शनिवार, 30 जुलाई 2011

आओ लोकपाल -जोकपाल खेले !

आओ लोकपाल -जोकपाल  खेले !

गली के बच्चे आज गेंद और बल्ला लेकर नहीं खेल रहे थे,यह भी एक अजूबा था मेरे लिए क्योंकि हर दिन तूफान मचाने वाले बच्चे आज शांत थे .उनकी शांति भी मेरे लिए कौतुहल बन गयी.जब मैं इस  राज को समझने के लिए नीचे उतरा तो देखा सभी बच्चे तीन झुण्ड में खड़े थे.उनसे अलग-विलग खड़े होने  का कारण पूछा तो एक बच्चे ने बताया ,"अंकल ,अब हम पुरे अगस्त महीने में नया रोमांचक खेल खेलेंगे "

               बच्चो से जब खेल का नाम पूछा तो हमारा मन भी इस खेल को नियमित देखने का हो गया क्योंकि यह बिलकुल नया प्रयोग था .खेल है "लोकपाल-लोकपाल"

खेल के नियम -     
  1. इसमें तीन ग्रुफ के लिए कुल जमा २० बच्चे कम से कम चाहिए 
  2. पहला ग्रुफ शासक पक्ष , दूसरा ग्रुफ जनता  ,तीसरा ग्रुप पंचायत सदस्यों का 
  3. पहला ग्रुफ आँखों  में धुल  झोकने,झूठ को सच दिखाने ,पसीना किसी का और माल चटाई शासक पक्ष की ये सभी करतब इतनी होशियारी से ,दादागिरी से ,नफ्फट बनकर करेगा  
  4. दूसरा सिविल पक्ष इनको पकड़ने के लिए बिना दादागिरी के ,सभ्य बनकर ,पहले ग्रुफ के नियम तले रहकर धरना देगा ,अनशन करेगा ,भूखा रहेगा 
  5. तीसरा ग्रुफ पंचों का रहेगा जो अपनी-अपनी रोटी इनके सुलगते अंगारों पर सकेगा मतलब यह की अपना नफा -नुकसान तौलकर दोनों ग्रुफ में पलटी मारता रहेगा .जो पंच पलटी बेहुदे तर्क से मारेगा वह अगले दिन पहले ग्रुफ का सदस्य बनेगा तथा जो पंच सही तथ्यों का सहारा लेगा वह अगले दिन के खेल में दूसरा ग्रुफ बनेगा .शेष बचे सभी बच्चे तीसरे ग्रुफ में रहेंगे 
खेल शुरू     
जोकपाल :- हम इस  देश में राजनीती का व्यापार पिछले ६५ वर्षो से कर रहे हैं .क्या हमने आपके धंधे में कभी बाधा  डाली है जो  तुम सब हमारे धंधे में टांग  फंसा रहे हो?

जनता  :- तुमने हमारी आँखों में धुल झोंकी है .हमारे से कर का पैसा लिया और देश के विकास   की जगह अपना घर भर लिया.

पंच  :-हमने कभी देश के विकास की सोची ही नहीं थी .ये आरोप सही नहीं है हमने नोट देकर वोट ख़रीदा .अपनी अक्ल और गुंडागर्दी की ताकत  पर पंच बने .क्या पेट भरने का अधिकार हमारा नहीं है क्या?

जोकपाल :-अब बोलो ?पेट भरने के लिए क्या करे हम.क्या सेवा से पेट भर जाता है 

जनता :- पेट भरने के लिए तुम हमसे पगार लेते हो ,भत्ते लेते हो ,रेल, टेलीफोन, हवाई जहाज सब फ्री में पाते हो.फिर भी  लूट चलाते हो .यह सहन नहीं करेंगे .हम लूट गिरी  के खिलाफ धरना देंगे   

पंच :- लोकपाल का अधिकार है की वह धरना दे लेकिन पहले सब तय हो जाए की धरना  कैसे टूटेगा 

जनता :- क्या तुम हमें  खरीदना चाहते हो.हम पैसे से नहीं बिकते ये काम तुम्हारा  है.हम तुम्हे जेल  भेजेंगे  
.देश को लूटने वालों के मुंह काला करेंगे

जोकपाल :- किसी भी पंच को पकड़ कर मुंह काला करने का किसी को अधिकार नहीं होगा .अगर जनता ने  चुने हुए पंचों का मुंह काला किया तो गोली चलेगी ,भुन दिया जाएगा  

पंच :- गौली नहीं चल सकती ,ये मर ही गए तो फिर हम रुआब किस पर झाडेंगे ,रुतबा किसे दिखाएँगे .सजा कम की जाए जोकपाल.इन्हें डंडे मारे जाए 

जनता :- लो अब हम धरने पर बैठ गए .अब नारे लगायेंगे .भ्रष्टाचारियों को जेल भेजो .देश  का धन देश में लाओ .आतंकवाद  दूर करो.वन्दे ............

