सोमवार, 4 जुलाई 2011

जन लोकपाल, बिल्ली जमात और भारतीय नागरिक

जन लोकपाल, बिल्ली जमात  और भारतीय नागरिक    

सभी दलों ने आज अपनी-अपनी खिचड़ी पकाई और नागरिकों के सामने बिखेरी . उनसे पहले भी कोई उम्मीद 
थी ही नहीं और ठीक वैसा ही आज हुआ. शायद सिविल सोसायटी भी अच्छी तरह से इस परिणाम को जानती 
भी होगी .

         बिल्ली को पकड़ने के लिए और उसके गले में घंटी बाँधने के लिए अन्नाजी ने उपाय भी बिल्ली से ही 
जानना चाहा .कोई अनाड़ी बिल्ली भी होती तो भी अन्नाजी को यह कभी भी नहीं बताती की बिल्ली के गले 
में घंटी और वह भी दूर तक आवाज करने वाली कैसे बाँधी जा सकती है.ये तो सभी पकी हुई घाघ बिल्लियाँ
है .

           बिल्ली को घंटी पसंद आने वाली भी नहीं थी,और आ भी नहीं पायेगी.क्योंकि उससे बिल्ली जमात 
को अपना अस्तित्व भी खतरे में लगता है. आज तक जो मलाई चट की है वह जन लोकपाल के नरक में नजर 
ही नहीं आ रही है.सभी बिल्लियाँ अपनी जमात के गुणधर्म को निभाती है चाहे वो काली हो ,भूरी हो या 
चितकबरी .नागरिक समाज यदि छोटी और मरियल बिल्लियों के शिकार करने की बात करता तो शायद 
बात कुछ बनती हुई लगती लेकिन बिल्लियों के सरदार और सरदार की सम्पूर्ण सेना के गले में मृत्यु घंट 
लटकाने की बात से सभी बिल्लियाँ भड़कने वाली ही थी ,कुछ सयानी थी वो चुप थी . 

           कुछ बिल्लियाँ, चूहों का शिकार यथावत चलता रहे इस बात पर पूरी जमात मुहर लगा दे, या कोई 
रास्ता सुझा दे इस बात की कोशिश करने का उपक्रम करने लगी तो कुछ छोटी मरियल बिल्लियाँ ताकत 
वाली बिल्लियों के मौजूद रहते शिकार तो कभी कर नहीं पाएगी ,यह सोच कर की  घंटी सबके बंध  जाए 
तो हमारे भी बाँध दो ,यह कहने लगी ताकि ताकतवर बिल्लियाँ उनकी  बगावत पर तवज्जो दे और उनको 
भी शिकार की हड्डियाँ चूसने को मिल जाये. समान ताकत वाली बिल्लियाँ ज्यादा ताकतवर बनने के 
लिए योजना बनाने लग गयी कि उनके भाग का छींका टूटे तो शासन करने वाली बिल्लियों को पटकनी दे  
देवें .

इन बिल्लियों के तमासे में बेचारे जन लोकपाल कि तो भ्रूण-ह्त्या ही होनी है क्योंकि सभी बिल्लियाँ एक 
दुसरे पर " कीचड़ उछाल " खेल खेलेगी .इन बिल्लियों का यह खेल देखने में नागरिक समाज दिलचस्पी लेगा 
और किस बिल्ली ने किस बिल्ली को किस हथियार से मारा  इस भटकाने वाली बात पर अपनी ऊर्जा को 
नष्ट कर देगा .बिल्लियों के तमासे और नागरिक समाज कि भटकन के बीच फंसे लोकपाल बिल के भ्रूण 
कि हत्या कब हो गयी इस बात को नागरिक समाज कभी  समझ ही नहीं पायेगा और बिल्लियाँ भी निश्चित हो 
जायेगी कि लम्बे समय से गर्भ में रहे जन  लोकपाल कि हत्या से उन पर छाया आसन्न संकट टल गया.

 अन्नाजी भी जानते होंगे कि बिल्लियों कि जमात के इरादे नेक नहीं है .जन लोकपाल का प्रसव सही 
सलामत करवाने का जुगाड़ कैसे हो ?  बिल्लियों के प्रवक्ता ,खुशामत दार और अधकचरे बुद्धिजीवी ऐसा 
जाल बुनने कि कोशिश करेंगे कि इसका सिरा भी अन्नाजी न ढूंढ़ पायेंगे.

प्रश्न यह है कि बाबा के अनशन जैसा हाल अन्ना का भी होगा ? संभावना तो बुरे हाल कि दिख रही है.
आगे के कठिन दौर में नागरिक समाज के पास भूखे रहने का विकल्प है या फिर सरकारी लोकपाल बिल 
को जन्म लेते देख रोते रहने का विकल्प है .

इस सारी कवायद को समझने के बाद हम भारतीयों के पास कोई विकल्प है ?

हमारे पास जो विकल्प है वह यही है कि सारे देशवासियों को अन्ना के आमरण अनशन के समर्थन का 
शंखनाद कर देना है .हम भी देश भक्ति का जज्बा लेकर गाँव,शहर,तहसील,जिला,राज्य स्तर पर स्वयं भू   
अनशन कर दे. करोड़ों लोगों की  ताकत के सामने ही ये बिल्लियाँ पूंछ दबा कर भागेगी .गांधी के उपवास की
सफलता का भी यही राज था .चाहे नमक सत्याग्रह था या सविनय अवज्ञा आन्दोलन ,गांधीजी ने भारतीय 
नागरिकों का साथ लिया था और अब अन्नाजी  को भी आम नागरिकों के सामने यह अपील करनी चाहिए 
की "१६ अगस्त को  लोकपाल लाओ अनशन सभी भारतीयों को करना है" .नागरिक समिति को जीवनदान 
आम नागरिक ही दे सकते हैं .आम नागरिक ही तख़्त और ताज   बदलने की क्षमता रखते हैं.            
      
           

कोई टिप्पणी नहीं: