रविवार, 12 जून 2011

स्व-मुल्यांकन और हमारे मस्तिष्क की कार्य प्रणाली

स्व-मुल्यांकन और हमारे मस्तिष्क की कार्य प्रणाली 

देश की ज्वलंत समस्याओं पर बीच में हमारी यात्रा रुक सी गयी थी ,शायद यह पड़ाव आवश्यक  ही था.
क्योंकि जब  हम समस्याओं के भार तले जीते हैं तब हमारी एकाग्रता भंग हो जाती है और
 मस्तिष्क की   कार्यप्रणाली भी बिगड़ जाती है              .

           हम जब खुद के मुल्यांकन की यात्रा करते हैं तब हम कल्पनाओं की दुनियाँ में पहुँच जाते हैं .
वहां हम एक जटिल यन्त्र से मिलते हैं जो मस्तिष्क कहलाता है .हमारा मस्तिष्क हर पल कार्यरत रहता 
है चाहे हम जाग  रहें हैं या सो रहे हैं. यहाँ से बुद्धि का ,विचारों का और भावनाओं का निरंतर जन्म होता है.
हमारी दबी हुई इच्छाएं ,हमारे संस्कार यहाँ संचित रहते हैं .हमारा मन हमारे मस्तिष्क द्वारा भेजी गयी 
हर सुचना ,हर घटना पर सुव्यवस्थित तरीके से कार्य करता है,सहेझता है और समय पर याद दिलाता है.

         सबसे पहले हम अपने मस्तिष्क के बारे में जान लेते हैं .पिछले तीस  वर्षों की शोध से अब तक हम 
जो जान पाए वह यह है  कि हमारे एक नहीं दो ऊपरी मस्तिष्क हैं और वे अलग-अलग मानसिक भागों
में अलग कोण से कार्य करते हैं.मस्तिष्क की बायीं कार्टिस का काम तर्क, शब्द , सूची, संख्या , क्रम ,
विश्लेषण और शैक्षिक गतिविधियों से होता है. एक  तरफ जब बांयी कार्टिस इन गतिविधियों में काम
 करती है तब दांयी कार्टिस बांयी कार्टिस की मदद करने के लिए तैयार रहती है और एल्फा वेव की
अवस्था (घटाव -बढाव ) में या स्थिर अवस्था में होती है .हमारी दांयी कार्टिस का काम रिदम , कल्पना ,
रंग, दिवा-स्वप्न, समग्र स्थिति , स्थानिक जागरूकता, दिशा सम्बंधित होता है.

      मस्तिष्क का दायाँ और बायाँ भाग ज्यादातर इसी तरह से काम करते हैं.इसलिए हम आये दिन
देखतें रहते हैं की जो लोग शिक्षा के क्षेत्र में कमजोर थे वे लोग संगीत ,चित्रकारी,अभिनय के क्षेत्र पर
बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लेते हैं या कम पड़े-लिखे लोगों की गणित मजबूत होती है.

        हम जब बायीं और दायीं कार्टिस दोनों का एक साथ उपयोग करते हैं तब हमें बेहतर परिणाम मिलते
हैं.ज्यादातर स्थितियों में हम एक कार्टिस का ज्यादा उपयोग करते हैं तब हम पाते हैं कि हम कहीं पर
निपुण हैं और कहीं पर कमजोर .जैसे कि एक आदमी शेक्षणिक योग्यता में अव्वल है परतु परिस्थिति
का लाभ नहीं उठा पाता है और अपने काम में असफल हो जाता है .आम भाषा में हम इसे नियति का
दोष मान लेते हैं वस्तुत: यह हमारे द्वारा मस्तिष्क कि दोनों कार्टिस का उपयोग नहीं कर पाना है .
हमें सफलता पाने के लिए इस पर विचार करना ही होगा वरना हमारी स्व-मुल्यांकन कि यात्रा अधूरी ही
रह जायेगी.

           हमारा मस्तिष्क एक की-बोर्ड की तरह है जिस पर अरबों अलग-अलग धुनों , व्यवहार-बुद्धि
के कार्यों, को बजाया जा सकता है.हम मस्तिष्क की शक्ति को किसी सीमा में बाँध नहीं सकते हैं .
मस्तिष्क की असाधारण क्षमताओं का उपयोग करके हम स्मरण शक्ति के असाधारण कार्य कर सकते हैं.

         हम अपनी पुस्तकों के ज्ञान को कैसे स्मरण शक्ति के दीर्घकालीन कोषों में सुरक्षित करें कि पढ़ी
या सुनी गयी घटना अक्षरश: याद आ जाये ?

          यह मेघा शक्ति मेरी और आप सब की हो सकती है इसके लिए आवश्यक है की हम मस्तिष्क की
कार्य पद्धति को समझ ले और उस पद्धति के अनुसार ही हम पढ़ें ,याद करें.

एक समय की बात है स्वामी विवेकानंद समुद्री यात्रा पर जहाज में सवार थे.उस समय की समुद्री यात्राएं
काफी समय लेती थी. स्वामीजी उस यात्रा में अपने साथ कुछ ग्रन्थ और पुस्तकें ले गए थे .एक सुबह
स्वामीजी जहाज के किनारे पर बैठे किसी पुस्तक को पढ़ रहे थे .स्वामीजी जैसे ही  उस पुस्तक का एक
पृष्ठ पढ़ लेते उसे फाड़ कर जल में फ़ेंक दे रहे थे .उनको ऐसा करते देख लोगों में कौतुहल जागा कि यह
बाबा क्या कर रहा है. पुस्तक पढता भी जा रहा है और उसके एक-एक पृष्ठ पानी में भी बहाता जा रहा
है .सहयात्रियों में से एक ने पूछा-बाबा ,आप पुस्तक पढ़ भी रहें हैं और फाड़ भी रहें हैं ;आपका यह
विचित्र आचरण हम समझ नहीं पा रहें हैं?
       स्वामीजी ने उत्तर दिया - मेरे द्वारा पढ़े जा चुके इस किताब के पृष्ठों कि कोई आवश्यकता नहीं
रही है इसलिए में पढ़ी जा चुकी किताब के पन्नों को फेंकता जा रहा हूँ.
       क्या आप यह कहना चाहते हैं कि इस किताब के फाड़कर फेंके जा चुके पृष्ठ आपको अक्षरश:
याद हो चुके हैं?
       स्वामीजी ने कहा-"हाँ ,मुझे सभी पृष्ठ याद हो चुके हैं .और स्वामीजी ने अब तक जो पढ़ा था
सबके सामने सुना दिया .सभी सहयात्री उनकी प्रखर मेघा शक्ति को देखकर भोंचक्के रह गए

           यह असीम शक्ति आपके अन्दर भी विद्यमान है आवश्यकता है इसको जगाने की

अगली पोस्ट में हम यह जानने का प्रयास करेंगें कि  स्मरण शक्ति को कैसे प्रखर किया जाए ?    
                     

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