पंच :- नारे बंद करो .हम तुम्हारी वाजिब मांगे सुनते हैं .बोलो क्या मांगे हैं.

जनता :- देश को किसने लुटा ?

पंच :हम में से वे सभी जिसको लुटने का मौका मिला ?

जनता :- लुट का माल कहाँ है ?

पंच :- देश के बाहर सुरक्षित है 

जनता :- उस पैसे को देश में लाओ और देश की सम्पति घोषित करो और तुम जेल की हवा खाओ 

पंच:- आपकी पहली  मांग मंजूर है .हम मारीशस रूट से पैसा वापिस ला रहे है.दूसरी बिलकुल मंजूर नहीं 
क्योंकि बड़ी सफाई से माल लुटा है वह अब हमारा है .तीसरी शर्त आधी मंजूर है जो पंच अपनी जान पर जोखिम महसूस करेगा वाही जेल सेवा का उपयोग करेगा 

ज़ोकपाल :- पंच सही कह रहे हैं .पंच अपनी सुरक्षा के लिए जेल जा सकता है .पैसे जिसने लूटे उसके रहेंगे .अब अंतिम  फैसला है हम नफ्फट ,कमीने बने रहेंगे 

जनता :- तो हमारा फैसला भी अंतिम ....चौक में झंडा गाड़कर अनशन शुरू 

पंच :- चौक पंचो का है .वहां तुम लोग नहीं जा सकते .वहां धारा 144 लगा देंगे .

जनता:- हम नहीं डरते ....हम तुम सबसे लुटा हुआ धन लेकर रहेंगे .कल हम फिर सब मिलकर नई राह बनायेंगे 

पंच हडबडा कर दौ  धड़ों में बाँट गए  कुछ जनता के saath  तो कुछ जनता के खिलाफ 

कल क्या गुल खिलेगा कल देखेंगे . 

                 

शुक्रवार, 29 जुलाई 2011

मानसून के मेंढक और भारतीय समाज

  मानसून के मेंढक और भारतीय समाज 

बरसात का मौसम और मेंढ़क का टर्राना वैसे कोई नयी बात नहीं है लेकिन जब सैकड़ों मेंढ़क अलग -अलग 
समुह में इकट्टे होकर टर्राये तो दाल काली होने का पक्का विश्वास हो ही जाता है.मेंढकों की टर्र-टर्र को 
समझने के लिए विशेषज्ञ का साथ मिल जाए तो हरेक टर्र टर्र को बारीकी से  समझा जा सकता है .मानसून 
सत्र  में पूरा तालाब टर्र-टर्र से गूंज उठेगा .कौनसा मेंढ़क कैसे टर्रा सकता है .एक बानगी ----

                तीन रंगों वाला मेंढ़क -- ये एक खास किस्म का मेंढ़क है .इस तिरंगी समुह की बोस मादा है ,वह भी 
बाहर के तालाब से आयात  करके लायी गई है .यह मादा खुल कर नहीं टर्राती है,क्योंकि खड़ी बोली में टर्र- टर्राना इसे आता नहीं है.यह बुजुर्ग देशी  मेंढ़क के पेट में घुस कर टर्राती है. इसकी इस टर्र -टर्र से बेचारा बुढा
मेंढ़क परेशान है लेकिन पापी पेट के लिए वह भी मेंढकी के सुर में टर्राता है.

                इस तिरंगी समुह में एक उजड़ा चमन नाम का मेंढ़क है ....क्या टर्राता है ,साला !बात बात में स्वर 
बदलता है .मानव को साधन समझता है बुध्धू . कभी उलटा पड़कर टर- टर्राता है तो कभी तिरछा पड़कर .

