शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

बधाई हो! अन्ना का लोकपाल लटक गया.

 बधाई हो! अन्ना का लोकपाल लटक गया. 

सुबह-सुबह वर्मा मिठाई के साथ हमारे घर पर धमक गये.हमने कुशल क्षेम पूछी .आज वे बहुत खुश
नजर आ रहे थे .हमने उनके चेहरे पर फुट रही ख़ुशी को देख कर पूछा-

वर्माजी,आज बहुत खुश नजर आ रहे हो ?क्या कोई परमोशन हो गया है क्या?

वर्माजी बोले -भाईसाहब ,इसे आप परमोशन ही समझ लीजिये. बधाई हो!लोकपाल लटक गया है.
वर्माजी हमारे पडोसी थे और सरकार के ऊँचे ओहदे पर विराजमान भी थे .हम कुछ समझ नहीं
पाए थे इसलिए उनसे विस्तार से जानना चाहा .
उन्होंने खुश होकर बताया-अन्ना की मांग पर जब देश के लोग भ्रष्टाचार पर आवाज बुलंद कर रहे थे
तब हमारी तो जान पर बन आई थी .हमारा केरियर ही पानी पानी हो रहा था.बड़ी रकम चुकाकर यह
मलाईदार नौकरी पायी थी कि अन्ना टपक पड़े .हम तो सचमुच के फँस गये थे .लाखो रूपये बाँट दिए थे
और लोकपाल के कारण उस पैसे की रिकवरी की संभावना पर पानी फिर रहा था .शनि देव की साढासाती
साफ दिखाई दे रही थी मगर भला हो सरकार का की वो लच्चर बिल लायी जिस पर सहमती बननी नहीं
थी और रात बारह बजे जनसेवकों ने लोकपाल की बारह बजा दी .

हम हेबताये से उनका चेहरा देख रहे थे और उनके द्वारा लाया गया मिठाई का डिब्बा हमें मुंह चिढ़ा रहा था .
वर्माजी के जाने के बाद हमने टी.वी.  पर समाचार लगाए तो सुनाई दिया की लोकपाल लटक गया है .

हमारा दिल रोने को कर रहा था की दरवाजे की घंटी फिर से बज गयी .अनमने भाव से दरवाजा खोला
तो सामने नेताजी खड़े थे .हाथ में लड्डू भरा थाल था .हमें देखते ही बोले -लो लड्डू खाओ बेटा!
हमने पूछा -नेताजी,चुनाव तो होने बाकी है .अभी से लड्डू ?

नेताजी बोले-बेटा ,यह चुनाव जीतने के लड्डू नहीं है ,यह तो लोकपाल के लटकने की ख़ुशी में बाँट रहा हूँ .

हमने पूछा -नेताजी,लोकपाल के लटकने से आपको क्या ....?

वो बोले-बेटा,अब पुरानी फाइल खुलने का डर नहीं है,अन्ना के कारण तो जान ही सांसत में आ गयी थी .
एक बार तो लगा मृत्यु घंट बजने ही वाला है ,भगवान् के जाप भी चालु करवा दिए थे ,दिन रात यही चिंता
थी की अब क्या होगा? जमा धन भी जनता लूट लेगी और चक्की भी पिसवाएगी. जो होता है,अच्छा ही
होता है ,बड़ी मेहनत के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया इसलिए पूरी गली में लड्डू बाँट रहा हूँ.

नेताजी के जाने के बाद हमने लड्डू को जोर से आँगन में फ़ेंक दिया और मायूस होकर मातम मनाने
लगे ,मगर आज हमें सुख पूर्वक मातम भी नहीं मनाने दिया जा रहा था .हम घर की कुण्डी लगाकर रोना
चाहते थे की दरवाजे की घंटी फिर बज गयी .दरवाजे पर धर्मिबाबू खड़े थे .
हमने उनको अन्दर आने का आग्रह किया .आज बाबू बड़े खुश थे .हमने उनके चेहरे पर ख़ुशी देख कर
पूछा-बाबू आज बहुत खुश हैं क्या बात है?

धर्मिबाबू बोले-चाचा ,रेलवे की नौकरी करते अभी दौ ही बरस हुए थे की अन्ना की नजर लग गयी .इतनी
उम्र में भी बन्दर गुलाट मार रहा था.एक तो मुसीबत के मारे मुसाफिर को सोने के लिए बर्थ दो और वह
भी बिना कुछ दक्षिणा के .हम रात-रात भर जागते हैं ,घर बार छोड़ रेल के धक्के खाते हैं ....

हमने उनकी बात को बीच में काटकर उनसे पूछ ही लिया -मगर इसके बदले में वेतन तो मिलता ही है.

वो बोले -चाचा,आप भी ....इतने से वेतन के लिए कौन इस धंधे में आता है,ऊपर का व्यवहार है इसलिए
इस काम में बैठे थे .अन्ना के साथ लोगों का हुजूम देखकर तो एक बार तो मेने नौकरी छोड़ देने की ठान
ली .भला हो आपकी बहु का कि उसने हिम्मत बँधायी.लक्ष्मी के व्रत चालु किये .अन्ना को सुम्मती के
लिए मंदिरों में प्रार्थना की.अन्ना बीमार पड़े ,अनशन टूटा तो कुछ आस बंधी ,लगा देश की जनता फिर से
कुम्भकरण की नींद में सो गयी है और उधर देवदूतों ने लोकपाल को लटका दिया .आप अब मेरे द्वारा लायी
मिठाई खाईये .

धर्मी के जाने के बाद हम भी दफ्तरों के काम से बाहर निकले .बाहर सड़क पर मायूस लोगों की भीड़ थी
चेहरे उतरे हुए थे मगर हर दफ्तर में आज रोनक थी .सब खुश थे .अन्ना की हार का जश्न चल रहा था .

हमने अपनी अर्जी बाबू को दी -बाबू ने आँखे तरेर कर कहा -चल बे ,कल आना .आज तो लोकपाल के
लटकने का जश्न है ,कल आना,काम हो जाएगा मगर हेकड़ी दिखाते खाली हाथ मत आना ,वरना काम
लोकपाल की तरह लटक जाएगा.

हम सुनहरे सपने को जल्द भूल जाना चाहते थे जो अन्ना ने दिखाया था और मन को समझा रहे थे कि
बेटा जिस तरह तेरा बाप जीया था उसी तरह से तू भी जीना सीख ले और बच्चो को भी सिखा दे क्योंकि
कोयले को कितना ही दूध से धोले मगर फिर भी वह काला ही रहेगा .            

सशक्त था फिर भी कौमा में............!!!

सशक्त था फिर भी कौमा में............!!!

मेरे देश के नेता ,सचमुझ आप जनता को उल्लू बना गए हैं! न नौ मन तेल होगा ना राधा
 नाचेगी. जब मजबूत लोकपाल लाना ही नहीं था तो सारी कवायद किसलिए की गयी?


जनता भ्रष्टाचार से परेशान थी ,है मगर उससे निजात दिलाना कोई दल नहीं चाहता है.क्योंकि 
दूध का धुला कौन है या फिर हमाम में सब ..........!!


जनसेवक के मुंह से अन्ना की आलोचना.... मतलब सियार को शेर की मांद में घुसने से 
जयमाला नहीं मौत ही मिलती है,और अन्ना भी भ्रष्ट नेता को शेर की मांद में घुसाने का कह
 रहे थे !!


अन्ना आन्दोलन मुंबई में फ्लॉप हो गया !जनता के लापरवाह होने का मतलब लोकपाल लटक 
गया !!लापरवाही का फल अन्ना को नहीं जनता को ही सहते रहना है!!! 
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                                                चुटकला

पहला दल-मैंने  तो जोकपाल   की कमर तोड़ दी .


दुसरा दल-मैंने तो जोकपाल  की टांग मरोड़ दी .


तीसरा दल-मैंने तो जोकपाल की जबान खींच ली 


चौथा दल-मैंने तो जोकपाल की नस काट दी .


पांचवा दल-यह करामात तुम लोगों ने नहीं की है ,ये तो हमारी करामात थी जो ऐसा जोकपाल 
 लाये की उसमे कोई जान ही नहीं थी .
   

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

कौआ जीत गया .

 कौआ जीत गया . 

एक जंगल में पीपल और बरगद के दौ पेड़ नदी के किनारे पास पास में लगे थे.एक पेड़ पर कौए रहते
थे और दुसरे पेड़ पर हंस ,बगुले ,बतख रहते थे .हंस स्वभाव से भले थे ,बतखें लालची थी और बगुले
धूर्त थे .कौओ ने जब एक समुदाय को अलग अलग मत के साथ देखा तो उन्होंने हंसो पर शासन
चलाने की सोची ,मगर उनके स्वार्थी स्वभाव ने सज्जन हंसों से हमेशा मात खायी थी .कौए मौके की
ताक में रहते थे जब उन्होंने हंस,बगुले और बतख के विचारों की भिन्नता को देखा तो हंसों को हराने
 की तिगडम लगायी.
     कौए संख्या में ४० थे,हंस ३५ ,बगुले १० ,और बतखे १५.  हंस,बगुले और बतख कुल मिलाकर ६०
 की संख्या में थे इसलिए हंस सदैव कौओ पर भारी पड़ते थे .कौओ के कुछ घाघ नेता बगुलों के पास
गये और बोले -"बगुला भैया, आप सभी हर दिन नदी के किनारे मछलियो के शिकार के कितनी
मेहनत करते हैं .सुबह से शाम तक पूरी लगन से एकाग्र चित होकर शिकार के लिए लगे रहते हैं .
हमारे पास एक योजना है जिस पर अमल करने से आपको भरण पोषण के लिए बहुत कम मेहनत
करनी पड़ेगी "

बगुले कौओ की बात सुनकर कौओ से  योजना पूछने लगे .कौओ ने कहा-"पीपल और बरगद के पेड़
 पर रहने वालो की सारी व्यवस्था के लिए एक मुखिया चुन लेते हैं .आप लोग हंसो को देखिये ,ये लम्बी
उड़ान भरकर मोती चुनते हैं और आप लोग जल के पक्षी होने के बाद भी बड़ी मुश्किल से पेट भर पा रहे
है यदि आप हमें अपना नेता चुन ले तो फिर हम आपके  भोजन के लिए ताजा मछलियों की व्यवस्था
हर दिन कर देंगे"
.
बगुलों ने कहा -"हम हंसो से बैर नहीं ले सकते"
 .
कौओ ने समझाया- "आपको  बैर नहीं लेना है.जिस दिन पेड़ों का नेता चुनेगें उस दिन आपको गायब
रहना है" . बगुलों ने कौओ की बात मान ली .
उसके बाद कौए बतखों के पास गए और बोले -प्यारी बतखो ,आप पेट भरने के कितनी मेहनत करती
 हैं यदि आप हम लोगो को नेता चुन लो तो आपके भोजन का प्रबंध हम कर देंगे ".बतखे लालच में आ
गयी और कौओ के समर्थन में हंसो का साथ नहीं देने का वादा कर लिया .अब कौए हंसों के पास गये
और बोले - "दादा,दोनों पेड़ो का मुखिया चुन लिया जाए ताकि सब आराम से रह सके" .

हंसो ने अपनी जाती बंधुओ की संख्या जोड़ कर नेता चुनने की हामी भर दी .

निश्चित दिन पर नेता चुना जाना था .जिस दिन नेता चुनने का समय आया तो बगुले गायब हो गये.
कौए,हंस और बतखे नेता चुनने में लग गये .चुनाव के लिए एक हंस और एक कौआ उम्मीदवार के
रूप में खड़े थे .हंसो को भरोसा था बतखे इन्ही के पक्ष में रहेगी मगर बतखो ने कहा-"हंस दादा और
कौए भैया हमारे लिए तो दोनों ही अच्छे हैं इसलिए हम किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं जाना चाहती
हैं और ना ही हम चुनाव में मत देंगी ".
अब तो चुनाव में हंस और कौए ही बचे थे .इन दोनों के बीच में मतदान हुआ और हंस हार गये .
                  

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

सवाल ..........?

सवाल ..........?

क्यों अन्ना हजारे की लोकप्रियता के सामने राजनैतिक नेता बौने लगते हैं?

क्या चुनाव जीतने के लिए जातिवाद का जहर फैलाना सामाजिक अपराध नहीं है ?

क्या मुस्लिम आरक्षण से मुस्लिम बिरादरी का वास्तव में  भला हो जाएगा?

क्यों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को राजनैतिक बिरादरी पचा नहीं पाती है ?

क्यों अखरता है जनसेवकों को ,जब जनता खुद के मंच से अपनी आवाज रखना चाहती है?

कैसा कानून होना चाहिए इस पर आम जनता की भागीदारी क्यों स्वीकार नहीं होती है ,
    जबकि उस कानून को आम जनता पर लागू  करना होता है?

क्या लोकपाल के अधिकारों पर संदेह जताना लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमारा अविश्वास नहीं
   दर्शाता है?

जो नेता अन्ना पर आरोप लगाते हैं क्या वे अपने को अन्ना जितना खरा साबित कर सकते हैं?

क्या जन सेवक  नागरिको को आदेश दे इसलिए चुने जाते हैं?

क्या जनहित के मुद्दे को एक दुसरे पर कीचड़ उछाल कर दबा देना देश के हित में है?

यदि कानून बन जाने से कुछ नहीं होगा तो फिर जनलोकपाल को पारित करने में डर कैसा ?

क्या उदारीकरण का रास्ता भारत को सशक्त बना पाया है?

क्या महंगाई के आंकड़े वास्तविकता के निकट हैं और आंकड़े घटने पर वास्तव में गरीब सुखी
   हो पाता है?

क्या गरीब और अमीर का बढ़ता आर्थिक असंतुलन हमारी नीतियों पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाता है?

क्या संसद की बहस के सामने जनता की बहस मूल्य रहित है?

क्या चुने हुए नेता ही हर बात पर ज्यादा समझ रखते हैं चाहे वे कम पढ़े-लिखे हो ?

ये कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढ़ नहीं पा रहा हूँ , मदद कीजिये.                

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

लोकतंत्र है कहाँ?

लोकतंत्र है कहाँ?


एक मदारी चौपाल पर अपने बन्दर और जम्बुरे के साथ आ जाता है .डुगडुगी बजाता है .तमाशबीन
इकट्टे हो जाते हैं फिर जम्बुरे की आँखों पर मदारी काली पट्टी बाँध देता है और जम्बुरे को जमीन
पर लेटा देता है .जम्बुरा भी अनपढ़ और मदारी भी अनपढ़ ,मगर सवाल पेट का है,इसलिए मजमा
लगाता है ,डुगडुगी बजाता है और जम्बुरे से सवाल करता है -

 मदारी - जम्बुरे ,बता लोकतंत्र है?
जम्बुरा- उस्ताद, तमाशा देखने वाले त्रस्त है इसका मतलब लोकतंत्र है.

मदारी- जम्बुरे, कुछ और पहचान बता.
जम्बुरा- सरदार, हित की बात पर फब्तियां, अहित की बात पर शाबासी.
 
मदारी-लोकतंत्र का रंग कैसा होता है ?
जम्बुरा-उस्ताद, गिरगिट की तरह... कभी भगवा, कभी हरा, और कभी सफेद.


मदारी- क्या लोकतंत्र के आँखें होती है?
जम्बुरा- उस्ताद, आँखे तो होती है मगर या तो बंद होती है या नीची.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र करता क्या है?
जम्बुरा- सरदार, गपल्ले.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र के पैर होते हैं ?
जम्बुरा- उस्ताद, पैर तो होते हैं मगर अढाई दिन में एक फलांग आगे और एक फलांग पीछे चलता है.
   

मदारी-जम्बुरे, लोकतंत्र के हाथ होते हैं या नहीं ?
जम्बुरा-उस्ताद, हाथ तो होते हैं मगर बाँध के रखता है.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र खाता क्या है?
जम्बुरा- गरीब की हाय, मजबूर से रिश्वत.


मदारी- जम्बुरे लोकतंत्र का पेट कैसा होता है ?
जम्बुरा- हराम का पचा जाता है मगर बाहर से पिचका हुआ दिखता है.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र खुश कब होता है?
जम्बुरा- उस्ताद, जागते को सपना दिखा कर.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र रोता कब है?
जम्बुरा- कभी पांच साल में तो कभी मंझधार में.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र की ताकत क्या है?
जम्बुरा- पैसे में बिकते वोट.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र सोता कब है?
जम्बुरा- उस्ताद,दिन के उजाले में.


मदारी- लोकतंत्र के कपडे कैसे होते हैं?
जम्बुरा- उस्ताद, मुझे तो दिखाई नहीं देते.


मदारी- लोकतंत्र का चेहरा कैसा?
जम्बुरा- चेहरा नहीं उस्ताद, चेहरे पर चेहरा.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र में सुखी कौन?
जम्बुरा- इस लोक में तो तंत्र सुखी.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र कहाँ नहीं ?
जम्बुरा- मुझ में, तुझ में और अपने बन्दर में.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र है कहाँ ?
जम्बुरा- ".........................................."












शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

अब चोर जमात है खतरे में

अब चोर जमात है खतरे में


ये इन्कलाब के नारे ,
ये बगावत के नारे, 
अब सहन नहीं होंगे;
क्योंकि-
यह जेहाद फैलाते है, 
सोये हुए को जगाते है, 
कायरों में जान फूंकते है. 
इसी इन्कलाब ने- 
फिरंगियों को खदेड़ा था, 
भारतीयों को जोड़ा था, 
आपातकाल को मरोड़ा था,
आज यही इन्कलाब- 
बच्चे,बुड्ढे,युवा,सब के खून में उबल रहा है; 
सच्चाई का गरमागरम लावा उगल रहा है; 
अधिकारों को पाने का संग्राम सिखा रहा है; 
चुने हुए शातिरों पर सीधी अंगुली तान रहा है.
यह बुझने वाला दीया-
पल-पल नयी मशाल जला रहा है.
यह बुझने वाला दीया 
पल-पल नयी जोत फैला रहा है.
टिमटिमाते दीये पर, 
आंधी बन कर टूट पड़ो.
मुट्ठी बनते हाथों पर, 
 कहर बन कर फूट पड़ो.
अभिव्यक्ति की आजादी पर, 
सीधा-सीधा वार करो .
अधिकार मांगनेवालो पर, 
मुक्का बन कर बरस पड़ो.   
सख्त लोकपाल के आने पर, 
हर दल का पग है दलदल में .      
भूलो अपने मतभेदों को 
अब चोर जमात है खतरे में






रविवार, 18 दिसंबर 2011

हिन्दुस्तान कब कहेगा ?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि ब्रिटेन एक ईसाई देश है और ''हमें ये बताने
 में डरना नही चाहिए''.


