शनिवार, 30 अप्रैल 2011

स्व-मुल्यांकन

 
                                हम पिछली पोस्ट में स्व-निरिक्षण क्या है इस विषय पर चर्चा कर रहे थे .अब हम इस चर्चा को जारी रखेंगे .
                  जिस तरह स्वर्ण   को जांचने के लिए उसे काटा, पीटा,तोड़ा,घीसा,और गलाया जाता है उसी तरह स्व-निरिक्षण में स्वयं का मुल्यांकन किया जाताहै. श्रीमद भागवत-गीता क्या है? क्या यह मुक्ती का सन्देश है?क्या यह युद्ध में झोंकने की कला है?मेरी समझ से यह स्व-निरिक्षण  का विज्ञान है.जिसे अब संसा
के उच्चतम शिक्षा पाठ्यकर्मों ( MBA ) में शामिल किया जा रहा है. गीतासार में वर्णीत"मैं कौन हू?" मेरा प्रयोजन क्याहै? मुझे कब,कहाँ, कैसे पहुँचना है? इन   सब प्रश्नों को विस्तारपूर्वक बताया  गया है.
                                                             स्व-मुल्यांकन थोपी हुयी शिक्षा नहीं होती है.यह एक खुद के द्वारा खुद को पूर्ण रूप से जाननेकी पद्धति है. 
                   हम दौ परिस्थियों से सदैव झुन्झते रहते हैं (१) आंतरिक परिस्थिति और दूसरी बाहरी  परिस्थिति आंतरिक  परिस्थितिमें हमे खुदको जानना होता है. मैं अभी किस स्थिति मेंहूँ? मेरा वास्तविक आधार क्या है? मुझे अपना लक्ष्य ,वहां तक पहुंचने का रास्ता क्या स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है?मुझे कब,कहाँ,  क्या और कैसे करना है ,जिससे मैं खुद के इच्छित मुकाम तक पहुँच सकूँ? इन प्रश्नों पर सतत नजर 
डालते रहना चाहिए.यदि हम स्व-प्रबंधन नहीं करेंगे  तो हम सदैव वही पाते रहेंगे जो आज तक पाते रहें हैं. 
                 जैसे -जैसे संसार का घटना-क्रम चलता रहता है हम भी उसके पीछे वैसे ही घसीटते रहते हैं 
क्या यही हमारे जीवन-मूल्य हैं?क्या यह जीवन बुझे हुए दीपक की भाँती गुजारने को विवश रहना 
पसंद करेंगे या फिर जलते हुए दीपक की तरह खुद को प्रकाशित करेंगे.फैसला हमें स्वयं को करना है 
इसमें हम पूर्ण-रूपसे स्वतंत्र  हैं. स्व-परिक्षण किये बिना हम अपनी  भोगी जाने वाली खराब परिस्थियों 
का दोष दूसरों पर,परिवार पर,मित्रों पर या भगवान् पर ढाल सकते हैं परन्तु  फिर भी हमें खुद को ही 
उन सब परिणामों   को भोगना पड़ता है.
                                                                         एक बार दौ दोस्त   पढने के लिए साथ -साथ गाँव से शहर के लिए गये .पढाई पूरी करने के पश्चात संयोग से वे एक ही शहर में काम करने लग गये. कुछ समय बीत 
 जाने पर दोनों ने आपसी हाल-चाल जानने के लिए निश्चित जगह पर मिलना तय किया .
         तय समय पर उन्होंने मुलाक़ात की और अपनी अपनी प्रगती के बारे में पूछा .पहले मित्र ने अपना हाल सुनाते हुये कहा-मित्र, इस शहर में अब प्रगती करने के चांस खत्म हो गये लगते हैं मुझे इस शहर के सितारे गर्दिश में लगते हैं. यहाँ के लोग दिन- प्रतिदिन  स्वार्थी होते जा रहें हैं यहाँ पर लक्ष्य तक पहुँचने के सभी मार्ग मेरे लिए बंद होते जा रहें हैं   इसलिए मै                                                      इस  शहर   अब अलविदा  कहना चाहता हूँ. 
                                                दुसरा मित्र बोला- दोस्त, मेरे को तुम्हारा विचार सही नहीं लग रहा है.इस  समय मेरी परिस्थिति भी अनुकूल नहीं लग रही है. इस शहर में लाखों लोग रह रहें हैं.उनमे से 
काफी लोग सफल भी हैं. मैं तो इसी शहर में रह कर प्रयत्न करूंगा.
                              कुछ समय पश्चात पहला मित्र गाँव चला गया और दूसरा मित्र शहर  में रह गया. दुसरा  मित्र सफलता पाने के  लिए शहरमें प्रयास करता रहा लेकिन अभी भी उसेअपनी मंजील नहीं मिल पा रही थी. एक रात वह लेटे हुये अपनी वर्तमान दशा के बारे में अवलोकन करने लगा .सोचते -सोचते वह गाँव से शहर में आने के बाद शहर में गुजारे  पल-पल को याद करने लगा .इस परिक्षण में उसे अपनी गलतियां नजर आने लगी . उसने मन ही मन अपनी त्रुटियों को मिटाने का संकल्प किया और अगले दिन से दुगने उत्साह से अपने काम में लग गया और आशातीत सफलता प्राप्त करने लगा. कुछ साल बीतने के बाद दुसरा मित्र अपने गाँव गया तो देखा की उसका पहला मित्र परिस्थियों को दोष देता हुआ दीन-हीन जीन्दगी गुजार रहा है. 

            यदि हम आन्तरिक परिस्थियों पर शासन करने में समर्थ हो जाते हैं तो बाहरी परिस्थियाँ
खुद-ब-खुद सुधरने लग जाती है. हमारी असफलता का अस्तित्व तब तक ही है जब तक हम खुद
को पहचान नहीं पाते. जैसे ही हम अपने लक्ष्य को स्पष्ट कर देते हैं हमारा मुकाम हमें नजर आने
लगता है, ठीक वैसे ही जैसे नन्हां सा दीप प्रज्जवलित होते ही अन्धकार भाग खड़ा होता है .

        हमारी मूलभूत समस्या इस प्रकार समझी जा सकती है-
                   -मैं जानता हूँ कि मेरा कर्त्तव्य क्या है? उचित क्या है?अनुचित क्या है?परन्तु उसे करने कि मेरी इच्छा नहीं है. हम तभी असफल होते हैं जब हम अपनी असफलता के बोझ को ढ़ोना चाहते हैं. 
दुनिया मेरी कमजोरियों को जान न ले इसलिए हम उसे ढकना चाहते हैं और इसी अज्ञानता के कारण 
हम असफल रहते  हैं. 

आगे कि पोस्ट में  इस चर्चा को जारी रखेंगे .     
              

गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

स्व-निरीक्षण


Thursday, April 28, 2011
 स्व-निरीक्षण

 खुद को जानना, आत्म निरीक्षण करना,स्व परीक्षण या आत्म साक्षात्कार क्या है ?हम इतिहास का तो रट्टा लगा देते हैं.बहुत से महापुरुषों की जीवन गाथा सुना देते हैं. बहुत से श्लोक कंठस्थ कर लेते हैं अपने परिचित लोगों का कच्चा चिठ्ठा बना देते हैं. देश विदेश के नेताओं पर अपने मत रख देते हैं.दूसरों के जीवन चरित्र पर सवाल खड़े कर देते हैं. हम निंदा-स्तुती सब कुछ करते हैं लेकिन हम स्वयं पर करारी टिप्पणी नहीं करते; क्योंकि हम स्व-परीक्षण से घबराते हैं या फिर अपनी पहचान खुद से ही छिपाना चाहते हैं . क्यों ?.....आखिर क्यों ?हम ऐसा क्यों करते हैं?


 निस-दिन टीसै गुमड़ो,
ढ्क्या रुकै कद पीड़?
एक छिपायाँ लागसी,
सौ रोगाँ री भीड़ .


 जब भी शरीर पर फोड़ा निकल जाता है तो चिकित्सक से इलाज कराना ही पड़ता है उस को छिपाना स्वय के लिए घातक है, क्योंकि समय पर इलाज नहीं कराने से यही फोड़ा बाद में ला इलाज हो जाता है और इससे शरीर में दुसरे रोगों की उत्पती हो जाती है .ठीक इसी तरह हमें स्व-परिक्षण को अपनाना ही होगा .

 स्व-परिक्षण क्या है ?
स्व-परिक्षण से हम क्यों भागते हैं?
स्व-परिक्षण कैसे करें?

 स्व-परिक्षण क्या है ?

 स्व-निरिक्षण खुद को खोजते रहने या स्वयं को जानने की प्रक्रिया है .हम सतत अन्य लोगों के गुण-दोषों को ढूंढते रहते हैं और अपने सिमित समय का दुरूपयोग करते हैं लेकिन हमारी तीव्र इच्छा खुद का परिक्षण करने की नहीं होती .हम करने योग्य काम को करना नहीं चाहते और न करने योग्य कार्य को सतत करना चाहते हैं.यही कारण हमें असफलता का स्वाद चखाता है.

                          एक किसान अपने खेत में हल जोत रहा था तभी अचानक हल किसी चीज से टकराया. किसान ने उस जगह को खोद कर देखा तो उसे एक घड़ा दिखाई दिया .उस घड़े में कुछ आभूषण थे .किसान उस घड़े को लेकर स्वर्णकार के पास जाता है. स्वर्णकार उन आभूषणों में से एक को निकाल कर पत्थर पर रगड़ता है,आभूषण पुराने होने के कारण सुनार निश्चय पर नहीं पहुँच पाता है वह पुन: उस आभूषण को हथोड़े से पीटने लगता है. किसान उत्सुकता से सुनार की क्रियाओं को देखता रहता है.थोड़ी देर पीटने के बाद भी सुनार संदेह से उबर नहीं पाता है तो वह आग जलाकर उस आभूषण को आग में तपाता है .आभूषण पीगल कर चमकने लगता है और सुनार के मुख पर प्रसन्नता की रेखा तैर जाती है .वह सुनार किसान को बताता है की उसे मिले आभूषण शुद्ध सोने के हैं.किसान के चेहरे पर ख़ुशी की लकीर तक नहीं देख कर सुनार को विस्मय होता है .वहकिसान से पूछता है,"आपको सोने के आभूषण मिले फिर भी खुश क्यों नहीं हो?"
किसान बोला ,यह वास्तविक संपती नहीं है .मेरे एक पुत्र है जिसे मेनें बहुत लाड से पाला था .उसे किसी वस्तु की कमी ना हो इसका मैं पुरी तरह से ख्याल रखता था . समय के साथ वह जवान हो गया लेकिन मौहवश में उसे बच्चा ही समझता रहा था.उसको तकलीफ नहीं हो इसलिए मेनें उसको कभी खेती के मेहनतपूर्ण काम में नहीं लगाया . आज यही कारणहै की स्वर्ण पाकर भी मैं खुश नहीं हूँ .काश! यह बात जो आभूषण मिलने पर सिख पाया उसे पहले समझ पाया होता?
सुनार ने पूछा ,"पहले आप क्या नहीं समझ पाए थे? अब आपने इतनी सी देर में क्या समझ लिया है?" किसान बोला -घड़े के आभूषण देख कर जिस तरह तुमने तुरंत निर्णय नहीं किया क़ि आभूषण सोने के हैं ? तुमने उनको रगड़कर,पीटकर,गलाकर और काटकर देखा और फिर निर्णय किया .उसी प्रकार मेनें भी अपने बच्चे को परखा होता,जांचा होता तो मैं उसे आलसी नहीं बनने देता .यह मुफ्त का स्वर्ण उसे निकम्मा नहीं बना दे ,इसी चिंता से मुझे ख़ुशी नहीं है .इस बोध-कथा से हम यह सिख सकते हैं की स्व-परिक्षण क्या है.

  यह चर्चा हम अगली पोस्ट में जारी रखेंगे   .

रविवार, 24 अप्रैल 2011

जरुरत


प्रगति का शिखर,
तब-
दूर चला जाता है,
जब-
सफलता पड़ाव की जगह मंजिल लगती है.
या
असफलता तोड़ कर कुचल देती है .
तब,
हम कर्त्तव्यविमुढ़ हो जाते हैं.
जरुरत है इस चक्रव्यूह से उबरने की;
हार या जीत से फ़ोलाद बन उभरने की;
सफलता व असफलता मैं लिप्त नहीं होने की;
गति को बढ़ाकर लक्ष्य की और मोड़ देने की.

