गुरुवार, 28 अप्रैल 2011

स्व-निरीक्षण


Thursday, April 28, 2011
 स्व-निरीक्षण

 खुद को जानना, आत्म निरीक्षण करना,स्व परीक्षण या आत्म साक्षात्कार क्या है ?हम इतिहास का तो रट्टा लगा देते हैं.बहुत से महापुरुषों की जीवन गाथा सुना देते हैं. बहुत से श्लोक कंठस्थ कर लेते हैं अपने परिचित लोगों का कच्चा चिठ्ठा बना देते हैं. देश विदेश के नेताओं पर अपने मत रख देते हैं.दूसरों के जीवन चरित्र पर सवाल खड़े कर देते हैं. हम निंदा-स्तुती सब कुछ करते हैं लेकिन हम स्वयं पर करारी टिप्पणी नहीं करते; क्योंकि हम स्व-परीक्षण से घबराते हैं या फिर अपनी पहचान खुद से ही छिपाना चाहते हैं . क्यों ?.....आखिर क्यों ?हम ऐसा क्यों करते हैं?


 निस-दिन टीसै गुमड़ो,
ढ्क्या रुकै कद पीड़?
एक छिपायाँ लागसी,
सौ रोगाँ री भीड़ .


 जब भी शरीर पर फोड़ा निकल जाता है तो चिकित्सक से इलाज कराना ही पड़ता है उस को छिपाना स्वय के लिए घातक है, क्योंकि समय पर इलाज नहीं कराने से यही फोड़ा बाद में ला इलाज हो जाता है और इससे शरीर में दुसरे रोगों की उत्पती हो जाती है .ठीक इसी तरह हमें स्व-परिक्षण को अपनाना ही होगा .

 स्व-परिक्षण क्या है ?
स्व-परिक्षण से हम क्यों भागते हैं?
स्व-परिक्षण कैसे करें?

 स्व-परिक्षण क्या है ?

 स्व-निरिक्षण खुद को खोजते रहने या स्वयं को जानने की प्रक्रिया है .हम सतत अन्य लोगों के गुण-दोषों को ढूंढते रहते हैं और अपने सिमित समय का दुरूपयोग करते हैं लेकिन हमारी तीव्र इच्छा खुद का परिक्षण करने की नहीं होती .हम करने योग्य काम को करना नहीं चाहते और न करने योग्य कार्य को सतत करना चाहते हैं.यही कारण हमें असफलता का स्वाद चखाता है.

                          एक किसान अपने खेत में हल जोत रहा था तभी अचानक हल किसी चीज से टकराया. किसान ने उस जगह को खोद कर देखा तो उसे एक घड़ा दिखाई दिया .उस घड़े में कुछ आभूषण थे .किसान उस घड़े को लेकर स्वर्णकार के पास जाता है. स्वर्णकार उन आभूषणों में से एक को निकाल कर पत्थर पर रगड़ता है,आभूषण पुराने होने के कारण सुनार निश्चय पर नहीं पहुँच पाता है वह पुन: उस आभूषण को हथोड़े से पीटने लगता है. किसान उत्सुकता से सुनार की क्रियाओं को देखता रहता है.थोड़ी देर पीटने के बाद भी सुनार संदेह से उबर नहीं पाता है तो वह आग जलाकर उस आभूषण को आग में तपाता है .आभूषण पीगल कर चमकने लगता है और सुनार के मुख पर प्रसन्नता की रेखा तैर जाती है .वह सुनार किसान को बताता है की उसे मिले आभूषण शुद्ध सोने के हैं.किसान के चेहरे पर ख़ुशी की लकीर तक नहीं देख कर सुनार को विस्मय होता है .वहकिसान से पूछता है,"आपको सोने के आभूषण मिले फिर भी खुश क्यों नहीं हो?"
किसान बोला ,यह वास्तविक संपती नहीं है .मेरे एक पुत्र है जिसे मेनें बहुत लाड से पाला था .उसे किसी वस्तु की कमी ना हो इसका मैं पुरी तरह से ख्याल रखता था . समय के साथ वह जवान हो गया लेकिन मौहवश में उसे बच्चा ही समझता रहा था.उसको तकलीफ नहीं हो इसलिए मेनें उसको कभी खेती के मेहनतपूर्ण काम में नहीं लगाया . आज यही कारणहै की स्वर्ण पाकर भी मैं खुश नहीं हूँ .काश! यह बात जो आभूषण मिलने पर सिख पाया उसे पहले समझ पाया होता?
सुनार ने पूछा ,"पहले आप क्या नहीं समझ पाए थे? अब आपने इतनी सी देर में क्या समझ लिया है?" किसान बोला -घड़े के आभूषण देख कर जिस तरह तुमने तुरंत निर्णय नहीं किया क़ि आभूषण सोने के हैं ? तुमने उनको रगड़कर,पीटकर,गलाकर और काटकर देखा और फिर निर्णय किया .उसी प्रकार मेनें भी अपने बच्चे को परखा होता,जांचा होता तो मैं उसे आलसी नहीं बनने देता .यह मुफ्त का स्वर्ण उसे निकम्मा नहीं बना दे ,इसी चिंता से मुझे ख़ुशी नहीं है .इस बोध-कथा से हम यह सिख सकते हैं की स्व-परिक्षण क्या है.

  यह चर्चा हम अगली पोस्ट में जारी रखेंगे   .

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