सवाल यही से उठता है हम विश्व को कब कहेंगे कि भारत भी हिन्दू राष्ट्र है.हमारे नेता अपने 
को सर्वधर्म का सिर्फ सन्देश सुनाते हैं मगर तुष्टिकरण कि राजनीति करते हैं.

जब ये लोग मंच से मुस्लिम तुष्टिकरण कि बात सार्वजनिक रूप से करते हैं तो कोई भी दल 
यह कहने का साहस नहीं करते हैं कि ये गलत है, यह अन्याय है, पक्षपात कि राजनीति है.


आज हिन्दू अपने ही देश में बेगाना हो गया है ,नेता लोग एक ही भाषा समझते हैं -वोट 
और वोट बैंक. हिन्दू भी यदि संगठित रूप से वोट बैंक बन जाए तो क्या मजाल हिन्दू हित 
कि अनदेखी हो, मगर हिन्दू कि आपस कि लड़ाई ही उसे डूबा रही है.


क्या दलित, अनुसूचित जनजाति,जनजाति ये सभी हिन्दू नहीं है ?मगर हिन्दुओ को आपस में 
लड़ाकर विभेद पैदा किया जा रहा है और राजनीति कि रोटियाँ सेकी जा रही है .


आरक्षण के नाम पर ,जाती के नाम पर ,धर्म के नाम पर हिन्दू हितों को ही कोसा जाता है ?
कोई दल यह नहीं कहता कि आरक्षण का आधार जाती नहीं आर्थिक स्थिति होनी चाहिए ?


जाती के नाम पर दलित,अगड़ा,पिछड़ा ,जनजाति ,अनुसूचित जाती ये सब हिन्दुओ को तोड़ने 
या कमजोर करने वाली बातें है.


जब कोई नेता ऐसा बातें मंच से करता है तो कोई भी आवाज नहीं होती है,ये कैसा सर्वधर्म 
समभाव है ?एक को सुविधा और एक कि अनसुनी .


दोष भी हिन्दुओ का है क्योंकि वे वोट बैंक नहीं हैं .            

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

क्षणिकाएँ -- जन लोकपाल

क्षणिकाएँ 

जन लोकपाल  


सरकारी कयास,
जनता के,
फोड़ लो- कपाल,
अन्ना के प्रयास-
जन लोकपाल .



सम्पूर्ण भ्रष्टाचार,
नहीं मिटा सकता,
जन  लोकपाल.
इसलिए -
सरकार चाहती है लाना,
low -कपाल .


जन लोकपाल के
अर्ध  विराम,
मंजूर नहीं है.
उभर रही है,
आम सहमती ,
लग जाए ,
पूर्ण विराम.
 






  

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

मनुष्य स्वभाव का विश्लेषण

 मनुष्य स्वभाव का विश्लेषण 

मानस मर्मज्ञ मुरारी बापू के श्री मुख से मनुष्य स्वभाव का विश्लेषण सुना ,तब लगा की हमारे पौराणिक 
ग्रन्थ गहन विश्लेषण के बाद ही लिखे गए हैं .मनुष्य का स्वभाव कितने प्रकार का हो सकता है .हम यदि 
किसी के स्वभाव को समझ सकने में सफल हो जाते हैं तो बहुत से व्यवधानों से बच सकते हैं .मनुष्य 
का स्वभाव हमारे महर्षियों ने १४ प्रकार का बताया है -


१.मिट्टी -मिट्टी का स्वभाव पानी डालने पर कोमल और पानी सुखाने पर कठोर होता है .जब तक 
      ज्ञान दो ,समझ दो तब तक कोमल और जैसे ही ज्ञान देना बंद करो स्वभाव पुन:कठोर हो जाता है. 


२.छलनी-जब अनाज छानने के लिए छलनी में अनाज डाला जाता है तब छलनी के छिद्रों से अधपका
    और कणी अनाज बाहर निकल जाता है .छलनी सार रूप अनाज को अपने अन्दर रख लेती है ठीक 
    इसी तरह मनुष्य का भी स्वभाव होता है ऐसे लोग सार बात को ग्रहण कर लेते हैं और थोथी बातें 
    बाहर फ़ेंक देते हैं .


३. भैसा - भैसा आलस का प्रतिक माना गया है ,भैंस दिन भर पानी में रहने के बाद भी पानी पीने का 
       काम घर पर ही करती है और पानी से निकल कर गन्दा कीचड़ खुद पर उंडेल लेती है ,ठीक ऐसा
      भी स्वभाव होता है सही स्थान ,समय और परिस्थिति का उपयोग नहीं कर पाते या फिर आज के 
      काम को कल पर टालते रहते हैं और जग हंसाई के काम कर बैठते हैं. 


४. हंस   -हंस उपयोगी वस्तु को ग्रहण कर लेता है और विवेकशील प्राणी होता है ,किसी के काम में 
        बाधा नहीं डालता है इसी तरह के स्वभाव वाले लोग विवेकशील होते हैं .जानबूझ कर आग 
        लगाने का काम नहीं करते हैं .


५.तोता  - तोता रट्टा लगाने वाला जीव है जो अर्थ समझे बिना सिर्फ रटता रहता है ,ठीक ऐसे ही 
      स्वभाव वाले लोग सूक्तियों या मर्म को समझे बिना शास्त्रों को घोकते रहते हैं जबकि पल्ले कुछ 
      भी नहीं पड़ता है और उनका ज्ञान भ्रम या छलावा उत्पन्न कर देता है.


६.घोडा   -     घोड़े पर बैठकर घुड़सवार जब उसका मार्गदर्शन करता है तब तक घोडा लक्ष्य की और 
         दौड़ लगाता है और घुड़सवार के उतरते ही एक जगह खडा हो जाता है यानि इस तरह के लोग 
        जब तक हाथ में डंडा होता है तब तक काम करते हैं .डंडा गायब होते ही पहले जैसा बन जाते हैं .


७.बिल्ली  -बिल्ली को रबड़ी खिलाओ या बादाम केसर का दूध पिलाओ मगर चूहा देखते ही छलांग 
     लगाती है .ऐसे आदमी को स्वार्थी स्वभाव की उपमा दी गयी है. 


८.कोआ -काक की गंदगी में चोंच मारने की बुरी आदत होती है.कोआ अकृतज्ञ होता है .इस प्रकार के 
     इंसान जिस व्यक्ति के कारण उन्नति हुई है उसका भी नुकसान करने से नहीं चुकते हैं.


९.मच्छर  -मच्छर स्वभाव के लोग अकारण ही बक-बक करने लग जाते हैं तथा शांति और आराम में 
       खलल डालने का काम करते हैं.दुसरे का सुख -चैन इन्हें फूटी आँख नहीं सुहाता है.


१०.जोंक या ज्लौक   -पानी में आडी होकर चलने वाली जंतु जो दुसरे का खून चूसने का स्वभाव रखती
       है इस स्वभाव के लोग जानबूझ कर आग  लगाते हैं और दबे कुचले का खून चुंसते हैं. 


११.छिद्र कुम्भ  ऐसा घडा जिसके पेंदे में छेद हो .ऐसे लोग कोई भी बात नहीं समझने वाले मुर्ख होते हैं.
        समझ बिलकुल टिकती नहीं ,ज्ञान को तुरंत बाहर फेंक देते हैं .


१२.पशु  -पशु अभ्यास तथा चिंतन रहित जीने वाला प्राणी है.पशु और भैंस में इतना ही अंतर है की पशु 
     पानी के तट को छिछ्लाता नहीं है जबकि भैंस पानी पीकर सिंग से पानी को छिछला कर देती है.


१३.सांप    - सांप को दूध पिलाने पर भी जहर ही उगलता है उसके पास विष के अलावा कुछ भी नहीं 
       होता है ,ऐसे लोग उपकार का बदला भी अपकार से चुकाने वाले होते हैं .


१४.पत्थर  -पत्थर पर कितना ही शीतल जल बरसा दो मगर उस की कठोरता पर कोई फर्क नहीं पड़ता 
       इस प्रकार के लोग प्रेम और संवेदना से रहित होते हैं .


       हमें पग-पग पर ऐसे ही लोग मिलते रहते हैं यदि हम उनके स्वभाव को परख नहीं पाते हैं तो 
जीवन भर हानि उठाते रहते हैं. 
   

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

यह भी सच है ---------

यह भी सच है ---------

 जनहित की चुपड़ी बातों से चौपाल पर वोट फँसाये जाते हैं.


किसान का पसीना तब तक ही खुशबूदार होता है जब तक वह वोट नहीं दे देता.

दलित के घर फेरी देने से राज सिंहासन का शुभ योग बन जाता है.


राजतिलक के लिए युवराज ही चुना जाता है, बुद्धिमान नहीं .


गांधी विचार के लोग बखेड़े खड़े कर देते हैं इसलिए गांधी जाती को मजबूत करते हैं .


अल्पसंख्यक वेतरनी नदी को पार लगाने वाली नौका ही तो है .


आयात किये गये विचार देशी पुराणों कि सूक्तियों से बढ़कर माने जाते हैं .


विदेशो में सम्मान पाने के लिये स्वाभिमान को बेच देना किफायती सौदा है. 


दागी लोगों को ही मंदिर रास आते हैं ,शरीफ तो दूर से ही कन्नी काट लेते हैं .


महंगाई को कम करने के लिये आंकड़ों के झाड़ पर वार कीजिये .


समस्या का सबसे अच्छा हल उसे अनदेखा करने में है.


सवा सौ को खुश करने से इक्कीस है एक घर की चमचागिरी करना.


पूंछ को मजबूती से पकड़ के रखिये आप कहीं ना कहीं तो पहुँच ही जायेंगे .


राम सुमिरन से जग पार और वंश सुमिरन से चुनाव पार . 


वादा करने में कंजूसी क्यों ,कंजूसी अमल करने पर रखिये.


मुकर जाना या धोखा देना कला है ,सज्जन इसमें अनाड़ी सिद्ध होते हैं.


दाम से काम, सफलता का शोर्ट-कट फॉर्मुला है.


जन सामान्य का पेट सरकार की आलोचना करने से भर जाता है.


न्याय की बात से दुश्मनी पनपती है इसलिए गूंगे बहरों के दुश्मन कम होते हैं.


अवमानना का दोषी नेता नहीं होता है,क्योंकि वह पहुँच से परे है.


अड़ियल लोग सच को पकडे रहने की बेवकूफी करते हैं,दूर द्रष्टा छोड़ देते हैं .


दौ कौमो में संघर्ष -संभावना है शीघ्र चुनाव होंगे.


शहर की सड़के साफ है ,मतलब लाल बत्ती इस रास्ते से जायेगी.    





           

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

गूंगी बस्ती ...........jagran junction forum

गूंगी बस्ती ...........


गूंगी बहरी जिन्दी लाशें, हर तरफ बिखरी पड़ी है .
आज यहाँ की सारी बस्ती, दिन में भी सोयी पड़ी है.


बस्ती में बसते गूंगों को, सही गलत की कहाँ पड़ी है.
जान बची तो लाखों पाये,सड़ते सच की किसे पड़ी है.


लड़ पड़ते छोटी बातों पर, बड़ी बात की किसे पड़ी है.
मेरी माला - तेरी टोपी,हर बात यही पर फँसी पड़ी है.


आग लगी है जिसके घर में ,तुमको उसकी क्यों पड़ी है.
बुझ जाये तो मिल के आना,जंग लड़ने की कहाँ अड़ी है.


लुटपाट चोरी मक्कारी, दलदल में यह नाव धंसी है.
चोर लुटेरे करे फैसले ,सच सुने ,कहे,तो मौत खड़ी है.  

      

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

थूंक के चाटना

थूंक के चाटना  


भरी दोपहर में बच्चों के हो-हल्ले ने हमारी नींद में खलल डाल दी थी, रविवार को ही थकान उतारने का
समय मिलता है और इस दिन भी बच्चों का हंगामा .हम तेस में आ गए ,फटाफट कमीज डाली और
निकले बच्चो को सबक सिखाने .

 बच्चों इस भरी दोपहरी में क्यों चिल्ला रहे हो ?

एक बच्चा बोला -"अंकल ,हम सरकार -सरकार खेल रहे थे मगर टौमी ने गलत फैसला लिया इसलिए
ये हो-हल्ला हो गया."

हमने टौमी की खबर ली -क्यों रे ,क्या फैसला कर दिया की इतना हंगामा कर दिया ?

टौमी बोला-"अंकलजी ,हम दूकान लगा रहे थे इसलिए रामू ,शामू ,बबली ,बबलू की दुकाने बंद करने का
आदेश दिया ,लेकिन ये मेरी बात को मान ही नहीं रहे थे .

हमने उन बच्चों से पूछा -टौमी को तुम लोगो ने अपना लीडर चुना और इसकी बात भी नहीं मानकर
तुम खेलने की जगह लड़ने लग गये,ऐसा मत करो ,और बिना हो-हल्ला किये खेलो .

बच्चे बोले-अंकल ,हम जब तक फैसला टौमी नहीं बदलता है तब तक नहीं मानने वाले.ये हम चारों को
नुकसान पहुंचा करके खुद अकेला दूकान चलाना चाहता है.

हमने कहा-बच्चो ,टौमी की सोच बड़ी है .देखो ,टौमी की बड़ी दूकान से तुम लोगो को चोकलेट सस्ती
मिलेगी .ये ज्यादा मात्रा में खरीद कर सस्ता लेगा और तुम्हे भी सस्ता देगा .

मेरी बात का विरोध कर रामू बोला -लेकिन अंकल हम चारों की तो दुकाने बंद हो गयी ना .हम ये बात
नहीं मानेगे .तभी शामू चिल्लाया -अंकल -हाय-हाय .

मेरे विरोध में सभी बच्चे नारे लगाने लगे तो मेने उनको डपट कर चुप किया और बोला -टौमी ,इनकी
बात मान ले और हंगामा ख़त्म कर .

टौमी सभी बच्चों को अपने खिलाफ देख बोला -अंकल ,आप कहते हैं तो मैं अपना फैसला बदल लेता
हूँ ,अब इन चारों की दुकाने बंद नहीं होगी .

सभी बच्चे खुश हो गये .तभी बबलू बोला -हम टौमी को इसे माफ नहीं करेंगे .हम उसको एक शर्त
पर अपने साथ खेलने देंगे यदि वह थूंक कर चाटे.

बबलू की बात सुन कर मुझे भी पसीने आ गये .अब तो सभी बच्चे बबलू के समर्थन में एक हो गये .
मैं तो बिना बात ही फँस गया था ,अब कैसे बच्चो को समझाया जाए .बच्चे फिर हो-हल्ला करने लग
गये .टौमी भी बेचारा बन गया था .थोड़ी देर के हंगामे के बाद टौमी ने कहा -मैं एक शर्त पर ही थूंक
कर चाटूंगा?

सभी बच्चा पार्टी ने हो-हल्ला बंद किया और टौमी से शर्त पूछी .टौमी ने कहा -मेरे थूंक कर चाटने के
बाद खेल शान्ति से चलेगा और लीडर मैं ही रहूंगा.

बच्चे थोड़ी देर विचार विमर्श में लग गये और फिर टौमी की बात मान ली .

टौमी भी खुश होकर झट से अपनी हथेली पर थूंका और फट से चाट लिया .

बच्चो का खेल फिर से शुरू हो गया और मेने भी आई आफत को टलते देख घर का रुख किया            

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

गीता - निराशा और असफलता से मुक्ति की गाथा

गीता - निराशा और असफलता से मुक्ति की गाथा 


हम दौ बाते सहने में असमर्थ होते है -पहली वस्तु दु:ख और दूसरी असफलता .इन दोनों ही परिस्थियों में 
व्यक्ति टूट जाता है ,उसे हर अगला कदम हताशा से भरा लगता है .जब भी व्यक्ति हताश होता है तो उसे 
दुनिया के सभी रंग फीके लगते है ,उसे अपने जीने का मौह भी नहीं रहता है. 


निराशा और असफलता में साम्यता - व्यक्ति के निराश होने और असफल होने के विभिन्न कारण हो 
सकते हैं लेकिन इन परिस्थियों में साम्यता भी है .जब भी हम इन परिस्थितियों से गुजरते है तब हमें 
अपना लक्ष्य बहुत दूर लगता है ,हमारी चेतना कुंठित हो जाती है,विवेक काम करना बंद कर देता है ,मन 
ऐसे समय में आँसू ही बहाता है .इन परिस्थियों से सहज रूप से कैसे बचे ?किन सिद्धांतो से जिए की हम 
पर बुरा समय अपना प्रभाव न दिखा पाये. इसका सही उत्तर है" श्रीमद भगवद गीता "


गीता पर चर्चा से पहले हम यह समझ ले की असफलता क्यों मिलती है?


असफल होने के कारण -


१.कमजोर इच्छा शक्ति का होना -हमारे में प्रबल इच्छा होनी चाहिए ,जैसे अन्तरिक्ष में उपग्रह को स्थापित 
करते समय उसकी उड़ान की तीव्रता प्रबल रखी जाती है .तोप से निकलने वाला गोला भी प्रबल गति के 
कारण सटीक स्थान पर मार करता है ,ठीक इसी तरह इच्छा शक्ति भी प्रबल होनी चाहिये.


२.बार -बार बदलता लक्ष्य - हम जब अपना लक्ष्य तय करते है उसके बाद उसका पीछा करने में पूरी तरह 
एकाग्र नहीं रहते ,थोड़ी सी भी लक्ष्य में बाधा दिखाई देने पर हम उस लक्ष्य को छोड़ नया लक्ष्य तय कर 
लेते हैं जबकि होना यह चाहिये की लक्ष्य पर पहुँचने के लिए एक योजना के असफल होने पर दूसरी 
योजना का क्रियान्वन .


३.विषय वस्तु पर कमजोर पकड़- हम गहन अध्यन के बिना ही किसी काम को शुरू कर देते हैं ,हम 
प्राप्त सूचनाओं का विश्लेकष्ण नहीं करते हैं और विपरीत परिणाम प्राप्त करते हैं.


४.ढिंढोरा पीटना - आपकी योजना बहुत गुप्त रहनी चाहिये जब तक की आपका काम ख़त्म होने को 
नहीं आ जाता ,मगर व्यक्ति अपने ही मन्त्र को अपनी ही योजना को बडाई मारने के लालच में उगल
देता है और असफल हो जाता है.

५.समय सीमा नहीं बनाना -व्यक्ति अपना लक्ष्य तय कर लेता है ,बढ़िया योजना बना लेता है और 
क्रियान्वन भी शुरू कर देता है मगर समय सीमा नहीं रखने से समय ही उस योजना को चाट जाता है.


