सोमवार, 9 मई 2011

शत्रु, मित्र और उदासीन

 एक गली में तीन युवक रहते थे. तीनो ही युवकों से मेरी अच्छी पहचान थी.तीनो ही कपास
खरीदने और बेचने का कम करते थे और उन तीनों की दूकान भी सटी हुई थी.एक रात 
शोर्ट सर्किट के कारण आग लग गयी.रात के समय कोई भी माक़ूल व्यवस्था नहीं हो पायी और उन 
तीनों की दुकानों में पड़ा कपास जल के राख हो गया. 

दुसरे दिन इस हादसे के बारे में जब मुझे मालुम चला तो मैं  उनसे मिलने और संवेदना जताने 
उनके पास पहुंचा. सबसे पहले मैं पहले मित्र के पास गया और इस दुर्घटना के बारें में पूछा .पहला 
मित्र बोला- यह हादसा काफी आघातजनक है . मैं तो इस आगजनी के कारण पांच लाख का नुकसान 
कर चुका हूँ लेकिन मैं तो बर्दाश्त कर सकता हूँ पर मेरे दोनों पड़ोसी मित्र आर्थिक  रूप से ज्यादा सक्षम 
नहीं हैं .इन दोनों में भी ये तीसरी दूकान वाला काफी कमजोर है. मुझे इन दोनों के नुकसान का काफी 
दर्द है. भगवान से मेरी प्रार्थना है की इस  आपदा की परीक्षा में इन्हें संभलने की शक्ति दें.

पहले मित्र से मिलकर में दुसरी दूकान वाले के पास गया और इस विपत्ति की घड़ी में संवेदना व्यक्त 
करके आग में हो चुके नुकसान के बारे में पूछा . उसने अपने नुकसान के बारे में बताया परन्तु 
अपने पड़ौसियों के बारे में कुछ भी चर्चा नहीं की जैसे उसे उनके दु:ख  से कोई लेनादेना नहीं हो.

इसके बाद मैं तीसरे मित्र के पास गया. उसके चेहरे पर आत्म संतुष्टी का भाव देखकर मैं एकबारगी 
तो सन्न रह गया .मेने मन ही मन उसकी दु;ख सहने की ताकत की सरहाना की और फिर उससे 
भी इस हादसे के बारे में चर्चा की.तीसरे मित्र ने बताया कि वह शुरू से ही आर्थिक रूप से कमजोर 
रहा है ओर इस विपत्ति ने उसके लिए नया संकट खड़ा कर दिया है. उसकी यह बात सुनकर मेने 
इस विपरीत स्थिति में भी गजब का धीरज रखने और प्रसन्नता नहीं खोने का उससे कारण पूछा
तो उसने बताया की ,"सबसे पहली दूकान वाले को पांच लाख का नुकसान हुआ है, भगवान ने उसको मुझ से भी दस गुना ज्यादा नुकसान पहुंचाया है इसलिए मुझे मेरे नुकसान का कोई गम 
महसूस नहीं हो रहा है. हो सकता है कि मेरी दूकान भविष्य में बंद हो जाए लेकिन पहला वाला
 दुकानदार भी अब ढंग से काम नहीं कर पायेगा ,यही मेरी इस समय की संतुष्टी का मुख्य 
कारण है" 

इन तीनों की एक समान परिस्थिति में गुजरने पर भी  सोच का जो अंतर रहा वह इस संसार में 
 पाये जाने वाले तीन प्रकार के व्यक्तियों की झलक दिखलाता है.              
   

गुरुवार, 5 मई 2011

बबुल और गुलाब

एक नदी के तट पर दौ पौधे लगे थे.एक बबुल का ओर दूसरा गुलाब का.दौनों पौधे अपने जन्म की 
 आनुवांशिकता पर बात कर रहे थे.

बबुल ने गुलाब से कहा- भगवान् ने हमें नीची श्रेणी के पौधे के रूप में जन्म देकर हमारे जीवन को
  महत्वहीन बना दिया ,

गुलाब ने पूछा,"तुम यह बात किस आधार से कह रहे हो."

बबुल बोला,"तुम देख नहीं रहे हो, हमारा जन्म कंटीली झाड़ियों के वंश में हुआ है.हमारे जन्म के साथ
हमें कांटे मिले हैं. अब देखना इस पृथ्वी पर हमारा जीवन सार रहित बीतेगा.अन्य वृक्षों की तरह कोई 
भी हमें अपने घर में स्थान नहीं देगा .ना तो हमें समय पर पानी मिलेगा और न ही हमें किसी से सुरक्षा 
मिलेगी. इससे अच्छा होता भगवान् हमें जन्म ही नहीं देता."

