मंगलवार, 25 अक्तूबर 2011

दीपज्योती नमोस्तुते

दीपज्योती नमोस्तुते 

जीवन -
क्षण भंगुर है ,
नश्वर है,
अल्प है,
मगर-
दीये की तरह 
सार्थक जीयें तो ,
अमृत है,
ज्योतिपुंज है.

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दीप -
तुम खुद के अस्तित्व को 
तिल -तिल जला 
जग को रोशन करते हो ;
मगर-
प्रतिफल में क्या पाते हो ?
दीप ने कहा-
अँधेरे की दया तले
जीना अर्थहिन है ,
बेमकसद है.
अँधेरे से जंग,
अर्थहिन जीने से बेहतर है . 

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नन्हें दीप -
तमस से टकराना, 
तेरे बूते से बाहर है .
दीप ने कहा -
अँधेरे की गहनता से डरना,
मेरी फितरत नहीं है .
तमस से जंग खेलने में , 
ताकत की नहीं,
 जज्बे की जरुरत है . 
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भ्रष्ट नेता ने 
दीप से पूछा- 
तुम भी काला खाते हो, 
काला उगलते हो .
मैं भी काला खाता हूँ, 
काला उगलता हूँ .
फिर भी तुम पूजे जाते हो, 
और 
मैं जूते खाता हूँ .
दीप ने कहा -
मैं जनहित में ऐसा करता हूँ 
तुम जन अहित में करते हो .
इसीलिए तुम जग में जूते खाते हो .  

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