६.स्वयं का गलत मूल्यांकन -हर आदमी दूसरों का मूल्यांकन बहुत मितव्ययता से करता है मगर खुद 
का मूल्यांकन बढ़ चढ़ कर करता है और मुझे सब कुछ आता है, का भ्रम पाल लेता है ,इस गलती का 
परिणाम असफल बना देता है.


७.पूर्वाग्रह - व्यक्ति जो पूर्वाग्रह में जीता है ,मन ही मन प्रश्न करता है और मन ही मन से जो उसे उचित 
लगे वह उत्तर गढ़ लेता है ,ऐसे व्यक्ति सत्य को परखना ही नहीं चाहते और असफल जीवन जीते हैं.


८.बिना विचारे काम करना - हम समय ,परिस्थिति ,स्थान ,सहयोगी और प्रतिस्पर्धी को समझे बिना 
काम कर लेते हैं और असफल होकर रोते रहते हैं.


९.अनुत्साह और आलसीपन -जब भी हमारा उत्साह कमजोर पड़ जाता है या हम काम के प्रति सजग 
नहीं रहते तब हम अवश्य ही काम बिगाड़ लेते हैं .


१०.अकर्मण्यता और टालमटोल - करने योग्य काम को नहीं करना और न करने योग्य काम करने से 
या फिर कर्तव्य कर्म को टालते रहने से हम असफल हो जाते हैं .


कैसे सफलता की तरफ ले जाती है भगवद गीता 


भगवद गीता निराशा से मुक्त कर देती है ,हर श्लोक अपने आप में परिपूर्ण है .महाभारत में कृष्ण सिर्फ 
सारथि धर्म को ही निर्वाह करते हैं ,मतलब यह की यदि मनुष्य प्रबल आत्मविश्वास से कर्म करने के 
पग भरता है तो प्रकृति उसका मार्गदर्शन करने के तैयार रहती है ,जरुरत है मजबूती से खडा होने की .
गीता "मेरापन " और " हमारा पन" यानि स्वार्थ तथा एकता की भावना के हानि और लाभ को दिखाती 
है.गीता दैवीय गुणों के विकास का मार्ग दिखाती है .गीता कर्म के हर अंग की विवेचना तर्क संगत रूप 
से करती है,गीता नीति को स्थापित करवाती है ,गीता अन्याय से लड़ने की शक्ति देती है ,गीता प्रेम के 
रूप का सूक्ष्मता से वर्णन करती है .गीता सच्चे वैराग्य में जीना सिखाती है ,गीता मृत्यु के भय से 
मुक्त करती है ,गीता निराशा को सहज ही तौड़ देती है .गीता कठिन परिस्थियों से संरक्षण करना सिखाती 
है .गीता व्यवस्था सिखाती है .इतनी बड़ी कौरव सेना से जीतना कोई आसान काम नहीं था लेकिन सही 
व्यवस्था से बड़े बड़ों पर काबू पाया जा सकता है .


गीता की व्याख्या ,टीका जरुर पढ़े .आप किसी भी धर्म के हो मगर जीवन को सच्चे अर्थ में जीना चाहते हैं 
तो विभिन्न विद्वानों द्वारा की गयी गीता की व्याख्या को पढ़े ,समझे और अमल करे .सी राजगोपालाचारी 
विनोबा,गांधी सभी दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों पर श्रीमद भगवत गीता का गहरा प्रभाव था 


हम अपने अमूल्य ग्रन्थ का बार बार मनन करे और निराशा से मुक्त हो सफल जीवन जिये.              

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

स्मार्टनेस

 स्मार्टनेस 


झूठ बोलना एक कला है ,मेहनत का काम है क्योंकि झूठ बोलने के बाद बोलने वाले को बोला गया झूठ
हर वक्त याद रखना पड़ता है ,बार-बार बोले हुए झूठ को स्मृति कोष में संचय करके रखना पड़ता है ,यदि
सावधानी नहीं रखी जाती है तो जबान कभी भी सच्च उगल देती है और झूठ नंगा हो जाता है.

किसी को विश्वास दिला कर धोखा देना सामान्य बुद्धि वाले का काम नहीं है.धोखा देने से पहले संवेदनाओं
और मन के कोमल भावों की ह्त्या करनी पड़ती है ,इसमें तपना पड़ता है .चेहरे पर प्रेम के बनावटी भाव
लाना और उसे बनाए रखना ,एक  लम्बी साधना है धोखा देना .

शब्दों से भ्रम फैलाने के लिए शब्द कोष को खंगालना पड़ता है ,विद्वता का काम है यह .विभिन्न अर्थ वाले
शब्दों का प्रयोग कोई हंसी खेल नहीं है.भ्रम में सामने वाला घाघ यदि नहीं फंसता है तो उन्ही शब्दों की
व्याख्या बदल देना एक निपुणता वाली बात है .

छल की रचना करना कोई सामान्य योजना बनाने जैसा नहीं है .असत्य को सही ठहराना और सटीक तर्क
प्रस्तुत करना एक कठिन विद्या है .

करोडो लोगों को मुर्ख बनाना भी विद्वता की निशानी है ,किसी को झांसे में लेने के लिए सुनहरे सपने
बुनने के लिए दिन रात एक करना पड़ता है ,नए पुराने ग्रंथों को पढ़ना पड़ता है उसके बाद पूर्ण रूप से
नयी कहानी तैयार करनी पड़ती है.

वर्ग विभेद फैलाना भी दुष्कर काम है ,इसमें विभिन्न जातियों के धर्मों का अध्ययन करना पड़ता है ,
उनकी दुखती नस को पकड़ना  पड़ता है,विभिन्न वर्गों की एकजुटता को तोड़ना पड़ता है ,धीमा जहर
फैलाना बहुत दुष्कर कर्म है .

काम निकाल लेना भी एक कला है ,इसके लिए प्रेम का ढोंग रचना पड़ता है ,स्नेह दिखाना पड़ता है ,
लोगो की समस्याओं से सिफ्त पूर्वक झुड़ने का दिखावा करना पड़ता है जब तक काम बन नहीं जाता
है तब तक सहन करना पड़ता है             

बुधवार, 30 नवंबर 2011

एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए ............

एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए ............ 


एक बड़ी समस्या से निपटने का कारगार उपाय यही है की दौ नयी समस्याओं को खड़ा कर दो .
लोग बड़ी समस्या को भूल जायेंगे और नयी समस्याओं पर माथाकुट करते रहेंगे .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए उसमे द्विअर्थी शब्द जोड़ दीजिये ताकि उसकी व्याख्या 
अपने मन मुताबिक की जा सके.


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए पुराने और नए दुश्मनों को जी भर के बेमतलब गालियाँ 
दीजिये , अंगुली उठाईये ,लोग आपको छोड़कर उन्हें पकड़ लेंगे.


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए मसालेदार सेक्स स्केंडल की खबर को आगे कर दीजिये 
लोग चटकारे लेंगे और आपकी जान छुट जायेगी .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए चुप हो जाईये ,लोग बकझक करके रह जायेंगे ,समस्या 
अपने आप पुरानी हो जायेगी .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए जनहित की नयी योजना की घोषणा कर दीजिये ,घाव 
पर मरहम लग जाएगा .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए बहुत सारे लोगो से एक साथ झूठ फेला दीजिये ,लोग भ्रम 
में पड़ जायेंगे और उनकी शक्ति कमजोर हो जायेगी . 


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए समस्या उठाने वाले की नींद हराम कर दीजिये ,झूठे 
मुकदमें में फंसा दीजिये ,समस्या स्वत:ठंडी पड़ जायेगी.


ये नयी व्याख्या मेने कहाँ से सीखी ?


मेरे देश के उन नेताओं के उपदेशो से जिनके कारण यह देश बेहाल और त्रस्त है .  

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

FDI और भारतीय खुदरा का दंगल

FDI और भारतीय खुदरा का दंगल 


एक जंगल में दंगल का आयोजन किया जाना था .दंगल में शेर और चीता की कुस्ती थी .चीता को लगा
शेर के हाथों दंगल में मौत निश्चित है .उसे चिंतित देख
सियार ने कहा-चीता भाई ,उदास क्यों हो ?

चीता बोला-इस दंगल में मुझे शेर से कुस्ती करनी है और मेरी मौत मुझे निश्चित लगती है .

सियार बोला -तुम्हे मैं बचा सकता हूँ ?

चीता बोला - कैसे?

सियार बोला- कुस्ती शेर से नहीं बिलाव से लडवा कर. तुम और बिलाव एक ही जाती के हो .मैं जंगल में जाकर सबको समझाऊंगा और दंगल के नियम में फेरबदल करवा दूंगा .
image by google 

सियार ने जंगल के पशुओं को समझाया और शेर की जगह एक सी खाल के दिखने वाले बिलाव के साथ
उसकी कुस्ती तय कर दी .नतीजा क्या आना था आप को भी मालुम है .यही है FDI और भारतीय खुदरा
की टक्कर का नतीजा .      












