रविवार, 28 अगस्त 2011

अन्ना की जीत के मायने

अन्ना की जीत के मायने  

अन्ना की जीत- एक व्यक्ति की नहीं है .
अन्ना की जीत- एक संस्था की नहीं है

अन्ना की जीत- सोये हुए भारत की जीत है
अन्ना की जीत- दबे कुचले भारत की जीत है

अन्ना की जीत-अँधेरे पर उजाले की जीत है
अन्ना की जीत-जड़ पर चेतन की जीत है

अन्ना की जीत- अहंकार पर विनम्रता की जीत है
अन्ना की जीत-धूर्तता पर सज्जनता की जीत है

अन्ना की जीत- क्रोध पर शान्ति की जीत है
अन्ना की जीत-ठहरने पर चलने की जीत है

अन्ना की जीत- उत्तेजना पर धीरज  की जीत है
अन्ना की जीत-टालमटोल पर कर गुजरने की जीत है

अन्ना की जीत-अव्यवस्था पर व्यवस्था की जीत है
अन्ना की जीत-अनाचार पर सदाचार की जीत है

अन्ना की जीत- राजनेता पर जन नेता की जीत है
अन्ना की जीत-मनमर्जी पर जनमर्जी  की जीत है

अन्ना की जीत-स्वार्थ पर परमार्थ की जीत है
अन्ना की जीत- अपमान पर स्वाभिमान की जीत है

अन्ना की जीत-गिद्ध पर राजहंस की जीत है
अन्ना की जीत-सियार पर खरगोस की जीत है 

अन्ना की जीत-अन्याय पर न्याय की जीत है 
अन्ना की जीत-कुकर्म पर सत्कर्म की जीत है

अन्ना की जीत के मायने क्या है?

अन्ना की जीत- सत्य का उदघोष है
अन्ना की जीत-संघर्ष का परिणाम है
अन्ना की जीत-स्वतंत्रता का अहसास है
अन्ना की जीत- उछ्ख्लनता का उपहास है

अन्ना की जीत-राम का आदर्श है
अन्ना की जीत- प्रताप का शोर्य है
अन्ना की जीत-कृष्ण का सन्देश है
अन्ना की जीत-बुद्ध का उपदेश है

अन्ना की जीत-गरीब की सम्पति  है
अन्ना की जीत- दलित का श्रृंगार है 
अन्ना की जीत- माँ की ममता है
अन्ना की जीत-बाप का अधिकार है

अन्ना की जीत- आन्नद की बरसात  है
अन्ना की जीत-उल्लास की गरमी है 
अन्ना की जीत-ख़ुशी का ऋतुराज है 
अन्ना की जीत-दुःख का पतझड़ है

अन्ना की जीत- सुशासन है
अन्ना की जीत-जागरूकता है
अन्ना की जीत-नवसर्जन है
अन्ना की जीत-पगडण्डी है

अन्ना की जीत-मौलिक अधिकार है
अन्ना की जीत- सच्चा संविधान है
अन्ना की जीत-जीने की आजादी है
अन्ना की जीत-जीवन पद्धति है

अन्ना की जीत- नीति है 
अन्ना की जीत-विज्ञानं है
अन्ना की जीत- वेद का रहस्य है
अन्ना की जीत-भारतीयों का सर्वस्व है

शनिवार, 27 अगस्त 2011

सावधान ! जंगल के गिद्ध ,सियार ,शेर और गिरगिट से .

सावधान ! जंगल के  गिद्ध ,सियार ,शेर और गिरगिट से .

जब भी जंगल की सैर करने का मौका मिले तो वहां के पशुओ ,पक्षियों और जानवरों के स्वभाव पर नजर डालिये
.इतना बड़ा जंगल यदि चलता है तो वहां सामंजस्य और विद्रोह चलते रहने वाला होगा .जंगल के प्राणी विद्रोह 
करने वाले गिरगिट, सियार और गिद्ध से बचकर कैसे जीते हैं ?

गिद्ध मरे हुये और निर्बल छोटे जानवरों पर निगाह बना के जीता है पर कभी कभी वहां भी जटायु और गरुड़ देखने को मिलते हैं जो शुद्र स्वार्थो की लीक से  हटकर मानवता के हित के काम करते हैं.

हंस जैसे पक्षिराज भी जंगल में पाए जाते हैं जो दिव्य दृष्टी रखते हैं उन्हें सत्ता का मौह नहीं सताता है वे हमेशा आम पक्षी बने रहकर भी सदा कल्याण के मार्ग पर चलते हैं.

सियार जैसे धूर्त जीव सदा अपने स्वार्थ में लीन रहते हैं वे शेर की खाल ओढ़ कर धोखा करते हैं उनका मित्र बगुला होता है. सर्वदा शुद्रता की सोच में जीने वाले ये जीव जाल ,महाजाल बुनते रहते हैं

शेर भी जंगल का बलवान और क्रूर नेता होता है,सदैव हिंसा करना और सभी जीवों को सताना इसका मुख्य 
काम होता है, यह सभी कानून से ऊपर होता है इसके इर्दगिर्द चापलूस जानवरों का जमावड़ा रहता है.ये
चापलूस शेर की जूठन चाटते रहकर जीवन जीते हैं.

गिरगिट छोटा जंतु है लेकिन खुद के स्वार्थो के अनुसार रंग बदलता रहता है, इसके रंग पर कोई जानवर एक 
राय नहीं बना पाते की एक मिनिट में ये इतने रंग क्यों बदलता है.

फुंकारते और बेमतलब जहर उगलने वाले विषधर भी जंगल में जगह जगह मिलते रहते हैं.ये काले नाग चन्दन 
के पेड़ से लिपटे मिल सकते हैं मगर शीतलता इनके नजदीक नहीं रहती है.

आप जब जंगल की सैर पर हो तब इन जन्तुओ को पहचान ले और इनसे किस तरह प्रतिकार किया जाए की 
आपकी यात्रा सुख - शांति  से पूर्ण हो जाए . आप सभी नीतिओ पर विचार कर आगे बढ़े क्योकि युक्ति ,उपाय, 
विवेक ,निर्भयता और साहस से जंगल को मंगलमय बनाया जा सकता है.



शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

भ्रष्ट उद्योगपति + भ्रष्ट राजनेता + भ्रष्ट कर्मचारी = भ्रष्टचार पीड़ित भारत

भ्रष्ट उद्योगपति  + भ्रष्ट राजनेता + भ्रष्ट कर्मचारी = भ्रष्टचार पीड़ित भारत 

राणा प्रताप के भामाशाह और आज की चुनाव प्रणाली में नेताओ के लिए भामाशाह बने उद्योग पति में कितना 
अंतर आ गया है .

राणा प्रताप के भामाशाह ने देशहित में अपना खजाना सौंप दिया था ,कहीं कोई अपने राजा से ब्लैक मेकिंग 
नहीं थी .भामाशाह ने प्रताप को दिए सहयोग के बदले किसी भी तरह का निजी स्वार्थ पूरा करने की मंशा नहीं 
थी लेकिन आज के भामाशाह क्या नैतिक है ?

चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. चुनाव जनता के दान यानि मतदान से होते हैं लेकिन जब से इस लोकतंत्र 
में वोट  की खरीद फ़रोख्त राजनीती में शुरू हुई तब से ऊँचे और बड़े भामाशाह भी किसी ना किसी रूप से चुनावी 
क्षेत्र में खुद के निजी स्वार्थो को पूरा करने के अपने धन का इन्वेस्टमेंट चुनावी जीत के लिए करना शुरू किया 
और इन भ्रष्ट भामाशाहों ने चुनावी जीत के बाद अपने लाभ को अपने हित के फैसले करवाकर बढ़ाया .यही से
उच्च - स्तर के भ्रष्टाचार का पदार्पण भी हुआ .