                इसका साथी भी कम नहीं है सा'ब! दिमाग घर पर रखकर ऐसा पन्च मारता है की मेंढकी की भी  साँसे फुला देता है.बद दिमाग ऐसा कि मेंढकी के ताबूत में ही कील ठोकता है जी ! अभी भी छत्र वाला समझता है अपने आप को .
               इसमें एक मेंढकी का बच्चा है, अभी-अभी तालाब के एक कोने में तेरना  सीख रहा था मगर ऐसा 
बरसात में भीगा सा'ब की जुकाम हो गया . नौटंकी की मगर देखने वाले नहीं थे सा'ब .बेचारी मेंढकी !! क्या 
कभी पुरे तालाब में एक बार अपने बबलू की टर्र टर्र को सबकी टर्र टर्र बना सकेगी ???


             मेंढक भाषा विशेषज्ञ के साथ आपको भी सैर करा देते हैं पुरे तालाब की .तीन-रंगे मेंढक अलग तरह 
से टर्रा रहे थे जिसका अर्थ यह था कि हम पूरे तालाब के उन मेंढकों को जरुर सबक सिखायेंगे जो हमारी छिपायी गई सम्पती को जनता में लुटा देना चाहते हैं , जो मेंढक हमें कानून पढ़ायेगा उसे कारावास में मरवा दिया जायेगा, जो मेंढक हमारी और एक वाजिब अंगुली भी उठाएगा तो हम गैरवाजिब तरीके से पांच अंगुलियाँ
उठायेगें ,जो हमारे हरामीपने कि पोल खोलेगा हम उसकी झूठी पोल लिखेंगे और सब एक साथ चीख कर उसे
सही करार देंगे .राज करेंगे तो गला तो दबायेंगे ही .जो हमारे  सेवा के धंधे में आग लगाएगा उसे बाबा बना देंगे .

        दुरंगे मेंढक की टोली में अजीब हादसा हो  गया लगता था क्योंकि  कुछ  दुरंगे रो रहे थे .कुछ तीन रंगे वाली
शक्ल के लग रहे थे कुछ चुप थे तो कुछ फिर बोलेंगे अभी  सोच रहे हैं कि गलत को सही कैसे  बोले ताकि राम कि कृपा से गद्दी मिल जाये तो तीर-रंगे कि तरह हलवा पूड़ी खा सके .

       एक कोने  में लम्बी सूंड वाले मेंढक टर्रा रहे थे. ये तालाब में नहीं खेतीहर कि जमीन में अपना आशियाना
ढूंढ़ रहे थे ,मूर्तियों में सत्ता ढूढ़ रहे थे.तीन-रंगे को गले भी लगाता है और आँख भी दिखाता है

      आगे कोने में तीन रंगे को सलाम ठोकने का मौका ढूंढ़ पाने में असफल मेंढक पुरानी सूखी घास के तिनके
से टाट खुजा रहा था ,बिना वजह के तीन-रंगी मादा के कसीदे पढ़ रहा था .मगर हाय रे किस्मत !फिर छलावा हो गया .काश! बत्ती दिखा सकता या हरी देख सकता .

     दक्षिण के कोने में पड़ा एक बुढा मेंढक मजे  से अंडा ,दूध,कपास ,चीनी ,बियर सब कुछ हजम करने कि
 जुगत में ताज को पटकनी देने कि धौंस झाड़ रहा था .

          एक जगह बहुत सारे  मरियल मेंढक जागते हुए भी गाफिल थे .इनमे से कभी कभी कोई मेंढक टर्राता
तो बाकि सब उसे ऐसे घूरते जैसे फिर सतरंगी नेता मेंढक से मार खाने कि नौबत आने वाली है

          इतने  में एक बड़ा शिकार तालाब में आकर गिरता है  .मरियल मेंढकों को आँखे दिखा बाकी सभी मेंढक
शिकार का मिलकर  लुफ्त उठाने  लगते हैं . बेचारा मरियल मेंढक का टोला... कभी नेताओं के भरे हुए पेट को, दबा दबा कर माल ठूंस रहे नेता मेंढक के पेट को देखता है तो कभी अपने भूखे पेट को देखकर अपनी किस्मत पर टर्राता है. उसकी टर्राहट का अर्थ है रोटी का  दूर होता निवाला, भूखमरी , अन्याय, गरीबी.

           ये रंग बिरंगे मेंढक जब भी टर्राते हैं बेचारे मरियल रंग हीन मेंढक समुदाय की चीख निकल जाती  है
क्या करे रंग हीन मेंढक ? व्यवस्था और कानून के नाम पर 65 साल से झेल रहा है ............                                          


    
                                                       

सोमवार, 4 जुलाई 2011

जन लोकपाल, बिल्ली जमात और भारतीय नागरिक

जन लोकपाल, बिल्ली जमात  और भारतीय नागरिक    

सभी दलों ने आज अपनी-अपनी खिचड़ी पकाई और नागरिकों के सामने बिखेरी . उनसे पहले भी कोई उम्मीद 
थी ही नहीं और ठीक वैसा ही आज हुआ. शायद सिविल सोसायटी भी अच्छी तरह से इस परिणाम को जानती 
भी होगी .

         बिल्ली को पकड़ने के लिए और उसके गले में घंटी बाँधने के लिए अन्नाजी ने उपाय भी बिल्ली से ही 
जानना चाहा .कोई अनाड़ी बिल्ली भी होती तो भी अन्नाजी को यह कभी भी नहीं बताती की बिल्ली के गले 
में घंटी और वह भी दूर तक आवाज करने वाली कैसे बाँधी जा सकती है.ये तो सभी पकी हुई घाघ बिल्लियाँ
है .

           बिल्ली को घंटी पसंद आने वाली भी नहीं थी,और आ भी नहीं पायेगी.क्योंकि उससे बिल्ली जमात 
को अपना अस्तित्व भी खतरे में लगता है. आज तक जो मलाई चट की है वह जन लोकपाल के नरक में नजर 
ही नहीं आ रही है.सभी बिल्लियाँ अपनी जमात के गुणधर्म को निभाती है चाहे वो काली हो ,भूरी हो या 
चितकबरी .नागरिक समाज यदि छोटी और मरियल बिल्लियों के शिकार करने की बात करता तो शायद 
बात कुछ बनती हुई लगती लेकिन बिल्लियों के सरदार और सरदार की सम्पूर्ण सेना के गले में मृत्यु घंट 
लटकाने की बात से सभी बिल्लियाँ भड़कने वाली ही थी ,कुछ सयानी थी वो चुप थी . 

           कुछ बिल्लियाँ, चूहों का शिकार यथावत चलता रहे इस बात पर पूरी जमात मुहर लगा दे, या कोई 
रास्ता सुझा दे इस बात की कोशिश करने का उपक्रम करने लगी तो कुछ छोटी मरियल बिल्लियाँ ताकत 
वाली बिल्लियों के मौजूद रहते शिकार तो कभी कर नहीं पाएगी ,यह सोच कर की  घंटी सबके बंध  जाए 
तो हमारे भी बाँध दो ,यह कहने लगी ताकि ताकतवर बिल्लियाँ उनकी  बगावत पर तवज्जो दे और उनको 
भी शिकार की हड्डियाँ चूसने को मिल जाये. समान ताकत वाली बिल्लियाँ ज्यादा ताकतवर बनने के 
लिए योजना बनाने लग गयी कि उनके भाग का छींका टूटे तो शासन करने वाली बिल्लियों को पटकनी दे  
देवें .

इन बिल्लियों के तमासे में बेचारे जन लोकपाल कि तो भ्रूण-ह्त्या ही होनी है क्योंकि सभी बिल्लियाँ एक 
दुसरे पर " कीचड़ उछाल " खेल खेलेगी .इन बिल्लियों का यह खेल देखने में नागरिक समाज दिलचस्पी लेगा 
और किस बिल्ली ने किस बिल्ली को किस हथियार से मारा  इस भटकाने वाली बात पर अपनी ऊर्जा को 
नष्ट कर देगा .बिल्लियों के तमासे और नागरिक समाज कि भटकन के बीच फंसे लोकपाल बिल के भ्रूण 
कि हत्या कब हो गयी इस बात को नागरिक समाज कभी  समझ ही नहीं पायेगा और बिल्लियाँ भी निश्चित हो 
जायेगी कि लम्बे समय से गर्भ में रहे जन  लोकपाल कि हत्या से उन पर छाया आसन्न संकट टल गया.

 अन्नाजी भी जानते होंगे कि बिल्लियों कि जमात के इरादे नेक नहीं है .जन लोकपाल का प्रसव सही 
सलामत करवाने का जुगाड़ कैसे हो ?  बिल्लियों के प्रवक्ता ,खुशामत दार और अधकचरे बुद्धिजीवी ऐसा 
जाल बुनने कि कोशिश करेंगे कि इसका सिरा भी अन्नाजी न ढूंढ़ पायेंगे.

प्रश्न यह है कि बाबा के अनशन जैसा हाल अन्ना का भी होगा ? संभावना तो बुरे हाल कि दिख रही है.
आगे के कठिन दौर में नागरिक समाज के पास भूखे रहने का विकल्प है या फिर सरकारी लोकपाल बिल 
को जन्म लेते देख रोते रहने का विकल्प है .

इस सारी कवायद को समझने के बाद हम भारतीयों के पास कोई विकल्प है ?

हमारे पास जो विकल्प है वह यही है कि सारे देशवासियों को अन्ना के आमरण अनशन के समर्थन का 
शंखनाद कर देना है .हम भी देश भक्ति का जज्बा लेकर गाँव,शहर,तहसील,जिला,राज्य स्तर पर स्वयं भू   
अनशन कर दे. करोड़ों लोगों की  ताकत के सामने ही ये बिल्लियाँ पूंछ दबा कर भागेगी .गांधी के उपवास की
सफलता का भी यही राज था .चाहे नमक सत्याग्रह था या सविनय अवज्ञा आन्दोलन ,गांधीजी ने भारतीय 
नागरिकों का साथ लिया था और अब अन्नाजी  को भी आम नागरिकों के सामने यह अपील करनी चाहिए 
की "१६ अगस्त को  लोकपाल लाओ अनशन सभी भारतीयों को करना है" .नागरिक समिति को जीवनदान 
आम नागरिक ही दे सकते हैं .आम नागरिक ही तख़्त और ताज   बदलने की क्षमता रखते हैं.            
      
           

रविवार, 3 जुलाई 2011

                                               बिल्लियों का लोकतंत्र 

एक बार कुछ बिल्लियाँ शेरों के जंगल में घुस गयी . अपने चारों ओर शेर ही शेर देखकर हड़बड़ा गयी. बात जान पर बन आई थी ,भूखे शेर उन पर टूट पड़े तो कोई भी बिल्ली बचने वाली नहीं है यह बात बिल्लियों की मुखिया समझ रही थी. उसने सब बिल्लियों को इशारा किया की यदि रास्ते में कोई भी शेर कुछ भी पूछे तो कोई भी कुछ नहीं बोले ,मैं शेरों से निपट लुंगी.

          थोड़ी देर चलने के बाद कुछ दहाड़ते हुए शेरों ने बिल्लियों के झुण्ड को रोका और पूछा आप कौन हैं ?
बिल्लियों की मुखिया ने जबाब दिया -हम आपकी सेविकाएँ हैं .भगवान् ने हमको आपकी सेवा के लिए 
भेजा है .हम आपके जंगल के राज की व्यवस्था संभालने के लिए आयी हैं ताकि आप सभी शेर आराम से 
पेट भरने के बाद चैन की नींद सो सके .

         जंगल के सभी शेरों ने मिलकर एक तात्कालिक सभा बुलायी और बिल्लियों की बात पर विचार -विमर्श किया .बिल्लियों की ताक़त पर विचार  किया और निर्णय किया कि  इन बिल्लियों की ताकत बहुत कमजोर है इसलिए ये हमारे लिए  खतरे का कारण कभी भी बन नहीं पायेगी. ये सब यदि अपनी जान बचाने के लिए हमारे  सभी भागदौड़ के काम कर देती है तो हम शेरों के लिए आराम हो जायेगा.इस प्रकार शेरों ने अपने राज की व्यवस्था को बिल्लियों के हाथों में सौप दिया और अब सभी शेर खा पीकर ऊँघने  लगे.

     शेरों को शिकार करके और दिन भर ऊँघते देख बिल्लियों की मुखिया ने निर्णय किया की अब हम सभी 
यहाँ पर सुरक्षित हैं इसलिए इसी जंगल में स्थायी निवास कर शेरों  पर शासन करना चाहिये.

