गुरुवार, 5 मई 2011

बबुल और गुलाब

एक नदी के तट पर दौ पौधे लगे थे.एक बबुल का ओर दूसरा गुलाब का.दौनों पौधे अपने जन्म की 
 आनुवांशिकता पर बात कर रहे थे.

बबुल ने गुलाब से कहा- भगवान् ने हमें नीची श्रेणी के पौधे के रूप में जन्म देकर हमारे जीवन को
  महत्वहीन बना दिया ,

गुलाब ने पूछा,"तुम यह बात किस आधार से कह रहे हो."

बबुल बोला,"तुम देख नहीं रहे हो, हमारा जन्म कंटीली झाड़ियों के वंश में हुआ है.हमारे जन्म के साथ
हमें कांटे मिले हैं. अब देखना इस पृथ्वी पर हमारा जीवन सार रहित बीतेगा.अन्य वृक्षों की तरह कोई 
भी हमें अपने घर में स्थान नहीं देगा .ना तो हमें समय पर पानी मिलेगा और न ही हमें किसी से सुरक्षा 
मिलेगी. इससे अच्छा होता भगवान् हमें जन्म ही नहीं देता."

गुलाब बोला- मित्र, मैं तुम्हारी सोच से सहमत नहीं हूँ .यह ठीक है की हम कंटीले वंश में पैदा  हुये हैं,
लेकिन हम सपने देखने, कर्म करने और अपनी उपादेयता बनाए रखने में स्वतन्त्र हैं. हमारे जन्म के 
साथ जो वंश मिला उसमें हम पराधीन थे लेकिन अब हम हर कर्म करने में स्वतन्त्र हैं. हमें अपने 
कुल से हीनता का अनुभव नहीं करके अपनी उपयोगिता बनाए रखने का इस संसार में प्रयत्न करना 
चाहिए .

बबुल गुलाब की बात सुनकर हँसने लगा और निराशा भरे स्वर में बोला- मित्र, तुम महज सपने देख 
रहे हो . अब हमें जीवन पर्यंत दुनिया का तिरस्कार सहना होगा और रोते-बिलखते इस जीवन को जीना 
होगा.

गुलाब बोला- बबुल, मैं तेरी बात से सहमत नहीं हूँ. मैं इस परिस्थिति को भी अवसर में बदल देने के लिए 
प्रयास करूंगा. ये कांटे भी मेरी रक्षा का उत्तरदायित्व निभायेंगे. मेरी कठिन परिस्थितियों में भी हँसते 
रहने की आदत मुझे श्रेष्ठ बनायेगी लेकिन तेरी नकारात्मक सोच के कारण तेरी तकदीर भी तुझे कभी 
सम्मानजनक स्थान नहीं दिला पायेगी.

समय के साथ दोनों पलने लगे. बबुल हर वक्त कुल को कोसता रहता और गुलाब अपने आप को 
बदल देने के लिए कर्म में लगा रहा. बरसात के मौसम में गुलाब की झाड़ी का प्रयास सफल होने 
लगा.अब उस झाड़ी में सुगन्धित फूल खिलने लगे जबकि बबुल का पेड़ विचित्र सी दुर्गन्ध से भर गया.

कुछ दिन पश्चात उस नगर का राजा वन भ्रमण के लिए उधर से निकला .उसे गुलाब की महक ने 
 इतना आकर्षित किया की उसे जंगल से उखाड़ कर अपने राज महल में लगा दिया .

सारतत्त्व:-- विपरीत  परिस्थितियों को स्वीकार करके रोते रहने की बजाय हमें परिस्थतियों को 
अपने अनुकूल बनाने का प्रयत्न करना चाहिए. 

इसी पायदान से स्व-निरिक्षण की शरुआत  करें.             
  

कोई टिप्पणी नहीं: