शनिवार, 10 सितंबर 2011

आम आदमी

आम आदमी 

सुबह सवेरे,
पेट की भूख बुझाने,
टिमटिमाती मासूम आँखों 
और 
हाथ हिलाते बच्चों को छोड़ ,
घर से निकलता है आम आदमी.

पिसता,लटकता, बसों और ट्रेनों में ,
समय पर दफ्तर पहुँचने की आपाधापी में ,
निक्कमी सरकार और भ्रष्ट नेता को कोसता,
देर से पहुँचता है दफ्तर आम आदमी.

बॉस की फटकार से दिन की शरुआत ,
फिर फायलों से माथापच्ची ,
दोपहर के भोजन पर,
बिना तेल की सब्जी 
और
रुखी रोटी को चबा ,
कुछ गालियाँ दे महंगाई को,
कुछ सुस्ता , काम पर लगता है आम आदमी.

शाम को काम निबटा ,
बस ,ट्रेन पकड़ने की जल्दी में,
बहदहासा,भीड़ को चीरता ,
घर पहुँचने की आशा से
चहकता है आम आदमी.

उसे कहाँ मालुम की ये चहक अंतिम है,
उसे कहाँ मालूम बच्चे ने अंतिम हाथ हिलाये हैं,
उसे कहाँ मालुम टिमटिमाती आँखों ने अंतिम विदाई दी है,
वह तो छोटी सी आशा में खोया है;
तभी -
 एक तेज धमाके ने,
नकारा तंत्र को अंगूठा दिखा ,
सैंकड़ों खुशियाँ लील ली है ,
कटे फटे शव ,
रक्तरंजित अवयव ,
चीख -पुकार ,
रुदन -कोहराम में डूबता है आम आदमी.

इस बीच-
जगते हैं  कुछ घड़ियाल, 
गिद्ध,सियार और मगर के बच्चे,
कुछ फ़ेंक  कर, कुछ बटोरने की चाल ,
उस जाल में फंसता है आम आदमी.

कुछ भुत -पलीत, 
जलती लाशो पर सेकते हैं रोटियाँ ,
शह और मात की बिछाते कुटनीतिक घोटियाँ,
आरोप -प्रत्यारोप के बीच उठती है अर्थियां ,
कैसी पहेली बन जाता है आम आदमी.

स्वजनों की सिसकियों से,
दहल जाता है मरघट ,
सूख जाता है आँखों का पानी ,
आग की लपटों में स्वाहा ,
माँ का तारा ,बाप का सहारा ,मासूम की जिंदगानी ,
मरगट के पेड़ से ,
तब 
चीखते हैं उल्लू -
कब तक कुत्ते की मौत , मरेगा आम आदमी ........!!

  




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