               कुछ दिन बीत जाने के बाद बिल्लियों की मुखिया ने जंगल के सभी शेरों की एक सभा बुलायी और शेरों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए कुछ योजनायें सभा में रखी.शेरों को बिल्लियों  की बुद्धि और 
विवेक पर भरोसा हुआ और उन्होंने उनकी बात मान ली .अब बिल्लियों ने  सुरक्षा के नाम पर जंगल के  एक 
भाग पर शेरों को बाहरी हिंसक जानवरों से भय है यह कहकर उनके लिए वह क्षेत्र प्रतिबंधित कर दिया .
उस प्रतिबंधित क्षेत्र में शेर भय के मारे जाने से डरने लगे तब उस क्षेत्र पर बिल्लियों   ने अपना कब्ज़ा कर लिया.सभी बिल्लियाँ अब आराम से रहने लगी और शेरों के खा चुके शिकार से अपना पेट भरने लगी .

         एक दिन बिल्लियों  की मुखिया ने सभी बिल्लियों को बुलाया और कहा की हमें शेरों की झूठन से पेट भरना पड़ता है यह हमारे गौरव के अनुकूल नहीं है ,हमें शेरों के किये गए शिकार से हिस्सा चाहिये इसलिए तुम 
सब मेरे साथ चलो .मुखिया बिल्ली सभी बिल्लियों को लेकर शेरों के पास गयी और बोली -"हे शूरवीरों !हम दिन-रात आपकी सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के कारण अपने भोजन के लिए भी समय नहीं निकाल पा रही हैं  हम सभी अब भूखे रह कर जीवित नहीं रह सकती हैं इसलिए हम ये जंगल छोड़ कर जा रही हैं"

शेरों ने उनसे जंगल छोड़ कर नहीं जाने की प्रार्थना की तो मुखिया बिल्ली बोली ,"हम एक शर्त पर आप सबकी सेवा कर सकती  हैं यदि आप अपने- अपने शिकार से निश्चित भाग हमें भरण -पोषण के लिए दे  दो" .

      शेरों ने इस आसान सी बात को मान ली तब बिल्लियों ने भी उन्हें उनकी सेवा में बने रहने का आश्वासन 
दे दिया .अब बेचारे शेर दिन में ज्यादा मेहनत करने लगे और बिल्लियाँ आराम से रहने लगी.

          थोड़े दिन बाद एक दुसरे जंगल का मेहमान  शेर वहां आया और सभी जाती बंधुओं का हालचाल जाना .साथी बंधुओं ने जंगल की राज्य व्यवस्था को बिल्लियों को सौप कर निश्चिंत हो जाने की बात भी मेहमान शेर को बतायी  .मेहमान शेर ने उनके गिरते स्वास्थ्य के बारे में पूछा तो शेरों के भूतपूर्व राजा ने बताया की हमें अपनी सुरक्षा व्यवस्था को समुचित रूप से चलाने के लिए अपने शिकार का निश्चित भाग बिल्लियों को देना होता है इसलिए सभी शेर  हरदिन थोड़े भूखे रह जाते हैं ,लेकिन सुरक्षा के लिए तो ये सहन करना ही पडेगा .

      मेहमान शेर ने बिल्लियों की चालाकी को समझ लिया था इसलिए उसने सभी शेरों को संबोधित 
करते हुए कहा-ये बिल्लियाँ आप  सभी को मुर्ख बना कर अपना जीवन सुख से बिता रही है .ये इस जंगल की राजा नहीं है असल में आप सभी इस जंगल के राजा हैं ,आप सभी को मिलकर उन पर आक्रमण कर देना 
चाहिये लेकिन लम्बे समय से ऊँघते शेरों का साहस जबाब दे चुका था .उन्होंने मेहमान शेर से कहा,"भाई ,
तुम तो मेहमान बनकर आज आये हो ,कल चले भी जाओगे लेकिन हमें तो यहीं रहना है .हम इन बिल्लियों 
से पंगा लेकर अपनी सुरक्षा को खतरे में नहीं डाल सकते हैं .

      जब बिल्लियों की मुखिया को मेहमान शेर की दहाड़ सुनाई दी तो उसने  तुरंत आसन्न खतरे को  भांप 
लिया और सभी बिल्लियों को हिदायत दे दी की इस शेर को तुरंत नोच डाले वर्ना ये सभी शेर हमारे अस्तित्व 
को मिटा डालेंगे .सभी बिल्लियाँ गुर्राती हुयी मेहमान शेर पर टूट पड़ी .मेहमान शेर अपने को अकेला निसहाय 
देखकर भाग निकला .अब बिल्लियाँ आराम से जिन्दगी गुजारने लगी .

कथा सार- चालाक लोगों कि चालबाजी से बचे और अपनी शक्ति पर अविश्वास नहीं करें.