बुधवार, 30 नवंबर 2011

एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए ............

एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए ............ 


एक बड़ी समस्या से निपटने का कारगार उपाय यही है की दौ नयी समस्याओं को खड़ा कर दो .
लोग बड़ी समस्या को भूल जायेंगे और नयी समस्याओं पर माथाकुट करते रहेंगे .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए उसमे द्विअर्थी शब्द जोड़ दीजिये ताकि उसकी व्याख्या 
अपने मन मुताबिक की जा सके.


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए पुराने और नए दुश्मनों को जी भर के बेमतलब गालियाँ 
दीजिये , अंगुली उठाईये ,लोग आपको छोड़कर उन्हें पकड़ लेंगे.


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए मसालेदार सेक्स स्केंडल की खबर को आगे कर दीजिये 
लोग चटकारे लेंगे और आपकी जान छुट जायेगी .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए चुप हो जाईये ,लोग बकझक करके रह जायेंगे ,समस्या 
अपने आप पुरानी हो जायेगी .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए जनहित की नयी योजना की घोषणा कर दीजिये ,घाव 
पर मरहम लग जाएगा .


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए बहुत सारे लोगो से एक साथ झूठ फेला दीजिये ,लोग भ्रम 
में पड़ जायेंगे और उनकी शक्ति कमजोर हो जायेगी . 


एक बड़ी समस्या से निपटने के लिए समस्या उठाने वाले की नींद हराम कर दीजिये ,झूठे 
मुकदमें में फंसा दीजिये ,समस्या स्वत:ठंडी पड़ जायेगी.


ये नयी व्याख्या मेने कहाँ से सीखी ?


मेरे देश के उन नेताओं के उपदेशो से जिनके कारण यह देश बेहाल और त्रस्त है .  

मंगलवार, 29 नवंबर 2011

FDI और भारतीय खुदरा का दंगल

FDI और भारतीय खुदरा का दंगल 


एक जंगल में दंगल का आयोजन किया जाना था .दंगल में शेर और चीता की कुस्ती थी .चीता को लगा
शेर के हाथों दंगल में मौत निश्चित है .उसे चिंतित देख
सियार ने कहा-चीता भाई ,उदास क्यों हो ?

चीता बोला-इस दंगल में मुझे शेर से कुस्ती करनी है और मेरी मौत मुझे निश्चित लगती है .

सियार बोला -तुम्हे मैं बचा सकता हूँ ?

चीता बोला - कैसे?

सियार बोला- कुस्ती शेर से नहीं बिलाव से लडवा कर. तुम और बिलाव एक ही जाती के हो .मैं जंगल में जाकर सबको समझाऊंगा और दंगल के नियम में फेरबदल करवा दूंगा .
image by google 

सियार ने जंगल के पशुओं को समझाया और शेर की जगह एक सी खाल के दिखने वाले बिलाव के साथ
उसकी कुस्ती तय कर दी .नतीजा क्या आना था आप को भी मालुम है .यही है FDI और भारतीय खुदरा
की टक्कर का नतीजा .      












सोमवार, 28 नवंबर 2011

FDI का विरोध- वोट की ताकत से ताज और तख़्त बदल दीजिये - Jagran junction forum

FDI का विरोध-  वोट की ताकत से ताज और तख़्त बदल दीजिये  - Jagran junction forum

सरकार हम चुनते हैं और हमारे हित के फैसले लेने के लिए चुनते है ,यह लोकतंत्र की मूल भावना है .
केंद्र सरकार की  उदारवादी पॉलिसी गरीबों के हित में नहीं है .आजादी के ६४ वर्षों के बाद भी हमारी
समस्याए ज्यों की त्यों हैं ,गरीब और गरीब होता जा रहा है देश की विकास की तस्वीर ५% लोगो की
मुट्ठी में है .क्या अब भी हम धर्म ,जाती अगड़ा-पिछड़ा के नाम पर नेताओं की चाल में थिरकते रहेंगे ?
पहले अंग्रेजों ने लड़ाया अब आरक्षण ,अगड़ा- पिछड़ा ,अल्पसंख्यक ,बहुसंख्यक के नाम पर भिड़ाया
जा रहा है क्या हम आपस में लड़कर अपने भविष्य को बर्बाद कर लेंगे?

आज केंद्र में बैठे लोग जो फैसले हमारे अहित में ले रहे हैं और हम बेबस हैं ,हमारे हाथ से पांच साल का
तीर लग चुका है लेकिन निराशा की बात फिर भी नहीं है .हमारे मौलिक अधिकार हमें अभिव्यक्ति की ,
विरोध प्रदर्शन करने की स्वतंत्रता देते हैं .सरकार यदि काले कानून लाती है तो उनका पुरजोर विरोध
हमारा प्रमुख हथियार है ,हमें जागरूक नागरीक बनने की जरुरत है.अपने आप को निडर बनाईये ,
संगठित हो जाईये ,भूल जाईये आपसी मनभेद को ,आपसी मतभेद को .

देश के खुदरा व्यापार को सरकार विदेशी हाथों में सौपने जा रही है ,यह हमारा हर तरह से सर्वनाश
 करने वाली बात है .सरकार का पक्ष बेतुका है ,वह इसमें किसानो का भला दिखाती है .अपना माल बेचने
 के लिए आज किसान के पास जितने विकल्प हैं वह FDI आने से कम  हो जायेंगे? आज किसान को जो
ज्यादा भाव देता है उसे ही माल बेच रहे हैं ,थोक व्यापारी की प्रतिस्पर्धा से किसान फायदे में ही है लेकिन
जब उसे अपनी फसल गिने चुने लोगो को बेचना पडेगा तब FDI का एकाधिकार उसे कंगाल नहीं बना देगा ?

किसानो की फसल खेत में ही नष्ट हो जा रही है,क्यों? कौन जबाबदार है ?उसकी फसल को सुरक्षित रखने
 के उपाय किसे करने थे ?उनकी उपज का सही भाव कौन तय करता है ?क्यों गन्ना किसान अपनी खड़ी
फसल को आग लगा देता है ?क्यों आन्दोलन कर रहे हैं कपास की फसल उपजाने वाले किसान ?हमारी
गलत नीतियों के कारण ऐसा हो रहा है ,क्यों मनमाने ढंग से कपास के निर्यात पर रोक लगाई पिछले वर्ष
जब किसान को अच्छे भाव मिल रहे थे ?किसान को गलत राजनीति का शिकार किसने बनाया ?

हमारे पास मिटटी की उर्वरा ,पहचान ,उत्तम खाद और उत्तम बीज का इन्फ्रा स्ट्रक्चर क्यों विकसित नहीं
हुआ ? क्यों नहीं हमने कोल्ड स्टेरोज विकसित किये ?हमने मनरेगा के लिए फंड बनाया, क्या काम आया
खुली लूट हुयी जनता के धन की .अगर यही पैसा भूमि सुधार ,कोल्ड स्टोरेज ,आधुनिक कृषि सयंत्र ,खेती
के लिए पानी और न्यूनतम दरों पर बिजली पर खर्च कर दिया जाता तो देश के किसान का जीवन स्तर
सुधर जाता ,मगर हमने ऐसा नहीं किया और अब उसी किसान को खून चूसने वाले परजीवियों के भरोसे
छोड़ देना चाहते हैं.आज उन्ही किसान के बच्चे मनरेगा के मजदुर बन गए हैं .

खुदरा व्यापार में करोडो भारतीय रोजी रोटी कमा रहे है करोडो परिवार पल रहे हैं .लाख दौ लाख से भी कम
पूंजी से वे लोग काम कर रहे हैं ,क्या उनकी आजीविका को छीन लेने वाले कानून बनाने के लिए चुना है
सरकार को ?यदि इस समय FDI को वापिस नहीं लौटाया तो आने वाले समय में खुदरा व्यापारी खत्म हो
जायेंगे .कैसे बाथ भिडायेगा एक- दौ लाख से व्यापार चलाने वाला अरबों रुपयों वाले FDI से ?मसल देंगे
विदेशी खुदरा व्यापारी उसे मच्छर की तरह.

सरकार से इस मुद्दे पर असहयोग कीजिये .शांतिपूर्ण अनवरत प्रदर्शन कीजिये ,आम आदमी तक अपनी
आवाज पहुंचाने के लिए दुकाने खुल्ली रखिये मगर बिक्री रोक दीजिये ,अपने पेंडिंग काम पुरे कीजिये ,जब
सप्लाई की चेन बंद हो जायेगी तो आपकी बात बहरे कानो तक पहुँच जायेगी ,एक दिन का बंद बेहरोंको
सुनाने के काफी  नहीं होगा ,अपनी लड़ाई को शांतिपूर्ण,लम्बी और धारदार बनाईये .

अगर फिर भी सरकार नहीं सुनती है तो कीजिये आने वाले चुनावों में अपने मत का प्रयोग और बदल
 दीजिये अहंकारी मतिहीन तख़्त और ताज को .यह आपकी ताकत है , पूरा उपयोग कीजिये .              

रविवार, 27 नवंबर 2011

शहीदों को नमन ........



    शहीदों को नमन ........


देश के सपूत  को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 

हम सभी सुख से यहाँ, तुम कितने दूर हो ? 
दिल में तेरी यादें हैं, होंठो पर तेरी बात है .
देश पर कुर्बान होकर, दी गर्व की सोगात है. 
जिन्दा है कसाब अब भी,बड़े शर्म की बात है.



देश के सपूत को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 


माँ भारती की गौद में, तुम चीर निद्रा ले रहे .
चर्चा हर चौपाल पर ,तेरी वीरता की बात है .
बच गया संसद भवन, दी फख्र की सौगात है .
जी रहा अफजल गुरु ,यह बड़े शर्म की बात है. 


देश के सपूत को,    हर लाल का  सलाम है. 
माँ भारती का गुलिस्ता तुझसे ही आबाद है. 



