शुक्रवार, 28 अक्तूबर 2011

नरेगा या मनरेगा से देश ने क्या खोया ?



नरेगा या मनरेगा से देश ने क्या खोया ?

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जब से शुरू हुयी है तब से जनता के कर के रूप में दिए 
गए धन की खुली लूट हुयी है .कांग्रेस सरकार का यह कानून देश के पैसे की भयंकर बर्बादी कर रहा है फिर 

भी सरकार इस तिलिस्म को चालू रख रही है.क्यों ? इस देश ने मनरेगा से क्या खोया है ?

१.  २०११-२०१२ के बजट में ४०००० करोड़ रूपये इस योजना के लिए मंजूर किये गये .यह इतनी बड़ी रकम है 
     जिसे देश के २०००० गाँवों पर खर्च किया जाता तो हर गाँव में उच्च शिक्षा के लिए  आधुनिक सुविधाओ
     से युक्त भवन और अस्पताल बन सकते थे क्योंकि देश के हर गाँव पर २ करोड़ रूपये खर्च किये जाते .

२. ये रकम अकुशल काम जैसे मेड बनाना ,गड्ढे खोदना ,तालाबों की खुदाई आदि पर खर्च किये जा रहे हैं.
    क्या देश को वास्तव में इसकी जरुरत है ?कच्ची सड़क बनाना या तालाबो की गहराई बढ़ाना आदि 
   कामो पर खर्च से गाँव को क्या मिला ? सभी गाँवों में पहले से ही तालाब थे ,उन्ही तालाबो को गहरा 
  करते रहना किस तरह का अर्थशास्त्र हो सकता है .गाँवों में अकुशल मजदुर वास्तव में हैं लेकिन वो 
  अकुशल क्यों रह गये और उसके लिए कौनसी योजना चाहिए इस पर विचार किये बिना मनरेगा ले 
  आये .गाँव इसलिए पिछड़ रहे हैं क्योंकि वहां पर उच्च शिक्षा की और उच्च स्वास्थ्य सेवाओं का घोर 
  अभाव है .यदि यह पैसा स्वावलंबी शिक्षा योजना और अस्पतालों पर खर्च होता तो अकुशल श्रमिक 
 की समस्या कुछ वर्षों में ख़त्म हो जाती लेकिन यदि योजना वोट आधारित बनने लगे तो फिर अरबों 
रूपये स्वाहा ही होंगे .

३. मनरेगा आने से पहले ग्राम पंचायतों के चुनावों में हजारो रूपये ही खर्च होते थे मगर मनरेगा के बाद 
   ग्राम पंचायतों के चुनावों में १०-१० लाख रुपयों तक खर्च होते हैं ! सरपंच के उम्मीदवार खुल कर पैसा 
खर्च कर रहे हैं क्योंकि उनको मालूम है मनरेगा से ही खर्च की गयी राशी से अधिक लक्ष्मी उसके घर में 
बरसेगी .

४. गाँवों में बसने वाला युवा जो रोजी रोटी के लिए उद्योग -धंधो में काम करता था ,वह युवा अब अकुशल             श्रमिक बन गाँवों में ही रुक गया है.जिस देश का युवा कभी उद्योगों में सेवा करके अकुशल से कुशल 
कारीगर बनता था ,अब हालत यह है की वो जीवन भर अकुशल ही बना रहना चाहता है क्योंकि उसे 
१००/- कम काम करके या ताश पत्ती खेल कर (मनरेगा में ३ घंटे काम करना है बाकी समय में छाया 
-दार पेड़ के नीचे ताश खेलना है ) मिलने ही वाले हैं फिरउद्योगों में मेहनत वाले काम क्यों करे ?

५. मनरेगा के बाद सरकार महंगाई पर काबू ही नहीं कर  पायी है क्योंकि लाखो लोगों को सरकार ने 
    ऐसे काम में लगा दिया जो लगभग निरर्थक हैं या अतिअल्प फायदे वाले हैं .इसका सीधा प्रभाव 
   उद्योग-धंधो पर पड़ा .श्रमिको की कमी के कारण और नए श्रमिक आसानी से नहीं मिल पाने के कारण 
  ऊँचे वेतन का लालच देकर श्रमिक रखने पड़े जिससे वस्तु का  लागत मूल्य हमेशा के लिए बढ़ा,
 फलस्वरूप महंगाई कम होने का नाम ही नहीं ले रही है .

६. मनरेगा के कारण श्रमिको की किल्लत के चलते पॉवर लूम्स उद्योग -हीरा उद्योग की तो कमर ही टूट 
    गयी. अकेले सूरत में हर वर्ष ७५०००-१००००० पॉवर लूम्स भंगार में बिक रहे हैं .कारण की श्रमिक 
   आसानी से उपलब्ध नहीं हो रहा है .पुरे देश में हर उद्योग को महंगे श्रमिक उठाने पड़ रहे हैं .यदि इसी 
   रफ्तार से लघु उद्योग चोपट होते रहे तो महंगाई बढ़ेगी तथा देश की उत्पादन क्षमता भी कम हो जायेगी .

७. मनरेगा में बड़ी मात्रा में गपले-घोटाले हो रहे हैं .क्योंकि मजदूरो के काम की मात्रा को मापने का 
    कोई पैमाना नहीं है .एक ही गड्ढे का दोबारा निरिक्षण हो जाता है ,गाँव की पुरानी कच्ची सड़क को 
   मनरेगा के तहत दिखाकर पैसा लुट लिया जाता है.मजदुर भी जानता है की मेरे से जो काम लिया 
   जा रहा है उसका मतलब कुछ भी नहीं है. वह तो सौ का नोट लेने जाता है .सरपंच भी जानता है की 
  सरकार ऐसे कामो की मात्रा कभी निर्धारित नहीं कर पाएगी इसलिए वह भी माल बनाने में लग 
 जाता है .

८. मनरेगा का दुष्प्रभाव यह भी है की जो ग्रामीण मेहनती थे वे कामचोर स्वभाव के बनते जा रहे हैं 
   मजदुर अपने ऊपर वाले अधिकारियों को भरपेट पैसा लूटते देख खुद भी काम नहीं करता है या 
कम दिन काम करके या कम समय तक काम करके पूरा पैसा वसूल कर चुप रहता है .यदि लम्बे 
समय तक ऐसा चलता रहेगा तो कामचोरी और नैतिक मूल्यों का ह्रास होता रहेगा जो चोरो की बड़ी 
फौज कड़ी कर देगा .

९. मनरेगा का वर्तमान स्वरूप खतरनाक है जो देश के पैसे का दुरूपयोग है .इससे अच्छा होता सरकार 
   ग्रामीण किसान को मुफ्त में ऊँचे दर्जे का बीज और खाद  दे देती .गाँवों में लघु उद्योग लगाने के लिए 
  बिना ब्याज के गरीबो को ऋण उपलब्ध करा देती . गरीब ग्रामीण किसानो को चोबीस घंटे कम दर पर 
   खेतों के लिए बिजली उपलब्ध करा देती ,मगर ऐसा करना किसे है ? जनता का धन है ,उडाना है और 
   सत्ता की वापसी को पक्का करना है .

मनरेगा को बंद कर दिया जाना देश हित में नहीं है ???                   
                   
    



कोई टिप्पणी नहीं: