सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

फॉर्मूला वन रेस .......पैसे का तमाशा

                                                                                   
फॉर्मूला वन रेस .......पैसे का तमाशा 


             
 १० अरब डॉलर .......एक छोटी सी रकम ..... स्वाहा ...फॉर्मूला  वन रेस के लिए  .......!!!

हमारे राष्ट्रिय खेल के लिए खिलाड़ियों के जूते का जुगाड़,,,,,,,,,,, नहीं कर सकते ......फिर भी जीत के आ गये!
ताज्जुब है!! .....मगर जीत के जश्न को पैसे नहीं है ,............पैसे का धुँआ तो फॉर्मूला के लिए किया  है .

एथलीट नहीं है .....करना भी क्या है .गाडी दोड़ा दो,नाम हो जाएगा .  

सैकड़ो बच्चे अस्पतालों में दम तौड़ रहे हैं ,ये ऊपर वाले की मर्जी पर छोड़ दे ,जिन्दगी की डोर तो खुदा के हाथ
में है मगर ट्रेक पर दौड़ती रेसिंग गाडियों की डोर तो हम अपने हाथ में रख सकते हैं .माया का मायावी संसार
लीला भी गजब की है और रेस भी गजब की है

भूख और कुपोषण लाइलाज हो चुके हैं ,लड़ते-लड़ते थक चुके हैं ,कुछ मनोरंजन हो जाए ताकि दर्द को भुलाया
जा सके .भूख और गरीबी पर लच्छेदार भाषण रेस देखकर दे देंगे .

क्या !! गरीब और गरीब हो गया ,कोई परवाह नहीं !!!ये तो हर दिन का रोना है .थोडा सुस्ता ले और फॉर्मूला
देख ले.गरीब का करम ही फूटा हुआ है ,अब पेबंद कैसे लगाये.

स्कुल नहीं है ........अध्यापक नहीं है .......बच्चे पढ़ नहीं पाएंगे ........कोई चिंता नहीं है .इन सबको में मनरेगा
में काम दे देंगे मगर रेस का बढ़िया आयोजन  हो जाए.नाम हो जाए

पीने का साफ मीठा जल भी नहीं है .....गन्दा पिला दो .कुछ लुढ़क गये तो क्या फर्क पड़ना १२१ करोड़ हैं
मगर फॉर्मूला रेस का सफल आयोजन ,पानी से ज्यादा मायने रखता है

राम भरोसे प्रजा को छोड़ दो .सबका मालिक है वो ,ठीक ही करेगा .हमें तो वाहवाही लुटने दो कार रेस की .    


शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

नरेगा या मनरेगा से देश ने क्या खोया ?



नरेगा या मनरेगा से देश ने क्या खोया ?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जब से शुरू हुयी है तब से जनता के कर के रूप में दिए 
गए धन की खुली लूट हुयी है .कांग्रेस सरकार का यह कानून देश के पैसे की भयंकर बर्बादी कर रहा है फिर 

भी सरकार इस तिलिस्म को चालू रख रही है.क्यों ? इस देश ने मनरेगा से क्या खोया है ?

१.  २०११-२०१२ के बजट में ४०००० करोड़ रूपये इस योजना के लिए मंजूर किये गये .यह इतनी बड़ी रकम है 
     जिसे देश के २०००० गाँवों पर खर्च किया जाता तो हर गाँव में उच्च शिक्षा के लिए  आधुनिक सुविधाओ
     से युक्त भवन और अस्पताल बन सकते थे क्योंकि देश के हर गाँव पर २ करोड़ रूपये खर्च किये जाते .

२. ये रकम अकुशल काम जैसे मेड बनाना ,गड्ढे खोदना ,तालाबों की खुदाई आदि पर खर्च किये जा रहे हैं.
    क्या देश को वास्तव में इसकी जरुरत है ?कच्ची सड़क बनाना या तालाबो की गहराई बढ़ाना आदि 
   कामो पर खर्च से गाँव को क्या मिला ? सभी गाँवों में पहले से ही तालाब थे ,उन्ही तालाबो को गहरा 
  करते रहना किस तरह का अर्थशास्त्र हो सकता है .गाँवों में अकुशल मजदुर वास्तव में हैं लेकिन वो 
  अकुशल क्यों रह गये और उसके लिए कौनसी योजना चाहिए इस पर विचार किये बिना मनरेगा ले 
  आये .गाँव इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि वहां पर उच्च शिक्षा की और उच्च स्वास्थ्य सेवाओं का घोर 
  अभाव है .यदि यह पैसा स्वावलंबी शिक्षा योजना और अस्पतालों पर खर्च होता तो अकुशल श्रमिक 
 की समस्या कुछ वर्षों में ख़त्म हो जाती लेकिन यदि योजना वोट आधारित बनने लगे तो फिर अरबों 
रूपये स्वाहा ही होंगे .

३. मनरेगा आने से पहले ग्राम पंचायतों के चुनावों में हजारो रूपये ही खर्च होते थे मगर मनरेगा के बाद 
   ग्राम पंचायतों के चुनावों में १०-१० लाख रुपयों तक खर्च होते हैं ! सरपंच के उम्मीदवार खुल कर पैसा 
खर्च कर रहे हैं क्योंकि उनको मालूम है मनरेगा से ही खर्च की गयी राशी से अधिक लक्ष्मी उसके घर में 
बरसेगी .

४. गाँवों में बसने वाला युवा जो रोजी रोटी के लिए उद्योग -धंधो में काम करता था ,वह युवा अब अकुशल             श्रमिक बन गाँवों में ही रुक गया है.जिस देश का युवा कभी उद्योगों में सेवा करके अकुशल से कुशल 
कारीगर बनता था ,अब हालत यह है की वो जीवन भर अकुशल ही बना रहना चाहता है क्योंकि उसे 
१००/- कम काम करके या ताश पत्ती खेल कर (मनरेगा में ३ घंटे काम करना है बाकी समय में छाया 
-दार पेड़ के नीचे ताश खेलना है ) मिलने ही वाले हैं फिरउद्योगों में मेहनत वाले काम क्यों करे ?

५. मनरेगा के बाद सरकार महंगाई पर काबू ही नहीं कर  पायी है क्योंकि लाखो लोगों को सरकार ने 
    ऐसे काम में लगा दिया जो लगभग निरर्थक हैं या अतिअल्प फायदे वाले हैं .इसका सीधा प्रभाव 
   उद्योग-धंधो पर पड़ा .श्रमिको की कमी के कारण और नए श्रमिक आसानी से नहीं मिल पाने के कारण 
  ऊँचे वेतन का लालच देकर श्रमिक रखने पड़े जिससे वस्तु का  लागत मूल्य हमेशा के लिए बढ़ा,
 फलस्वरूप महंगाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही है .