शुक्रवार, 25 नवंबर 2011

समझ से परे सफाई देना मल्टी ब्रांड रिटेल पर

समझ से परे सफाई देना मल्टी ब्रांड रिटेल पर  


वाणिज्य मंत्री मल्टी ब्रांड रिटेल पर सरकार का पक्ष रख रहे थे .बातें आम आदमी हजम भी नहीं कर पा
 रहा है.हम मल्टी ब्रांड रिटेल को भारत की जरुरत कैसे मान सकते हैं ?जिस देश में ८५%आबादी बुनियादी
सुविधाओं से वंचित है .लोगो के पास खुद का मकान तो दूर दौ समय का भोजन जुटाना भी मुश्किल हो रहा
है,बच्चो की शिक्षा की व्यवस्था नहीं है ,पीने का साफ मिट्ठा पानी उपलब्ध नहीं है ,युवा बेरोजगारी के
.खप्पर में है,और मंत्री महोदय इसे भारत की जरुरत बता रहे हैं .समझ से परे बात......

मंत्री महोदय कह रहे थे की मल्टी ब्रांड रिटेल कई संस्थाओं  और राज्यों की मांग है ,उन्होंने यह नहीं बताया
की वे राज्य या संस्थाए कौनसी हैं?भारत का कौनसा ऐसा राज्य है जिसमे बुनियादी समस्याए नहीं हैं ?
वे चीन से और विकसित देशो से भारत की तुलना करते नजर आये .क्या हम चीन और विकसित देशो के
बराबर हैं ?जिस देश का बच्चा जन्म लेते ही हजारो रुपयों का कर्ज लेकर जनम लेता है वहां मल्टी ब्रांड को
कैसे उचित ठहराया जा सकेगा ? तथ्य समझ से परे .........

वाणिज्य मंत्री इसमें किसानो का भला देखते हैं ,आप राष्ट्रीय भाषा में कहते तो शायद आम आदमी बात
 सुनता भी मगर आपने जो कहा उसे तो भारत की ५%जनता ही समझ सकी .उन्होंने माना की की हम
६४ वर्षों खाद्य में इन्फ्रा स्ट्रक्चर नहीं बना पाए जबकि बड़ा उत्पादन करते हैं तो क्या अब मल्टी ब्रांड रिटेल
आने से इन्फ्रा स्ट्रक्चर मजबूत हो जाएगा .बात गले नहीं उतरती ,समझ से परे .........   

इतिहास कुछ कहना चाहता है ...

इतिहास कुछ कहना चाहता है ...


जब नीतियाँ ही आम लोगो के खिलाफ बनेगी तो आम आदमी क्या करेगा ? सिंगल ब्रांड रिटेल 
और मल्टी ब्रांड रिटेल के लिए रास्ता खोलकर सरकार करोडो भारतीयों को बेरोजगारी के 
खप्पर में होम देना चाहती है .


  विदेशी आका अपने देश में ख़त्म हो चुकी मांग को हमारे से वसूल करना चाहते हैं ,और नीति
 तय करने वाले उनके लिए रास्ते बना रहे हैं ?क्या इसी  स्वराज्य के लिए सुभाष,भगत,आजाद 
कुर्बान हुए थे ? एक गांधी की आवाज पर हमारे बाप -दादाओ ने विदेशी सामान का बहिष्कार 
किया था ,होली जला दी थी विदेशी सामान की विदेशी सरकार के सामने .अब हमारी ही चुनी
 हुयी सरकार यदि देशवासियों के अहित में विदेशी लोगो को हर क्षेत्र में आमंत्रित करेगी तो हम चुपचाप सहन करते रहेंगे ?


हमें संगठित होकर लड़ना ही पडेगा ,विदेशी दुकानों को हम अपनी जमीं क्यों दे ? उनका धंधा 
चमकाने में हम कंगाल क्यों हो जाए ?क्यों ख़रीदे उन दुकानों से सामान ?हम भारतीयों को
उनका बहिष्कार करना होगा.यदि उनसे हम सामान खरीदेंगे ,उन्हें प्रोत्साहित करेंगे तभी तो
 वो यहाँ टिक पायेंगे .हम क्यों अपनी और आने वाली पीढ़ी की कब्र अपने ही हाथों से तैयार
 करेंगे ?


क्या हमारी में कुशलता की कमी है?क्या हमारे में बुध्धि की कमी है ?यदि नहीं तो फिर क्यों 
सहन करे ?


सरकार यदि जनहित में नहीं है तो कोई बात नहीं ,हमें कसम लेनी होगी की हम किसी भी 
विदेशी दूकान से सामान नहीं खरीदेंगे ?यह कसम विदेशी ताकतों की आँखे खोल देगी .हमारे 
नीति निर्माता भी हमारे असहयोग के आगे झुक जायेंगे .


याद कीजिये गांधी के सपने को -"देश में कुटीर उद्योग विकसित हो ? हर हाथ को काम मिले ?"
हमें  आने वाली पीढ़ियों की तगदीर मनरेगा के अकुशल श्रमिक के रूप में नहीं लिखनी है ,हमें 
अपने भविष्य को सुदृढ़ करना होगा ?हमें इस काबिल बनना होगा की विदेशी हमारा सामान 
ख़रीदे .विश्व के विकसित देश अपने देश में फैल रही मंदी से भयभीत हैं वे लोग अविकसित और विकाशशील देशों पर डोरे डाल रहे हैं ,अपना माल इन देशो में खपाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपना रहे हैं .माना कि हम गरीब हैं लेकिन हम कामचोर और आलसी तो नहीं हैं ?हम भले ही
 ज्यादा पढ़े -लिखे नहीं हैं मगर हम मूढ़ और बेवकूफ भी नहीं है.हम अपना भला बुरा जानते हैं .


यदि भारतीय जातिवाद,भेदभाव भूलकर संगठित होकर नहीं रहेंगे तो हम आर्थिक गुलामी की
 और बढ़ते जायेंगे ?हमें जागना होगा.आज संकट करोडो लोगो की रोजी रोटी का है ?आज भले 
ही हम कुछ सामान हम महंगा खरीद रहे होंगे लेकिन हमें याद रखना होगा की इससे किसी
 निर्धन भारतीय के घर का चुल्हा जलता है.विदेशी दुकाने हमें सस्ती चीजें उपलब्ध करा सकती
 है ,मगरवे सस्ती लायेंगें कहाँ से? हमारे से ही कच्चा माल सस्ता लेगी ,तब हम कहाँ जायेंगे ?
विदेशी दुकाने कोई सेवा करने नहीं आ रही है हमारे देश में ,वे लोग हमें ही चूस कर हमारा धन 
अपने देश में ले जाने आ रहे हैं ?


हमें जागरूक रहना होगा ,यह हर भारतीय का पावन कर्तव्य है की वह दुसरे हर भारतीय को
चेताये सजग करे ,आने वाले खतरे का अहसास कराये .यह काम हम हिन्दू,मुस्लिम,दलित 
बनकर नहीं कर सकेंगे ,हमें भारतीय बनना होगा ,मन से और कर्म से .


आर्थिक उदारीकरण की नीतियाँ सम्पूर्ण भारत के लिए बढ़िया नहीं है ,नहीं है. हमें ३२/-वाला
 धनीनहीं बनना है .हमें छोटे दुकानदारों के हित की रक्षा करनी पड़ेगी क्योंकि उन करोडो
 दुकानदारों के पीछे करोडो परिवार पल रहे हैं ,करोडो सपने सच हो रहे हैं ,कुसुमित हो रहे हैं.
क्या हम विदेशी दुकानों से खरीदी के लालच को नहीं रोककर उनको त्राहि-त्राहि करते देखना 
चाहते हैं ?


फैसला हमारे हाथ में है ?फैसला मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग के लोगो को करना है क्योंकि 
सबसे बड़ा बाजार इन्ही के हाथ में है.यदि ये वर्ग सही दिशा में सोचेगा तो विदेशी दुकाने शटर 
खुद ही बंद कर देगी ,और बिस्तर पोटले लेकर भारत को अलविदा कह देगी .


लेकिन हम ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि हम राष्ट्र हित को प्राथमिकता नहीं दे रहे हैं .शायद यही 
हमारी विडम्बना है ,जिसके कारण हम सदियों तक गुलाम रहे हैं .हम घर का जोगी जोगना 
बाहर गाँव का सिदध वाली कहावत चरितार्थ करते रहे हैं .


हमें अपनी सोच बदलनी पड़ेगी ,यह समय की मांग है .......  
             

गुरुवार, 24 नवंबर 2011

भारत भाग्य विडम्बना

भारत भाग्य विडम्बना    


हमारे देश को अर्थहीन नीतियाँ डस रही है .मनमानी नीतियाँ और विधेयक  आम जनता पर थोप दिए जा
 रहे हैं ,उनके कुपरिणाम ५%जनता को छोड़कर आम नागरिकों को भुगतने पड़ रहे हैं .आम आदमी त्रस्त 
और बेहाल है .भारत के नीति नियंता अहंकार और परिवारवाद में रचे पचे हैं .


कुछ बानगियाँ   


१.करोडो फुटकर व्यापारी जो जैसे तैसे १-२लाख रूपये का जुगाड़ बैठाकर अपने परिवार को दौ समय की 
  रोटी मुहैया कराते हैं अब उस क्षेत्र को भी विदेशी हाथो में सुरक्षित किया जा सकता है ,अब हमारे देश के 
  उत्पाद विदेशी लोग पहले लागत मूल्य पर या मोटी संख्या में सस्ते में खरीद कर हमें ऊँचे दामों में बेचेंगे.
  नतीजा यह आयेगा की धीरे धीरे करोडो दुकाने बंद हो जायेगी और करोडो घर दौ समय की रोटी के लिए 
 मारे मारे फिरेंगे या अकुशल श्रमिक बनकर मनरेगा में काम करते हो जायेंगे .इसमें देश का क्या फायदा 
 होगा?शायद ५%जनता को सुविधा होगी .अगर ऐसे ही विधेयक बनते रहे तो आम आदमी का क्या होगा ?
 क्या भारत के विकास की गाथा हम नहीं लिख कर विदेशी लिखेंगे .एक इस्ट इंडिया को हटाने में 
लाखों लोगो ने जान की कुर्बानी दी थी तो अब तो लाखों विदेशी कम्पनियां हमारा क्या हाल करेगी ? क्या 
हम नादानी भरे कदम उठाकर कुर्बानियां ही देते रहेंगे? 


२. अर्थ शास्त्र का सामान्य नियम है कि बड़ी मछली छोटी मछलियों को निगल जाती है .हमारे देश के प्रधान 
  तो खुद अर्थशास्त्री हैं .कैसा विकसित भारत चाहते हैं ? आम आदमी के समझ से परे है.भारत के प्राण आज 
  भी गाँवों में ही बसते हैं यदि उन प्राणों पर ही संकट आ जाएगा तो भारत कि तगदिर क्या होगी ?आज हर 
 चीज का केन्द्रीयकरण होता जा रहा है .देश का पैसा अमीरों के हाथों में जा रहा है .गरीब को ३२/- वाला धनी
 बनाया जा रहा है ,बढ़ता आर्थिक असन्तुलन भयावह भविष्य कि और खिंच रहा है ,गाँवों में उद्योग पनप ही 
नहीं रहे हैं क्योंकि वंहा बुनियादी सुविधाओं का खाका ही तैयार नहीं किया जा रहा है .मज़बूरी में गाँवों कि दौड़ 
  शहरों कि तरफ है और हमारे नेता हैं कि एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर कर्तव्य कि इति श्री कर लेते 
हैं.जनता बेचारी हर एक को आजमाकर थक चुकी है ,कही क्षितिज नजर नहीं आ रहा है.


३.हमारे देश में अरबों रूपये सालाना कमाने वाली कम्पनियों पर भी ३०% टेक्स है और उच्च मध्यम वर्ग के 
   लोगो पर भी कुछ सीमा कि राहत के बाद ३०% टेक्स है .क्या उच्च में वर्ग और अरबों रूपये सालाना कमाने 
  वाली कम्नियों का एक ही स्तर है ? लेकिन वसूली के लिए यही वर्ग है .सौ बड़े घराने लाखों करोड़ रूपये बैंकों 
 से कर्ज लेकर वापस नहीं कर रहे हैं या उन पर कोई दबाब नहीं है परन्तु एक किस्त समय पर नहीं भरने वाले 
 को डी फोल्टर लिस्ट का भय सताता है .२-३ किस्तों का समय पर भुगतान नहीं कर पाने वाला तो बेहाल हो 
 जाता है 


४.दवा पर छपी MRP को ही ले लीजिये .सरकार कहती है जीवन रक्षक दवा को टेक्स मुक्त किया जाएगा .मेरे 
ख्याल से दवा होती ही जीवन रक्षक है.सरकार हर दवा को टेक्स मुक्त करे और MRP का नियम तय करे .
आज दवा पर ४०से ५०% तक ज्यादा रेट लिखी रहती है ,क्यों ? दवा जैसे क्षेत्र पर कोई पाबंदी नहीं ,मनमर्जी 
का रेट छाप दे और मजबूर भारतीय ठगाता रहे .


५.पीने का बोतल बंद पानी १२ से २० रूपये लीटर में रिटेल में बिकता है ,हमारा ही पानी जमीन से खिंच कर 
हमें वापिस इतने महंगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है ,कारण सरकार पीने के पानी कि समुचित व्यवस्था करने 
 में विफल रही है ,बेचारा मजदुर जब रोजी रोटी के लिए बाहर यात्राएं करता है तो उसका धन पानी में खर्च हो 
जाता है ,लेकिन किसी को पड़ी नहीं है .


६.हमारे देश के पानी को ठंडा पेय वाली कम्पनियां बर्बाद कर रही है .जिस देश में सभी को पीने योग्य पानी 
नहीं मिल पा रहा है उस देश को ठंडा पेय बनाने वाली कम्पनियों कि कँहा आवश्यकता है ?मगर राजस्व के 
बहाने लाखों लीटर पानी हर दिन बर्बाद होने दिया जा रहा है और लोग पानी को तरसते हैं.


७.आज हर कौम जब शान्ति से जी रही है ,अपने अपने जीवन यापन में लगी है ऐसे में साम्प्रदायिकता का 
विधेयक लाने कि तैयारी क्यों हो रही है ?क्या हम भारतीय रोजी रोटी को छोड़ फिर जातीवाद पर खून 
खराबा करे ? अरे!जीने दो सबको ,अपनी दूकान चलाने के लिए बिना जरुरत के कानून ना लाओ .तू हिन्दू ,
तू मुस्लिम ,तू दलित ...............क्यों मानवता में विभेद पैदा कर रहे हो ?यदि कानून ही जातिवादी हो 
जाएगा तो मानवता कहाँ जायेगी  .


८.काम हो तो हंगामा और काम नहीं हो तो हंगामा .कैसी स्तरहीन राजनीति पनपती जा रही है .सिर्फ तू -तू 
मैं-मैं .जनता कि समस्याओं से किसी को लेना देना नहीं .देश के विकास कि कोई बात नहीं .हर सत्र में लोक 
-सभा हंगामे कि भेंट चढ़ जाती है .करोडो रूपये स्वाहा हो जाते हैं .चोरो के बचाव कि तोड्जोड़ में सत्र ख़त्म .
सब पार्टियों को मत कि बेजा फिकर मतदाता कि किसी को पड़ी नहीं .मतदाता फटेहाल है तो है मगर वह 
हमें वोट देकर निहाल कर दे ,बस यही चाहते हैं पक्ष -विपक्ष के लोग ......
                        

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

...उम्मीदवार चाहिये (विज्ञापन )

....  उम्मीदवार  चाहिये (विज्ञापन )


चाहिये चुनावों के समय मतदारो से वोट दिला सकने वाले उम्मीदवार !! ना -ना चौंकिये मत !आजकल
हर चीज की मार्केटींग हो रही है ,यह काम भी अच्छी प्रोफेशनल एजेंसी को सौंप देने जैसा है .इस काम
का भविष्य भारत जैसे देश में चमकीला हो सकता है ,काफी संभावनाओं से भरा नया क्षेत्र है ,इसका
कारण भी है क्योंकि---------------

 इस देश में भ्रष्ट ,कामचोर नेताओं की बाढ़ आ रही है ,उनकी छवी बढ़िया क्रीम -मक्खन लगाने के बाद
 भी नाजुक होती जा रही है ,अब नाजुक दागदार छवी वाले उम्मीदवार वोट लेने में कारगार साबित नहीं
हो रहे हैं और नए मलाईदार उम्मीदवारों का भी राजनैतिक पार्टियों में टोटा है जो भी उम्मीदवार नए
मिलते हैं वे दांव पेच नहीं जानते और ऐसे अनाड़ी उम्मीदवार चुनाव जीत नहीं पायेंगे क्योंकि ज्यादातर (सज्जन) भोले किस्म के मिलते हैं.

     नए व्यक्ति  को झूठ बोलने में पारंगत करने के लिए भी काफी समय लग जाता है और मुश्किल
से ५-७% ही लोग सफल होते हैं क्योंकि झूठ भी सलीके से बोला जाता है और भोले नागरिक या तो झूठ
बोलते नहीं या फिर बोलना जानते ही नहीं ,ऐसे में बड़ी मुश्किल हो जाती है की चुनाव में किस व्यक्ति को
उम्मीदवार बनाया जाए.

   ज्यादातर पार्टियों ने दूरगामी परिणाम को ध्यान में रखे बिना ही भूतकाल में ऐसे  उम्मीदवारों का चयन
कर लिया था ,वे लोग अनाड़ी की तरह जनता के धन पर इस तरह उतावल में झपटे कि अब दागी हो गये.
धन को पचाना और वह भी जनता के धन को ,बहुत ही भेजाबाज शातिर का काम है .ऐसे काम किसी सेवा
 भावी इंसान के बूते के बाहर होता है

     हर व्यक्ति कि अपनी विशिष्टता होती है और चुनाव जीत सके ऐसा व्यक्ति भी विशिष्ट गुणों से युक्त होना
चाहिये .उसकी बोलने कि शैली में शहद सी मिठास हो ,उसकी आँखों में धूर्तता दिखाई ना दे ,नए नए
आश्वासन देने में माहिर हो ,रिश्वत लेने के तरीके में परिवर्तन शीलता हो ,नवीनता का सृजन कर नए
तरीके इजाद करने वाला हो

      नयी योजनाओं के उदघाटन ,शिलारोपण जैसे तरीके पुराने होते जा रहे हैं .लोग जानने लग गये हैं कि
ये सब बढ़िया ढकोसले के सिवाय कुछ नहीं है ,इन परम्परागत तरीको से मतदाता को गाफिल करना
मुश्किल होता जा रहा है .वोट लेने के नए नुस्खे पैदा करने वाले बाजीगर ही आज कि आवश्यकता बन
गये हैं .नए सपनो को जनता के मन में उतार देने वाले सृजक ही कुछ करामात दिखा सकते हैं .

     नए उम्मीदवार कि साख हो ,जैसे बगुला महाराज माला जपने का स्वांग बहुत निपुणता के साथ करते
हैं और मछली गटक कर पुन: शांत अवस्था में आ जाते हैं ,ठीक ऐसे ही साख वाले लोग मिल जाए जो
संत जैसे स्वांग में बिना चबाये माल गटक सके और मिलझुल कर बाँट खा सके .

       

रविवार, 20 नवंबर 2011

कटाक्ष मसाला

कटाक्ष मसाला 

अमरीका ने एक ऐसे 'हाइपरसोनिक' बम वाहक का सफल परीक्षण किया है जो ध्वनि की गति
 से पाँच गुना तेज़ी से उड़ सकता है.............


 विश्व शान्ति दूत की नयी परिभाषा  .... .
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उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री ने विकास को मुद्दा बनाकर राज्य को चार हिस्सों में बाँटने की घोषणा
 की..........
टुकड़े करने से विकास होता है तो टुकड़े बहुत कम हैं...  
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भारतीय-कनाडाई मूल की वयस्क फ़िल्मों की कलाकार सनी लियोन रियालिटी टेलीविज़न शो
 बिग बॉस में दिखेंगी.


स्वामी को दिखाने से टीआरपी में जो कमी आ गयी थी अब वापस बढ़ जायेगी .......