भ्रष्ट राजनेता भी चुनावी फंड के लिए इस पगडण्डी को समय के साथ मजबूत सड़क में बदल दिया.यह चुनाव
जीतने का आसान रास्ता था.भ्रष्ट भामाशाहों के पैसे से गरीब और मजबूर मतदाताओं के वोट ख़रीदे जाए और
धन तथा बाहुबल के जरिये चुनाव जीत लिया जाए. चुनाव जीत लेने के बाद भ्रष्ट भामाशाह अपने चुनावी
इन्वेस्टमेंट की फसल को भ्रष्ट उम्मीदवार के साथ बांटकर कमाई करने लगे 

उपरी भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट जन नेता जब फलने फूलने लगे तब निचे के स्तर के कर्मचारी भी रिश्वत की
कमाई में लग गये. काम जायज हो या नाजायज ,निचे स्तर पर १०/- से लेकर बड़ी रकम जनता की जेब 
से वसूल की जाने लगी .

छोटे और बड़े सब स्तर पर कालाधन बढ़ता रहा है,इससे निजात पाने के लिए जनलोकपाल प्रभावी है 

क्या बड़े भ्रष्ट उद्योगपति अपने नैतिक मूल्य को समझेंगे और छोटे रास्ते से मोटी  अनैतिक कमाई की 
गलत राह से हटकर पुरुषार्थ के बल पर नए भारत के निर्माण के लिए आगे आयेंगे और जनलोकपाल का समर्थन करेंगे 


बुधवार, 24 अगस्त 2011

भेड़ियों ने कब बख्शे हैं निरीह हिरणों के प्राण

भेड़ियों ने कब बख्शे हैं निरीह हिरणों के प्राण 

क्या ऐसा कभी हुआ है .....................

जंगल के भेड़ियों ने क्या कभी निरीह हिरणों के प्राण बख्शे हैं ?

शिकारी कुत्तों ने खरगोस के पीछे भागना छोड़ा है ?

दैत्यों ने कभी जनहित के काम और साधू जन के प्राण बख्शे हैं ?

बड़ी मछली ने छोटी मछली को अपना शिकार बनाना छोड़ा है ?

श्रीराम की प्रार्थना पर अहंकारी समुद्र ने क्या लंका का रास्ता दिया था ?

पांडवों की पांच गाँव देने की बात को क्या दुर्योधन माना था ?

सिर्फ शांति और अंहिंसा की भाषा से गोरे देश छोड़ कर कुच कर गये थे ?

गोल घेरे में चक्कर लगाते रहने से मंजिल मिल जाती है ?

एक गाल पर दुष्ट चांटा मारे तो दूसरा गाल भी आगे कर देना प्रभावी नीति है ?

भैंस के सामने भागवत पढने से कोई काम सिद्ध हो जाता है ?

कुत्तों की पूंछ कुछ दिन परखनली में रखने पर सीधी हो जाती है ?

मुर्ख को कभी नीतिशास्त्र की बाते समझाई जा सकती है ?

खल और शठ कभी प्रेम की भाषा समझते हैं ?

चमगादड़ को सूर्य के होने पर भी कभी विशवास होता है ?

लातों के भुत कभी बातों से मानते हैं ?

चोर कभी अपनी  फांसी का फैसला खुद लिखता है ?

अगर ऐसा होता नहीं है तब जरुरी होता है.....................

दुष्ट को उसकी भाषा में समझाया जाये.

लक्ष्मण बन समुद्र को मिटा देने का संकल्प किया जाये.

कृष्ण बन गीता का कर्म समझाया जाये .

सुभाष और शिवाजी के सिद्धात दोहराये जाये 

मतलब  कि..........................

भय बिन होय न प्रीत 


मंगलवार, 23 अगस्त 2011

हमारा लोकतंत्र पानी का रेला आने के बाद पाल क्यों बांधता है ? ? ?

हमारा लोकतंत्र पानी का रेला आने के बाद पाल क्यों बांधता है ? ? ?                                                                      

जबसे हम स्वतंत्र हुए हैं तब से लेकर अभी तक की सभी सरकारे पानी रेला गर्दन तक पहुँचने पर उपाय क्यों ढूंढ़ती
है ? क्यों----------------
१.सरकारों की यही परिपाटी बन गयी  है ?
२.इसी तरह से लोकतंत्र में  दायित्व निर्वाह होने चाहिए ?
३.जनप्रतिनिधि अपने कर्तव्य पालन को समय पर नहीं करते ?
४.जनप्रतिनिधि जनता से वोट लेकर उनकी सेवा नहीं करना चाहते हैं ?
५.जनप्रतिनिधि वोट तो जनसेवा के नाम पर मांगते हैं, जनहित के काम करने में कोताही दिखाते हैं ?
६.जनप्रतिनिधि समस्या को चरम सीमा तक ले जाते हैं ?
७.देश हित की संसद में सपथ लेते जनप्रतिनिधि अपनी सपथ और राष्ट्रिय हित को भूल जाते हैं ?
८.जन हित की योजनाओं का पैसा आम जनता के हित में पूरा नहीं पहुँच पाता है ?
९.सरकार भ्रष्ट व्यवस्था का उपाय नहीं सोचकर घुटने टेक देती है  ?
१०.सरकारी गौदामो में अनाज सड़ता है और जनता भुखमरी झेल रही है ?
११.गरीब और गरीब होता जा रहा है ?
१२.आर्थिक उदारीकरण को गति दी जा रही है जबकि उसके दुष्परिणाम भयंकर हो रहे  हैं ?
१३.किसान की भूमि छिनकर उद्योगों को कौड़ियो में दी जा रही है ?
१४.प्रतिवर्ष टैक्स के जाल को बढा कर जनता को चोर बनने पर मजबूर किया जाता है ?
१५.सरकारे जनहित की योजनाओं को बनाने में ग्राम स्तर पर नागरिको के मंतव्य से नहीं जुडती है ?
१६.जनप्रतिनिधि जनता के काम करने में उपेक्षा दिखाते हैं ?
१७.जनप्रतिनिधि देश सेवा के पवित्र काम को  व्यापार में तब्दील कर देते हैं ?
१८.जनता अपनी आशाओ पर पानी फिरता देख  अनशन का हथियार उठाने पर मजबूर होती है ?
१९.संसद में शब्दों के वार होते हैं,कागज पर जनकल्याण चलता है ?
२०.भारत युवा देश होने के बाद भी  मेघावी युवा बेकार है, हताश है,निराश है ?

 यह सब किसका पाप है ?

निर्णय आप पर निर्भर है - नैतिकता या अनैतिकता , शांति या अशांति , विकास  या भुखमरी , इमानदारी या
भ्रष्टाचार, अन्ना का अनशन या मूक संविधान इनमे से आपको ही चयन करना है की आप क्या चाहते है


सोमवार, 22 अगस्त 2011

आज क्रांति फिर लाना है


आज क्रांति फिर लाना है.



आज सभी आज़ाद हो गए,
 फिर    ये कैसी आज़ादी
वक्त और अधिकार मिले,

 फिर ये कैसी बर्बादी
संविधान में दिए हक़ों से, 

परिचय हमें करना है,
भारत को खुशहाल बनाने,
 आज क्रांति फिर लाना है.