६. मनरेगा के कारण श्रमिको की किल्लत के चलते पॉवर लूम्स उद्योग -हीरा उद्योग की तो कमर ही टूट 
    गयी. अकेले सूरत में हर वर्ष ७५०००-१००००० पॉवर लूम्स भंगार में बिक रहे हैं .कारण की श्रमिक 
   आसानी से उपलब्ध नहीं हो रहा है .पुरे देश में हर उद्योग को महंगे श्रमिक उठाने पड़ रहे हैं .यदि इसी 
   रफ्तार से लघु उद्योग चोपट होते रहे तो महंगाई बढ़ेगी तथा देश की उत्पादन क्षमता भी कम हो जायेगी .

७. मनरेगा में बड़ी मात्रा में गपले-घोटाले हो रहे हैं .क्योंकि मजदूरो के काम की मात्रा को मापने का 
    कोई पैमाना नहीं है .एक ही गड्ढे का दोबारा निरिक्षण हो जाता है ,गाँव की पुरानी कच्ची सड़क को 
   मनरेगा के तहत दिखाकर पैसा लुट लिया जाता है.मजदुर भी जानता है की मेरे से जो काम लिया 
   जा रहा है उसका मतलब कुछ भी नहीं है. वह तो सौ का नोट लेने जाता है .सरपंच भी जानता है की 
  सरकार ऐसे कामो की मात्रा कभी निर्धारित नहीं कर पाएगी इसलिए वह भी माल बनाने में लग 
 जाता है .

८. मनरेगा का दुष्प्रभाव यह भी है की जो ग्रामीण मेहनती थे वे कामचोर स्वभाव के बनते जा रहे हैं 
   मजदुर अपने ऊपर वाले अधिकारियों को भरपेट पैसा लूटते देख खुद भी काम नहीं करता है या 
कम दिन काम करके या कम समय तक काम करके पूरा पैसा वसूल कर चुप रहता है .यदि लम्बे 
समय तक ऐसा चलता रहेगा तो कामचोरी और नैतिक मूल्यों का ह्रास होता रहेगा जो चोरो की बड़ी 
फौज कड़ी कर देगा .

९. मनरेगा का वर्तमान स्वरूप खतरनाक है जो देश के पैसे का दुरूपयोग है .इससे अच्छा होता सरकार 
   ग्रामीण किसान को मुफ्त में ऊँचे दर्जे का बीज और खाद  दे देती .गाँवों में लघु उद्योग लगाने के लिए 
  बिना ब्याज के गरीबो को ऋण उपलब्ध करा देती . गरीब ग्रामीण किसानो को चोबीस घंटे कम दर पर 
   खेतों के लिए बिजली उपलब्ध करा देती ,मगर ऐसा करना किसे है ? जनता का धन है ,उडाना है और 
   सत्ता की वापसी को पक्का करना है .

मनरेगा को बंद कर दिया जाना देश हित में नहीं है ???                   
                   
    



मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

दीपज्योती नमोस्तुते

दीपज्योती नमोस्तुते 

जीवन -
क्षण भंगुर है ,
नश्वर है,
अल्प है,
मगर-
दीये की तरह 
सार्थक जीयें तो ,
अमृत है,
ज्योतिपुंज है.

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दीप -
तुम खुद के अस्तित्व को 
तिल -तिल जला 
जग को रोशन करते हो ;
मगर-
प्रतिफल में क्या पाते हो ?
दीप ने कहा-
अँधेरे की दया तले
जीना अर्थहिन है ,
बेमकसद है.
अँधेरे से जंग,
अर्थहिन जीने से बेहतर है . 

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नन्हें दीप -
तमस से टकराना, 
तेरे बूते से बाहर है .
दीप ने कहा -
अँधेरे की गहनता से डरना,
मेरी फितरत नहीं है .
तमस से जंग खेलने में , 
ताकत की नहीं,
 जज्बे की जरुरत है . 
  -----------------------------------
भ्रष्ट नेता ने 
दीप से पूछा- 
तुम भी काला खाते हो, 
काला उगलते हो .
मैं भी काला खाता हूँ, 
काला उगलता हूँ .
फिर भी तुम पूजे जाते हो, 
और 
मैं जूते खाता हूँ .
दीप ने कहा -
मैं जनहित में ऐसा करता हूँ 
तुम जन अहित में करते हो .
इसीलिए तुम जग में जूते खाते हो .  

कैसी ये दिवाली



चिकनी माटी से,
चाक पर, 
दीये का सृजन,
कर  रहा था कुम्हार .
कभी खो जाता था पुरानी यादों में ,
पिछली  दिवाली पर,
खायी थी पूरी ,कचोरी!
साथ में कुछ मिठाई भी !! 
मगर
 पेट फिर भी भरा न था.
इस बार बनाने हैं दीये ज्यादा,
ताकि,
ना रहे मन की कोई हसरत अधूरी.
मगर- 
हाट बाजार में , 
आम आदमी,
क्षण भर ठिठक,  
खुबसूरत दीये देख,
आगे बढ़ जाता है.
क्योंकि-
बस के बाहर हो रही जब दाल  चपाती.
दीप जलाने को कहाँ तेल ,रुई की बाती .
  
  

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

.....क्योंकि फूल हूँ मैं .





कभी प्रेयसी की  केश रश्मि पर, खुद को इठलाता पाता हूँ . 
कभी प्रियतम  को रिझाने, खुद प्रेम सेतु बन जाता हूँ.
कभी प्रेयसी के मुख मंडल की ,खुद से तुलना पाता हूँ .
कभी चाहत बनकर दौ दिलों की ,अमर साक्षी बन जाता हूँ .

कभी ईश्वर की आराधना में ,खुद को समर्पित पाता हूँ .
कभी देव प्रतिमा के गले पर ,खुद को संवरता पाता हूँ .
कभी निराकार के मस्तक पर ,खुद को चढ़ता पाता हूँ 
कभी युगल कृष्ण के महारास का ,अमर साक्षी बन जाता हूँ  

कभी वीरों के संग समरांगन में ,खुद को विजयी पाता हूँ .
कभी शहीदों के संग चढ़ चिता पर ,धन्य धन्य हो जाता हूँ.
कभी देशद्रोही नेता की शोभा बन  ,खुद को शर्मिंदा पाता हूँ 
कभी देश प्रेमी के कर कमलों का ,अमर साक्षी बन जाता हूँ 

सुख दुःख सहता रोज निरंतर , खुद को समभाव में पाता हूँ 
शादी ,उत्सव या मरघट में ,खुद को सहज सरल ही  पाता हूँ 
जन्म ,मृत्यु या प्रेम पंथ में ,खुद को निर्विकार ही पाता हूँ 
कर्म भाव में पल पल जी कर ,अमर साक्षी  बन  जाता हूँ 

बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

हम राजनीति में नहीं आयेंगे !!

हम राजनीति में नहीं आयेंगे,यह बात बार बार अन्ना टीम क्यों कहती है ? एक तरफ आप व्यवस्था में 
आमूलचूल परिवर्तन की बात करते हैं और दूसरी और व्यवस्था को हाथ में नहीं लेना चाहते हैं .इसका 
अर्थ तो ये हुआ जिन्हें आप देश की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार मानते हैं उन मक्कारों में ही  इमानदारी या 
देशभक्ति ढूंढना चाहते हैं.ऐसा प्रयोग तो असफल ही होगा .

जो चीज होती है ,दिखती है उसके पीछे एक कारण होता है .अन्ना के सुर में करोडो देशवासियों के सुर
मिल गए थे उसका कारण विकराल होता भ्रष्टाचार ही था .अब यदि भ्रष्टाचार का इलाज वास्तव में अन्ना
हजारे जी ढूंढना चाहते हैं तो उन्हें धर्म और न्याय के उपदेश के साथ साथ कर्म में उतरना ही पडेगा या फिर
टीम को बड़ी बनाकर टीम को राष्ट्र धर्म के लिए मैदाने जंग में उतारना पडेगा .

अगर हम यह कह कर बरी होना चाहते हैं की भ्रष्टाचार मुक्त भारत  की बात करने के लिये चुनाव लड़ना
कहाँ जरुरी है तो शायद अन्ना टीम अपने सपने को कभी पूरा भी नहीं कर पायेगी. यदि राजनीती में
निडर ,साहसी ,नैतिक ,समदर्शी ,संवेदनशील और राष्ट्र भक्त जनता नहीं आएगी तो फिर देश स्वार्थी ,झूठे,
गुनाहगार ,निरंकुश ,भ्रष्ट और चोरो के एकाधिकार में ही चलेगा .यदि अन्ना टीम देश की जनता को
वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त भारत देना चाहती है तो अरबों की जनसंख्या वाले देश में ५५० देश भक्त तो उन्हें
मिल ही जायेंगे.

अन्ना कहते हैं मेरे पास बैंक बैलेंस नहीं है या मेरी चुनाव लड़ने पर जमानत जब्त हो जायेगी या इस
गंदगी में मेरा काम नहीं है तो फिर देश का भविष्य भगवान् या वर्तमान पिट्टू नेताओं के भरोसे चलने
दिया जाये. जब हम किसी जगह की गंदगी की सफाई करेंगे तो कुछ धुल ,मिटटी हमारे पर लगेगी ,मगर
उससे डरकर हम सफाई करना ही छोड़ दे या हमारे हाथ गंदगी उठाने के कारण मेले हो जायेंगे और लोग
अन्ना को सफाई करते वक्त मैला देख कर  कुछ गलत समझ बैठेंगे तो फिर सुधार कागज़ पर ही संभव
होगा.

सिर्फ कानून बन जाने से क्या होगा .क्या कानून बन जाने से  समस्या ख़त्म हो जाती है ?असल में कानून
का पालन करने वाले और करवाने वाले कर्मवीर मानव गढ़ने होंगे .प्राचीन भारत में सदाचारी महामानव
ही राजनीती में आते थे वे सदाचारी वशिष्ट हो, विदुर हो या चाणक्य .इन महानुभावो ने कभी नहीं कहा कि
हम देश की गंदगी को साफ स्वयं नहीं करेंगे .इन सबने राष्ट्र के लिए कर्म भी किया और कर्म करने के लिए
लोगों को प्रेरित भी किया .अन्ना यदि भारतीयों को सिर्फ प्रेरित करना चाहते हैं तो संकल्प सिद्ध होने में
संदेह ही है .हमारे देश में उपदेशक बहुत हैं ,धर्म के मर्मग्य भी बहुत हैं ,विवेचक भी कम नहीं हैं लेकिन
हमने आज तक क्या पाया ,कथा सुनी एक कान से और दुसरे से निकाल दी ,अमल नहीं की .इसका कारण
यही है की हमारे उपदेशक स्वयं कर्म नहीं करते सिर्फ जबान हिलाते हैं .

किसी एक को वोट मत दो या कम खराब को वोट दो या किसी को भी मत दो ,यह उत्तर क्या हमारे देश की
उन्नति के लिए सही है ? अन्ना का  उत्तर यह होना चाहिए था- भारतवासियों ,मुझे  हर जिले से ,हर तहसील
से एक एक ऐसा आदमी दो जो नैतिकता पर खरा उतरने वाला हो ताकि मैं भ्रष्टाचार मुक्त भारत का निर्माण
कर सकूँ .लेकिन यह बात अन्ना नहीं कह पा रहे हैं और टीम अन्ना उलझ गयी है छोटा चोर और बड़ा चोर
के फेर में .जिसका नतीजा ढाक के तीन पात वाला होता देख कंही थप्पड़ बरस रहे हैं तो कहीं चप्पल .               

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

तुम


तुम 


तेरी आँखों के समन्दर में, उल्फत को छलकते देखा. 
तेरी मदहोश अदाओ से  , जमाने को मचलते देखा.

गूगल से साभार 
 उझड़े हुये गुलशन को ,फूलो से सँवरते देखा.     
तेरे चेहरे की रंगत में, फूलों को सिमटते देखा.
सितारों की चुनड़ी में, चन्दा को झलकते देखा. 
तेरे हुस्न पे फिदा होकर, चंदा को ढलते  देखा.


तेरी आँखों के समन्दर में, उल्फत को छलकते देखा. 
तेरी मदहोश अदाओ से, जमाने को मचलते देखा .


कलियों के खिलने पर ,भंवरो  को टहलते  देखा. 
तेरे रस रसीले होंठो में, भंवरो  को लिपटते देखा.
सागर की गहराई  में, साहिल को पार लगते देखा .
तेरे गालो के गड्ढों में, हर साहिल को डूबते देखा.

तेरी आँखों के समन्दर में, उल्फत को छलकते देखा .
तेरी मदहोश अदाओ से, जमाने को मचलते देखा.


विरह के गीत पर रोते ,रात में चकोर को देखा. 
तेरी यादो में ढलती शाम, करवटों में सूरज देखा. 
यूँ तो शमां पर, मिटते आये हैं, जमाने से परवाने .
तेरे नाम के संग हर पल, मेरे नाम को जुड़ते देखा. 

तेरी आँखों के समन्दर में, उल्फत को छलकते देखा .
तेरी मदहोश अदाओ से , जमाने को मचलते देखा  
     

   
  

शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2011

तौल मोल के बोल

तौल मोल के बोल 

वाणी की अनूठी महिमा है .यह साली जीभ भी कैसे कैसे रंग दिखा जाती है .बिना हड्डी के लपलपाती 
रहती है .वाणी के कारण मुर्ख और बुद्धिमान शब्द बने हैं .थोड़ी सी भी चूक एक बड़े हादसे में तब्दील हो जाती
 है.वाणी आशिको के लिए वरदान भी है और व्यापारी के लाभ का कारण भी.नेता लोग जो घाघ होते हैं वो तो 
बहुत कंजूसी से वाणी उपयोग करते हैं मगर चुनाव के समय वाणी का खुलकर उपयोग करते हैं .वाणी जब 
भले आदमी के मुखारविंद से निकलती है तो जनमानस पर छाप छोड़ जाती है लेकिन जब अंह और गर्व 
से चूर आदमी के मुंह से निकलती है तो जन जन की हथेली की छाप चेहरे पर छोड़ जाती है .

