शनिवार, 24 सितंबर 2011

शिखर पर ध्वज फहराता हूँ .



मैं सपने बेचता नहीं हूँ .
मैं सपने दिखाता नहीं हूँ .
मैं खुद सपने देखता हूँ ,
मैं बड़े सपने देखता हूँ ,
और सपनो को 
सत्य में रूपांतरित करता हूँ  .
 मैं प्रेरित करता हूँ उनको -
जो सपने नहीं देखते हैं.
जो सपनो को मूल्य हीन समझते हैं . 

मैं तो आम पंछी हूँ ,
भरता हूँ उड़ान,
कबीले के संग .
थकता नहीं हूँ , 
रुकता नहीं हूँ ,
मेरी गति पर ,
है विश्व आफरान.

पाता हूँ गीता से ,
कर्म पथ पर चलना .
छद्म राज धर्म निभाना ,
मुझे नहीं आता है .
क्या होते हैं सापेक्ष के मायने,
क्या निरपेक्ष होता है,
मुझे तो हर युग में,
 बाली वध ही उचित लगता है .

मेरी आलोचना ,
मुझे प्रेरणा देती है .
मुझ पर मिथ्या कलंक ,
मुझे नयी  राह दिखाते हैं .
मुझ पर झूठे आरोप ,
मुझे योद्धा बनाते हैं .
मैं तो पथिक हूँ उस पगडण्डी का ,
जिस पर कभी लौह पुरुष चले थे .

सफलता के भार तले कब दबा हूँ ?
गीत अपने ही गौरव के कब गाता हूँ ?
अपनों की पीड़ा से कब दूर हुआ हूँ ?
गहन अंधेरों से कब डरा हूँ  ?
हर मुश्किलों को ठुकराता हूँ ,
पेरो तले मसल चट्टानों को ,
शिखर पर ध्वज फहराता हूँ .

मेरी सफलता के  गीत ,
जब गाती है दुनिया ,
खिल जाते हैं तब ,
साबरमती में करोडो  कमल ,
ठहर कर देखता हूँ ,
मुस्कराते उपवन को ,
और- चल पड़ता हूँ फिर,
 जीतने नये शिखर को .




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