.जहाँ शिवा, राणा, लक्ष्मी ने, देशभक्ति का मार्ग बताया
जहाँ राम, मनु, हरिश्चन्द्र ने, प्रजाभक्ति का सबक सिखाया
वहीं पुनः उनके पथगामी, 

बनकर हमें दिखना है, भारत को खुशहाल बनाने,
 आज क्रांति फिर लाना है...
गली गली दंगे होते हैं,

 देशप्रेम का नाम नहीं
नेता बन कुर्सी पर बैठे,


 पर जनहित का काम नहीं
अब फिर इनके कर्त्तव्यों की,


 स्मृति हमें दिलाना है,
भारत को खुशहाल बनाने,

 आज क्रांति फिर लाना है...
पेट नहीं भरता जनता का,

 अब झूठी आशाओं से
आज निराशा ही मिलती है,


 इन लोभी नेताओं से
झूठे आश्वासन वालों से, 


अब ना धोखा खाना है,
भारत को खुशहाल बनाने,

 आज क्रांति फिर लाना है...
दिल बापू का टुकड़े होकर,

 इनकी चालों से बिखरा
रामराज्य का सुंदर सपना, 


इनके कारण ना निखरा
इनकी काली करतूतों का, 


पर्दाफाश कराना है
भारत को खुशहाल बनाने,

 आज क्रांति फिर लाना है...
सत्य-अहिंसा भूल गये हम, 

सिमट गया नेहरू सा प्यार
बच गए थे जे. पी. के सपने,


 बिक गए वे भी सरे बज़ार
सुभाष, तिलक, आज़ाद, भगत के, कर्म हमें दोहराना है

भारत को खुशहाल बनाने, 
आज क्रांति फिर लाना है...
आज जिन्हें अपना कहते हैं,

 वही पराए होते हैं
भूल वायदे ये जनता के,


 नींद चैन की सोते हैं
उनसे छीन प्रशासन अपना, 'युवाशक्ति' दिखलाना है
भारत को खुशहाल बनाने, 

आज क्रांति फिर लाना है...
सदियों पहले की आदत,

 अब तक ना हटे हटाई है
निज के जनतंत्री शासन में, परतंत्री छाप समाई है
अपनी हिम्मत, अपने बल से, स्वयं लक्ष्य को पाना है
भारत को खुशहाल बनाने, 

आज क्रांति फिर लाना है...
देशभक्ति की राह भूलकर, 

नेतागण खुद में तल्लीन
शासन की कुछ सुख सुविधाएँ, बना रहीं इनको पथहीन
ऐसे दिग्भ्रम नेताओं को, 


सही सबक सिखलाना है
भारत को खुशहाल बनाने, 

आज क्रांति फिर लाना है...
काले धंधे रिश्वतखोरी, 

आज बने इनके व्यापार
भूखी सोती ग़रीब जनता,


सहकर लाखों अत्याचार
रोज़ी-रोटी दे ग़रीब को,


 समुचित न्याय दिलाना है
भारत को खुशहाल बनाने,

 आज क्रांति फिर लाना है...
राष्ट्र एकता के विघटन में, 

जिस तरह विदेशी सक्रिय हैं
उतने ही देश के रखवाले,


 पता नहीं क्यों निष्क्रिय हैं
प्रेम-भाईचारे में बाधक,


 रोड़े सभी हटाना है
भारत को खुशहाल बनाने,

 आज क्रांति फिर लाना है...
कहीं राष्ट्रभाषा के झगड़े,

 कहीं धर्म-द्वेष की आग
पनप रहा सर्वत्र आजकल,


 क्षेत्रीयता का अनुराग
हीन विचारों से ऊपर उठ,


 समता-सुमन खिलाना है
भारत को खुशहाल बनाने,

 आज क्रांति फिर लाना है...

अब हमको संकल्पित होकर, प्रगति शिखर पर चढ़ना है
ऊँच-नीच के छोड़ दायरे, 


हर पल आगे बढ़ना है
सारी दुनिया में भारत की,


 नई पहचान बनाना है
भारत को खुशहाल बनाने, 

आज क्रांति फिर लाना है...
-डॉ. विजय तिवारी किसलय
१० अगस्त २००

अन्ना के रूप में कह रहे हैं कृष्ण----परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम ....................

 अन्ना के रूप में कह रहे हैं कृष्ण----परित्राणाय  साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम ....................

कृष्ण का जन्म भी बहुत विपरीत परिस्थितियों में हुआ .माँ- बाप जेल में कैद हैं ,दुष्ट मामा के रखवाले उनके 
जन्म लेते ही मारने को उतारू हैं. भारी विषम परिस्थितियों में उन्हें नन्द के घर भयावह रत में ले जाना पड़ता है 
बाल्यकाल से सघर्ष झेलने और बचपन से अन्याय को चुनोती देने वाला भगवान कैसे मान लिया गया ?

जो बच्चा बचपन से अन्याय के खिलाफ सीना तान के खड़ा हो गया,दुष्टों का दलन करने लग गया .जिसके गाँव 
में पीने के पानी पर कालिय नाग ने अधिकार कर लिया, वह बच्चा निर्भीकता के साथ नागराज से झुंझ पड़ा और पाताल में पहुंचा दिया .

इन्द्र जो व्यक्ति पूजा में विशवास करता था उसके इस अहंकार को चकनाचूर कर दिया.इन्द्र राजा के सभी अधिकारों का दुरूपयोग कर चूका लेकिन कृष्ण डटे रहे कुछ गाँव वालों का साथ लेकर ,आखिर इन्द्र का
घमन्ड चकनाचूर हो गया एक अहीर के बच्चे के सामने .

कंस की दुष्ट नीतियों का विनाश कंस वध के साथ इसी बालक ने किया ,न तो वहां रिश्ता देखा,न ही दुष्ट कंस
की नीतिओ के साथ समझोता किया

दोस्त जब संकट में फँस गया तो पूरा मित्र धर्म निभाया ,दोस्त को अन्याय से डरकर भागने की सलाह नहीं 
दी बल्कि उसे कर्म करने की प्रेरणा दी.दोस्त की विजय में मेरा सहयोग था इस बात का कभी अहसास तक 
नहीं किया.

लोकहित के कार्य में तत्पर वह युवा राजा बनकर भी निराभिमानी बना रहा .प्रजा के कल्याण के लिए हर 
पल चिंतन करने वाला स्वत: ही अपने विशिष्ट कर्मों से प्रजा द्वारा भगवान् मान लिया जाता है.उन्हें भगवान्
की पदवी के लिए प्रजा से लिखित में लेना नहीं पड़ा.

आज इस पावन पर्व पर अन्ना का अन्याय के खिलाफ संघर्ष यह बताता है की कृष्ण के सिद्धांतो को किस तरह 
से अमल कर रहे हैं .वहां इन्द्र राजा का अभिमान था,यंहा निरंकुश कांग्रेसी सरकार का. वहां कंस जैसा दुष्ट मामा 
था तो आज अपने ही निरंकुश भारतीय भ्रष्ट नेता .

प्रजा हमेशा अपना हित चाहने वाले के समय आने पर प्राण भी अर्पित कर देती है .प्रजा भले ही ज्यादा नहीं
समझ रखती हो पर निरंकुश शासक के साथ कभी नहीं रहती है

हे! कृष्ण, आपने सही कहा था- जब - जब भी धरती पर अनाचार बढेगा मै तब - तब किसी ना किसी रूप में
अन्याय,अनाचार के नाश के अवतरित होता रहूंगा 

आज तुम अन्ना के रूप में साक्षात हो, कभी तुम गांधी बनते हो,कभी शिवाजी के रूप में आते हो, कभी विवेकानंद के रूप में आते हो, कभी लक्ष्मीबाई बन जाते हो,कभी चाणक्य बनते हो. हे, जगत गुरु तेरे 
हर रूप को कोटि कोटि नमन 

रविवार, 21 अगस्त 2011

अन्ना का अनशन शहादत में बदल गया तो करोडो अन्ना को कैसे संभालेगी सरकार ?

अन्ना का अनशन  शहादत में बदल गया  तो करोडो अन्ना को कैसे संभालेगी  सरकार ?

राष्ट्र प्रेमी से मौत भी कांपती है क्योंकि मौत को राष्ट्र प्रेमी की तय सीमा में चलने को मजबूर होना पड़ता है 
क्रन्तिकारी खुदीराम बोस को फाँसी होने वाली थी उस दिन अंग्रेज अफसर ने उन्हें एक आम दिया .खुदीराम
आम चूस कर और चुसे आम को फुलाकर रख दिया .थोड़ी देर बाद वह अफसर वापस आया तो उसे लगा 
खुदीराम ने आम नहीं खाया है .उस अफसर ने उस आम को उठाया तो वह आम पिचक गया और खुदीराम
ठहाका लगा पड़े .अंग्रेज अफसर ने पूछा,"खुदीराम तुम ठहाका लगा रहे हो ? क्या तुम्हे मालूम नहीं है कुछ 
घंटो के बाद तुम्हे फाँसी होने वाली है?"

खुदीराम ने हंसते हुए जबाब दिया- आजादी के दीवाने मौत से नहीं डरते , मौत खुद ऐसे लोगों से डरने लगती 
है.

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है, लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत की जनता 
अभी भी सरकार को कुर्सी पर बने रहना देख रही है,उनसे अभी तक गद्दी खाली करने का आह्वान नहीं कर पाई है


 आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत की सरकार खुद जल्लाद बनी हुयी है. अपना पाप छिपाने के लिए ऐसा कर रही है या भ्रष्टाचार की नीव मजबूत बनाने के
ऐसा कर रही है.जनता अभी तक सरकार का मंतव्य नहीं समझ पायी है.

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के जनप्रतिनिधि आवाम को उनके हित का कानून बनकर रहेगा ऐसा आश्वासन भी नहीं दे पाए हैं 

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत का मुख्य 
विपक्षी दल चुपचाप है. क्या कारण है की विपक्ष मौन है .

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नेता हरदिन उन्हें शहादत की और धकेल रहे हैं .संसद में कानून बनाने के लिए समय मांगकर जन लोकपाल को
भुलाना चाहते हैं जबकि शाहबानो मामले पर तुरंत कानून लाते हैं 

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नेता काले धन को राष्ट्रिय सम्पति बनाने के सवाल पर चुप हैं

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के अरुणा राय जैसे लोग देश की धारा को नहीं पहचान पा रहे हैं,जब अन्ना टीम इस मसोदे के लिए पुरे भारत में घूम
रही थी तब अरुणा राय जैसे सोये लोग क्यों नहीं जग रहे थे,जो आज लोकपाल का नया नाटक करती हैं

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नागरिक
एक दिन का सामूहिक भारतीय उपवास दिवस की घोषणा भी नहीं कर पा रहे हैं

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है लेकिन विडम्बना यह है की आजाद भारत के नेता
पार्टी लाइन को महत्व दे अपने स्वाभिमान की हत्या कर रहे हैं.जनता की आवाज को बल नहीं देने वालो को
जनता बाहर का रास्ता दिखाने की हुंकार क्यों नहीं भर पा रही है?

आज अन्ना दूसरी आजादी के लिए शहादत के मंच पर है  आशा  है की आजाद भारत के जुजारू नागरिक
भी वीरों के पथ पर चलेंगे और अन्ना की तरह शहादत के पथ पर चलेंगे

क्या अन्ना की शहादत हुयी तो सरकार और उसके नुमायन्दे देश को अराजकता से बचा पाएंगे?ये बहरी
सरकार अपने अहंकार को छोड़ देश हित में सोचे ,आज आवाम यही चाहता है.

हम ऐसा जीवन जीने की कोशिश करे की जब हमारी मौत की घडी आ पहुंचे तो हर कोई अफसोस करे.

 या सुभाष चाहिए                                                                या पटेल चाहिए

शनिवार, 20 अगस्त 2011

संविधान का पालन या अवमानना 

संविधान का पालन क्या ये नेता कर पाए हैं जो आज जनता को सीख दे रहे हैं .आइये कुछ भ्रष्ट नेताओ के कृतित्व को समझे .

१.संविधान ने जनता को जीने की आजादी का अधिकार दिया है और जीने की आजादी में हर नागरिक को अधिकार है की उसे जल,स्वच्छ्तता ,पर्याप्त पोषण ,शिक्षा,विचार प्रगट करने तथा देश में कंही भी आने जाने की छुट है.अपने अपने धर्म के पालन की छुट है.सरकार का कर्तव्य है की इनका पालन हो 

क्या हमारे देश में स्वच्छ पीने का पानी सरकार उपलब्ध करा पायी है.क्या पानी के प्रबंधन पर संसद में उचित बहस हुयी है.नदियों के मिट्ठे जल को प्रदूषित होते कोई भी सरकार क्यों नहीं रोक पाई हैं? क्यों अब तक निगमा नन्द को प्राण होमने पड़े .क्यों नदियों को जोड़ने का काम नहीं हुआ ? क्या पानी की समुचित व्यवस्था 
 नहीं कर पाना  संसद या संविधान की अवमानना के अंतर्गत नहीं आती है?

हमारे देश की प्राथमिक और उच्च शिक्षा व्यवस्था बदतर स्थिति में है. सरकारी स्कुल में विद्यार्थियों के लिए समुचित भवन ,शिक्षक तक नहीं है? क्या इस पर संसद में विशेष चर्चा हुयी है ?ज्यादातर निजी हाथों में शिक्षा व्यवस्था चल रही है जिसका  खर्च सहन कर पाना ७५% भारतीयों के बूते के बाहर है. क्या शिक्षा  की समुचित व्यवस्था  नहीं कर पाना  संसद या संविधान की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता  है?

भारतीय नागरिक जो प्रतिदिन ३५/- रुपया भी नहीं कमा पा रहा है उसको सरकार पर्याप्त पोषण उपलब्ध करा
पाई है ? महंगाई से नागरिक आत्महत्या जैसा कदम उठाने को क्यों मजबूर हुआ क्या संसद ने इस पर समुचित निर्णय लेने का बीड़ा उठाया है ?क्या पर्याप्त खाद्य आपूर्ति उचित मूल्य पर सभी को मिले इसकी समुचित व्यवस्था  नहीं कर पाना  संसद या संविधान की अवमानना के अंतर्गत नहीं आता है?

जनता पर अनगिनत कर लगाकर उस पैसे की पारदर्शी व्यवस्था बनाने का किस सरकार ने पालन किया है? क्या संसद इस गलत ,अन्यायी ,लुट की व्यवस्था को नहीं बदल कर संवेधानिक दायित्व निभा रही है

भारत हमारा देश है,हम सभी भारतीय इसके अभिन्न अंग हैं.यहाँ पर  संविधान हम सबके लिए  एक सरीखा
बिना भेदभाव के लागु होना चाहिए . प्रधान मंत्री भी पहले भारतीय नागरिक होता है,उसके बाद ही उसका पद
आता है? भारतीय संविधान के ऊपर प्रधानमंत्री, मंत्री,सांसद कैसे हो सकता है?

यदि भ्रष्ट नेता जेल जाता है,भ्रष्ट राजकर्मी को समय पर काम करना पड़ता है तो इसमें इमानदार सांसदों को
आपत्ति क्यों है?. अगर भारतीय नागरिक होने के नाते उन पर भी संविधान का पालन करने की बात समस्त
भारतीय( अन्ना ) कर रहे हैं तो संसद सहित प्रधान मंत्री को जन लोकपाल के दायरे में आकर संविधान की
गरिमा को बढ़ाना चाहिए

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे ........................................