वाणी के प्रभाव से कुछ दिनों पहले बाबा फँस गए थे .योग से तंदुरुस्ती का विज्ञापन बढ़िया चल निकला तो 
भोले भक्तो को मखनिया वाणी से प्रभावित कर ऊँची कुर्सी पर लोटने के सपने देखने लगे मगर वाणी कब 
फिसली कि बेचारे घर के रहे न घाट के .

वाणी जब निस्वार्थ भाव से निकलती है तब अमृत बन जाती है .एक दादाजी बुढापे में भी ऐसा बोले कि 
शक्तिशाली अजगर भी विकल्प हीन हो दंडवत हो गया था .यह अजगर भी दौ मुंह वाला था ,दोनों मुंह से 
एक साथ दोनों बातें बोलता था .कभी हाँ कभी ना के कारण अजगर कुमार मखनिया बेबी बन गया था .

वाणी के प्रभाव से अफसर भी अछूते नहीं हैं ,अपने अधीनस्थ से गुपचुप में ऐसी वाणी बुलवाई कि चक्की 
पीसने लगे, हवा का रुख राजा की और है मगर वो इसे कब मानने वाले ,पिल पड़े राजा पर और लगे अंट
संट बकने .नतीजा तो फिर वैसा ही आना था और आया भी .

बुड्ढ़े दादाजी के बोल पर पुरे देशवासियों को थिरकता देख छोटे दादाजी में भी हवा भर गयी .वो बोले -
बड़े दादा तो कुछ साल से वाणी उपयोग कर रहे हैं और सुपर हिट हो गए हैं जबकि मैं तो कई दशकों से 
वाणी विलास करता आया हूँ ,राम को रिझाता आया हूँ ,बाल वाणी विलास से निरमा की सफेदी ले चुके 
हैं मगर बात अभी तक बनी नहीं सो हठ करके बैठ गए कि मुझे एक मौका दे मैं फिर से वाणी के तेज 
से महल जीतना चाहता हूँ .जो बात बड़े दादा आगे करने वाले हैं वो मैं घोड़े पर बैठकर अभी कहना चाहता 
हूँ .सबने डांटा,डपटा मगर वो नहीं माने .आखिर हारकर पितामह से बात मनवा गए और वाणी से चेतना
जगाने लगे

वाणी तो सच्चे संतो के मुंह से सुनी जाती है और ऐसी वाणी दिल तथा दिमाग को खुराक भी देती है .माया
वाले बाबा भी जै रामजी की बोल के कथा के अमृत में बबलू की कहानी कह डालते हैं .अब बेचारा बबलू
क्या जबाब दे ? कभी कभी ही तो बबलू बोलता है और बोलते ही टांग खिचाई हो जाती है .मगर बबलू की
बात बबलू के कबीले-कुनबे के लोग सर माथे पर रख लेते हैं आखिर मदारियों को पेट जो भरना है

बड़े दादाजी की अंगुली पकड़ कर एक नौसिखिया तलवार की धार पर वैतरणी पार कर गया .जब वैतरणी
पार हो गयी और दादा ने अंगुली छोड़ी तो साहबजादे ने जोश  में आकर अंगुली माँ के माथे की और ताक दी .
कुछ नासमझ बन्दों को नागवार गुजरा और साहबजादे को प्रेक्टिकल सीख दे डाली ,साहबजादे ने फरमाया -
मैं दादा के साथ रह चूका हूँ तुमने उनकी बात मानी और मशाल जला दी ,अब मेने अकेले में वाणी विलास
की तो मशाल से मेरी मूंछ जला दी .ऐसा करना नाइंसाफी है .
इन्हें कौन समझाए सा'ब कि माँ कि गाली कौन खुद्दार बच्चा सहन कर लेगा .मगर हम तो इस वाणी विलास
में ना पड़ेंगे क्योंकि कबीर ने कहा था -
ऐसी वाणी बोलिए मन का आपा खोय
ओरन कि शीतल करे आपहुं शीतल होय                              

बुधवार, 12 अक्तूबर 2011

आ बेटा ,तुझे नेता बना दूँ !!

आ बेटा ,तुझे नेता बना दूँ !!

एक गली में टंगे बड़े से बोर्ड पर विज्ञापन छपा था -"आ बेटा ,तुझे नेता बना दूँ "हमने पुरे मनोयोग से उस 
विज्ञापन को पढ़ा .हमारी तो बांछे खिल गयी हुजुर .बड़ी बड़ी डिग्रियों के पीछे भागते भागते बाल ही सफेद 
हो गए थे हमारे .आज भी यदि इस गली से नहीं गुजरे होते तो शायद पढ़ते पढ़ते बुड्ढे हो जाते सा'ब मगर 
किस्मत के धनि थे हम भी जो अनायास ही इस बोर्ड को पढ़ बैठे और सच कहूँ तो मुझे अपना भविष्य भी 
सुनहरा नजर आया .हम आनन फानन में बोर्ड पर लिखे पते पर पहुँच गए थे .काफी भीड़ थी बाहर .लोग 
पंक्ति में खड़े खड़े धक्का मुक्की कर रहे थे .उम्र का कोई प्रतिबन्ध नहीं होने के कारण जवान ,अधेड़ ,बुड्ढे 
सभी फंसे हुए थे .हम भी पंक्ति में खड़े हो गए थे तभी हमारे आगे खड़े ताऊ ने पूछा -तुमने फार्म ले लिया ?
हमने नहीं में सिर हिलाया तो वो बोले ,कोई बात नहीं मेरे पास दौ फार्म है पुरे १००/-में ख़रीदा है यदि तुझे 
चाहिए तो एक का सौ देकर मेरे से ले सकते हो या फिर पंक्ति छोड़कर पहले फार्म लो .मेने मेरे पीछे देखा 
पंक्ति काफी लम्बी हो गयी थी .मेने पचास का सौ देकर ताऊ से फार्म लेना मुनासिब समझा .अब फार्म 
भरना था .फार्म में शिक्षा का कोष्ठक नदारद था .कुछ विशेष योग्यताओ पर निशान लगाना था -क्या 
आप मक्कार हैं ? अपने खास दोस्त को कितनी बार धोखा दिया ? हर बात की शरुआत झूठ से करते हो?
चोरी करते पकडे गए या नहीं ,झूठ बोलते समय हकलाते हो या नहीं, किसी का बताया काम पूरा कर देते 
हो या गोल घुमा देते हो ,चेहरे के भाव और मन के भाव एक ही होते या अलग -अलग .फार्म पढ़ कर तो 
हमारा भेजा ही खराब हो गया था सा'ब.जैसे तैसे हमने अपना फार्म भरा .हमारे आगे खड़ा ताऊ फार्म पर 
लिखे उत्तर को पढ़ कर मुस्करा रहा था तो हमारे पीछे खड़ी यौवना वंग्य से बोली -डफर !
 हम सकपका गए थे शायद हमने फार्म गलत भर दिया था .काफी देर बाद हमारा नंबर आया .हमें एक 
कमरे में बुलाया गया .टेबल के एक तरफ एक बुड्ढा था उसने हाथ से कुर्सी पर बैठने का इशारा किया 
और हमारे फार्म को एकाग्रता से पढने लगा और फिर मुंह बिचका कर बोला -तुम नेता नहीं बन सकते ?
मेने पूछा -क्यों ? वो बोले -तेरे में एक भी गुण नहीं है नेता बनने के .तुमने अभी तक मक्कारी नहीं की ,
झूठ नहीं बोला ,धोखा नहीं दिया ,चोरी करते पकडे गये, झूठ बोलते हकला गये ,हर किसी का काम किया .
मगर ये सब तो अच्छे गुण हैं .........
वो मेरी बात काट कर बोले -तुझे उपदेशक बनना है या नेता ?
हम बोले -जी, हम नेता बनने आये थे .
वो बोले -देखो ,वैसे तो तुम नेता बनने के काबिल नहीं हो मगर तीन महीने का कोर्स पूरा करके तुम नेता
 बन सकते हो .तुम्हे एक प्रश्न पत्र दिया जाएगा.जिसके जबाब लिखे रहेंगे तुम्हे उसके अनुसार आचरण 
करना है .हमने उनके हाथ से प्रश्न पत्र ले लिया और तीन महीने बाद फिर आने का वादा कर दिया .
प्रश्न पत्र के उत्तर कुछ इस प्रकार थे  
१.मक्कार बनो 
२.खुदगर्ज रहो 
३.चापलूसी करो 
४.झूठ को सच की तरह बोलो 
५.सब्ज बाग़ दिखाओ 
६.आग में घी डालते रहो 
७.समस्या को आगे -पीछे सरकाओ 
८.आगे वाले को पीछे धकेलो 
९.ऊपर वाले की टांग खेचो ,नीचे गिराओ 
१०.झगडा कराओ और पन्च बनो 
११.बगुला भगत बनो 
१२.चेहरा साफ ,मन काला रखो 
१३.गुस्सा पीओं ,गेंढा बनो 
१४.काम निकालो ,चलते बनो 
१५.चूहे खाओ ,हज भी जाओ         