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 इमरान खा़न ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान को कुछ समय के लिए कश्मीर मुद्दे को
 किनारे रख देना चाहिए.


भारतीय कश्मीर में हर रोज खून की होली खेलने का काम करने वाले बेरोजगार हो जायेंगे .....


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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने कहा है कि भारत के साथ रिश्तों में आगे बढ़ने
 का एक ही रास्ता है और वो है जम्मू-कश्मीर समेत सभी अहम मुद्दों पर चर्चा करना.


ये हैं शान्ति के मसीहा की आइना दिखाती तस्वीर .........


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भारत के प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने मालदीव में हुई द्विपक्षीय बैठक पर संतोष जताते हुए कहा है कि अगले दौर की बातचीत और
 ज़्यादा सकारात्मक होगी.


डॉक्टर करेंगे कुत्ते की पूंछ को सीधा करने की आधुनिक सर्जरी .......
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विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने कहा, "भारत और पाकिस्तान के बीच अविश्वास में कमी आई है 
और सकारात्मक माहौल बना हुआ है."


हवा में तलवार भांजना कोई हमसे सीखे .........
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पाकिस्तान के मंत्रिमंडल ने भारत को सर्वाधिक वरीयता वाले देश (एमएफ़एन) का दर्जा देने की औपचारिक रुप से मंज़ूरी दे दी.


गिरगिट के रंग बदलने की क्रिया पर शोध ........
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तेज़ विकास और तरक़्क़ी की हमारी कोशिशें तभी रंग लाएंगी जब हम
 सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकेंगे और प्रशासनिक
 व्यवस्था को बेहतर बना सकेंगे."
मनमोहन सिंह, प्रधानमंत्री
 गीता सार .......... 
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भारत में पेट्रोल की क़ीमत में प्रति लीटर 1.85 रुपए की कटौती की गई
सांप सीढ़ी का खेल ....दौ घटाओ तीन बढ़ाओ  
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बुधवार, 16 नवंबर 2011

हो रहा भारत निर्वाण !!



हो रहा भारत निर्वाण  !!


सपने बुनकर.......जमकर लुटा.........पाया तुमने कई गुणा..........मेरे सपने....कब सच होंगे?
......वो बोले- .........सपने भी सच होते हैं क्या?


भाई ..बंधू ...मित्र... कबीला.......खेल रहा...... लाखों का खेला ....तेरी और इनकी उन्नति के,
........आये अवसर......... कई गुणा . मेरी उन्नति .........अब कब होगी?..............
....वो बोले -
तुझको इन बातों से क्या ?


खोल के टी.वी....मौज से देखो...हो रहा भारत नि .र्मा .ण?निर्वाण!! हुयी तरक्की ,कई गुनाह !! 






सोमवार, 14 नवंबर 2011

क्या अन्ना जनता में नैतिकता जगा पायेंगे ?

क्या अन्ना जनता में नैतिकता जगा पायेंगे ?


अन्ना टीम की आपसी खेंचतान से यह सवाल मुखुर हो उठता है की टीम अन्ना का ये हश्र क्यों हो रहा है?
क्या कोई राजनैतिक महत्वाकांक्षा सदस्यों में घुस आई है? क्या अन्ना की लोकप्रियता को लोग अपनी 
निजी लोकप्रियता में तब्दील करना चाहते हैं ?क्या अन्ना रूपी बरगद अपनी डालियों के भार से दबा जा 
रहा है?


आम भारतीय अन्ना के साथ क्यों जुड़े थे ?-- अन्ना के साथ निर्धन मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग दिल 
से जुड़ा था और इनके जुड़ने का कारण इनकी प्रमुख समस्याए थी जिनमे भ्रष्टाचार ,महंगाई और दिन -
प्रतिदिन सरकारी नीतियों से हो रही उसकी माली हालत मुख्य थी .आज जब देश में आर्थिक असमानता 
बढती जा रही है उच्च मध्यम वर्ग जैसे तैसे अपनी आबरू ढक रहा है मध्यम वर्ग तो नीचे के पायदान 
पर फिसल चुका है और गरीब मध्यम वर्ग तो बेहाल है .इस परिस्थिति में सभी दलों के राजनेता अपनी 
डफली अपना राग अलापने में व्यस्त हैं ,कुर्सी की खेचतान में डूबे हैं या फिर अपने काले कारनामो पर 
रेशमी परदे ढकने में लगे हैं तो इस पीड़ित विशाल वर्ग की कौन सुने और ऐसे समय में जब अन्ना ने 
हुंकार भरी तब ये सभी अन्ना के साथ सुर में सुर मिला कर मैदान में डट गए ,ये सब इतने बड़े पैमाने 
पर हो जाएगा ये ना तो अन्ना ने सोचा ना किसी राजनैतिक  पंडित ने .


मेरे ख्याल से आम भारतीयों को लगा अब उसके दिन फिरने वाले हैं ,आने वाले दिनों में व्यवस्था में बड़ा 
बदलाव आयेगा जिससे उसका काम आसान हो जाएगा ,उसे रिश्वत से निजात मिल जायेगी ,सरकारी 
दफ्तरों में काम तुरंत हो जाएगा और देश के भ्रष्ट नेताओं नेताओं का विदेशों में जमा काला धन पुन:देश 
की तिजौरी में जमा हो जाएगा इन सबके परिणाम स्वरूप उसकी दयनीय स्थिति में सुधार हो जाएगा 
मगर जब अन्ना ने आन्दोलन को स्थगित करने की घोषणा की उसके बाद उनके आन्दोलन पर प्रमुख 
राजनैतिक दल ने बेफाम हमले किये और अन्ना टीम को आपस में उलझा दिया .


अन्ना की  टीम के लोग अहंकार के मद में डूबकर मनमर्जी का विधान करने लगे जैसे वे ही भारत हैं.
उनके अटपटे विधानों ने इस मध्यम वर्ग को पुन: हताश किया है .जनलोकपाल के लिए जब अन्ना ने 
कांग्रेस के खिलाफ हुंकार भरी तो लोगों को लगा की "अन्ना यहाँ गलती कर रहे हैं "क्योंकि अन्ना यह 
तो कह सकते थे की कांग्रेस को वोट मत दो मगर यह नहीं कह पाए की अमुक चयनित उम्मीदवार को 
वोट दे क्योंकि यह खरा और सेवाभावी इंसान है .यदि अन्ना के पास "नैतिक या ईमानदार लोगो का 
टोटा है तो अन्ना को पहले अच्छे लोगों पर ध्यान केन्द्रित करना था जो देश की तस्वीर बदलने में 
सक्षम हो मगर अन्ना ने एलान कर दिया की हिसार के बाद आने वाले राज्यों में चुनाव से पहले यदि  जनलोकपाल नहीं लाया गया तो केंद्र सरकार का विरोध करेंगे .


अन्ना  के अधिकार में कांग्रेस का विरोध करना तो है मगर अन्ना का पवित्र कर्तव्य भी यह बनता है 
की वो आम भारतीयों को बताये की किस उम्मीदवार को वोट करे .अन्ना यह तो अच्छी तरह से जानते 
हैं की इस समय भारत के जितने भी राजनैतिक दल हैं उनमे से कोई भी दल दूध का धुला हुआ नहीं है 
फिर अन्ना किस दल को वोट देने की बात कहेंगे ?इस यक्ष प्रश्न का सही जबाब अन्ना टीम या आम 
भारतीय के पास भी नहीं है और यही कारण है की मतदाता एक बार फिर ज्यादा काला और कम काला 
के फेर  में पड़ जाएगा .


आदरणीय अन्ना ,प्रश्न जनलोकपाल कानून के बनने का तो है ही ,लेकिन गर्त में जा चुकी नैतिकता और 
हमारे जीवन से दफन हो रहे सदाचार का भी है क्योंकि इन दौ गुणों की पुष्टि के बिना हर कानून लंगडा 
हो जाता है .सदाचार और चरित्र का निर्माण किसी कानून के बन जाने से विकसित नहीं होते इसके लिए 
शिक्षा और मूल्यों में आमूल चुल परिवर्तन की आवश्यकता है .हमारे देश में मूल्य हीन विद्धवानो का 
टोटा नहीं है ,सिर्फ जीवन मूल्यों का टोटा है .क्या अन्ना पुरे भारत में यह अलख जगा सकेंगे ?कर सकेंगे 
इस संकल्प की पूर्ति का सफल प्रयास ?  


सिर्फ पत्तियों को पानी देने से क्या होगा ?सवाल जड़ को सींचने का है ? सवाल उच्च नैतिक मूल्यों और 
सदाचार की पुन: स्थापना का है ?बिना इनके कानून क्या कर सकेगा .  
          

रविवार, 13 नवंबर 2011

बुरी आदत है " अति लोभ "

बुरी आदत है " अति लोभ "


लोभ क्या है ?-लेने की अंत विहीन भावना या इच्छा .

लोभ कैसे पैदा होता है - संग्रह की प्रवृति से.

एक बिंदु तक असंतुष्टि विकास में सहायक बनती है लेकिन असंतुष्टि की पराकाष्ठा से लोभ की प्रवृति का
जन्म होता है अधिक से अधिक संग्रह कैसे किया जाए ,संग्रह करने की अंधी दौड़ में हम जीवन के विभिन्न
सुखो का त्याग कर देते हैं और हमारे जीने का एक लक्ष्य तय हो जाता है "येन केन प्रकारेण" हम दुसरे के
हक़ को मारना और बेमतलब का धन या साधन इकट्ठे करते रहना .हमारे नीति ग्रंथो में  कहा है -पूत सपूत
तो क्यों धन संचय ?पूत सपूत तो क्यों धन संचय ?

         हम धन को साधन नहीं मानकर साध्य समझ बैठे हैं और अधिकाधिक उपार्जन को ही सफलता मान
बैठे हैं .सदाचार की दयनीयता का कारण भी लोभ की प्रवृति है.कैसे भी धन आ जाए और हम सुखी हो जाए
की सोच ने हमारे आदर्शो की होली जला  दी है. अन्ना जैसे लोग जो समाज में परिवतन फूंकना चाहते हैं
मगर उन्हें भी देश और समाज पर निस्वार्थ भाव से मर मिटने को आतुर लोगो का टोटा पड़ जाता है .

लोभ के दुष्प्रभाव   
 
१.दुराचारी प्रवृति- जब हमारी असंतुष्टि ज्यादा संग्रह करने के रास्ते की और बढ़ जाती है तब हम लालच में
   आकर सदवृतियों को छोड़ कर दुराचरण से समझोता कर लेते हैं .वास्तव में देखा जाए तो विश्व में बढती
   भ्रष्टाचार तथा काले धन की समस्या का यह एक बड़ा कारण है.

२.धूर्तता - लोभ की बढती इच्छा हमारे को धूर्तता के करीब ले जाती है.हमारे इर्दगीर्द धूर्त लोग जाल बना
          के हमारी सम्पति की लूट मचाते हैं या फिर हम खुद ही धूर्त बन जाते हैं .

३.ठगा जाना -बढती हुयी लालसा के कारण हम आये दिन ऐसे किस्से सुनते या पढ़ते रहते हैं की लोभ की
     दुष्प्रवृति के कारण विद्धवान तथा बुद्धिमान भी फँस जाते हैं और नुकसान उठाते हैं.

४.मुसीबतों को बुलावा -कुछ मुसीबते दैविक हो सकती है लेकिन ज्यादातर मुसीबते हम खुद उत्पन्न
   कर लेते हैं और इसका एक कारण है बढती हुयी लालसा .जब भी लालसा बढती है तब हमारी बुद्धि भी
   कुंठित हो जाती है .हम उस समय लोभ के वशीभूत होकर हीन कृत्य कर बैठते हैं और बहुत कुछ
   गंवाकर पछताते हैं मगर तब तक सब कुछ स्वाहा हो जाता है.

५.जग हंसाई का कारण - जब भी हम लोभ के अथाह सागर में उतरते हैं और डूबने लगते हैं तब दुनिया
     हमारे कृत्य को जान हंसती है  ,अपना मनोरंजन करती है. जग हंसाई तथा सम्पति का नुकसान तो
    हमें फिर भी उठाना ही पड़ता है.

६.चरित्र का पतन- कुछ पाने की इच्छा के कारण हम चरित्र को भी दांव पर लगा बैठते हैं .काम की सभी
   दमित इच्छाएं जिन्हें हम पूरा करने का दू:साहस करने लगते हैं या करने की कोशिश करते हैं तब हम
  अधोगति की तरफ बढ़ते हैं.हम उस समय अच्छी तरह से जानते हैं की हम काम के आवेग के कारण
  जो कुछ भी करने जा रहे हैं वह अनैतिक है मगर हम मन के वशीभूत होकर उस दलदल के मार्ग पर
  चल पड़ते हैं और मान ,सम्मान ,मर्यादा सब कुछ पल भर में खो देते हैं .

लोभ की प्रवृति से कैसे बचे ?


लोभ की प्रवृति से निजात पाने का सरल मार्ग है संतुष्टि की भावना को पुष्ट किया जाए.

जो प्राप्त है,उसका भरपूर आनंद लिया जाए और सुखद भविष्य के लिए पुरुषार्थ का सहारा लिया जाए

सफलता के लिए क्रमबद्ध योजना तैयार की जाए और रास्ता लंबा भी हो तो धीरज के साथ अपने बनाए
नैतिक रास्ते पर ही चला जाए क्योंकि संघर्ष से तैयार किया रास्ता ही मंजील की और ले जाता है भले
ही वह कंटीला हो .

अपने विवेक को हर समय जाग्रत रखे और मन को बार बार पूछते रहे की कही वह लोभ में तो नहीं फँस
रहा है .जागरूक बने .शोर्ट कट छोड़े .

                

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

स्वर्ग और नरक

स्वर्ग और नरक 

एक बार एक विचारक स्वर्ग और नरक के बारे में उपदेश दे रहे थे .तभी एक पढ़ा लिखा युवा खडा हुआ 
और उपदेशक से पूछा-"श्रीमान ,आप जिस स्वर्ग और नरक के बारे में उपदेश दे रहे हैं वे वास्तव कुछ
 भी नहीं है आप या तो स्वर्ग और नरक का साक्षात्कार करवाये या श्रद्धालु लोगो को बरगलाना बंद करे."

विचारक महोदय ने जबाब दिया -"मैं स्वर्ग और नरक से साक्षात्कार करवा सकता हूँ मगर शर्त ये है 
आप अपने शहर के दस भले और दस बदमाश लोगो को लेकर आये और साथ में एक बीस फिट लम्बी 
सीढ़ी  भी ले आये."

उस युवक ने उपदेशक की बात स्वीकार कर ली और अगले दिन एक सीढ़ी, दस भले और दस बदमाश 
लोगों को लेकर उपदेशक की कुटिया पर पंहुच गया .उपदेशक सबसे पहले दस बदमाशो और सीढ़ी के 
साथ एक सूखे कुएं के पास पहुंचा और बोला -"आप सभी दस व्यक्ति सीढ़ी की सहायता से कुएं के अन्दर 
उतर जाएँ ." उपदेशक की आज्ञा के अनुसार दसों बदमाश सीढ़ी की सहायता से कुएं में उतर गये .उपदेशक 
ने कहा -" ये सीढ़ी हम कुएं से बाहर खीँच लेते हैं आप लोग बिना सीढ़ी के बाहर निकल जाना". इतना कहकर 
उपदेशक ने सीढ़ी को कुए से बाहर खीँच लिया और उस युवक से बोले -इस सीढ़ी को दोनों मिलकर उठा ले 
और पुन: कुटिया पर पहुंचे .

उपदेशक और युवक सीढ़ी को उठाकर कुटिया पर पहुंचे .वहां पर दसों भले लोग उनका इन्तजार कर रहे थे 
उपदेशक ने उन सबको संबोधित करते हुए कहा कि आप लोग मेरे साथ सीढ़ी को लेकर चले .उपदेशक ने 
दुसरे सूखे कुएं के पास पहुँच कर उन सब दस लोगो को आदेश दिया कि आप सभी इस सीढ़ी कि सहायता 
से कुए के अन्दर उतर जाए ,जब दसों भले लोग कुएं में पहुँच गये तो उपदेशक ने कहा-'हम ये सीढ़ी वापस 
खीँच लेते हैं आप बिना सीढ़ी के बाहर निकल आना ."

इतना कहकर उपदेशक ने युवक कि सहायता से सीढ़ी बाहर खीँच लीया .युवक विस्मित सा उपदेशक के 
करतब को देख रहा था पर कुछ समझ नहीं पाया तो उपदेशक से पूछा -महोदय,इस करतब से मेरे प्रश्न 
का हल कैसे आयेगा ?"

उपदेशक बोले-प्रतीक्षा करे और देखे बिना सीढ़ी के कौन कौन बाहर निकल कर आते हैं .कुछ घंटो के बाद 
भले आदमी वाले कुएं से एक आदमी बाहर निकल आया तथा युवक और उपदेशक के पास पड़ी सीढ़ी को 
उठाकर कुएं में पड़े अपने साथियों के पास पहुंचा दी और सीढ़ी की सहायता से एक-एक करके सभी भले 
आदमी बाहर आ गये .उपदेशक ने उनसे पूछा -आपने  इतने गहरे कुए से एक आदमी को बाहर निकालने 
में कैसे सफल हो गये ?

भले आदमी में से एक ने बताया- यह तो बहुत आसान था .हम सबने मिलकर कुएं से बाहर निकलने की 
योजना तैयार की तदुपरांत सबसे पहले चार आदमी खड़े हो गये उनके ऊपर तीन आदमी उनके ऊपर दौ 
और सबसे ऊपर एक आदमी चढ़ गया ,इस प्रयास में बहुत बार असफल भी हुए मगर हार नहीं मानकर 
प्रयास करते रहे और एक आदमी को बाहर निकालने में सफल हो गये और उसके बाद आपके पास पड़ी 
सीढ़ी का उपयोग कर सभी आसानी से  बाहर निकल गये .

उपदेशक ने उस युवक से कहा-आपस में सहयोग करना और मिलजुल कर लक्ष्य की और आगे बढना 
ही स्वर्ग है .

दुसरे कुए से किसी को भी लम्बे इंतजार के बाद में भी बाहर नहीं निकलते देख उपदेशक ने उस युवक 
से कहा-अब तक बदमाश बाहर नहीं आ पाए हैं जरा उधर चल कर माजरा समझ ले .उपदेशक उस युवक 
को लेकर कुए के पास पहुंचे .कुएं के अन्दर से लड़ने -झगड़ने की आवाजे आ रही थी .सभी लहुलुहान 
हो गये थे .उपदेशक ने युवक को कुएं में झांखकर देखने को कहा .सभी बदमाश एक दुसरे के कंधे पर 
चढ़ कर बाहर निकलने की कोशिश कर रहे थे जैसे भी दुसरा घेरा लगता की तभी बाकी बचे आपस में 
लड़ने लग जाते और बंद(घेरा)बिखर जाता और एक दुसरे को मारकर फिर नया बंद बनाने की कोशिश 
करते .

उपदेशक ने युवक से कुएं के अन्दर का हाल पूछा तो युवक ने कहा-महोदय ये सभी" पहले मैं -पहले मैं "
बाहर निकलने की बात पर झगड़ रहे हैं और एक दुसरे की  टांग खींचकर गिर जाते हैं .सभी लहुलुहान 
हो चुके हैं .

उपदेशक ने कहा -वत्स, असहयोग और स्वार्थ की भावना ही नरक है.मुझे लगता है तुम्हे तेरी बात का 
उत्तर मिल गया होगा .यदि स्वर्ग और नरक का साक्षात्कार हो गया हो तो सीढ़ी को कुए में डालकर 
इन बदमाशो को बाहर निकाल दे .
                 

   



बुधवार, 9 नवंबर 2011

भूचाल आना है

 भूचाल आना है 
         

भ्रष्ट नेता जब भ्रष्टाचार मुक्त भारत की बात करता है 
आम आदमी तब खुद को ठगा सा महसूस करता है .

जब चोर खुद के गले में फंदा डालने की गुहार करता है 
तब इतिहास इस नौटंकी पर बिलखता नजर आता है  

लूटे धन को लूटेरा जब  सौंप देने की बात करता है
खाली जेब को भिखारी तब कस कर पकड़ लेता है 

भूख से लड़ने का अहसास  जब जनसेवक कराता है 
तब लटका पेड़ से कोई मजबूर  किसान नजर आता है


मिलेगा न्याय सब जन को जब बात गीदड़ करता है 
मानना  अतिशीघ्र जंगल में भयंकर भूचाल आना  है  


  




  

  

सोमवार, 7 नवंबर 2011

मद का प्याला -"अहंकार "

मद का प्याला -"अहंकार "

यदि नरक को पास से देखना हो तो अहंकार के विचार अपना लीजिये ,आपको पूरी दुनिया स्वार्थी नजर आने 
लगेगी .मद का दुसरा नाम शराब भी है जिसके पान के बाद बुद्धि सुप्त हो जाती है .अहंकार से सभी लौकिक 
और परलौकिक कर्म हमें अन्धकार के गर्त में ले जाते हैं .

अहंकार क्या है ?-

जब हम में "मैं" पन जाग जाता है .मैं और मेरेविचार ,मेरी सोच ही हर जगह सही है,बाकी सब गौण या 
मूल्यहीन . 

अहंकार होने के कारण -

धन - धनवान होने की भावना हमारे पर शासन करने लग जाये.हमारी सोच हमारे धन तक आकर ठहर
         जाये.हमारी द्रष्टि अन्य सद्गुणों की जगह सिर्फ धन को देखने लग जाये  .

विद्या -वैसे तो विद्या हमें विनय तक ले जाने वाली होती है मगर हम खुद को विद्धवान समझने की भूल कर 
         देते हैं तब हमें हमारे ज्ञान के अलावा सब फीका लगने लग जाता है. 

जवानी- जवानी के जोश में हम अपने को करता-धरता मान बैठते हैं .हमें वृद्ध और पूजनीय लोगो की सलाह 
          नागवार गुजरती है .यदि जवानी के साथ परमात्मा रूप -रंग भी प्रदान कर देता है तो हम अंधे तो
            जाते  हैं.

कुल- यदि हम उच्चे कुल में जन्म ले लेते हैं तो बाकी के कुल को हम हेय मान बैठते हैं.हम अपने कुल पुरुषो 
         की थाती के विपरीत कर्म करने लग जाते हैं .


सत्ता -जब भी व्यक्ति के पास अधिकार आ जाते हैं तब वह अपने कर्तव्य को भूलने लग जाता है ,उस पर सत्ता
         का मद चढ़ जाता है और मनमर्जी के सिद्धांतो को थोप देता है .


धर्म - हम जब कोई भी परोपकार के ,मानवता के भले के लिए कर्म करते है तो हम यह शीघ्र भूल जाते है 
        की हमारे द्वारा किये जा रहे कर्म हमारे कर्तव्य हैं .हम अपने किये जाने वाले या कर चुके शुभ कर्मो 
        का जोरशोर से ढिंढोरा पीटने लग जाते हैं .बड़ी-बड़ी नाम पट्टिकाए अपने नाम की लगाकर खुश 
       होते हैं.

कीर्ति - यदि किसी शुभ कर्म के कारण हम लोकप्रिय हो जाते हैं तब हम अपनी कीर्ति का सुख लेने में लग 
          जाते हैं .हमें लगाता है की नियंता भी हमारे सम्मुख कुछ भी सत्ता नहीं रखता है .हम अपनी यश 
          गाथा को अपने मुंह से सुनाते हैं और दुनिया से सुनना पसंद करते हैं.

विजय -हमें अपनी छोटी मोटी हर सफलता पर घमंड हो जाता है ,हम यह भूल जाते हैं की सफलता सिर्फ 
         हमारे अकेले के सुप्रयासो का फल नहीं होती है वरन समय ,प्रकृति ,नियति,परिवार और मित्र वर्ग के 
        पूर्ण सहयोग से मिलती है. 

संतान- यदि हमें सुयोग्य संतान मिल जाती है तो हम उसे अपने कर्म से जोड़ लेते हैं और अपने ही मुख से 
           संतानों की प्रशंसा सारे जग में करते रहते हैं .  


अहंकार के दुष्परिणाम -

१.अहंकार हमें कर्तव्य पथ से दूर ले जाता है.

२. अहंकार हमें मित्रो से विहीन कर देता है.

३.अहंकार हमारी योग्यता को कुंठित कर देता है.

४.अहंकार हमारे इर्दगिर्द भ्रम का निर्माण कर देता है.

५.अहंकार हमारे शुभ कर्मो का क्षरण कर लेता है.

६.अहंकार हमें नित नयी विपत्तियों में डाल देता है.

७.अहंकार हमें असफलता के नजदीक ले जाता है.

८.अहंकार हमारे विवेक का हरण कर लेता है.

९.अहंकार हमें इष्टमित्रो से दूर कर देता है.

१०.अहंकार हमें आलोचना से परिचय करवाता है.

११.अहंकार हमें उद्दंड बना देता है .

१२.अहंकार हमें नकारात्मक बना देता है.

१३.अहंकार से अनचाहे संघर्ष उत्पन्न होते हैं.

१४.अहंकार से असहयोग को जन्म  देता है.

१५.अहंकार से दुनिया हमसे नफरत करने लग जाती है.

१६.अहंकार के कारण अनुकूल भी प्रतिकूल में बदल जाता है

अहंकार का त्याग कैसे करे-

१.हमें जो कुछ मिला है वह सामूहिक प्रयत्नों का फल है इसलिए सफलता में कृतज्ञ बने.

२.कर्म के परिणाम अगर अच्छे हैं तो सब में बराबर बाँट दे और बुरे हैं तो स्वयं पर ले ले.

३.हमें अपने कर्तव्यो का ज्ञान रहे परिणामो पर समय व्यतीत नहीं करे ,उत्सव नहीं मनाये.

४.स्वयं को निमित मात्र माने ,यह काम तो होने ही वाला था मगर नियति ने मुझे गोरवान्वित कर दिया
   इसलिए नियति की कृतज्ञता प्रगट करे

५. विनयी बने,विवेकशील बने .

६.समस्त कर्मो का फल नियति को समर्पित कर दे .         

रविवार, 6 नवंबर 2011

सफलता क्या है ?कैसे मिलती है ?

सफलता क्या है ?कैसे मिलती है ?

सफलता क्या है? -लक्ष्य को कदम दर कदम नजदीक पाना ही सफलता है .

सफल कौन ?- जिसने जीवन को सभी आयामों से जीकर देखा है.जिसने विद्या ,अर्थ,काम,धर्म को हासिल
करने के बाद सही सदुपयोग किया हो.

सफलता कैसे ------?

१.आत्मविश्लेषण - यदि हम प्रतिदिन सोने से पहले स्वयं का विश्लेषण करे की आज के दिन को हमने कैसे 
बिताया .यदि इस आत्मविश्लेष्ण में हमें अपनी कमजोरियां दिखाई देने लग जाए और हम हो चुकी भूलो के 
दोहराव को रोकने का पूर्ण प्रयास करते हैं तो हम सफल हो सकते हैं ,शंका की कोई जगह नहीं है.

२.गलतियाँ करते रहे -हमें नयी भूल करने पर दुखी नहीं होना चाहिए ,क्योंकि नयी गलतियां हमारी मार्ग-
दर्शक होती है.जो हमें बहुआयामी व्यक्तित्व प्रदान करती है इसलिए नयी भूल करते रहना है परन्तु पुरानी 
भूलो का दोहराव रुकना चाहिए 

३.सोच समझ कर करे-हम अतिउत्साह में प्राय: बुद्धि का उपयोग करना भूल जाते हैं और जल्दबाजी में काम 
को अंजाम तक पहुचाना चाहते हैं परन्तु ऐसा प्रयास सफल नहीं होता है .किसी भी काम को हाथ में लेने से 
पहले विचार करे,अपना बल या ताकत को तौले, अगर सामर्थ्य में हो तो कार्य का शुभारम्भ करे .जल्दबाजी 
से बचे .

४.सकारात्मक सोच- जिस काम को  हम पूरा करने का संकल्प लेते है उस समय हमारा मन संशय में ना
 पड़ा हो ,हम आशावान रहे ,हमारे शब्द नकारात्मक नहीं होने पाए ,हमारे हाव-भाव से उत्साह छलकता रहे .

५.अवचेतन मन को आदेश करे -जब भी किसी काम को करने का हम संकल्प लेते हैं तब हमारा जाग्रत मन 
तो हमारे वश में रहता है परन्तु अवचेतन मन को यदि हम आदेश करना भूल जाते हैं तो हमें सफलता प्राप्ति 
में ज्यादा समय लगता है .ज्यादा अच्छा यह है की हम अपने अर्ध जाग्रत मन को कम से कम तीन बार अपने 
संकल्प को पूरा करने का आदेश दे ताकि संकल्प को सिद्ध करने में आपका अवचेतन मन भी पूर्ण सहयोग 
कर सके.

६.सर्वसम्मति बनाने का प्रयास करे- संकल्प को पूरा करने के लिए अकेले ही विचार कभी नहीं करे ,कम से 
कम एक साथी के साथ तो विचार विमर्श जरुर करे .यदि काम टीम वर्क का है तो हमें अपना संकल्प और 
योजना सुस्पष्ट और पारदर्शी रखनी चाहिए ताकि किसी को गलत संदेह ना हो.

.ढोल ना पीटे - जब तक आपका काम पूर्णता के करीब नहीं पहुंचता है तब तक आपकी योजना गुप्त रहे 
आपका संकल्प लोगो तक नहीं फेले .हमें काम शुरू करने से पहले अपनी बढ़ाई खुद के मुंह से नहीं करनी 
चाहिए या हम जो करने का संकल्प ले चुके हैं उसके बारे में शेखी नहीं मारनी चाहिए ताकि विपरीत परिणाम 
भी मिल जाए तो आप बेमतलब की आलोचना से बच सके.

८.आत्मानुशासन बनाए-हर सफलता के लिए जरुरी है हमारा कार्य की महत्ता के अनुसार हमारा आत्म अनुशासन .यदि लक्ष्य बड़ा है तो उसके लिए धीर गंभीरता भी उतनी ही बड़ी चाहिए .

९.समय की पाबंदी -लक्ष्य की प्राप्ति के लिए समय की पाबंदी का बहुत महत्व रहता है ,हमारी टायमिंग 
सही होनी चाहिए और तय समय में हाथ में लिए काम को पूरा करने का भरपूर प्रयास करना चाहिए 

१०.लक्ष्य पर नजर- जिस भी संकल्प को हम पूरा करना चाहते हैं और जब तक काम की प्रोसेस चालू 
रहती है तब तक हमें अपने लक्ष्य को याद करते रहना चाहिए ,ऐसा नहीं हो की लोग हमें दूसरी बातों में 
उलझा दे और समय बीत जाए .

११.परमात्मा पर आस्था -आपके काम को परिणाम तक पहुचाने के लिए ईश्वर से प्राथना करे ,सृष्टि-कर्ता
पर पूर्ण विशवास रखे .यदि परिणाम विपरीत भी प्राप्त हो जाए तो भी ईश्वर का पुन:प्रयास करने का निर्णय 
मानकर फिर से लाश्य प्राप्ति के मार्ग पर खड़े हो जाए .

हम यदि इन साधारण नियमो का ईमानदारी से पालन करेगे तो मंजिल मिलती ही है.            

शनिवार, 5 नवंबर 2011

मुहँ के बल गिरे,फिर भी टंगड़ी ऊँची !

मुहँ के बल गिरे,फिर भी टंगड़ी ऊँची !

नेताजी चलते चलते मुहँ के बल गिरे ,हमने दौड़ कर उनको उठाया और पूछा-"चोट तो नहीं आई ?"
नेताजी बोले -बेटे,चोट तो गिरने पर आती है हम गिरे ही कब थे ?

मेने कहा -"नेताजी अभी-अभी तो मेने आपको अपने हाथों से उठाया है".........वो हमारी बात काट कर बोले 
इसको गिरना नहीं कहते हैं ,गिरने का मतलब होता है टांग का चित्त हो  जाना .हम जब गिरे तो हमारी टांग
 दबी नहीं थी ऊपर हो गयी थी .हम उनके गिरने की व्याख्या से अभिभूत हो उठे और मुहं से "वाह" निकल
 ही गया

हमने उनसे पूछा -नेताजी महंगाई आसमान छू रही है?कारण?

वो बोले-"बेटा महंगाई अभी तो मेरे घुटने तक ही नहीं पहुंची है ,आसमान छूने बात गले नहीं उतर रही है और
घुटने तक महंगाई पहुचने का कारण हमारे त्यौहार हैं .हम त्योहारों पर डटकर पोष्टिक भोजन लेते हैं .आप
त्यौहार मनाना बंद कीजिये और एक समय उपवास करके गांधीवादी बन जाईये फिर देखिये महंगाई सरपट
कम हो जायेगी ."

हम खुद त्यौहार मनाने के गुनाहगार थे इसलिए बात बदलते हुए पूछा -नेताजी पेट्रोल,गेस,बिजली,और
केरोसिन की बढती कीमतों के बारे में कुछ निवेदन करेंगे?

वो बोले-"ये सब सेठ लोगो की घाटे की पूर्ति की कवायद है ,आप देखिये जिसका भी मन करता है दौ पहिया
वाहन खरीद रहा है .कार चलाने वालो को सड़क पर जगह ही नहीं मिलती यदि पेट्रोल के दाम बढ़ेंगे तब ही
 तो आप लोग दुपहिया चलाना बंद करेंगे फिर सडको पर सिर्फ कारे दोड़ेंगी और देश की उन्नति की तस्वीर
विदेशो तक जायेंगी.

हम निरुत्तर होकर बात बदलते हुए बोले -नेताजी, बेरोजगारी पर भी आपको कुछ कहना है ?"

नेताजी बोले-"आप लोग एक तो बच्चे पैदा करना बंद नहीं करते और ऊपर से उनको पढ़ाते भी हैं ,यदि बच्चे आपके  नहीं पढ़ते तो मनरेगा में काम की गारंटी तो पाते ."

हम अपनी बात को कटते देख फिर नेताजी से प्रश्न दाग बैठे-"नेताजी ,भ्रष्टाचार पर कोई मीमांसा पेश करेंगे?'

वो बोले-"यह काम हो जाने की गारंटी है ,एक व्यवहार है ,इसे बंद कर देने से आप ही लटक जायेंगे .जो काम
 उत्साह के साथ आफिसर कर रहे हैं उनका काम करने से उत्साह भंग हो जाएगा .भ्रष्टाचार एक टोनिक
है ,स्फूर्ति से काम करने की रामबाण दवा है और आप मुर्खता वश बंद कराने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं.

नेताजी किसान रो रहे हैं ,गरीब चिल्ला रहा है ,इसका चुल्हा भी एक समय जल रहा है ,आप कुछ कर क्यों
नहीं रहे हैं ? हमने फिर प्रश्न दागा .

नेताजी बोले-"किसान  की रोने की आदत है ,समय पर बारिस नहीं होती है तो इसमें सरकार क्या करे ,
गरीब का चिल्लाना बंद कर देंगे क्योंकि हम गरीबी रेखा ही ख़त्म कर देंगे ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी
और रहा सवाल चूल्हे का तो सड़ा अनाज सस्ते में बटवा देंगे वैसे भी गौदामो में रखने की जगह नहीं है .

हमारे प्रश्न खत्म होते जा रहे थे और नेताजी को घेरने के लिए हमने अंतिम सवाल पूछा -देश की अर्थव्यवस्था
बेहाल है ,विदेशी कर्ज बढ़ रहा है ,काला धन विदेशो में जमा है ,आप क्या कर रहे हैं ?

नेताजी बोले- जैसे नौरत्नो को अमीरों को बेचा है और देश की तिजोरी भरी है वैसे ही और बेच देंगे ,सरकारी
उद्योग के बिकने के बाद देश का कोई भी टुकडा चीन या अमेरिका के हवाले कर देंगे ,जिससे विदेशी ऋण भी
चुकता हो जाएगा और रहा सवाल काले धन का तो वह तेरे बाप का नहीं ,हमारी बिरादरी का है ,तुमको क्या ?

हम अपना सा मुंह लेकर रह गए और नेताजी चलते बने .

   

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

जिन्दगी में पतजड़ लाता है -"तालमेल का अभाव"

जिन्दगी में पतजड़ लाता है -"तालमेल का अभाव"   

जब भी हम आर्केस्ट्रा पार्टी को सुनते हैं तो दिल झुमने लग जाता है ,क्यों होता है ऐसा? मन पर सकारात्मक 
प्रभाव पड़ता है मधुर संगीत से .तनाव गायब हो जाता है और चेहरा खिल उठता है .मधुर संगीत की धुन के 
पीछे संगीत पार्टी का सुन्दर तालमेल ही मुख्य कारण है .ठीक इसी प्रकार विचारो का तालमेल अपना प्रभाव 
हमारे जीवन में छोड़ता है .तालमेल का आभाव हमारे जीवन को पतजड़ में बदल देता है और जिन्दगी वीरान 
लगती है 

जब भी हम किस खेल की टीम को खेलते हुए और जीतते देखते हैं तो उसके पीछे भी खिलाड़ियों का सुन्दर 
तालमेल ही मुख्य होता है .तालमेल का अभाव हमें पराजय की और धकेल देता है .बड़ी -बड़ी कम्पनियों को 
गर्त से शिखर पर स्थापित होता देखते हैं तो इसका कारण भी सभी कर्मचारियों का तालमेल ही प्रमुख रूप 
से दिखाई देता है.

सवाल यह है की क्या तालमेल बनाने के इतने सुन्दर परिणाम आते हैं तो फिर हम बहुधा तालमेल बनाने 
में असफल क्यों हो जाते हैं .

तालमेल टूटने के कुछ कारण - 
१. अपरिपक्व नजरिया -अक्सर हम वही परिणाम देखना पसंद करते हैं जो हमें प्रिय लगता हो ,चाहे
हम प्रयास परिणाम के विरुद्ध ही कर रहे हो .किसी बात को समझाने का नजरिया भी हम इतना छोटा कर 
लेते हैं की सामने वाले की बात यदि तर्क पूर्ण या सार्थक भी हो तब भी हम अपनी जिद्द पर ही अड़े रहते हैं.

२.स्वार्थ से भरी सोच - यदि किसी भी पक्ष की सोच अपने ही स्वार्थ से जुडी हुयी हो तो तालमेल टूट जाया 
करता है . हम जीओ और जीने दो के सिद्धांत के विपरीत अपना ही हित साधने की कोशिश करते हैं तब 
आपस के तालमेल की लय टूट जाती है .

३.गलाकाट प्रतिस्पर्धा -जब हम स्वस्थ स्पर्धा को छोड़ कर एक दुसरे से अहित से परिपूर्ण स्पर्धा करने 
लग जाते हैं ,एक दुसरे को नीचा दिखाने की भावना रखते हैं तब हम बिखर जाते हैं .

४.लोकव्यवहार में कमी - यदि कोई व्यक्ति लोक व्यवहार के दैनिक नियमों को ताक पर रख कर स्वयं 
को सर्वेसर्वा समझने की भूल कर बैठता है तब सुन्दर आनेवाले परिणाम भी खराब आ जाते हैं .हम अपनी 
हेकड़ी के कारण दूसरों के सम्मान की जब परवाह करना छोड़ देते हैं तब हम अकेले पड़ जाते हैं ,टूट जाते हैं.

५.जलन और इर्ष्या -जब हम अपने ही परिवार ,भाई बन्धु,दोस्त,मातहत या बॉस की प्रगति पर प्रसन्न होने 
की जगह जल उठते है तब हम तालमेल बनाने की जगह तोड़ने की कोशिश में लग जाते हैं क्योंकि हम स्वयं
की कमियों का मूल्यांकन नहीं करके दुसरे पक्ष की सफलता को पचा नहीं पाते और हमारे लूटे पिटे हावभाव 
से सामने वाला हमसे कन्नी काटने लग जाता है 

६.नुक्ताचीनी की आदतें -जब मनुष्य अच्छी या बुरी ,सकारात्मक या नकारात्मक हर बात में दुसरे पक्ष की 
कसर निकालना शुरू कर देता है तब दुनियां उस प्राणी को नकचढ़ा कह कर अलग कर देती है .आलोचना 
यदि सार्थक बात की हो तो लोग उस व्यक्ति को मुर्ख या बेवकूफ समझ कर उसे अकेले रोने के लिए छोड़ 
देते हैं. 

७.गलतफहमी,वहम या भ्रम - जब भी हम मन ही मन विचार करके किसी के प्रति भी अपना व्यवहार गलत 
बना लेते हैं या परिस्थिति को समझे बिना ही भ्रम या वहम में फँस जाते हैं तब तालमेल चाहे पारिवारिक हो 
या व्यावसायिक टूट के बिखर ही जाता है 

८.मुस्कराने के स्वभाव का नहीं होना -यदि हम हर समय धीर गंभीर बने रहते हैं किसी का भी मुस्करा कर 
स्वागत करने में असमर्थ होते हैं ,स्वभाव से शुष्क बने रहते है ,उदासीन रहते हैं तब हमारे प्रयास चाहे 
कितनी ही लगन से क्यों नहीं किये गए हो उनका परिणाम पूर्ण रूप से नहीं पाते  हैं .

विचारों में तालमेल बनाने के तरीके     

१.सामान लक्ष्य का निर्धारण 
२.लोक व्यवहार में निपुणता 
३.हंसमुख स्वभाव 
४.सकारात्मक सोच 
५.दूरदर्शिता पूर्ण निर्णय 
६.खुलकर प्रशंसा करने की आदत बनाना 
७.मतभेदों पर शांतिपूर्ण चर्चा 
८.जीओ और जीने दो 
९.कडवी बात को कहने से पहले शब्दों का सही प्रयोग 
१०.दुसरे पक्ष के सम्मान को ठेस नहीं पहुंचाए 
११.साम नीति का भरपूर उपयोग 
       

मनोकामना की पूर्ति में रोड़ा -"क्रोध "

मनोकामना की पूर्ति में रोड़ा -"क्रोध "

क्रोध क्या है - कोई भी घटना जो हमारे स्वार्थ के अनुकूल नहीं है जब घटित होती है उसके परिणाम स्वरूप 
हमारे अन्दर जो उबाल पैदा होता है वह क्रोध है .

क्रोध के दुष्प्रभाव - क्रोध की अग्नि से हम शारीरिक विकार के साथ साथ मानसिक,आर्थिक ,पारमार्थिक ,
सामाजिक एवं पारिवारिक दुष्प्रभाव का परिणाम तत्काल पाते हैं

१.नफरत की भावना - क्रोध आपस में नफरत को जन्म देता है .हम अपनी बात शान्ति और प्रेम से कह 
सकते हैं और सामने वाले व्यक्ति से मनवा भी सकते हैं .क्रोध करके किसी बात को मनवाने का मतलब 
यह है की हम जिद्दी ,हठी या अहंकारी हैं और कोई जरुरी नहीं की हमारी  सोच हर समय खरी उतरे ,यदि 
हम क्रोध करके किसी बात को स्वीकृत करवा भी लेते हैं और उस कर्म का परिणाम प्रतिकूल आ जाता है 
तो हम हंसी और तिरस्कार का पात्र बन जाते हैं और जो पक्ष हमारा गुस्सा सहन करता है वह हमारे पर 
हावी भी हो जाता है और हमसे नफरत भी करता है .

२.वास्तविक तथ्य नहीं जान पाना - जब भी व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है तब हमारा विवेक काम 
करना बंद कर देता है .हमारी बुध्धि कुंठित हो जाती है .क्रोध के आवेश में हम स्वयं को सही और बाकी 
को गलत मान लेते हैं .हम किसी घटना को सिर्फ एक ही तरह से समझ पाते हैं जो उस समय हमें अपने 
स्वार्थ के अनुकूल जान पड़ता है .हम उस घटना को विभिन्न आयामों से देख ही नहीं पाते जिसके परिणाम 
स्वरूप हम उस परिस्थति के उत्पन्न होने के वास्तविक तथ्य से बहुत दूर चले जाते हैं.

३.स्वयं का गलत आंकलन - जब भी हम क्रोध में होते है उस समय हमारे द्वारा लिए गए निर्णय हमें घातक 
परिणाम देते हैं .आवेश की अवस्था में हम परिस्थिति को समझने की चेष्टा ही नहीं करते हैं और हमारी 
इन्द्रियों पर काबू नहीं होने के कारण हम स्वयं का भी सही सटीक आंकलन नहीं कर पाते हैं फलस्वरूप 
हमें विपरीत परिणामो का सामना करना पड़ता है .

४.स्नायु तंत्र का नुकसान- जब भी हम आवेश में होते हैं तब हम अपने स्नायु तंत्र का नुकसान करते हैं .
हमारे आवेश की अवस्था में रक्त के भ्रमण की गति अनियमित और अव्यवस्थित हो जाती है .जिसका 
दुष्प्रभाव पाचन तंत्र ,हर्दय ,किडनी और मस्तिष्क की कोशिकाओं पर पड़ता है जो लम्बी अवधि में 
हमारे स्वास्थ्य को घातक बीमारियों की परिधि में खडा कर देता है.

५.वर्तमान पर दुष्प्रभाव -क्रोध एक ऐसा सौदा है तो जिसका मूल्य तुरंत चुकाना होता है और इस सौदे में 
क्रोध करने वाले को हमेशा हानि ही उठानी पड़ती है

६.उन्नति के अवसरों में बाधा -एक बार किये गए क्रोध का परिणाम सिर्फ एक बार ही नहीं भोगना पड़ता 
है बल्कि बार -बार भी भोगना पद सकता है .क्रोध से वर्तमान के सुअवसर तो खोते ही हैं और भविष्य के 
सुअवसर भी आसानी से उत्पन्न नहीं होते हैं .

७.सामाजिक असम्मान -क्रोध आप अपनों पर करते हैं या बाहरवालों पर परन्तु सामाजिक असम्मान 
दोनों ही परिस्थियों में भोगना ही पड़ता है .हम अपने बच्चो ,स्त्री या भाई बंधू पर जब भी क्रोध करते हैं 
तब भी हमें समाज की आलोचना सहनी ही पड़ती है और दुसरो पर क्रोध करने पर तो तुरंत आलोचना 
शुरू हो जाती है.

८.अदुरदर्शिता-आवेश के पलों में हमारी कुशलता ख़त्म हो जाती है .हम परिस्थिति की गहनता को समझने
की ताकत खो देते हैं और अदूरदर्शी निर्णय लेकर हानी और अपमान सहन करते हैं.

क्रोध को कैसे जीते 

क्रोध को जीता जा सकता है या उसका सही उपयोग किया जा सकता है दोनों ही परिस्थितियों से हम लाभ
प्राप्त कर सकते हैं .क्रोध को जीतने का मतलब हम स्वयं को हर परिस्थिति में संतुलित रख पा रहे  हैं और
क्रोध का उपयोग का मतलब हम जिस तरह अग्नि का और विद्युत् का उपयोग करते हैं उसी तरह क्रोध का
भी सदुपयोग करना है .

१.विनम्रता से सामने वाले पक्ष के विचार सुने .
२.कुतर्क या बहस नहीं करे .
३.अपना आपा नहीं खोये
४.क्रोध का प्रत्युतर गला फाड़कर या चिल्लाकर न दे .
५.तुरंत निर्णय से बचे.
६.सुखद समाधान को भरोसा जताये.
७.अपनी भाव भंगिमा को सहज बनाए रखे .
८.सामने वाला पक्ष सही है तो विनम्रता पूर्वक तुरंत माफी मांग ले .
९.सामने वाले पक्ष को शांत होने का प्रयाप्त समय दे .
    

मंगलवार, 1 नवंबर 2011

150 लाख करोड़ का सवाल ?

150 लाख  करोड़  का  सवाल ? 

भारतीय सरकारी बेंको का १५० लाख करोड़ कर्ज का सवाल .
१२१ करोड़ की आबादी वाले देश में १५० लाख  करोड़ का कर्ज वसूल नहीं या अता पता नहीं है .
ये सभी बेंक रिजर्व बेंक के निर्देशन में चलते हैं .कर्ज का ७०% यानी १०५ लाख करोड़ कोर्पोरेट 
सेक्टर के पास है यानि ओधोगिक क्षेत्र ने दबा रखा है .जिसकी कोई डीफोल्टर  सूची नहीं है ,
कारण ,क्योंकि वे बड़े हाथ हैं .३० % राशि आम भारतीयों के पास है -इस रकम की वसूली का 
एक मतलब यह भी हो सकता है की ये राशी वसूल कर हर भारतीय में बाँट दी जाए तो एक लाख करोड़ के करीब हर भारतीय के पास धन आ सकता है या हर गाँव पर खर्च कर दिया जाए तो 
विकास की क्रान्ति आ सकती है .मगर ये होगा नहीं !! 

   होता ये है की अगर आम आदमी होम लोन की किस्त समय पर नहीं चुका पाया तो उसे दंड 
मिलता है उसे डीफोल्टर  सूची में डाल दिया जाता है .क्रेडिट कार्ड का भुगतान में आम आदमी 
चूक करता है तो पेनल्टी भरनी पड़ती है उसे डीफोल्टर में डाल दिया जाता है क्योंकि समर्थ का 
कोई दोष होता ही नहीं है और गरीब की लुगाई (पत्नी )को हर कोई भाभी कह देता है 

बेंको का यह धन जो राष्ट्र की सम्पति है उसे कब वसूल किया जाएगा ?यह सवाल सालो से 
अनसुलझा है  .सरकारी बेंको के ये दोहरे मापदंड कब तक रहेंगे ?