भारतीय भाई -बहनों ,

                  आपके धैर्य को ,आपके उत्साह को,आपकी देशभक्ति को शत-शत नमन .

आपकी जाग्रति देश के लिए महत्वपूर्ण है . हम जानते हैं की हम जिस संग्राम को छेड़ चुके हैं उसमे विजय निश्चित है, हम सबके मन में विजय के प्रति तनिक संदेह की गुंजायिस नहीं है. मंजिल की राह
कठिन हो सकती है पर  असंभव कदापि नहीं है 

                   सड़के बाद में बनती है पहले पगडण्डी तैयार होती है. टीम अन्ना ने पगडण्डी तैयार की और अब हम सबको मिलकर उसे सडक बनाना है .सही मायने में अब जो समय बीतने वाला है उसका 
पल- पल का सदुपयोग करना है

                      हम या तो समाधान का हिस्सा बने या समस्या को बढ़ने न दे , हम या तो इस राष्ट्र यज्ञ 
में शांतिपूर्वक आहुति दे या फिर कोई व्यवधान हमसे भूल से भी न हो इसका ख्याल रखे क्योंकि ये 
सरकारी नुमायंदे इसी फिराक में रहेंगे की जोश में हम कोई गलत कदम उठाये और कानून के नाम पर ये हमारे यज्ञ को नापाक कर दे

                        अति सर्वत्र वर्जयेत ......हम अपनी उर्जा को,अपने उत्साह को,अपने जज्बे को नियंत्रित 
रखे.हम सभी नागरिको का कर्तव्य है की देश के किसी भी कोने में अराजकता उत्पन्न न हो. हमारी 
विजय का यह ब्रम्हास्त्र है और अभी से संकल्प करे की हम इसका उपयोग करेंगे .

                        आप जन लोकपाल के हर पहलु को पढ़े,समझे ,विश्लेषण करे और उन्हें समजाये, जो 
इसे अभी तक न जान पाए हैं.

                       आप १५ दिन तक हर दिन चार घंटे इस मुहीम के लिए दे. संविधान में जान फूंकने का 
समय है ,निजी काम जिन्दगी भर करने हैं लेकिन अभी अपने हर पल को बचाए और राष्ट्र हित में लगाए .  


                    यह काम हमारा अपना है  क्योंकि यह हमारे स्वाभिमान के लिए है, यह भ्रष्ट तंत्र को खत्म 
करने के लिए है 


                   हमारे शहीद हम लोगों से स्वर्ग में बैठे आशा कर रहे होंगे ,उनके बलिदान को गौरवान्वित 
हम आप करेंगे .


                  विजय आपका इन्तजार कर रही है- शांति ,धैर्य , संयम ,क्षमा के गुणों से अलंकृत हो विजय
को धारण करो 


                 गांधी की जय ,          सुभाष की जय

साबरमती से रालेगन सिद्धि

साबरमती से रालेगन सिद्धि 

लोकसभा में आज प्रधानमंत्री को सुना ,कपिल सिब्बल  को सुना,प्रणव को सुना,समझा .

प्रधान मंत्री के अनुसार ,अन्ना हज़ारे ने जो रास्ता चुना है, वो लोकतंत्र के लिए नुक़सानदेह है.

प्रश्न यह उठता है की बाबा रामदेव के अनशन पर राष्ट्र के नागरिको पर क्रूरता क्या आपका संवैधानिक कदम था? 

आपके मंत्रिमंडल द्वारा आपकी नाक के निचे अरबों के घोटाले किये क्या वे लोकतंत्र के लिए फायदाकारक थे .आपने कहा की मेरी निजी इच्छा है की प्रधानमंत्री को लोकपाल के अंतर्गत लाने में आपत्ति नहीं है और उसके बाद आपका 
इस बात से किनारा कर लेना क्या लोकतंत्र के अनुकूल है?

 प्रधानमंत्री ने अपने बयान में कहा है कि अन्ना हज़ारे ने दिल्ली पुलिस की शर्तों को मानने से इनकार कर दिया था, इसलिए उन्हें गिरफ़्तार करना पड़ा.




उन्होंने कहा कि उनकी सरकार मज़बूत लोकपाल के पक्ष में है, लेकिन इसकी एक प्रक्रिया 

है और क़ानून बनाने का हक़ संसद को है.

पुरे संसार ने देखा था की अन्ना का अनशन सुबह ८ बजे से था और गिरफ्तार ७.२० पर ही कर लिया, यानि आप

 करे वह संवैधानिक और प्रजा करे वह असंवैधानिक .सरकार की मंशा यदि मजबूत लोकपाल की होती तो वह लूला

 लोकपाल क्यों लायी? क्या लोकपाल कोई कठपुतली है जो सरकार के नुमयांदो के इशारे पर नाचता रहे .

माना की कानून बनाने का हक़ संसद का है,मगर सरकार का कर्तव्य होता है वह जो कानून लाएगी 

उसका अच्छा बुरा भोगना तो आम जनता को है.सही कानून नहीं होने से ही आप स्विस  बेंको में 

पड़े धन को देश में अभी तक वापिस नहीं ला पाए . यदि संविधान की दुहाई देकर आपकी सरकार 

काले कानून पास कराना चाहेगी तो जनता चुप बैठी रहकर सहन कर ले क्या यही संविधान है?

इस समय लोकपाल विधेयक स्थायी समिति के पास है और अन्ना हज़ारे की टीम अपनी बात वहाँ रख सकती है. स्थायी समिति चाहे तो विधेयक में संशोधन कर सकती है ऐसा प्रधानमंत्री ने कहा .  


आपने संयुक्त कमिटी बनवाई ,आपके मंत्री उसमे थे आपका लोकपाल बिल और सिविल सोसायटी के 


बिल में दिन-रात का फर्क था तो फिर दोनों बिल के मसौदे सदन में रखने थे, आपने सिर्फ एक 


मसौदा संसद की बहस के लिए रखवा कर भारत की प्रजा के साथ कौनसी संवैधानिकता दिखाई ?


प्रधानमंत्री ने कहा, "भारत विश्व के मंच पर आर्थिक शक्ति के रूप में उभर रहा है, लेकिन 

कुछ शक्तियाँ ऐसा नहीं चाहती. हमें ऐसी शक्तियों के हाथ में नहीं खेलना चाहिए."

भारत आज विश्व के मंच पर उभर रहा है यह सिद्ध करता है की हम मेहनती विवेकी बुद्धिशाली और

 हमारे में ये सब गुण हैं तो हमें कौन मुर्ख बना सकता है?


कपिल सिब्बल सांसदों के अधिकार के बारे में खूब जम कर बोले 




कपिल साहब अधिकार जताने में और जनता के भले के लिए सोचने में बहुत फरक होता है.जिसे

 आप पांच आदमी की सोसायटी कहते है उस सोसायटी के विश्व रूप के दर्शन आपने खूब कर लिए 

होंगे . यदि हमारा संविधान कही कमजोर रह गया है और वह देशवासियों से सुधार की उम्मीद करता है तो आपका पुनीत दायित्व बनता है की संविधान की मजबूती के लिए भी कुछ करे मगर अफसोस ! संविधान में रह गयी कमजोर कड़ी का बेजा लाभ उठाना  चाहते दिख  रहे हैं.मगर समय बता रहा है की जनता जाग्रत हो गयी है

साबरमती से जो अलख जगा था वह रालेगन सिद्धि से फिर जग गया है .गीता में कृष्ण ने वचन दिया था की अधर्म के बढ़ने पर मै धर्म न्याय की स्थापना के लिए जन्म लेता रहूंगा और दुष्टों का विनाश करता रहूंगा

जब आप लक्ष्य के करीब हो तो आपको बहुत ज्यादा धीरज रखना होता है ,आपका संयम आपका उत्साह आपकी दूरदर्शिता आपका कर्तव्य स्पष्ट होना चाहिए .भारतीयों ,हम भेदभाव भूलकर मिलझुल
आगे बढे .हम इस युद्ध में भारतीय बनकर लड़े.हमारा दल पीछे छुट जाना है ,हमारी जाती पीछे छुट
जानी है.हम एकसूत्र में बंध कर संघर्ष करे .विजय आगे दासी बन खड़ी है बस हमें कदम से कदम
बढ़ाना है       







बुधवार, 17 अगस्त 2011

राम की गिलहरी बन कर कूद पड़ो संग्राम मे

राम की गिलहरी बन कर कूद पड़ो संग्राम मेमुझे एक प्रसंग रामायण कल  का याद आता है जब श्री राम रावन वध की तैयारी मे पुल का निर्माण करवा रहे थे .पुल बनाने का जिम्मा नल -नील के नेतृत्व मे हो रहा था . उस निर्माण कार्य के दौरान श्री राम जब पुल के निर्माण का निरिक्षण कर रहे थे तब उन्होंने देखा की एक गिलहरी बार -बार अपने शारीर को पानी मे भिगो रही है और  फिर रेत मे लोटपोट हो समुद्र मे बन रहे पुल पर कुछ मिटटी गिरा देती है .गिलहरी का काम अनवरत जारी है


 .श्री राम को कौतुहल हुआ .वे गिलहरी के पास गए और बोले, ऐ! नन्ही गिलहरी ये तुम क्या कर रही हो ?


गिलहरी ने कहा ,"हे नाथ मे आपके वानर ,भालुओ जितनी ताकतवर नहीं हूँ लेकिन इस पुल निर्माण मे अपना योगदान देना चाहती हूँ इसलिए बार बार अपने शारीर मे मिटटी भरकर ला रही हूँ और पुल निर्माण मे सहयोग दे रही हूँ .


गिलहरी की आततायी के वध के प्रति निष्ठां देख श्री राम ने गिलहरी को अपनी गोदी मे उठा लिया

क्या आज हम अपने जीने के अधिकार की रक्षा के लिए ,भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए ,भ्रष्ट नेताओ को श्रद्धांजलि देने शांति और धीरज के शस्त्र के साथ मैदाने जंग मे अपने समय की छोटी सी आहुति नहीं दे सकते ?

अगर हम अब भी वातानुकूलित कमरे मे बहस करने के सिवाय कुछ नहीं  कर रहे हैं तो हमारा जीना ही महत्वहीन है.


अरे भारतीयों, भंग करो अपनी तन्द्रा को ?बहुत सो लिए ,बहुत सह लिया ?तुम कीड़े मकोडो की जिन्दगी जीने के लिए तो पैदा नहीं हुए हो ?


तुम कोई पशु नहीं हो की कोई भी भ्रष्ट जनप्रतिनिधि तुम पर डंडे बरसा जाये ?

हमारे पढ़ लिख लेने का अर्थ यह नहीं की हम तमाशा देंखे? साहस कीजिये ,शांति दूत बनकर सड़क पर जंग छेडिये .

हम क्या करे ? हम कैसे शरुआत करे ?ये बचकानी बाते बंद होनी चाहिए .आप चार दोस्त मिलिए .देश प्रेम का संकल्प लीजिये और गाँव,कसबे ,शहर,महानगर जहाँ भी आप हैं एक दिन का उपवास बारी बारी से करे जब तक आप अपने लक्ष्य को नहीं पा लेते इस पावन यज्ञ की अंग्नी मे देशप्रेम की आहुति देते रहिये

उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहाँ जो सोवत है जन लोकपाल की लड़ाई सिर्फ अन्ना की नहीं है,सिविल सोसायटी की नहीं है,भारत देश की नहीं है,यह विश्व के मानव मूल्यों की लड़ाई है .आप समूचे विश्व को एकबार फिर सत्य,अहिंसा,उपवास,अनशन की ताकात से जख्जोर दे ताकि विश्व के सभी तानाशाह यह समझ सके की "जुल्म बन्दुक के जोर पर किया जा सकता है पर जुल्म का अंत भी बिना बन्दुक के लाया जा सकता है "    

आइये ठोंके भ्रष्ट नेताओ के ताबूत में आखिरी कील!!

 आइये ठोंके भ्रष्ट नेताओ के ताबूत में आखिरी कील!! 

 हे! राजघाट के महात्मा ,हमें  क्षमा करना क्योंकि तेरे नाम की दुहाई से भ्रष्टाचार की दूकान चलाने वाले धूर्त,मक्कार, भ्रष्ट,चोर ,बईमान, मूढ़,खल नेताओ के ताबूत में हम आखिरी कील ठोकना चाहते हैं.हमारी
यह कील सही स्थान पर लगे इसलिए हम तेरा आशीर्वाद चाहते हैं.

हे !साबरमती के संत ,हमारे हाथ में एक दूसरी कील है वह हम संविधान की मजबूती के लिए ठोकना चाहते हैं ताकि आने वाले भारत का भविष्य  सुन्दर बन सके इसी भावना की पूर्णता के लिए हम आपका आशीर्वाद चाहते हैं

हे!बापू ,आपका अहिंसात्मक अनशन और उपवास का शस्त्र हम भ्रष्ट- नेताओ , भ्रष्ट राज कर्मचारियों के ऊपर चला रहे हैं ,यह शस्त्र की धार और तेज बन जाये ,यह वरदान आप हमें दे

हे! बापू, हमारे लोकतंत्र को भ्रष्ट नेताओ ने सड़ा दिया है ,लोकतंत्र  की रुग्ण बिमारी को दुरस्त करने के लिए तेरे सपूत सही कानून को बनाकर बिमारी का इलाज करना चाहते हैं,कुछ भ्रष्ट शासक इसका विरोध कर रहे हैं इसलिए हमें इतनी शक्ति दे की द्रढ़ता से सड़ी व्यवस्था का कड़े कानून की औजार से सफल सर्जरी कर सके.

हे राष्ट्र नायक ,हमें संघर्ष करने की ताकत दे.हम देश वासियों पर अमृतव की बारिस कर. हो सके तो तेरे प्रिय
भजन से उन्हें सुमति दे जो मूढ़ हो गए हैं,सत्ता के मद में पागल हो गए हैं,देश के धन को लुट रहे हैं

हे! राष्ट्रपिता अन्याय के विरुद्ध तेरे बच्चो ने जो संग्राम छेड़ा है उसमे विजय का अमृत भर दे.

   


      

मंगलवार, 16 अगस्त 2011

हम चोर और भ्रष्ट नेताओ पर नहीं थूकेंगे !

हम चोर और भ्रष्ट नेताओ पर नहीं थूकेंगे !

हम भ्रष्ट नेताओ के चेहरे पर नहीं थूकेंगे क्योंकि हमारा थूंक भी इनके कृतित्व से पवित्र है .

हम चोर नेताओ पर जूते नहीं फेकेंगे क्योंकि हमारे जूते की धुल भ्रष्ट कीचड़ की धुल नहीं है.

हम धूर्त नेताओ पर सड़े टमाटर नहीं मारेंगे क्योंकि सड़े टमाटर भी खेतों में खाद के काम आते हैं.

हम तानाशाह नेताओं को हिटलर नहीं कहेंगे क्योंकि हिटलर भी अपनी जन्मभूमि के लिए समर्पित था .

हम दगाबाज नेताओं को कुत्ता नहीं कहेंगे क्योंकि कुत्ता भी वफादारी में अव्वल रहता हे.

हम गंदे नेताओं को सूअर भी नहीं कहेंगे क्योकि सूअर की गंदगी इनसे बेहतर है.