  उत्तर पढ़ कर लगा हम जैसे क्या नेता बनेगें .हम जैसे थे वैसे ही रह गए .

रविवार, 9 अक्तूबर 2011

अन्ना सौ टंच पागल !!

 अन्ना सौ टंच पागल !!

अन्ना के पागलपन को सिद्ध करने से पहले कुछ उन भारतीय पागलो को भी याद कर लेना सामयिक रहेगा

एक पागल ने बंगाल की धरती पर अवतरण लिया और रामकृष्ण परम हंस कहलाये .उनके जीवन चरित्र 
को पढने से उनका माँ काली के प्रति अटूट भाव उनके गाढ़ पागलपन को दर्शाता है .एक ऐसा पागल  देव 
पुरुष जिससे माँ काली का अरस परस था ,इस पागल भक्त को नमन .

एक पागल मरुधरा की धरती पर पैदा हुआ था जो अपने पागलपन के कारण पत्नी पुत्र के साथ वन -वन
में भटकता रहा ,घास की रोटी भी उसके बच्चो को नसीब नहीं हो पायी थी .मेवाड़ की स्वाधीनता का वह 
पागल दीवाना था महाराणा प्रताप . अपनी जन्म भूमि से पागलपन की हद तक प्रेम करने वाले वीर के 
पागलपन को नमन .

एक पागल था पंजाब का पुत्र - जो इस देश की मिटटी का इतना बड़ा दीवाना था की उसे दिन रात इस 
मिटटी की चिंता ही सताती रहती थी .अपने देश की मिटटी से पागल यह युवा अपने जांबाज साथियों के 
साथ मौत को भी हँसते हँसते गले लगा लिया था .उस शहीद भगत सिंह के पागलपन को सलाम .

एक पागल हुआ था गुजरात में ,अधनंगा फकीर ,जिसके पागलपन ने  देशवासियों को आंदोलित कर दिया 
जिसके पागलपन का मन्त्र था - अंग्रेजों ,भारत छोडो . फिरंगी उसके पागलपन से भाग खड़े हुए थे .वो 
थे मोहन दास करम चंद गांधी .पूरा विश्व उसके पागलपन को नमन करता है आज .

अब आते हैं अन्ना के पागल पन पर .अन्ना को पागलपन की यह बिमारी १९७९ से ही लग गयी थी मगर 
इस देश के स्वार्थी नेता इसे उस समय पहचान नहीं पाए थे .सबसे पहले भारत सरकार ने इस पागल को 
 १९८६ में "वृक्ष मित्र" के रूप में पहचाना . दूसरी बार १९८९ में इस पागल को महाराष्ट्र सरकार ने चिन्हित 
किया " कृषि भूषण" देकर . मगर इस पागल बन्दे की यह बिमारी बढती ही गयी और १९९० में यह पागल 
"पदम् श्री" और १९९२ में "पदम् भूषण" से नवाजा गया मगर इस बिमारी को इन पांच सालो में हर देश 
प्रेमी ने बढ़ता पाया .अन्ना का यह पागलपन पिछले दिनों पुरे भारत में फैल गया और करोड़ों भारतीयों
ने अन्ना के पागलपन को अपने दिल में बसा लिया .यह एक पागलपन ही कहा जाएगा की ७० वर्ष का 
भारतीय कंठी माला जपने की जगह व्यवस्था परिवर्तन के जंग में कूद गया है .यह अन्ना का पागलपन 
ही है की इस अवस्था में भी १२ दिन तक महाभारत के जंग का नायक बन लड़ता रहता है .यह अन्ना का 
पागलपन ही है की हिसार की जनता  से सारहीन सिद्धांतो को तर्पण करने को कहता है .कांग्रेसी लोगो 
का आकलन सौ टंच सही है की अन्ना पागल है . अन्ना को पागलखाना जाना चाहिए .अन्ना भी कह 
चुके हैं ,निर्णय कर चुके हैं की वे पागल खाने में जायेंगे ,अन्ना का पागल खाना पूरा भारत वर्ष है और 
वे इस पागलखाने को  स्वदेश प्रेम ,सदाचरण , स्वच्छ तंत्र और सद्भाव की दवा देंगे ताकि भारत वासी 
देशप्रेम के पागलपन में बेसुध हो जाए .अन्ना के पागलपन को प्रणाम .        
      

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2011

रावण का अस्तित्व

रावण का अस्तित्व  

रावण 
हम वर्षो से 
फूंकते आये हैं तेरा पुतला 
फिर भी तुम मिटते नहीं हो ?
रावण बोला -
तुम रावण को मिटाना कब चाहते हो ?
हर साल 
एक रावण को मिटाने 
दुसरे रावण का उपयोग करते हो 
एक भस्म होता है 
और 
दूसरा जिन्दा रहता है 
इसी तरह 
मेरा अस्तित्व 
हर युग में 
अमर रहता है 



रावण का प्रश्न  ?

सपने में
लंकेश्वर बोले -
सालों से  पुतला दहन ?
कब बंद करोगे ?
मैं बोला -
अपनी करनी का फल 
भोगना ही पड़ता है .
अपने  कुकर्म का फल
पाना ही पड़ता है .
रावण बोला -
मगर 
मेने तो सिर्फ हरण किया था .
इस अपराध की
कितनी बार सजा ?
जबकि 
राम के देश में 
बलात्कारी पाता है 
सिर्फ सात साल की सजा . 
और,
अबला के साथ
यह जघन्य अपराध ?
मेने कब किया ?
फिर भी ,
 पुतला क्यों जलता है ,
 मेरा ही हर बार ?


गरीब की संवेदनशीलता

गरीब की संवेदनशीलता    

कभी कभी ऐसे सुन्दर सत्य से जिन्दगी रूबरू हो जाती है कि आँखे नम हो जाती है ,ह्रदय संवेदना से भर
जाताहै .लगता है मेरे देश का अभाव ग्रस्त वर्ग कितना संवेदन शील है.उस वर्ग की अपरिग्रहता से माथा श्रद्धा
से झुक जाता है .क्या हमारे देश के राजशाही में जिन्दगी गुजारते नेता ऐसे  अभावग्रस्त का अनुकरण कर
सकेंगे या हम जैसे लोग जो अपने को शिक्षित मानते हैं वो भी दिखा  सकेंगे ऐसी संवेदना. 

बात मकर सक्रांति के पर्व की है .सूरत से एक सेवा दल वनवासी बंधुओ के साथ पर्व मनाने गया था .पुरे दल
 ने अपने सामर्थ्य के अनुसार अनाज ,दाले,पुराने तथा नए कपडे और ऊनी कम्बल ले लिए थे .कच्चे और
 बीहड़ रास्ते से गुजरता ये दल वनवासी इलाके में पहुँच गया था .जिस गाँव को इन्होने चिन्हित कर रखा था
उस गाँव का सरपंच उन्हें दौ किलोमीटर पहले ही उन सबका इन्तजार करता हुआ मिल गया था .आगे का
 रास्ता पैदल तय करना था क्योंकि रास्ता ऊबड़ खाबड़ था और उसके बाद  गाँव में पहुँचने का साधन नाव थी 
यह दल उस गाँव के सरपंच के गाइड में गाँव में पहुँच गया .उन्होंने गाँव के सभी लोगो को बुला लिया था और 
साथ में लायी गयी सामग्री के पेकेट बांटने का काम शुरू कर दिया था .पुरे गाँव में तीस के लगभग घर थे .
खाने के सामान के पेकेट तो सभी को मिल गए थे .अब बारी थी कपड़ो के वितरण की .पुराने कपडे भी वे 
प्रसन्नता के साथ ले रहे थे .औरतों में साड़िया बांटी  गयी .अब कम्बल बच गये  थे . कम्बल कम संख्या में
 थे इसलिए उस दल ने सरपंच से कहा कि कम्बल की संख्या कम है और लोग ज्यादा हैं इसलिए आप इन्हें
 समझा दे कि कम्बल के लिए एक एक घर से एक एक सदस्य आये और कम्बल ले जाये.सरपंच ने सभी 
लोगो से निवेदन किया कि कम्बल एक घर में एक के हिसाब से वितरित होगा इसलिए हर घर से एक एक 
सदस्य ही आये और कम्बल ले जाये .

सभी कम्बल वितरित किये जाने के बाद दौ कम्बल कम पड़ गए थे उसमे जिसे कम्बल नहीं मिला था वे 
दोनों बुजुर्ग लोग थे .अब क्या किया जाये ? पास में कोई ७० किलोमीटर तक शहर भी नहीं था कि खरीद कर
 दे दिया जाता .सभी विचार मग्न थे तभी एक युवती दौड़ती हुयी आयी उसके हाथ में दौ कम्बल थे .उसने 
आकर बताया कि वह और उसकी सास दोनों ही पंक्ति में खड़ी थी और अनजाने में हम दोनों ने ही एक 
एक कम्बल ले लिए थे जबकि सरपंच जी ने एक घर से एक कम्बल मिलने कि बात कही थी .आप ये एक 
कम्बल वापिस ले लीजिये .

उस युवती कि बात सुन पूरा दल हक्का बक्का रह गया था .इतने अभावो में जीने वाले लोग भी इतने न्याय 
प्रिय!इमानदार! वह युवती ख़ुशी ख़ुशी एक कम्बल वापिस देकर चली गयी थी .

अब यह सेवा दल भारी  कसमकस में पड़ गया .उनके पास कम्बल एक ही था और दौ सदस्य बाकि बच गए थे 
सेवा दल ने आपस में विचार कर उनमे से जो ज्यादा बुजुर्ग था उसको वह कम्बल दे दी .उस बुजुर्ग ने
 वह कम्बल लेने से मना कर दिया और बोला -"बाबूजी ये कम्बल इसे दीजिये क्योंकि मेरे घर पर तो खाने के 
पेकेट के साथ साड़ी भी मिल गयी है परन्तु इसको सिर्फ खाने का पेकेट ही मिला है .इसके घर कोई औरत नहीं 
है ये अकेला ही घर में रहता है .सर्दी में इसको काम लगेगा ."

यह सुनकर तो सब सेवा दल वाले आश्चर्य में रह गए .कहाँ हम शहरी पढ़े लिखे और खुद को सभ्य मानने वाले 
 संवेदना से दूर होते स्वार्थी लोग और कहाँ ये वनवासी जो अनपढ़ ,मैले कुचेले मगर संवेदनशील और सच्चे 
अपरिग्रही हैं .

अभावों में भी स्वच्छ आचार विचार के साथ जीने वाले वनवासियों को नमन                            

मंगलवार, 4 अक्तूबर 2011

जब बच्चा रो पड़ा

जब बच्चा रो पड़ा 

वनवासी बंधुओ की सहायतार्थ एक दल गुजरात और महाराष्ट्र में काम कर रहा है .उस दल का एक सदस्य
 मेरा मित्र है .उसके द्वारा वनवासी बंधुओ की माली हालत को सुनने का मेरे को मौका मिलता रहा है .गेंहू ,
चावल ,बाजरा मक्का,ज्वार आदि पदार्थ तो उन्हें यदा कदा ही खाने को मिलते हैं वो लोग अपना पेट
जंगली बीजो की रोटियाँ बना कर भरता है .शिक्षा का हाल तो बहुत बेहाल है पांच से सात किलोमीटर पर
 निम्न दर्जे के स्कुल टूटी फूटी खस्ता हाल कमरों में चलते हैं .यातायात के साधन का नामोनिशान  तक
 नहीं है .ऐसे सुदूर इलाको में पहुँच कर यह दल अपनी सेवा देता आया है .तिन सांधे तो तेरह टूटे वाला
हाल है .वनवासी बेकार ,अशिक्षित हैं लेकिन शराब पीते हैं

ऐसा ही एक वाकया जो विडम्बना ही कहा जा सकता है वो आपके साथ बांटना चाहूँगा -

        एक बार ये दल विद्या दान के लिए वनवासी स्कुल में पहुंचा .वह स्कुल एक मास्टर के भरोसे चल
रहा था .बच्चो के लिए एक कमरा था जो जर्जर हालत में था .बच्चो की संख्या बहुत कम थी क्योंकि
 ज्यादातर बच्चे स्कुल जाते ही नहीं हैं और जो बच्चे आते हैं वो भी काफी पैदल चल कर .उस दल ने
स्कुल के बच्चो को चिन्हित किया और एक बच्चा सात किलोमीटर पैदल चल कर आता था उसे आने
जाने के लिए साइकिल दिला दी .
बच्चा साइकिल देखकर भाव विभोर हो गया था उसने पुरे दल के प्रति कृतज्ञता प्रगट की और यत्न पूर्वक
पढने का वचन दिया .
सेवा दल ने स्कुल के मास्टर को अपना फोन नंबर दिया और आगे की जरूरतों के लिए किताबों -नोटबुक
 आदि लेखन सामग्री बांटने का फैसला किया .उस बच्चे को भी उन्होंने अपना फोन नंबर दिया और
प्रोत्साहन के लिए उसकी आगे की जरुरत में भी सहायता करने का वचन दिया .
सेवा दल वापिस अपने गंतव्य स्थान पर लौट आया .तीन -चार दिन बाद सेवा दल के पास उस लड़के का
फोन आया .वह बच्चा फोन पर रोने लग गया था .जब उससे उसके रोने का कारण पूछा तो उसने बताया -
वह साइकिल लेकर ख़ुशी ख़ुशी अपने घर गया और अपनी माँ-बापू को साइकिल मिलने की बात बतायी .
उस दिन तो उसके बापू खुश हुए और बच्चे के सुन्दर भविष्य के सपने भी संझोये लेकिन दौ दिन बाद ही
शराब की तलब के चलते उसने वो साइकिल बेच दी और उन पेसो की शराब पी गया .

यह सुन मैं  सन्न रह गया .कैसे सुधार होगा मेरे देश के वनवासियों का ?कौन करेगा इस अंधकार को दूर ?कैसे होगा उनका विकास ?      

सोमवार, 3 अक्तूबर 2011

(मनरेगा) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना :सफेद हाथी

(मनरेगा) महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना :सफेद हाथी 
राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यूपीए सरकार का सबसे महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम है। यह योजना फरवरी 2006 में शुरू हुई। लगभग शुरू से ही इसकी गड़बडियां सामने आने लगीं।तीन साल बाद इस योजना के साथ महात्मा गांधी का नाम तो जोड़ दिया गया, पर अनियमितताओं का सिलसिला चलता रहा है।
कुछ यक्ष प्रश्न जो वर्तमान में उत्तर मांग रहे हैं हर भारतीय से .
  इस योजना ने  देश को क्या दिया है ?
इस योजना का परिणाम क्या मिला है ?
इस योजना के भारी भरकम खर्च से ग्रामीण लोगो का विकास क्या  वास्तव में हुआ है ?

क्यों नहीं हर साल के बजट में आवंटित इस मोटे बजट से सरकार ग्रामीण इलाको में निजी क्षेत्र के साथ मिलकर उद्योग धंधे विकसित कर देती है इससे देश का सकल घरेलु उत्पादन भी बढ़ जाता और हर ग्रामीण को काम मिल जाता और सही मायने में कर के रूप में प्राप्त राजस्व का सही उपयोग हो जाता ?

वर्तमान रूप में इस योजना को ढ़ोते रहना क्या सही है ?

आप ही बताये मनरेगा का विकल्प क्या हो या इसका सही स्वरूप क्या हो ?  

रविवार, 2 अक्तूबर 2011

गांधी विचार का हश्र

गांधी विचार का हश्र 

गांधी विचार और जीवन मूल्यों को दरकिनार कर हमारे नेता जिस तरह के भारत का निर्माण कर रहे हैं 
उस निर्माण का कुप्रभाव पुरे देश में साफ झलकता है .देखिये कुछ बानगीयाँ-

१. गांधी ने अहिंसा का पाठ सिखाया हमने  उसको इस तरह से कंठस्थ किया कि आतंकियों ,हत्यारों और 
गुनाहगारो को भी फांसी कि जगह सम्मान सहित रिहा करने कि कोशिश दम ख़म से कर रहे हैं .संसद के 
मंदिर को ध्वस्त करने वाले हो चाहे प्रधानमन्त्री के हत्यारे सब गुनाहगारो पर रहमदिली दिखा रहे हैं .

२.गांधी ने स्वतंत्रता प्राप्ति के लक्ष्य के लिए देशप्रेमियो का संगठन खडा किया और लक्ष्य प्राप्ति के बाद 
  उस संगठन को समाप्त करने को कहा हमने उस संगठन के पवित्र नाम को सत्ता प्राप्ति का साधन बना
 लिया.

३.गांधी ने अपरिग्रह को अपनाया हमने इस सिद्धांत को गरीबी में जी रहे करोडो भारतीयों से अमल 
करने को मजबूर कर दिया और हम  खुद हर मीटिंग से पहले कपडे और जूते बदलने लग गये.हमारा 
यह आडम्बर जनता के धन पर फलने फूलने लगा .

४.गांधी ने छुआछुत को मिटाने का सपना संझोया और हमने आरक्षण के बहाने करोडो भारतीयों को 
  अनुसूचित जाती,अनुसूचित जन जाती और अल्पसंख्यक कहकर अपने से अलग कर दिया .

५.गांधी ने शांति का मन्त्र दिया और हमने देश कि सीमाओं का अतिक्रमण करने वाले देशो के साथ 
  इस मन्त्र  का कुप्रयोग करना शुरू कर दिया .

६.गांधी ने क्षमा को वीरता का भूषण माना और हमने देश के गद्दारों को निजी पुत्र -पुत्रियों कि जान 
बचाने के लिए कायरता के साथ क्षमा कर दिया .

७.गांधी ने करोडो भारतीयों को भूख से बेहाल देख कर उपवास का व्रत लिया और हमने सत्ता प्राप्ति 
   का जरिया बना लिया .

८.गांधी ने लाठी को अहिंसा के पर्याय के रूप में अपने साथ रखा और दोनों के सदुपयोग से फिरंगियों 
   को भगाया और हमने लाठी को समय समय पर देशद्रोहियों कि जगह देशवासियों पर बरसाया .

९.गांधी ने ग्राम स्वराज्य का सपना बुना और हमने गावों को अमीरों से सेज के नाम पर लुटवाया,
   जमीन अधिग्रहण के नाम पर हथियाया .

१०.गांधी ने लघु और ग्रामो उद्योग का सपना बुना और हमने देश को बड़े उद्योगपतियों के हवाले कर 
   दिया और देश के नवरत्नों को निजी हाथों में बेचा तथा ग्रामीण प्रजा के हाथ के दीपक को बुझाया .