गुलाब बोला- मित्र, मैं तुम्हारी सोच से सहमत नहीं हूँ .यह ठीक है की हम कंटीले वंश में पैदा  हुये हैं,
लेकिन हम सपने देखने, कर्म करने और अपनी उपादेयता बनाए रखने में स्वतन्त्र हैं. हमारे जन्म के 
साथ जो वंश मिला उसमें हम पराधीन थे लेकिन अब हम हर कर्म करने में स्वतन्त्र हैं. हमें अपने 
कुल से हीनता का अनुभव नहीं करके अपनी उपयोगिता बनाए रखने का इस संसार में प्रयत्न करना 
चाहिए .

बबुल गुलाब की बात सुनकर हँसने लगा और निराशा भरे स्वर में बोला- मित्र, तुम महज सपने देख 
रहे हो . अब हमें जीवन पर्यंत दुनिया का तिरस्कार सहना होगा और रोते-बिलखते इस जीवन को जीना 
होगा.

गुलाब बोला- बबुल, मैं तेरी बात से सहमत नहीं हूँ. मैं इस परिस्थिति को भी अवसर में बदल देने के लिए 
प्रयास करूंगा. ये कांटे भी मेरी रक्षा का उत्तरदायित्व निभायेंगे. मेरी कठिन परिस्थितियों में भी हँसते 
रहने की आदत मुझे श्रेष्ठ बनायेगी लेकिन तेरी नकारात्मक सोच के कारण तेरी तकदीर भी तुझे कभी 
सम्मानजनक स्थान नहीं दिला पायेगी.

समय के साथ दोनों पलने लगे. बबुल हर वक्त कुल को कोसता रहता और गुलाब अपने आप को 
बदल देने के लिए कर्म में लगा रहा. बरसात के मौसम में गुलाब की झाड़ी का प्रयास सफल होने 
लगा.अब उस झाड़ी में सुगन्धित फूल खिलने लगे जबकि बबुल का पेड़ विचित्र सी दुर्गन्ध से भर गया.

कुछ दिन पश्चात उस नगर का राजा वन भ्रमण के लिए उधर से निकला .उसे गुलाब की महक ने 
 इतना आकर्षित किया की उसे जंगल से उखाड़ कर अपने राज महल में लगा दिया .

सारतत्त्व:-- विपरीत  परिस्थितियों को स्वीकार करके रोते रहने की बजाय हमें परिस्थतियों को 
अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए. 

इसी पायदान से स्व-निरिक्षण की शरुआत  करें.             
  

बुधवार, 4 मई 2011

स्व-मंथन (जैसा वह बोये, वैसा ही काटे)

उस समय की बात है, जब कि पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म नहीं हुआ था।

आखिर विधाता ने चन्द्रमा की मुस्कान, गुलाब की सुगन्ध और अमृत की माधुरी को एक साथ मिलाया और मिट्टी के घरौदों में भर दिया। सब घरौंदे लगे चहकने और महकने।

देवदूतों ने विधाता की इस नई अनोखी रचना को देखा तो आश्चर्य से चकित रह गये। उन्होंने ब्रह्मा से पूछा, "यह क्या है?"

विधाता ने बताया, "इसका नाम है जीवन। यह मेरी सर्वश्रेष्ठ कृति है।"

विधाता की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि एक देवदूत बीच ही में बोला पड़ा, "क्षमा कीजिये प्रभु! लेकिन यह समझ में नहीं आया कि आने इसे मिट्टी का तन क्यों दिया? मिट्टी तो तुच्छ-से-तुच्छ है, जड़ से भी जड़ है। मिट्टी न लेकर आपने कोई धातु क्यों नहीं ली? सोना नहीं तो लोहा ही ले लेते।"

विधाता के होठों पर एक मोहक मुस्कान खेल उठी। बोले, "वत्स! यही तो जीवन का रहस्य है। मिट्टी के शरीर में मैंने संसार का सारा सुख-सौंदर्य, सारा वैभव, उड़ेल दिया है। जड़ में आनन्द का चैतन्य फूंक दिया है। इसका जैसा चाहो, उपयोग कर लो। शरीर को महत्ता देने वाला मिट्टी की जड़ता भोगेगा; जो इससे ऊपर उठेगा, उसे आनन्द के परत-परत-परत मिलेंगे। लेकिन ये सब मिट्टी के घरौंदे की तरह क्षणिक हैं। इसलिए जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान् है। जो जितना सोयेगा, उतना ही खोयेगा। तुम मिट्टी के ही अवगुणों को देखते हो, गुणों को नहीं। मिट्टी में ही अकुंर फूटते हैं। मैंने शरीर का कर्मक्षेत्र बनाया है, उसमें कर्मों के अंकुर जमेंगे। इस भांति मैंने मनुष्य को खेती उसके अपने ही हाथ में दे दी है। जैसा वह बोये, वैसा ही काटे।"l

