गुरुवार, 3 नवंबर 2011

मनोकामना की पूर्ति में रोड़ा -"क्रोध "

मनोकामना की पूर्ति में रोड़ा -"क्रोध "

क्रोध क्या है - कोई भी घटना जो हमारे स्वार्थ के अनुकूल नहीं है जब घटित होती है उसके परिणाम स्वरूप 
हमारे अन्दर जो उबाल पैदा होता है वह क्रोध है .

क्रोध के दुष्प्रभाव - क्रोध की अग्नि से हम शारीरिक विकार के साथ साथ मानसिक,आर्थिक ,पारमार्थिक ,
सामाजिक एवं पारिवारिक दुष्प्रभाव का परिणाम तत्काल पाते हैं

१.नफरत की भावना - क्रोध आपस में नफरत को जन्म देता है .हम अपनी बात शान्ति और प्रेम से कह 
सकते हैं और सामने वाले व्यक्ति से मनवा भी सकते हैं .क्रोध करके किसी बात को मनवाने का मतलब 
यह है की हम जिद्दी ,हठी या अहंकारी हैं और कोई जरुरी नहीं की हमारी  सोच हर समय खरी उतरे ,यदि 
हम क्रोध करके किसी बात को स्वीकृत करवा भी लेते हैं और उस कर्म का परिणाम प्रतिकूल आ जाता है 
तो हम हंसी और तिरस्कार का पात्र बन जाते हैं और जो पक्ष हमारा गुस्सा सहन करता है वह हमारे पर 
हावी भी हो जाता है और हमसे नफरत भी करता है .

२.वास्तविक तथ्य नहीं जान पाना - जब भी व्यक्ति अपना संतुलन खो देता है तब हमारा विवेक काम 
करना बंद कर देता है .हमारी बुध्धि कुंठित हो जाती है .क्रोध के आवेश में हम स्वयं को सही और बाकी 
को गलत मान लेते हैं .हम किसी घटना को सिर्फ एक ही तरह से समझ पाते हैं जो उस समय हमें अपने 
स्वार्थ के अनुकूल जान पड़ता है .हम उस घटना को विभिन्न आयामों से देख ही नहीं पाते जिसके परिणाम 
स्वरूप हम उस परिस्थति के उत्पन्न होने के वास्तविक तथ्य से बहुत दूर चले जाते हैं.

३.स्वयं का गलत आंकलन - जब भी हम क्रोध में होते है उस समय हमारे द्वारा लिए गए निर्णय हमें घातक 
परिणाम देते हैं .आवेश की अवस्था में हम परिस्थिति को समझने की चेष्टा ही नहीं करते हैं और हमारी 
इन्द्रियों पर काबू नहीं होने के कारण हम स्वयं का भी सही सटीक आंकलन नहीं कर पाते हैं फलस्वरूप 
हमें विपरीत परिणामो का सामना करना पड़ता है .

४.स्नायु तंत्र का नुकसान- जब भी हम आवेश में होते हैं तब हम अपने स्नायु तंत्र का नुकसान करते हैं .
हमारे आवेश की अवस्था में रक्त के भ्रमण की गति अनियमित और अव्यवस्थित हो जाती है .जिसका 
दुष्प्रभाव पाचन तंत्र ,हर्दय ,किडनी और मस्तिष्क की कोशिकाओं पर पड़ता है जो लम्बी अवधि में 
हमारे स्वास्थ्य को घातक बीमारियों की परिधि में खडा कर देता है.

५.वर्तमान पर दुष्प्रभाव -क्रोध एक ऐसा सौदा है तो जिसका मूल्य तुरंत चुकाना होता है और इस सौदे में 
क्रोध करने वाले को हमेशा हानि ही उठानी पड़ती है

६.उन्नति के अवसरों में बाधा -एक बार किये गए क्रोध का परिणाम सिर्फ एक बार ही नहीं भोगना पड़ता 
है बल्कि बार -बार भी भोगना पद सकता है .क्रोध से वर्तमान के सुअवसर तो खोते ही हैं और भविष्य के 
सुअवसर भी आसानी से उत्पन्न नहीं होते हैं .

७.सामाजिक असम्मान -क्रोध आप अपनों पर करते हैं या बाहरवालों पर परन्तु सामाजिक असम्मान 
दोनों ही परिस्थियों में भोगना ही पड़ता है .हम अपने बच्चो ,स्त्री या भाई बंधू पर जब भी क्रोध करते हैं 
तब भी हमें समाज की आलोचना सहनी ही पड़ती है और दुसरो पर क्रोध करने पर तो तुरंत आलोचना 
शुरू हो जाती है.

८.अदुरदर्शिता-आवेश के पलों में हमारी कुशलता ख़त्म हो जाती है .हम परिस्थिति की गहनता को समझने
की ताकत खो देते हैं और अदूरदर्शी निर्णय लेकर हानी और अपमान सहन करते हैं.

क्रोध को कैसे जीते 

क्रोध को जीता जा सकता है या उसका सही उपयोग किया जा सकता है दोनों ही परिस्थितियों से हम लाभ
प्राप्त कर सकते हैं .क्रोध को जीतने का मतलब हम स्वयं को हर परिस्थिति में संतुलित रख पा रहे  हैं और
क्रोध का उपयोग का मतलब हम जिस तरह अग्नि का और विद्युत् का उपयोग करते हैं उसी तरह क्रोध का
भी सदुपयोग करना है .

१.विनम्रता से सामने वाले पक्ष के विचार सुने .
२.कुतर्क या बहस नहीं करे .
३.अपना आपा नहीं खोये
४.क्रोध का प्रत्युतर गला फाड़कर या चिल्लाकर न दे .
५.तुरंत निर्णय से बचे.
६.सुखद समाधान को भरोसा जताये.
७.अपनी भाव भंगिमा को सहज बनाए रखे .
८.सामने वाला पक्ष सही है तो विनम्रता पूर्वक तुरंत माफी मांग ले .
९.सामने वाले पक्ष को शांत होने का प्रयाप्त समय दे .
    

1 टिप्पणी:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

बढिया बात बतायी है।