सोमवार, 2 मई 2011

स्व-मंथन

स्व-निरिक्षणकी प्रक्रिया में हम स्वयं के बारे में जानना सीखते हैं. हम अपने गुण-दोष का सही-सही 
अवलोकन कर पाते हैं.खुद को परखने का काम यदि हम निष्पक्षता से कर पाते हैं तो इस मंथन से 
हम अँधेरे से उजाले की और प्रस्थान कर पाते हैं. 
                  
            जब हम इस मंथन से अपनी शक्तियों का सही मूल्यांकन कर पाते हैं तब हमें हमारी 
निर्बलता व सबलता को अपनी स्मृती में सहेज लेना चाहिये. हमको अपनी निर्बलता को सिर्फ इसलिए 
सहेजना चाहिये ताकि हम इन पर तब तक करारी चोट करते जाए जब तक अपने व्यक्तित्व  से ये 
पूर्ण रूप से खत्म न हो जाये और अपनी सबलता को इसलिए सहेजना चाहिये की इनकी चमक 
फीकी ना पड़ जाये.

             इस आत्म-मंथन से हमें चिंतन करने की शक्ती मिलती है. यह शक्ति दौ प्रकार की होती है 
सकारात्मक शक्ति और नकारात्मक शक्ति . हमारी चिंतन शक्ति खुद में बदलाव लाने की क्रिया 
को जन्म देती है. क्या हमारे देश या दुनिया के आदर्श पुरुष जन्म से ही बड़े  कूळ में पैदा हुए थे .
ज्यादातर आदर्श-पुरुषों का जन्म साधारण परिवारों में ही हुआ है. श्री कृष्ण का जन्म अहीर कूळ में, 
चाणक्य का जन्म गरीब ब्राह्मण कूळ में, स्वामी विवेकानंद, सरदार पटेल, शास्त्रीजी, डाक्टर अब्दुल 
कलाम, अन्ना हजारे या कोई अन्य महापुरुष ........इन सबने विपरीत परिस्थितियों का रुख अपने पक्ष 
में मोड़ा है. ये सब कैसे संभव हुआ होगा? इन सबके जीवन चरित्र को पढने पर मालुम होता है की ये
सभी अपने अपने जीवन  में स्व-मूल्यांकन के दौर  से गुजरकर ही आगे बढ़ें हैं. 

              एक बार की बात है एक साधारण बुद्धि का बालक शिक्षा अर्जन के लिए गुरुकुल में गया .
यह बालक मंद बुद्धि था .समय पर पाठ का अभ्यास नहीं कर पाने के कारण उसे गुरुकुल से निकाल 
दिया गया .यह बालक जब घर की ओर रवाना हुआ तो रास्ते में एक कुएँ के पास पानी पीने के 
  लिए रुक गया.जब उस बालक ने कुएं में रस्से से बंधी बाल्टी को डाला ओर पानी से भरी बाल्टी को 
ऊपर खींचने लगा तो सहसा उसकी नजर कुएं के उस पत्थर पर पड़ी जिस पर बार-बार रगड़ के 
कारण लकीर पड़ चुकी थी. उस बालक ने सोचा कि क्या मेरा दिमाग इस पत्थर से भी कड़ा है 
कि उस पर शिक्षा का प्रभाव नहीं पडेगा?
    वह बालक वहीँ से पुनः अपने गुरुदेव के पास लौट आता है और एक बार उसे फिर   से अवसर देने 
का निवेदन करता है. यही बालक वोपदेव आगे चलकर  एक श्रेष्ठ व्याकरणाचार्य के रूप में विख्यात 
हुआ .

        जब-जब भी हम सच्चे दिल से स्व-मंथन करते हैं तो हम अवश्य ही लक्ष्य कि और बढ़ने 
लग जाते हैं.यदि हमने लम्बे समय से आत्म-निरिक्षण नहीं किया है तो भी घबराने या निराश होने 
कि आवश्यकता नहीं हैं.कोई पथिक रास्ता भूल जाने के कारण विपरीत दिशा में आगे बढ़ जाता है 
और किसी के निर्देशित करने पर तुरंत पीछे कि और घूम जाता है तो निश्चित रूप से वह अपने 
गंतव्य स्थान को हासिल कर ही लेता है. 
              स्व-मंथन से निकलने वाले   मोती कि चर्चा हम अगली पोस्ट में करेंगे.             

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