सोमवार, 2 मई 2011

स्व-मंथन

स्व-निरिक्षणकी प्रक्रिया में हम स्वयं के बारे में जानना सीखते हैं. हम अपने गुण-दोष का सही-सही 
अवलोकन कर पाते हैं.खुद को परखने का काम यदि हम निष्पक्षता से कर पाते हैं तो इस मंथन से 
हम अँधेरे से उजाले की और प्रस्थान कर पाते हैं. 
                  
            जब हम इस मंथन से अपनी शक्तियों का सही मूल्यांकन कर पाते हैं तब हमें हमारी 
निर्बलता व सबलता को अपनी स्मृती में सहेज लेना चाहिये. हमको अपनी निर्बलता को सिर्फ इसलिए 
सहेजना चाहिये ताकि हम इन पर तब तक करारी चोट करते जाए जब तक अपने व्यक्तित्व  से ये 
पूर्ण रूप से खत्म न हो जाये और अपनी सबलता को इसलिए सहेजना चाहिये की इनकी चमक 
फीकी ना पड़ जाये.

             इस आत्म-मंथन से हमें चिंतन करने की शक्ती मिलती है. यह शक्ति दौ प्रकार की होती है 
सकारात्मक शक्ति और नकारात्मक शक्ति . हमारी चिंतन शक्ति खुद में बदलाव लाने की क्रिया 
को जन्म देती है. क्या हमारे देश या दुनिया के आदर्श पुरुष जन्म से ही बड़े  कूळ में पैदा हुए थे .
ज्यादातर आदर्श-पुरुषों का जन्म साधारण परिवारों में ही हुआ है. श्री कृष्ण का जन्म अहीर कूळ में, 
चाणक्य का जन्म गरीब ब्राह्मण कूळ में, स्वामी विवेकानंद, सरदार पटेल, शास्त्रीजी, डाक्टर अब्दुल 
कलाम, अन्ना हजारे या कोई अन्य महापुरुष ........इन सबने विपरीत परिस्थितियों का रुख अपने पक्ष 
में मोड़ा है. ये सब कैसे संभव हुआ होगा? इन सबके जीवन चरित्र को पढने पर मालुम होता है की ये
सभी अपने अपने जीवन  में स्व-मूल्यांकन के दौर  से गुजरकर ही आगे बढ़ें हैं. 

              एक बार की बात है एक साधारण बुद्धि का बालक शिक्षा अर्जन के लिए गुरुकुल में गया .
यह बालक मंद बुद्धि था .समय पर पाठ का अभ्यास नहीं कर पाने के कारण उसे गुरुकुल से निकाल 
दिया गया .यह बालक जब घर की ओर रवाना हुआ तो रास्ते में एक कुएँ के पास पानी पीने के 
  लिए रुक गया.जब उस बालक ने कुएं में रस्से से बंधी बाल्टी को डाला ओर पानी से भरी बाल्टी को 
ऊपर खींचने लगा तो सहसा उसकी नजर कुएं के उस पत्थर पर पड़ी जिस पर बार-बार रगड़ के 
कारण लकीर पड़ चुकी थी. उस बालक ने सोचा कि क्या मेरा दिमाग इस पत्थर से भी कड़ा है 
कि उस पर शिक्षा का प्रभाव नहीं पडेगा?
    वह बालक वहीँ से पुनः अपने गुरुदेव के पास लौट आता है और एक बार उसे फिर   से अवसर देने 
का निवेदन करता है. यही बालक वोपदेव आगे चलकर  एक श्रेष्ठ व्याकरणाचार्य के रूप में विख्यात 
हुआ .

        जब-जब भी हम सच्चे दिल से स्व-मंथन करते हैं तो हम अवश्य ही लक्ष्य कि और बढ़ने 
लग जाते हैं.यदि हमने लम्बे समय से आत्म-निरिक्षण नहीं किया है तो भी घबराने या निराश होने 
कि आवश्यकता नहीं हैं.कोई पथिक रास्ता भूल जाने के कारण विपरीत दिशा में आगे बढ़ जाता है 
और किसी के निर्देशित करने पर तुरंत पीछे कि और घूम जाता है तो निश्चित रूप से वह अपने 
गंतव्य स्थान को हासिल कर ही लेता है. 
              स्व-मंथन से निकलने वाले   मोती कि चर्चा हम अगली पोस्ट में करेंगे.