बुधवार, 28 सितंबर 2011

नारी....?

नारी....?


नारी -
तुझ से लेकर ,
अनुत्तरित है प्रश्न ?
नहीं ढूढ़ पाया हूँ हल,
कि-    
तेरा पूजन ,
अब पंडालो में ,
या -
मंदिरों तक क्यों सिमट गया है ?
इसी आर्यावृत में कभी  ,
तुम-
शक्ति और श्रद्धा थी , 
शुचिता और आद्या थी ,
दुर्गा और लक्ष्मी थी . 
इसी आर्यावृत में अब ,
तुम-
भोग्या, 
काम्या , 
अबला ,
निर्लज्जा बन रही हो .
क्या,
इसे स्वतंत्रता  कहें?
इसे प्रगति पथ कहें ?  
तुम्हारी -
इस दुर्दशा का जबाबदार कौन ?
तुम खुद,
या 
पुरुष  समाज !!




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