बुधवार, 4 मई 2011

स्व-मंथन (जैसा वह बोये, वैसा ही काटे)

उस समय की बात है, जब कि पृथ्वी पर मनुष्य का जन्म नहीं हुआ था।

आखिर विधाता ने चन्द्रमा की मुस्कान, गुलाब की सुगन्ध और अमृत की माधुरी को एक साथ मिलाया और मिट्टी के घरौदों में भर दिया। सब घरौंदे लगे चहकने और महकने।

देवदूतों ने विधाता की इस नई अनोखी रचना को देखा तो आश्चर्य से चकित रह गये। उन्होंने ब्रह्मा से पूछा, "यह क्या है?"

विधाता ने बताया, "इसका नाम है जीवन। यह मेरी सर्वश्रेष्ठ कृति है।"

विधाता की बात पूरी भी नहीं हो पाई थी कि एक देवदूत बीच ही में बोला पड़ा, "क्षमा कीजिये प्रभु! लेकिन यह समझ में नहीं आया कि आने इसे मिट्टी का तन क्यों दिया? मिट्टी तो तुच्छ-से-तुच्छ है, जड़ से भी जड़ है। मिट्टी न लेकर आपने कोई धातु क्यों नहीं ली? सोना नहीं तो लोहा ही ले लेते।"

विधाता के होठों पर एक मोहक मुस्कान खेल उठी। बोले, "वत्स! यही तो जीवन का रहस्य है। मिट्टी के शरीर में मैंने संसार का सारा सुख-सौंदर्य, सारा वैभव, उड़ेल दिया है। जड़ में आनन्द का चैतन्य फूंक दिया है। इसका जैसा चाहो, उपयोग कर लो। शरीर को महत्ता देने वाला मिट्टी की जड़ता भोगेगा; जो इससे ऊपर उठेगा, उसे आनन्द के परत-परत-परत मिलेंगे। लेकिन ये सब मिट्टी के घरौंदे की तरह क्षणिक हैं। इसलिए जीवन का प्रत्येक क्षण मूल्यवान् है। जो जितना सोयेगा, उतना ही खोयेगा। तुम मिट्टी के ही अवगुणों को देखते हो, गुणों को नहीं। मिट्टी में ही अकुंर फूटते हैं। मैंने शरीर का कर्मक्षेत्र बनाया है, उसमें कर्मों के अंकुर जमेंगे। इस भांति मैंने मनुष्य को खेती उसके अपने ही हाथ में दे दी है। जैसा वह बोये, वैसा ही काटे।"l

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