शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

भ्रष्ट उद्योगपति + भ्रष्ट राजनेता + भ्रष्ट कर्मचारी = भ्रष्टचार पीड़ित भारत

भ्रष्ट उद्योगपति  + भ्रष्ट राजनेता + भ्रष्ट कर्मचारी = भ्रष्टचार पीड़ित भारत 

राणा प्रताप के भामाशाह और आज की चुनाव प्रणाली में नेताओ के लिए भामाशाह बने उद्योग पति में कितना 
अंतर आ गया है .

राणा प्रताप के भामाशाह ने देशहित में अपना खजाना सौंप दिया था ,कहीं कोई अपने राजा से ब्लैक मेकिंग 
नहीं थी .भामाशाह ने प्रताप को दिए सहयोग के बदले किसी भी तरह का निजी स्वार्थ पूरा करने की मंशा नहीं 
थी लेकिन आज के भामाशाह क्या नैतिक है ?

चुनाव एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया है. चुनाव जनता के दान यानि मतदान से होते हैं लेकिन जब से इस लोकतंत्र 
में वोट  की खरीद फ़रोख्त राजनीती में शुरू हुई तब से ऊँचे और बड़े भामाशाह भी किसी ना किसी रूप से चुनावी 
क्षेत्र में खुद के निजी स्वार्थो को पूरा करने के अपने धन का इन्वेस्टमेंट चुनावी जीत के लिए करना शुरू किया 
और इन भ्रष्ट भामाशाहों ने चुनावी जीत के बाद अपने लाभ को अपने हित के फैसले करवाकर बढ़ाया .यही से
उच्च - स्तर के भ्रष्टाचार का पदार्पण भी हुआ .

भ्रष्ट राजनेता भी चुनावी फंड के लिए इस पगडण्डी को समय के साथ मजबूत सड़क में बदल दिया.यह चुनाव
जीतने का आसान रास्ता था.भ्रष्ट भामाशाहों के पैसे से गरीब और मजबूर मतदाताओं के वोट ख़रीदे जाए और
धन तथा बाहुबल के जरिये चुनाव जीत लिया जाए. चुनाव जीत लेने के बाद भ्रष्ट भामाशाह अपने चुनावी
इन्वेस्टमेंट की फसल को भ्रष्ट उम्मीदवार के साथ बांटकर कमाई करने लगे 

उपरी भ्रष्ट अफसर और भ्रष्ट जन नेता जब फलने फूलने लगे तब निचे के स्तर के कर्मचारी भी रिश्वत की
कमाई में लग गये. काम जायज हो या नाजायज ,निचे स्तर पर १०/- से लेकर बड़ी रकम जनता की जेब 
से वसूल की जाने लगी .

छोटे और बड़े सब स्तर पर कालाधन बढ़ता रहा है,इससे निजात पाने के लिए जनलोकपाल प्रभावी है 

क्या बड़े भ्रष्ट उद्योगपति अपने नैतिक मूल्य को समझेंगे और छोटे रास्ते से मोटी  अनैतिक कमाई की 
गलत राह से हटकर पुरुषार्थ के बल पर नए भारत के निर्माण के लिए आगे आयेंगे और जनलोकपाल का समर्थन करेंगे 


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