रविवार, 13 नवंबर 2011

बुरी आदत है " अति लोभ "

बुरी आदत है " अति लोभ "


लोभ क्या है ?-लेने की अंत विहीन भावना या इच्छा .

लोभ कैसे पैदा होता है - संग्रह की प्रवृति से.

एक बिंदु तक असंतुष्टि विकास में सहायक बनती है लेकिन असंतुष्टि की पराकाष्ठा से लोभ की प्रवृति का
जन्म होता है अधिक से अधिक संग्रह कैसे किया जाए ,संग्रह करने की अंधी दौड़ में हम जीवन के विभिन्न
सुखो का त्याग कर देते हैं और हमारे जीने का एक लक्ष्य तय हो जाता है "येन केन प्रकारेण" हम दुसरे के
हक़ को मारना और बेमतलब का धन या साधन इकट्ठे करते रहना .हमारे नीति ग्रंथो में  कहा है -पूत सपूत
तो क्यों धन संचय ?पूत सपूत तो क्यों धन संचय ?

         हम धन को साधन नहीं मानकर साध्य समझ बैठे हैं और अधिकाधिक उपार्जन को ही सफलता मान
बैठे हैं .सदाचार की दयनीयता का कारण भी लोभ की प्रवृति है.कैसे भी धन आ जाए और हम सुखी हो जाए
की सोच ने हमारे आदर्शो की होली जला  दी है. अन्ना जैसे लोग जो समाज में परिवतन फूंकना चाहते हैं
मगर उन्हें भी देश और समाज पर निस्वार्थ भाव से मर मिटने को आतुर लोगो का टोटा पड़ जाता है .

लोभ के दुष्प्रभाव   
 
१.दुराचारी प्रवृति- जब हमारी असंतुष्टि ज्यादा संग्रह करने के रास्ते की और बढ़ जाती है तब हम लालच में
   आकर सदवृतियों को छोड़ कर दुराचरण से समझोता कर लेते हैं .वास्तव में देखा जाए तो विश्व में बढती
   भ्रष्टाचार तथा काले धन की समस्या का यह एक बड़ा कारण है.

२.धूर्तता - लोभ की बढती इच्छा हमारे को धूर्तता के करीब ले जाती है.हमारे इर्दगीर्द धूर्त लोग जाल बना
          के हमारी सम्पति की लूट मचाते हैं या फिर हम खुद ही धूर्त बन जाते हैं .

३.ठगा जाना -बढती हुयी लालसा के कारण हम आये दिन ऐसे किस्से सुनते या पढ़ते रहते हैं की लोभ की
     दुष्प्रवृति के कारण विद्धवान तथा बुद्धिमान भी फँस जाते हैं और नुकसान उठाते हैं.

४.मुसीबतों को बुलावा -कुछ मुसीबते दैविक हो सकती है लेकिन ज्यादातर मुसीबते हम खुद उत्पन्न
   कर लेते हैं और इसका एक कारण है बढती हुयी लालसा .जब भी लालसा बढती है तब हमारी बुद्धि भी
   कुंठित हो जाती है .हम उस समय लोभ के वशीभूत होकर हीन कृत्य कर बैठते हैं और बहुत कुछ
   गंवाकर पछताते हैं मगर तब तक सब कुछ स्वाहा हो जाता है.

५.जग हंसाई का कारण - जब भी हम लोभ के अथाह सागर में उतरते हैं और डूबने लगते हैं तब दुनिया
     हमारे कृत्य को जान हंसती है  ,अपना मनोरंजन करती है. जग हंसाई तथा सम्पति का नुकसान तो
    हमें फिर भी उठाना ही पड़ता है.

६.चरित्र का पतन- कुछ पाने की इच्छा के कारण हम चरित्र को भी दांव पर लगा बैठते हैं .काम की सभी
   दमित इच्छाएं जिन्हें हम पूरा करने का दू:साहस करने लगते हैं या करने की कोशिश करते हैं तब हम
  अधोगति की तरफ बढ़ते हैं.हम उस समय अच्छी तरह से जानते हैं की हम काम के आवेग के कारण
  जो कुछ भी करने जा रहे हैं वह अनैतिक है मगर हम मन के वशीभूत होकर उस दलदल के मार्ग पर
  चल पड़ते हैं और मान ,सम्मान ,मर्यादा सब कुछ पल भर में खो देते हैं .

लोभ की प्रवृति से कैसे बचे ?


लोभ की प्रवृति से निजात पाने का सरल मार्ग है संतुष्टि की भावना को पुष्ट किया जाए.

जो प्राप्त है,उसका भरपूर आनंद लिया जाए और सुखद भविष्य के लिए पुरुषार्थ का सहारा लिया जाए

सफलता के लिए क्रमबद्ध योजना तैयार की जाए और रास्ता लंबा भी हो तो धीरज के साथ अपने बनाए
नैतिक रास्ते पर ही चला जाए क्योंकि संघर्ष से तैयार किया रास्ता ही मंजील की और ले जाता है भले
ही वह कंटीला हो .

अपने विवेक को हर समय जाग्रत रखे और मन को बार बार पूछते रहे की कही वह लोभ में तो नहीं फँस
रहा है .जागरूक बने .शोर्ट कट छोड़े .

                

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