सोमवार, 28 नवंबर 2011

FDI का विरोध- वोट की ताकत से ताज और तख़्त बदल दीजिये - Jagran junction forum

FDI का विरोध-  वोट की ताकत से ताज और तख़्त बदल दीजिये  - Jagran junction forum

सरकार हम चुनते हैं और हमारे हित के फैसले लेने के लिए चुनते है ,यह लोकतंत्र की मूल भावना है .
केंद्र सरकार की  उदारवादी पॉलिसी गरीबों के हित में नहीं है .आजादी के ६४ वर्षों के बाद भी हमारी
समस्याए ज्यों की त्यों हैं ,गरीब और गरीब होता जा रहा है देश की विकास की तस्वीर ५% लोगो की
मुट्ठी में है .क्या अब भी हम धर्म ,जाती अगड़ा-पिछड़ा के नाम पर नेताओं की चाल में थिरकते रहेंगे ?
पहले अंग्रेजों ने लड़ाया अब आरक्षण ,अगड़ा- पिछड़ा ,अल्पसंख्यक ,बहुसंख्यक के नाम पर भिड़ाया
जा रहा है क्या हम आपस में लड़कर अपने भविष्य को बर्बाद कर लेंगे?

आज केंद्र में बैठे लोग जो फैसले हमारे अहित में ले रहे हैं और हम बेबस हैं ,हमारे हाथ से पांच साल का
तीर लग चुका है लेकिन निराशा की बात फिर भी नहीं है .हमारे मौलिक अधिकार हमें अभिव्यक्ति की ,
विरोध प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता देते हैं .सरकार यदि काले कानून लाती है तो उनका पुरजोर विरोध
हमारा प्रमुख हथियार है ,हमें जागरूक नागरीक बनने की जरुरत है.अपने आप को निडर बनाईये ,
संगठित हो जाईये ,भूल जाईये आपसी मनभेद को ,आपसी मतभेद को .

देश के खुदरा व्यापार को सरकार विदेशी हाथों में सौपने जा रही है ,यह हमारा हर तरह से सर्वनाश
 करने वाली बात है .सरकार का पक्ष बेतुका है ,वह इसमें किसानो का भला दिखाती है .अपना माल बेचने
 के लिए आज किसान के पास जितने विकल्प हैं वह FDI आने से कम  हो जायेंगे? आज किसान को जो
ज्यादा भाव देता है उसे ही माल बेच रहे हैं ,थोक व्यापारी की प्रतिस्पर्धा से किसान फायदे में ही है लेकिन
जब उसे अपनी फसल गिने चुने लोगो को बेचना पडेगा तब FDI का एकाधिकार उसे कंगाल नहीं बना देगा ?

किसानो की फसल खेत में ही नष्ट हो जा रही है,क्यों? कौन जबाबदार है ?उसकी फसल को सुरक्षित रखने
 के उपाय किसे करने थे ?उनकी उपज का सही भाव कौन तय करता है ?क्यों गन्ना किसान अपनी खड़ी
फसल को आग लगा देता है ?क्यों आन्दोलन कर रहे हैं कपास की फसल उपजाने वाले किसान ?हमारी
गलत नीतियों के कारण ऐसा हो रहा है ,क्यों मनमाने ढंग से कपास के निर्यात पर रोक लगाई पिछले वर्ष
जब किसान को अच्छे भाव मिल रहे थे ?किसान को गलत राजनीति का शिकार किसने बनाया ?

हमारे पास मिटटी की उर्वरा ,पहचान ,उत्तम खाद और उत्तम बीज का इन्फ्रा स्ट्रक्चर क्यों विकसित नहीं
हुआ ? क्यों नहीं हमने कोल्ड स्टेरोज विकसित किये ?हमने मनरेगा के लिए फंड बनाया, क्या काम आया
खुली लूट हुयी जनता के धन की .अगर यही पैसा भूमि सुधार ,कोल्ड स्टोरेज ,आधुनिक कृषि सयंत्र ,खेती
के लिए पानी और न्यूनतम दरों पर बिजली पर खर्च कर दिया जाता तो देश के किसान का जीवन स्तर
सुधर जाता ,मगर हमने ऐसा नहीं किया और अब उसी किसान को खून चूसने वाले परजीवियों के भरोसे
छोड़ देना चाहते हैं.आज उन्ही किसान के बच्चे मनरेगा के मजदुर बन गए हैं .

खुदरा व्यापार में करोडो भारतीय रोजी रोटी कमा रहे है करोडो परिवार पल रहे हैं .लाख दौ लाख से भी कम
पूंजी से वे लोग काम कर रहे हैं ,क्या उनकी आजीविका को छीन लेने वाले कानून बनाने के लिए चुना है
सरकार को ?यदि इस समय FDI को वापिस नहीं लौटाया तो आने वाले समय में खुदरा व्यापारी खत्म हो
जायेंगे .कैसे बाथ भिडायेगा एक- दौ लाख से व्यापार चलाने वाला अरबों रुपयों वाले FDI से ?मसल देंगे
विदेशी खुदरा व्यापारी उसे मच्छर की तरह.

सरकार से इस मुद्दे पर असहयोग कीजिये .शांतिपूर्ण अनवरत प्रदर्शन कीजिये ,आम आदमी तक अपनी
आवाज पहुंचाने के लिए दुकाने खुल्ली रखिये मगर बिक्री रोक दीजिये ,अपने पेंडिंग काम पुरे कीजिये ,जब
सप्लाई की चेन बंद हो जायेगी तो आपकी बात बहरे कानो तक पहुँच जायेगी ,एक दिन का बंद बेहरोंको
सुनाने के काफी  नहीं होगा ,अपनी लड़ाई को शांतिपूर्ण,लम्बी और धारदार बनाईये .

अगर फिर भी सरकार नहीं सुनती है तो कीजिये आने वाले चुनावों में अपने मत का प्रयोग और बदल
 दीजिये अहंकारी मतिहीन तख़्त और ताज को .यह आपकी ताकत है , पूरा उपयोग कीजिये .              

रविवार, 27 नवंबर 2011

शहीदों को नमन ........



    शहीदों को नमन ........


देश के सपूत  को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 

हम सभी सुख से यहाँ, तुम कितने दूर हो ? 
दिल में तेरी यादें हैं, होंठो पर तेरी बात है .
देश पर कुर्बान होकर, दी गर्व की सोगात है. 
जिन्दा है कसाब अब भी,बड़े शर्म की बात है.



देश के सपूत को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 


माँ भारती की गौद में, तुम चीर निद्रा ले रहे .
चर्चा हर चौपाल पर ,तेरी वीरता की बात है .
बच गया संसद भवन, दी फख्र की सौगात है .
जी रहा अफजल गुरु ,यह बड़े शर्म की बात है. 


देश के सपूत को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 



शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

समझ से परे सफाई देना मल्टी ब्रांड रिटेल पर

समझ से परे सफाई देना मल्टी ब्रांड रिटेल पर  


वाणिज्य मंत्री मल्टी ब्रांड रिटेल पर सरकार का पक्ष रख रहे थे .बातें आम आदमी हजम भी नहीं कर पा
 रहा है.हम मल्टी ब्रांड रिटेल को भारत की जरुरत कैसे मान सकते हैं ?जिस देश में ८५%आबादी बुनियादी
सुविधाओं से वंचित है .लोगो के पास खुद का मकान तो दूर दौ समय का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो रहा
है,बच्चो की शिक्षा की व्यवस्था नहीं है ,पीने का साफ मिट्ठा पानी उपलब्ध नहीं है ,युवा बेरोजगारी के
.खप्पर में है,और मंत्री महोदय इसे भारत की जरुरत बता रहे हैं .समझ से परे बात......

मंत्री महोदय कह रहे थे की मल्टी ब्रांड रिटेल कई संस्थाओं  और राज्यों की मांग है ,उन्होंने यह नहीं बताया
की वे राज्य या संस्थाए कौनसी हैं?भारत का कौनसा ऐसा राज्य है जिसमे बुनियादी समस्याए नहीं हैं ?
वे चीन से और विकसित देशो से भारत की तुलना करते नजर आये .क्या हम चीन और विकसित देशो के
बराबर हैं ?जिस देश का बच्चा जन्म लेते ही हजारो रुपयों का कर्ज लेकर जनम लेता है वहां मल्टी ब्रांड को
कैसे उचित ठहराया जा सकेगा ? तथ्य समझ से परे .........

वाणिज्य मंत्री इसमें किसानो का भला देखते हैं ,आप राष्ट्रीय भाषा में कहते तो शायद आम आदमी बात
 सुनता भी मगर आपने जो कहा उसे तो भारत की ५%जनता ही समझ सकी .उन्होंने माना की की हम
६४ वर्षों खाद्य में इन्फ्रा स्ट्रक्चर नहीं बना पाए जबकि बड़ा उत्पादन करते हैं तो क्या अब मल्टी ब्रांड रिटेल
आने से इन्फ्रा स्ट्रक्चर मजबूत हो जाएगा .बात गले नहीं उतरती ,समझ से परे .........   

इतिहास कुछ कहना चाहता है ...

इतिहास कुछ कहना चाहता है ...


जब नीतियाँ ही आम लोगो के खिलाफ बनेगी तो आम आदमी क्या करेगा ? सिंगल ब्रांड रिटेल 
और मल्टी ब्रांड रिटेल के लिए रास्ता खोलकर सरकार करोडो भारतीयों को बेरोजगारी के 
खप्पर में होम देना चाहती है .


  विदेशी आका अपने देश में ख़त्म हो चुकी मांग को हमारे से वसूल करना चाहते हैं ,और नीति
 तय करने वाले उनके लिए रास्ते बना रहे हैं ?क्या इसी  स्वराज्य के लिए सुभाष,भगत,आजाद 
कुर्बान हुए थे ? एक गांधी की आवाज पर हमारे बाप -दादाओ ने विदेशी सामान का बहिष्कार 
किया था ,होली जला दी थी विदेशी सामान की विदेशी सरकार के सामने .अब हमारी ही चुनी
 हुयी सरकार यदि देशवासियों के अहित में विदेशी लोगो को हर क्षेत्र में आमंत्रित करेगी तो हम चुपचाप सहन करते रहेंगे ?


