बुधवार, 17 अगस्त 2011

राम की गिलहरी बन कर कूद पड़ो संग्राम मे

राम की गिलहरी बन कर कूद पड़ो संग्राम मेमुझे एक प्रसंग रामायण कल  का याद आता है जब श्री राम रावन वध की तैयारी मे पुल का निर्माण करवा रहे थे .पुल बनाने का जिम्मा नल -नील के नेतृत्व मे हो रहा था . उस निर्माण कार्य के दौरान श्री राम जब पुल के निर्माण का निरिक्षण कर रहे थे तब उन्होंने देखा की एक गिलहरी बार -बार अपने शारीर को पानी मे भिगो रही है और  फिर रेत मे लोटपोट हो समुद्र मे बन रहे पुल पर कुछ मिटटी गिरा देती है .गिलहरी का काम अनवरत जारी है


 .श्री राम को कौतुहल हुआ .वे गिलहरी के पास गए और बोले, ऐ! नन्ही गिलहरी ये तुम क्या कर रही हो ?


गिलहरी ने कहा ,"हे नाथ मे आपके वानर ,भालुओ जितनी ताकतवर नहीं हूँ लेकिन इस पुल निर्माण मे अपना योगदान देना चाहती हूँ इसलिए बार बार अपने शारीर मे मिटटी भरकर ला रही हूँ और पुल निर्माण मे सहयोग दे रही हूँ .


गिलहरी की आततायी के वध के प्रति निष्ठां देख श्री राम ने गिलहरी को अपनी गोदी मे उठा लिया

क्या आज हम अपने जीने के अधिकार की रक्षा के लिए ,भ्रष्टाचार मुक्त भारत के निर्माण के लिए ,भ्रष्ट नेताओ को श्रद्धांजलि देने शांति और धीरज के शस्त्र के साथ मैदाने जंग मे अपने समय की छोटी सी आहुति नहीं दे सकते ?

अगर हम अब भी वातानुकूलित कमरे मे बहस करने के सिवाय कुछ नहीं  कर रहे हैं तो हमारा जीना ही महत्वहीन है.


अरे भारतीयों, भंग करो अपनी तन्द्रा को ?बहुत सो लिए ,बहुत सह लिया ?तुम कीड़े मकोडो की जिन्दगी जीने के लिए तो पैदा नहीं हुए हो ?


तुम कोई पशु नहीं हो की कोई भी भ्रष्ट जनप्रतिनिधि तुम पर डंडे बरसा जाये ?

हमारे पढ़ लिख लेने का अर्थ यह नहीं की हम तमाशा देंखे? साहस कीजिये ,शांति दूत बनकर सड़क पर जंग छेडिये .

हम क्या करे ? हम कैसे शरुआत करे ?ये बचकानी बाते बंद होनी चाहिए .आप चार दोस्त मिलिए .देश प्रेम का संकल्प लीजिये और गाँव,कसबे ,शहर,महानगर जहाँ भी आप हैं एक दिन का उपवास बारी बारी से करे जब तक आप अपने लक्ष्य को नहीं पा लेते इस पावन यज्ञ की अंग्नी मे देशप्रेम की आहुति देते रहिये

उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहाँ जो सोवत है जन लोकपाल की लड़ाई सिर्फ अन्ना की नहीं है,सिविल सोसायटी की नहीं है,भारत देश की नहीं है,यह विश्व के मानव मूल्यों की लड़ाई है .आप समूचे विश्व को एकबार फिर सत्य,अहिंसा,उपवास,अनशन की ताकात से जख्जोर दे ताकि विश्व के सभी तानाशाह यह समझ सके की "जुल्म बन्दुक के जोर पर किया जा सकता है पर जुल्म का अंत भी बिना बन्दुक के लाया जा सकता है "    

कोई टिप्पणी नहीं: