शनिवार, 5 नवंबर 2011

मुहँ के बल गिरे,फिर भी टंगड़ी ऊँची !

मुहँ के बल गिरे,फिर भी टंगड़ी ऊँची !

नेताजी चलते चलते मुहँ के बल गिरे ,हमने दौड़ कर उनको उठाया और पूछा-"चोट तो नहीं आई ?"
नेताजी बोले -बेटे,चोट तो गिरने पर आती है हम गिरे ही कब थे ?

मेने कहा -"नेताजी अभी-अभी तो मेने आपको अपने हाथों से उठाया है".........वो हमारी बात काट कर बोले 
इसको गिरना नहीं कहते हैं ,गिरने का मतलब होता है टांग का चित्त हो  जाना .हम जब गिरे तो हमारी टांग
 दबी नहीं थी ऊपर हो गयी थी .हम उनके गिरने की व्याख्या से अभिभूत हो उठे और मुहं से "वाह" निकल
 ही गया

हमने उनसे पूछा -नेताजी महंगाई आसमान छू रही है?कारण?

वो बोले-"बेटा महंगाई अभी तो मेरे घुटने तक ही नहीं पहुंची है ,आसमान छूने बात गले नहीं उतर रही है और
घुटने तक महंगाई पहुचने का कारण हमारे त्यौहार हैं .हम त्योहारों पर डटकर पोष्टिक भोजन लेते हैं .आप
त्यौहार मनाना बंद कीजिये और एक समय उपवास करके गांधीवादी बन जाईये फिर देखिये महंगाई सरपट
कम हो जायेगी ."

हम खुद त्यौहार मनाने के गुनाहगार थे इसलिए बात बदलते हुए पूछा -नेताजी पेट्रोल,गेस,बिजली,और
केरोसिन की बढती कीमतों के बारे में कुछ निवेदन करेंगे?

वो बोले-"ये सब सेठ लोगो की घाटे की पूर्ति की कवायद है ,आप देखिये जिसका भी मन करता है दौ पहिया
वाहन खरीद रहा है .कार चलाने वालो को सड़क पर जगह ही नहीं मिलती यदि पेट्रोल के दाम बढ़ेंगे तब ही
 तो आप लोग दुपहिया चलाना बंद करेंगे फिर सडको पर सिर्फ कारे दोड़ेंगी और देश की उन्नति की तस्वीर
विदेशो तक जायेंगी.

हम निरुत्तर होकर बात बदलते हुए बोले -नेताजी, बेरोजगारी पर भी आपको कुछ कहना है ?"

नेताजी बोले-"आप लोग एक तो बच्चे पैदा करना बंद नहीं करते और ऊपर से उनको पढ़ाते भी हैं ,यदि बच्चे आपके  नहीं पढ़ते तो मनरेगा में काम की गारंटी तो पाते ."

हम अपनी बात को कटते देख फिर नेताजी से प्रश्न दाग बैठे-"नेताजी ,भ्रष्टाचार पर कोई मीमांसा पेश करेंगे?'

वो बोले-"यह काम हो जाने की गारंटी है ,एक व्यवहार है ,इसे बंद कर देने से आप ही लटक जायेंगे .जो काम
 उत्साह के साथ आफिसर कर रहे हैं उनका काम करने से उत्साह भंग हो जाएगा .भ्रष्टाचार एक टोनिक
है ,स्फूर्ति से काम करने की रामबाण दवा है और आप मुर्खता वश बंद कराने के लिए आन्दोलन कर रहे हैं.

नेताजी किसान रो रहे हैं ,गरीब चिल्ला रहा है ,इसका चुल्हा भी एक समय जल रहा है ,आप कुछ कर क्यों
नहीं रहे हैं ? हमने फिर प्रश्न दागा .

नेताजी बोले-"किसान  की रोने की आदत है ,समय पर बारिस नहीं होती है तो इसमें सरकार क्या करे ,
गरीब का चिल्लाना बंद कर देंगे क्योंकि हम गरीबी रेखा ही ख़त्म कर देंगे ना रहेगा बांस ना बजेगी बांसुरी
और रहा सवाल चूल्हे का तो सड़ा अनाज सस्ते में बटवा देंगे वैसे भी गौदामो में रखने की जगह नहीं है .

हमारे प्रश्न खत्म होते जा रहे थे और नेताजी को घेरने के लिए हमने अंतिम सवाल पूछा -देश की अर्थव्यवस्था
बेहाल है ,विदेशी कर्ज बढ़ रहा है ,काला धन विदेशो में जमा है ,आप क्या कर रहे हैं ?

नेताजी बोले- जैसे नौरत्नो को अमीरों को बेचा है और देश की तिजोरी भरी है वैसे ही और बेच देंगे ,सरकारी
उद्योग के बिकने के बाद देश का कोई भी टुकडा चीन या अमेरिका के हवाले कर देंगे ,जिससे विदेशी ऋण भी
चुकता हो जाएगा और रहा सवाल काले धन का तो वह तेरे बाप का नहीं ,हमारी बिरादरी का है ,तुमको क्या ?

हम अपना सा मुंह लेकर रह गए और नेताजी चलते बने .

   

1 टिप्पणी:

जाट देवता (संदीप पवाँर) ने कहा…

नेता ने आपके प्रश्न के जवाब में बढिया बात बतायी है।