हमें संगठित होकर लड़ना ही पडेगा ,विदेशी दुकानों को हम अपनी जमीं क्यों दे ? उनका धंधा 
चमकाने में हम कंगाल क्यों हो जाए ?क्यों ख़रीदे उन दुकानों से सामान ?हम भारतीयों को
उनका बहिष्कार करना होगा.यदि उनसे हम सामान खरीदेंगे ,उन्हें प्रोत्साहित करेंगे तभी तो
 वो यहाँ टिक पायेंगे .हम क्यों अपनी और आने वाली पीढ़ी की कब्र अपने ही हाथों से तैयार
 करेंगे ?


क्या हमारी में कुशलता की कमी है?क्या हमारे में बुध्धि की कमी है ?यदि नहीं तो फिर क्यों 
सहन करे ?


सरकार यदि जनहित में नहीं है तो कोई बात नहीं ,हमें कसम लेनी होगी की हम किसी भी 
विदेशी दूकान से सामान नहीं खरीदेंगे ?यह कसम विदेशी ताकतों की आँखे खोल देगी .हमारे 
नीति निर्माता भी हमारे असहयोग के आगे झुक जायेंगे .


याद कीजिये गांधी के सपने को -"देश में कुटीर उद्योग विकसित हो ? हर हाथ को काम मिले ?"
हमें  आने वाली पीढ़ियों की तगदीर मनरेगा के अकुशल श्रमिक के रूप में नहीं लिखनी है ,हमें 
अपने भविष्य को सुदृढ़ करना होगा ?हमें इस काबिल बनना होगा की विदेशी हमारा सामान 
ख़रीदे .विश्व के विकसित देश अपने देश में फैल रही मंदी से भयभीत हैं वे लोग अविकसित और विकाशशील देशों पर डोरे डाल रहे हैं ,अपना माल इन देशो में खपाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं .माना कि हम गरीब हैं लेकिन हम कामचोर और आलसी तो नहीं हैं ?हम भले ही
 ज्यादा पढ़े -लिखे नहीं हैं मगर हम मूढ़ और बेवकूफ भी नहीं है.हम अपना भला बुरा जानते हैं .


यदि भारतीय जातिवाद,भेदभाव भूलकर संगठित होकर नहीं रहेंगे तो हम आर्थिक गुलामी की
 और बढ़ते जायेंगे ?हमें जागना होगा.आज संकट करोडो लोगो की रोजी रोटी का है ?आज भले 
ही हम कुछ सामान हम महंगा खरीद रहे होंगे लेकिन हमें याद रखना होगा की इससे किसी
 निर्धन भारतीय के घर का चुल्हा जलता है.विदेशी दुकाने हमें सस्ती चीजें उपलब्ध करा सकती
 है ,मगरवे सस्ती लायेंगें कहाँ से? हमारे से ही कच्चा माल सस्ता लेगी ,तब हम कहाँ जायेंगे ?
विदेशी दुकाने कोई सेवा करने नहीं आ रही है हमारे देश में ,वे लोग हमें ही चूस कर हमारा धन 
अपने देश में ले जाने आ रहे हैं ?


हमें जागरूक रहना होगा ,यह हर भारतीय का पावन कर्तव्य है की वह दुसरे हर भारतीय को
चेताये सजग करे ,आने वाले खतरे का अहसास कराये .यह काम हम हिन्दू,मुस्लिम,दलित 
बनकर नहीं कर सकेंगे ,हमें भारतीय बनना होगा ,मन से और कर्म से .


आर्थिक उदारीकरण की नीतियाँ सम्पूर्ण भारत के लिए बढ़िया नहीं है ,नहीं है. हमें ३२/-वाला
 धनीनहीं बनना है .हमें छोटे दुकानदारों के हित की रक्षा करनी पड़ेगी क्योंकि उन करोडो
 दुकानदारों के पीछे करोडो परिवार पल रहे हैं ,करोडो सपने सच हो रहे हैं ,कुसुमित हो रहे हैं.
क्या हम विदेशी दुकानों से खरीदी के लालच को नहीं रोककर उनको त्राहि-त्राहि करते देखना 
चाहते हैं ?


फैसला हमारे हाथ में है ?फैसला मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के लोगो को करना है क्योंकि 
सबसे बड़ा बाजार इन्ही के हाथ में है.यदि ये वर्ग सही दिशा में सोचेगा तो विदेशी दुकाने शटर 
खुद ही बंद कर देगी ,और बिस्तर पोटले लेकर भारत को अलविदा कह देगी .


लेकिन हम ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि हम राष्ट्र हित को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं .शायद यही 
हमारी विडम्बना है ,जिसके कारण हम सदियों तक गुलाम रहे हैं .हम घर का जोगी जोगना 
बाहर गाँव का सिदध वाली कहावत चरितार्थ करते रहे हैं .


हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी ,यह समय की मांग है .......  
             

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

भारत भाग्य विडम्बना

भारत भाग्य विडम्बना    


हमारे देश को अर्थहीन नीतियाँ डस रही है .मनमानी नीतियाँ और विधेयक  आम जनता पर थोप दिए जा
 रहे हैं ,उनके कुपरिणाम ५%जनता को छोड़कर आम नागरिकों को भुगतने पड़ रहे हैं .आम आदमी त्रस्त 
और बेहाल है .भारत के नीति नियंता अहंकार और परिवारवाद में रचे पचे हैं .


कुछ बानगियाँ   


१.करोडो फुटकर व्यापारी जो जैसे तैसे १-२लाख रूपये का जुगाड़ बैठाकर अपने परिवार को दौ समय की 
  रोटी मुहैया कराते हैं अब उस क्षेत्र को भी विदेशी हाथो में सुरक्षित किया जा सकता है ,अब हमारे देश के 
  उत्पाद विदेशी लोग पहले लागत मूल्य पर या मोटी संख्या में सस्ते में खरीद कर हमें ऊँचे दामों में बेचेंगे.
  नतीजा यह आयेगा की धीरे धीरे करोडो दुकाने बंद हो जायेगी और करोडो घर दौ समय की रोटी के लिए 
 मारे मारे फिरेंगे या अकुशल श्रमिक बनकर मनरेगा में काम करते हो जायेंगे .इसमें देश का क्या फायदा 
 होगा?शायद ५%जनता को सुविधा होगी .अगर ऐसे ही विधेयक बनते रहे तो आम आदमी का क्या होगा ?
 क्या भारत के विकास की गाथा हम नहीं लिख कर विदेशी लिखेंगे .एक इस्ट इंडिया को हटाने में 
लाखों लोगो ने जान की कुर्बानी दी थी तो अब तो लाखों विदेशी कम्पनियां हमारा क्या हाल करेगी ? क्या 
हम नादानी भरे कदम उठाकर कुर्बानियां ही देते रहेंगे? 


२. अर्थ शास्त्र का सामान्य नियम है कि बड़ी मछली छोटी मछलियों को निगल जाती है .हमारे देश के प्रधान 
  तो खुद अर्थशास्त्री हैं .कैसा विकसित भारत चाहते हैं ? आम आदमी के समझ से परे है.भारत के प्राण आज 
  भी गाँवों में ही बसते हैं यदि उन प्राणों पर ही संकट आ जाएगा तो भारत कि तगदिर क्या होगी ?आज हर 
 चीज का केन्द्रीयकरण होता जा रहा है .देश का पैसा अमीरों के हाथों में जा रहा है .गरीब को ३२/- वाला धनी
 बनाया जा रहा है ,बढ़ता आर्थिक असन्तुलन भयावह भविष्य कि और खिंच रहा है ,गाँवों में उद्योग पनप ही 
नहीं रहे हैं क्योंकि वंहा बुनियादी सुविधाओं का खाका ही तैयार नहीं किया जा रहा है .मज़बूरी में गाँवों कि दौड़ 
  शहरों कि तरफ है और हमारे नेता हैं कि एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर कर्तव्य कि इति श्री कर लेते 
हैं.जनता बेचारी हर एक को आजमाकर थक चुकी है ,कही क्षितिज नजर नहीं आ रहा है.


३.हमारे देश में अरबों रूपये सालाना कमाने वाली कम्पनियों पर भी ३०% टेक्स है और उच्च मध्यम वर्ग के 
   लोगो पर भी कुछ सीमा कि राहत के बाद ३०% टेक्स है .क्या उच्च में वर्ग और अरबों रूपये सालाना कमाने 
  वाली कम्नियों का एक ही स्तर है ? लेकिन वसूली के लिए यही वर्ग है .सौ बड़े घराने लाखों करोड़ रूपये बैंकों 
 से कर्ज लेकर वापस नहीं कर रहे हैं या उन पर कोई दबाब नहीं है परन्तु एक किस्त समय पर नहीं भरने वाले 
 को डी फोल्टर लिस्ट का भय सताता है .२-३ किस्तों का समय पर भुगतान नहीं कर पाने वाला तो बेहाल हो 
 जाता है 


४.दवा पर छपी MRP को ही ले लीजिये .सरकार कहती है जीवन रक्षक दवा को टेक्स मुक्त किया जाएगा .मेरे 
ख्याल से दवा होती ही जीवन रक्षक है.सरकार हर दवा को टेक्स मुक्त करे और MRP का नियम तय करे .
आज दवा पर ४०से ५०% तक ज्यादा रेट लिखी रहती है ,क्यों ? दवा जैसे क्षेत्र पर कोई पाबंदी नहीं ,मनमर्जी 
का रेट छाप दे और मजबूर भारतीय ठगाता रहे .


५.पीने का बोतल बंद पानी १२ से २० रूपये लीटर में रिटेल में बिकता है ,हमारा ही पानी जमीन से खिंच कर 
हमें वापिस इतने महंगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है ,कारण सरकार पीने के पानी कि समुचित व्यवस्था करने 
 में विफल रही है ,बेचारा मजदुर जब रोजी रोटी के लिए बाहर यात्राएं करता है तो उसका धन पानी में खर्च हो 
जाता है ,लेकिन किसी को पड़ी नहीं है .


६.हमारे देश के पानी को ठंडा पेय वाली कम्पनियां बर्बाद कर रही है .जिस देश में सभी को पीने योग्य पानी 
नहीं मिल पा रहा है उस देश को ठंडा पेय बनाने वाली कम्पनियों कि कँहा आवश्यकता है ?मगर राजस्व के 
बहाने लाखों लीटर पानी हर दिन बर्बाद होने दिया जा रहा है और लोग पानी को तरसते हैं.


७.आज हर कौम जब शान्ति से जी रही है ,अपने अपने जीवन यापन में लगी है ऐसे में साम्प्रदायिकता का 
विधेयक लाने कि तैयारी क्यों हो रही है ?क्या हम भारतीय रोजी रोटी को छोड़ फिर जातीवाद पर खून 
खराबा करे ? अरे!जीने दो सबको ,अपनी दूकान चलाने के लिए बिना जरुरत के कानून ना लाओ .तू हिन्दू ,
तू मुस्लिम ,तू दलित ...............क्यों मानवता में विभेद पैदा कर रहे हो ?यदि कानून ही जातिवादी हो 
जाएगा तो मानवता कहाँ जायेगी  .


८.काम हो तो हंगामा और काम नहीं हो तो हंगामा .कैसी स्तरहीन राजनीति पनपती जा रही है .सिर्फ तू -तू 
मैं-मैं .जनता कि समस्याओं से किसी को लेना देना नहीं .देश के विकास कि कोई बात नहीं .हर सत्र में लोक 
-सभा हंगामे कि भेंट चढ़ जाती है .करोडो रूपये स्वाहा हो जाते हैं .चोरो के बचाव कि तोड्जोड़ में सत्र ख़त्म .
सब पार्टियों को मत कि बेजा फिकर मतदाता कि किसी को पड़ी नहीं .मतदाता फटेहाल है तो है मगर वह 
हमें वोट देकर निहाल कर दे ,बस यही चाहते हैं पक्ष -विपक्ष के लोग ......
                        

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

...उम्मीदवार चाहिये (विज्ञापन )

....  उम्मीदवार  चाहिये (विज्ञापन )


चाहिये चुनावों के समय मतदारो से वोट दिला सकने वाले उम्मीदवार !! ना -ना चौंकिये मत !आजकल
हर चीज की मार्केटींग हो रही है ,यह काम भी अच्छी प्रोफेशनल एजेंसी को सौंप देने जैसा है .इस काम
का भविष्य भारत जैसे देश में चमकीला हो सकता है ,काफी संभावनाओं से भरा नया क्षेत्र है ,इसका
कारण भी है क्योंकि---------------

 इस देश में भ्रष्ट ,कामचोर नेताओं की बाढ़ आ रही है ,उनकी छवी बढ़िया क्रीम -मक्खन लगाने के बाद
 भी नाजुक होती जा रही है ,अब नाजुक दागदार छवी वाले उम्मीदवार वोट लेने में कारगार साबित नहीं
हो रहे हैं और नए मलाईदार उम्मीदवारों का भी राजनैतिक पार्टियों में टोटा है जो भी उम्मीदवार नए
मिलते हैं वे दांव पेच नहीं जानते और ऐसे अनाड़ी उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं पायेंगे क्योंकि ज्यादातर (सज्जन) भोले किस्म के मिलते हैं.

     नए व्यक्ति  को झूठ बोलने में पारंगत करने के लिए भी काफी समय लग जाता है और मुश्किल
से ५-७% ही लोग सफल होते हैं क्योंकि झूठ भी सलीके से बोला जाता है और भोले नागरिक या तो झूठ
बोलते नहीं या फिर बोलना जानते ही नहीं ,ऐसे में बड़ी मुश्किल हो जाती है की चुनाव में किस व्यक्ति को
उम्मीदवार बनाया जाए.

   ज्यादातर पार्टियों ने दूरगामी परिणाम को ध्यान में रखे बिना ही भूतकाल में ऐसे  उम्मीदवारों का चयन
कर लिया था ,वे लोग अनाड़ी की तरह जनता के धन पर इस तरह उतावल में झपटे कि अब दागी हो गये.
धन को पचाना और वह भी जनता के धन को ,बहुत ही भेजाबाज शातिर का काम है .ऐसे काम किसी सेवा
 भावी इंसान के बूते के बाहर होता है

     हर व्यक्ति कि अपनी विशिष्टता होती है और चुनाव जीत सके ऐसा व्यक्ति भी विशिष्ट गुणों से युक्त होना
चाहिये .उसकी बोलने कि शैली में शहद सी मिठास हो ,उसकी आँखों में धूर्तता दिखाई ना दे ,नए नए
आश्वासन देने में माहिर हो ,रिश्वत लेने के तरीके में परिवर्तन शीलता हो ,नवीनता का सृजन कर नए
तरीके इजाद करने वाला हो

      नयी योजनाओं के उदघाटन ,शिलारोपण जैसे तरीके पुराने होते जा रहे हैं .लोग जानने लग गये हैं कि
ये सब बढ़िया ढकोसले के सिवाय कुछ नहीं है ,इन परम्परागत तरीको से मतदाता को गाफिल करना
मुश्किल होता जा रहा है .वोट लेने के नए नुस्खे पैदा करने वाले बाजीगर ही आज कि आवश्यकता बन
गये हैं .नए सपनो को जनता के मन में उतार देने वाले सृजक ही कुछ करामात दिखा सकते हैं .

     नए उम्मीदवार कि साख हो ,जैसे बगुला महाराज माला जपने का स्वांग बहुत निपुणता के साथ करते
हैं और मछली गटक कर पुन: शांत अवस्था में आ जाते हैं ,ठीक ऐसे ही साख वाले लोग मिल जाए जो
संत जैसे स्वांग में बिना चबाये माल गटक सके और मिलझुल कर बाँट खा सके .

       

रविवार, 20 नवंबर 2011

कटाक्ष मसाला

कटाक्ष मसाला 

अमरीका ने एक ऐसे 'हाइपरसोनिक' बम वाहक का सफल परीक्षण किया है जो ध्वनि की गति
 से पाँच गुना तेज़ी से उड़ सकता है.............


 विश्व शान्ति दूत की नयी परिभाषा  .... .
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उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने विकास को मुद्दा बनाकर राज्य को चार हिस्सों में बाँटने की घोषणा
 की..........
टुकड़े करने से विकास होता है तो टुकड़े बहुत कम हैं...  
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भारतीय-कनाडाई मूल की वयस्क फ़िल्मों की कलाकार सनी लियोन रियालिटी टेलीविज़न शो
 बिग बॉस में दिखेंगी.


स्वामी को दिखाने से टीआरपी में जो कमी आ गयी थी अब वापस बढ़ जायेगी .......


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 इमरान खा़न ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान को कुछ समय के लिए कश्मीर मुद्दे को
 किनारे रख देना चाहिए.


भारतीय कश्मीर में हर रोज खून की होली खेलने का काम करने वाले बेरोजगार हो जायेंगे .....


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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने कहा है कि भारत के साथ रिश्तों में आगे बढ़ने
 का एक ही रास्ता है और वो है जम्मू-कश्मीर समेत सभी अहम मुद्दों पर चर्चा करना.


ये हैं शान्ति के मसीहा की आइना दिखाती तस्वीर .........


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भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने मालदीव में हुई द्विपक्षीय बैठक पर संतोष जताते हुए कहा है कि अगले दौर की बातचीत और
 ज़्यादा सकारात्मक होगी.


डॉक्टर करेंगे कुत्ते की पूंछ को सीधा करने की आधुनिक सर्जरी .......
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विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा, "भारत और पाकिस्तान के बीच अविश्वास में कमी आई है 
और सकारात्मक माहौल बना हुआ है."


हवा में तलवार भांजना कोई हमसे सीखे .........
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पाकिस्तान के मंत्रिमंडल ने भारत को सर्वाधिक वरीयता वाले देश (एमएफ़एन) का दर्जा देने की औपचारिक रुप से मंज़ूरी दे दी.


गिरगिट के रंग बदलने की क्रिया पर शोध ........
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तेज़ विकास और तरक़्क़ी की हमारी कोशिशें तभी रंग लाएंगी जब हम
 सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकेंगे और प्रशासनिक
 व्यवस्था को बेहतर बना सकेंगे."
मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री
 गीता सार .......... 
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भारत में पेट्रोल की क़ीमत में प्रति लीटर 1.85 रुपए की कटौती की गई
सांप सीढ़ी का खेल ....दौ घटाओ तीन बढ़ाओ  
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