हम लुटेरे नेताओ को डाकू नहीं कहेंगे क्योंकि ये डाकुओ के भी डाकू हैं.

हम दरिन्दे  नेताओं को जल्लाद नहीं कहेंगे क्योंकि जल्लाद तो पापियों का वध करता है

हम नकारा नेताओं को मुर्ख नहीं कहेंगे क्योंकि मुर्ख भी राष्ट्र प्रेमी होता है.

हम अंधे नेताओं को अंधा नहीं कहेंगे क्योकि अंधों में भी सूरदास बसते हैं.

हम जहरीले नेताओ को नागराज नहीं कहेंगे क्योंकि नाग बेमतलब नहीं फुंकारता है.

हम भ्रष्ट नेताओ को कांग्रेसी नहीं कहेंगे क्योंकि खुद महात्मा ने आजादी के बाद इसका विसर्जन किया था

हम जुल्मियो के सामने शस्त्र नहीं उठाएंगे क्योंकि हम मृतुन्जय - नीलकंठ के अंश हैं.

हम भ्रष्ट नेताओ की गंवार भाषा इस्तेमाल नहीं करेंगे क्योंकि हम सरकार नहीं सिविल हैं

हम आततायी नेताओ को आतंकवादी नहीं कहेंगे,क्योंकि वे तो हकीकत से नादान प्यादे हैं 

हम शांति के शस्त्र का इस्तेमाल करेंगे,क्योंकि पहली आजादी के इस शस्त्र की धार अभी भी तेज है

आगे बढिए , देश आपको पुकार रहा है .

धीरज  और हौसला रखिये जन लोकपाल करीब है

आपके कुछ दिन आपके बच्चो का स्वाभिमानी भविष्य है

अंहिंसा के अस्त्र का पुरजोर से इस्तेमाल कीजिये ताकि दुनिया इस अस्त्र का उपयोग करना सीखे 

आपकी आत्मा से पूछिये यदि आत्मा गवाह दे तो अनुशासित सिपाही बन जंग में शामिल हो जाइए 


सोमवार, 15 अगस्त 2011

बदल सकते हो तुम तस्वीर हिंदुस्तान की



वक्त की धारा बदल दो , हिंद की पुकार है,
जागो ,उठो,चलो वहां ,जहाँ  क्रांति की बयार है.

धुं-धुं कर के जल उठो ,धुँआ फैलाना पाप है ,
अगले कदम ही मंजिल है,शस्त्र फेंकना हार है.

लड़ रहे हैं बुढ्ढे सिपाही,हम युवा होकर सो रहे,
लानत है ऐसी जवानी,अब मुंह छिपाना पाप है.

देश दिया था जिन हाथों में, हाथ वो लाचार है,
मर चुकी है सोच उनकी , बढ़ चूका अब पाप है.

भ्रष्ट हुआ है तंत्र सारा ,      गिरने वाली गाज है,
नहीं भरी हुंकार जोश से, आगे फिर अभिशाप है

धूर्त ,चोर , बईमान;  फ़ेंक  रहे अब पासे हैं,
छल से चाले चल रहे ,  वो राष्ट्र  द्रोही हैवान हैं.

भ्रष्टाचार को सहते रहना बहुत बड़ा अब पाप है,
रणबाँकुरो  शंख फूंक दो ,जंग हारना पाप है.

क्या होता है असंभव ,हमने कभी ना जाना है ,
दुष्ट दमन के खातिर ,हमने पहना केसरी बाना है 

आने वाला कल बदलना ,हम खुद को अब आता है
चलो,हटो छद्म नेताओ ,हमें  लोकपाल को लाना है






जीने की आजादी ???

जीने की आजादी ???

संविधान का अनुच्छेद 21 "आपके जीवन की आजादी का अधिकार" है  1981 में सर्वोच्च न्यायालय ने एक मामले में फैसला सुनाया था: "जीवन के अधिकार में मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है और इसके तहत शामिल हैं- जल, स्वच्छता ,पर्याप्त पोषण, वस्त्र और आवास, पढ़ने-लिखने की सुविधा, विविध प्रकार की अभिव्यक्ति का अधिकार और हर जगह जाने तथा इंसानों के साथ घुलने-मिलने की आज़ादी. हालांकि इस आजादी के विस्तार और तत्व देश के आर्थिक विकास पर निर्भर होंगे, लेकिन किसी भी परिस्थिति में मानवीय जीवन की मूलभूत आवश्यकता और ऐसे क्रियाकलाप को लागू करना अनिवार्य होगा जो इंसानों की मूलभूत अभिव्यक्ति के लिए जरूरी हैं."


 क्या वास्तव में हमें ६४ वर्षो में सही अर्थ में जीने की आजादी मिली है ?

नहीं .....नहीं.....नहीं.....

जीने की आजादी का अधिकार पूर्ण रूप से नहीं मिलने के कारण------

१.राजनीतिक इच्छा शक्ति का अभाव.

२.अशिक्षित जनता 

३.जागरूकता का अभाव 

४.गरीबी और भुखमरी 

५.भ्रष्टाचार 

६.देशप्रेम के जज्बे का शिथिल होना 

७.वोट की राजनीती 

८.काले धन का दंश 

९.टैक्स का भयंकर मकड़ जाल 

१०.मतदान की अनिवार्यता का कानून नहीं होना

११.मतदान में नापसंगी का चुनाव करने की छुट का अभाव

१२.नैतिक और सांस्कृतिक मूल्यों का क्षय .

१३.गैरजिम्मेदार शासक वर्ग 

१४.शासक वर्ग का एक दुसरे पर दोषारोपण 

१५.जनसेवक का मालिक बन जाना 

१६.संविधान के छेद बने रहने देना 

१७.जनता के धन का दुरूपयोग 

१८.दोहरी अर्थ व्यवस्था 

१९.नीतियो के संचालन में तालमेल का अभाव

२०.नीति-नियमो के विश्लेषण में त्रुटियाँ 

२१.सही और कारगर शिक्षा नीति का अभाव

२२.प्राकृतिक संसाधनों का अनुचित दोहन 

२३.काम रोको प्रवृति 

२४.चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार की उम्र तथा जरुरी शिक्षा के नियम का अभाव

२५.धन बल और बाहुबल का चुनावों में उपयोग 

२६.अफसरों की कामचोरी

२७.प्रमाणिक ऑफिसर को हैरान करना 

२८.गलत आर्थिक नीतियो का निर्धारण 

२९.धीमी न्यायिक प्रक्रिया 

३०.जातिवाद को बढ़ावा 

उपाय ---------

स्वयं सुधरे ,कानून सुधारे  



रविवार, 14 अगस्त 2011

कदम से कदम मिलाये जा ............

कदम से कदम मिलाये जा ............

सरकार का अपना संविधान है और भारतीय जनता के पास अपना संविधान है.सवाल यह उठ सकता है कि क्या संविधान का अर्थघटन बदल सकता है.क्यासिविल सोसायटी संविधान के ऊपर जाकर काम कर रही है या सरकारी नुमायन्दे जो अर्थ करे वही संविधान .

सरकारी तंत्र ,जनता द्वारा चुने प्रतिनिधि यदि जनता की आवाज को अनसुना करना या क्रूरता से दबाना चाहते हैं तो जनता शांतिपूर्वक विरोध का अधिकार रखती है.यदि सरकारीतंत्र इस अधिकार को बलपूर्वक खत्म करना चाहेगी तो याद रहे  जनता की ऊर्जा से तख्त और ताज बदल दिए जाते हैं.