सफलता की राह

सफलता की राह

एक - एक करके पगथिया
सौ भी होज्या पार.
पण सागै दौ चार भी,
लान्घ्याँ खतरों त्यार .

हम सभी सफलता की खोज में निरंतर लगे रहते हैं क्योंकि हम ऐसे सूत्र की खोज करना चाहते  हैं जिससे सफलता को पाया जा सके .क्या सफलता का कोई रहस्य है, जिसे हम नहीं जानते हैं? मेरा मानना है की सफलता का कोई रहस्य होता ही नहीं है .हर सफल व्यक्ति अपनी सभी प्रकार की सफलता का ढोल पीटता आया है और पीटता रहेगा .अब प्रश्न यह उठता हैकी जब सफलता पारदर्शी होती है तो फिर ज्यादातर व्यक्ति असफलता से परेशान क्यों हैं?शायद उन्होंने जो राह तैयार की है उसमें अपूर्णता रह गयी      है .

सफलता की राह कैसे बनाएं :-जब भी हम किसी भी काम को करना चाहते हैं तो सबसे पहले
उस का एक खाका तैयार करते हैं. यह खाका हमारे मस्तिष्क में जन्म लेता है और एक विचार रूपी 
बीज की उत्पत्ति होती है. हमारे प्रतिपल जन्म लेते रहने वाले विचारों का बहुत बड़ा प्रभाव हमारे जीवन 
में पड़ता है. मस्तिष्क द्वारा देखा गया हर एक सपना विचार बन कर बाहर निकलता है लेकिन हम 
असावधानीवश ध्यान नहीं देते हैं जिसके कारण विचारों के भ्रूण असमय नष्ट हो जाते हैं जबकि ये नन्हें से विचार वट वृक्ष बनने की ताकत रखतें हैं.हमारी सम्पूर्ण  कोशिश होनी चाहिए की हम हमारे सकारात्मक 
विचारों को सहेजने  की शक्ति को पैदा करें .

विचार सपने पैदा करते हैं:- हमारे नन्हें- नन्हें विचारों में सपने पैदा करने की भरपूर ऊर्जा होती है 
हमारे द्वारा देखें गए सपने कभी भी निर्रथक नहीं जाते क्योंकि हर सपनें में एक संभावना छिपी रहती है 
उस संभावना में छिपी शक्ति का महत्व होता है .हमारे सकारात्मक विचारों में छिपे सपनों ने ही तो 
दुनिया की तस्वीर बदली है , तकदीर  संवारी है. हमारी कोशिश होनी चाहिए की हम अपने अन्दर 
पनपने वाले सकारात्मक एवम  नकारात्मक सपनों को पृथक-पृथक करना सीखें. हमें पूर्ण सजगता से 
इस काम को करना चाहिये; हमें यह सीखना ही पड़ेगा.   नकारात्मक सपनों को पृथक करना एवं 
उन्हें तुरंत नष्ट करना हमारी दैनिक दिनचर्या में शामिल होना बहुत जरुरी है वरना ----

नावडिया! खे नाव नै ,
लहरां पर मत छोड़ .
ऐ ले ज्यासी मन-मतै
तनै लागसी खोड.

यदि नाविक नाव का पाल सही दिशा में नहीं बांधता है और चप्पू नहीं चलाता है तब नाव लहरों के
भरोसे रह जाती है और उस पतवार रहित नौका का कोई लक्ष्य नहीं होता है वह लक्ष्यविहीन 
होकर इधर उधर हिचकोले खाकर नष्ट हो जाती है .

सपने आत्म- साक्षात्कार कराते हैं:- विचार जब सपनों में बदलते हैं तब सपने हमारा परिचय हम 
से कराते हैं.जब हमारा हम से साक्षात्कार होता है तब हमको हमारी ताकत ,हमारी निर्बलता, हमारे गुण - अवगुण का ज्ञान  होता है. यह एक ऐसा पड़ाव है जहां से हमारी मंझिल का सही दिशा- 
निर्देश होता है 

इस विषयवस्तु को हम अगली पोस्ट में समझने की कोशिश करेंगें