११.गांधी ने उच्च विचारों से पाप को बढ़ने से रोका और हमने राजघाट को ही अपने पापो को ढकने 
का स्थल बना लिया .

१२.गांधी ने सादे जीवन को अपनाया और हमने उस सादगी को तिहाड़ भिजवाया .

१३.गांधी ने शाब्दिक हिंसा को मधुर वाणी से रोका और हमने कटु शब्दों का आचरण करके अपने 
    घमंड को पोसा .मर्यादाहीन बनकर सुर्खिया बटोरी .

१४.गांधी ने भ्रष्ट आचरण से परहेज किया हमने आचरण से परहेज किया भ्रष्ट को गले लगाया .

१५.गांधी ने नमक आन्दोलन से कानून को सविनय अंगुठा दिखाया और हमने ऐसे जन आन्दोलन 
   को रातोरात बर्बरता से तोडा और अंगूठा दिखाने वालों को घेरा .

१६.गांधी ने हर भारतीय के लिए शिक्षा का विचार रखा और हमने शिक्षा को आम भारतीय की पहुँच 
    से दूर किया और निजी हाथों में बेचा .

१६.गांधी ने रामराज्य को सार्वभोमिक बनाया हमने राम को ही कटघरे में खड़ा कर दिया और उसके 
आदर्श को,उसके अस्तित्व को साम्प्रदायिक ठहरा दिया .

१७.गांधी ने खुद को सत्ता और माया से दूर रखा और हमने गांधी के नाम को सत्ता के लिए भुनाया .

१८. गांधी ने ईस्ट इण्डिया को भारत से बाहर का रास्ता दिखाया और स्व निर्माण को आगे बढ़ाया 
   और हमने भारतीयों को(पेप्सी कोला) विदेशी लुटेरी कंपनियों के हाथो  से लुटवाया.

१९. गांधी ने विदेशी कपड़ो से होली मनाई और हमने विदेशी कपड़ो से दिवाली सजाई .

२०.गांधी ने हर धर्म को सम्मान दिया और हमने वोट के नजरिये से धर्म को आंका और उस पेड़ के 
तने पर वार किया जिस पर सभी पंथ फलते फूलते हैं .

२१.गांधी को हमने नोट पर सझाया ,चौराहों पर बिठाया मगर गांधी विचार को सालो से तडफाया.

    .......बापू तुझको करता है भारतीय नमन ,तेरे विचारों का करते रहे हम ............!  
             

शनिवार, 1 अक्तूबर 2011

थोडा सा पुण्य

 थोडा सा पुण्य  

सा'ब जी ! सा'ब जी !!हमने जोर से आवाज निकाली .उन्होंने पहले दायें बांये झाँका फिर हमारी सीध में देखा 
वो कुछ समझे तब तक हम उन्हें दंडवत प्रणाम कर चुके थे .हमारे साथी दगडू जी भी हमारी देखादेखी श्री 
चरणों में लोटपोट हो चुके थे .वो बेचारे अचानक आई मुसीबत से छुटकारा पाने की कोशिश में बौखलाते हुए 
पीछे की तरफ खिसके और बोले -जी,मेने आपको पहचाना नहीं ,आप .........

वो आगे कुछ बोल पाते उससे पहले हम बोल पड़े -सा'ब जी ,मैं आपकी बहन के नंदोई के साला का साला का साला .

वो बेचारे खींसे निपोरते हुये बोले -अरे आप ,भले पधारे ,मिलकर बहुत ख़ुशी हुयी श्रीमान .......

उनकी बात को पूरी करते हुये हम तुरंत बोल उठे -आपने सही पहचाना ,आपकी स्मरण शक्ति की दाद देनी 
होगी कि अभी तक आपको हमारा नाम तक याद है ,मैं जब से मेरे साथी दगडू को साथ लेकर घर से निकला
 था तब से दगडू को बोलता आ रहा हूँ कि मेरे सा'ब कि इस नाचीज झगडू पर रहम नजर है .

वो हें हें करके बोले -श्रीमान झगडू, मैं आपको कब भुला पाया हूँ जब हम आपसे पहली बार मिले थे तब ........

उनको कुछ याद करते देख हम तुरंत बोल पड़े -......जब आप नेताजी की गाडी रगड़ रगड़ कर चमकाया करते 
थे .कितनी लगन थी आप में ,कितनी तन्मयता थी काम में आपके ,आप कभी भी गाडी में बैठकर यात्रा करने 
की इच्छा तक नहीं रखते थे .

हमारी बात सुनकर वे खुश हो गए और बोले -झगडू ,आज भी मैं भले ही प्रधान बन गया हूँ मगर सा'ब की
गाडी मैं ही सुबह सवेरे चमकाता हूँ .सा'ब की पत्नी जी के चरणों में लोटपोट होकर दिन की शरुआत करता
 हूँ .भक्ति से क्या नहीं मिलता ,नाम स्मरण से सब काम बन जाते हैं .तू बता मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूँ ?

साधू -साधू ,धन्य है आप ,मैं रास्ते मैं दगडू सेठ को आपकी परोपकारी स्वभाव के बारे में बताता आ रहा था .
आप स्वनाम धन्य हैं सा' ब !आप कृपा करके दगडू सेठ की भेंट स्वीकार कर इन्हें भी कृतार्थ कीजिये .

प्रधान बोले -इसकी जरुरत नहीं है झगडू ,दोस्ती में आपसे कुछ नहीं लूंगा .बस आप काम बताईये ?

मैं बोला ,सा'ब जी ,आप भेंट स्वीकार कीजिये ,जबतक आप इस थेले पर नरम कोमल हाथों से स्पर्श नहीं
 कर लेते तब तक हमारे से कुछ कहते नहीं बन पा रहा हैं .हम खुद को कृत्घन समझ रहे हैं .

उन्होंने सुकोमल हाथों से भेंट स्वीकार की तब हम बोले -साब ,इस दगडू के माथे पर हाथ रख दीजिये ,
आपका सौभाग्यशाली हाथ दगडू के सर पर रहेगा तो गाँव की गौचर जमीन का पट्टा बन जाएगा ........
दगडू के बच्चे भी आपका स्मरण करेगे .और मेरा तो कोई खास काम नहीं है ,बच्चा डिग्री में फेल हो गया
 है सो उसे नया पास का सर्टिफिकेट दिलवा दीजिये और कोई जिले का मुखिया .......

अरे झगडू ,दगडू ! मुझे शर्मिंदा ना कर भाई ,समझ तेरा काम करके मेरी आत्मा को असीम सुख मिलेगा 
बस एक काम कर करना ,एक चिट पर पूरा पता लिख दे और जब बड़े साब बुलाये तब .........

उनकी बात का सार समझ कर हम बोले -सा'ब जी !आपकी नाक थोड़े ही कटायेंगे ,साब की पार्टी के लिए 
बड़ी रसीद लिखवा कर थोडा पुन्य तो हम कमाएंगे .

प्रधान को पुन: प्रणाम कर हम भी खुद को धन्यभाग समझते घर की ओर लौट चले थे .