जनता के धन का दुरूपयोग यदि जनप्रतिनिधि करते हैं तो उसको रोकना भी जनता के अधिकार क्षेत्र में आता है . हमने अपना संविधान अपने भारतीय परिवार की सुव्यवस्था के लिए बनाया है.संविधान कोई अटल सिद्धांत 
तो नहीं होता है की उसमे सुधार नहीं हो सकता है.अगर सुधार की प्रक्रिया में अनुचित देरी की जाएगी तो जनता
में असंतुष्टि फेलेगी इस असंतुष्टि को तुष्ट नहीं जाएगा तो जनता विरोध करेगी और विरोध की लपटे बगावत में 
भी बदल जाये तो आश्चर्य नहीं होगा .जनता के शांतिपूर्ण प्रदर्शन का हक़ छिनना दमन के अलावा ओर क्या हो सकता है.

अन्ना को भ्रष्ट बताने वाले क्या अपने गिरेबान में झाँक कर देखेंगे की वो जो सरकार चला रहे हैं उनके ऊपर जनता का धन हड्फने के आरोप क्यों लग रहे हैं? विदेशो में जमा काला धन हम भारतीयों के खून पसीने की कमाई का है उसे देश की सम्पति क्यों नहीं घोषित की जाती है .

अन्ना को असंवेधानिक ठहराने वाले खुद कितने पाक साफ हैं? देश का प्रधान जब खुद लोकपाल के दायरे में आना चाहता है तो उनकी इच्छा का गला घोंटना क्या संवेधानिक कदम है? क्या ब्रष्ट शासको के खिलाफ जनता
का एकजुट होना असंवैधानिक है? ए.राजा की पीठ पर वरदहस्त रखना क्या संवैधानिक है?

सरकार जब भ्रष्ट नेताओ ,अधिकारियों पर कार्यवाही नहीं करती तब क्या वह संविधान के तहत ऐसा नहीं करती? अन्ना के सत्याग्रह में हड्डियाँ उछाल कर सरकार क्या सिद्ध करना चाहती है?

अब अन्ना एक व्यक्ति नहीं रहे हैं,आज अन्ना ६४ वर्षो से लुटते भारतीयों की आवाज बन गए हैं. आम भारतीय
भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना के विश्व रूप में खड़ा हो चूका है. देश को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते देख भ्रष्ट नेताओ  की चुलें हिल गई है .

आज के परिपेक्ष्य में अन्ना , देश-हित का सुविचार है.सिविल सोसायटी का अर्थ भारत राष्ट्र हो चूका है.इनसे
इनका परिचय पूछना बौने नेताओ के अधिकार में नहीं है.

आज मोदीजी ने गुजरात से हुंकार भरी है की गुजरात अन्ना के साथ है. आगे आने वाले समय में एक-एक करके और राष्ट्रप्रेमी हुंकार भरेंगे क्योंकि यह राष्ट्र -हित का हवन मंडप है और भारतीय जनता की उम्मीद है
की बहुत से राज्य इसमे अपनी पावन आहुति देंगे .

अरे ! भारतीयों, पीछे मुड़कर ये मत देखों की कारवां कितना लम्बा हो चूका है. आपको राष्ट्र हित में कदम से कदम बढाकर चलना है क्योंकि अब हम लक्ष्य के बहुत करीब हैं.

अरे!भारतीयों अपने भविष्य को अपने हाथों से लिखने का समय आ चूका है.अब एक ही लक्ष्य है- भ्रष्टाचार मुक्त भारत;

चलना ही जिन्दगी है रुकना है"........................."



या सुभाष या पटेल चाहिये

या सुभाष या पटेल  चाहिये


 स्वतंत्रता के ६४ वर्ष बीतने के साथ हम आत्म विश्लेष्ण करे कि क्या सिर्फ अंग्रेजो के शासन से मुक्त होना ही हमारा लक्ष्य था या इसके आगे भी हमने कोई सपना देखा था. क्या वर्तमान स्थिति जिसमे हम भारतीय जीवन खेंच रहे हैं उससे संतुष्ट हैं .

हम यहाँ खड़े हैं---

१.आज हमारे देश  में गरीबी-रेखा के निचे जीवन जीने वाले करोड़ों भारतीय भूख से बिलबिला रहे हैं.

२.हमारे देश में पीने का पानी भी समुचित रूप से हर गाँव,शहर,महानगर में पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं है.

३.आज भी लाखो गाँव बिजली की सुविधा से वंचित हैं.

४.हमारी सड़क परिवहन व्यवस्था गाँवों और कस्बों तक नहीं पहुँच पायी है.

५.हमारी ग्रामीण और कस्बो की सरकारी शिक्षा व्यवस्था अधकचरी है.

६.हमारे गाँव और कस्बों में प्राथमिक चिकित्सा व्यवस्था दोयम दर्जे की भी नहीं है.

७.हमारा किसान भुखमरी, गरीबी से त्रस्त है .

८.हमारे पास शिक्षित बेरोजगारों की अंतहीन कतार लगी है.

९.हमारे देश में गरीब मिटता जा रहा है,गरीबी द्रोपदी का चीर बन गयी है.

१०.हमारे पास विश्व की बड़ी थल सेना है फिर भी घुसपेट रुक नहीं पायी है.

११. हमारे पडोसी देश मन आये तब देश को दहला देते है और हम बचकानी बयान बाजी कर चुप हो जाते हैं.

१२. हमारी न्याय प्रणाली में न्याय पाने के लिए तरसना पड़ता है.

१३.हमारे पुलिस तंत्र पर आम जन को गहरी शंका है.

१४.हमारे जन प्रतिनिधि रिश्वत खोर होते जा रहे हैं.

१५.हमारे विधायक और सांसद की निगाह सिर्फ वोट पर टिकी है.

१६.हमारी सरकार के नुमायंदे खुद को ही संविधान समझते हैं.

१७.हमारे विभागीय मंत्री योग्यता के आधार पर चयनित  नहीं होते हैं,हम मंत्री-पद भी जातिगत समीकरण को
       ध्यान में रख कर बाँटते हैं.

१८. हमारे राजनीतिक दल समस्या के समाधान पर कम बल्कि केंकड़ा वृति पर ज्यादा ध्यान देते हैं.

१९. हम बहुसंख्यक  और अल्पसंख्यक समाज में बँटे हैं क्योंकि हम भारतीय समाज ही नहीं बना पाये हैं.

२०.हम संसद में देश के धन, समय, स्वाभिमान का हरण करते रहते हैं.

२१.हम  विदेशी आकाओं के ऐसे निर्णय भी दबाब में आकर मान लेते हैं जिससे देश का गौरव घायल हो जाता है.

२२.हम एक नहीं हजारों इस्ट इंडिया कम्पनियों को निमंत्रण दे रहे हैं.

२३. हमारे विशाल ज्ञान के भण्डार पर विदेशी अपना अधिकार जता रहे हैं.

२४. देश हित के ऊपर हमारे नेताओं का अहंकार झलकता है.

२५.हमारी अति-अंहिंसा की भावना  हमें कायर, दब्बू और डरपोक बना रही है.

२६.हम पार्टी के प्रति समर्पित हैं,मगर देश के प्रति नहीं.

२७.हम स्वार्थ, पद का दुरूपयोग ,हराम के पैसे की कमाई , अनैतिकता ,लुच्चाई ,धूर्तता में आकंठ डूबे हुये हैं.

२८. हम सोये रहने में अपनी भलाई देखते हैं 

२९.जो राज्य सरकारे सही दिशा में गतिशील हैं हम उनकी गति को बाधित करते हैं.

३०. हमारे गुनाह परदे में रहे इसलिए हम बेगुनाह जनता पर क्रूरता करते है.

क्या करे अब ????????? 

माँ भारती की शान के लिए---
                    या सुभाष चाहिये या पटेल चाहिये