गुरुवार, 24 नवंबर 2011

भारत भाग्य विडम्बना

भारत भाग्य विडम्बना    


हमारे देश को अर्थहीन नीतियाँ डस रही है .मनमानी नीतियाँ और विधेयक  आम जनता पर थोप दिए जा
 रहे हैं ,उनके कुपरिणाम ५%जनता को छोड़कर आम नागरिकों को भुगतने पड़ रहे हैं .आम आदमी त्रस्त 
और बेहाल है .भारत के नीति नियंता अहंकार और परिवारवाद में रचे पचे हैं .


कुछ बानगियाँ   


१.करोडो फुटकर व्यापारी जो जैसे तैसे १-२लाख रूपये का जुगाड़ बैठाकर अपने परिवार को दौ समय की 
  रोटी मुहैया कराते हैं अब उस क्षेत्र को भी विदेशी हाथो में सुरक्षित किया जा सकता है ,अब हमारे देश के 
  उत्पाद विदेशी लोग पहले लागत मूल्य पर या मोटी संख्या में सस्ते में खरीद कर हमें ऊँचे दामों में बेचेंगे.
  नतीजा यह आयेगा की धीरे धीरे करोडो दुकाने बंद हो जायेगी और करोडो घर दौ समय की रोटी के लिए 
 मारे मारे फिरेंगे या अकुशल श्रमिक बनकर मनरेगा में काम करते हो जायेंगे .इसमें देश का क्या फायदा 
 होगा?शायद ५%जनता को सुविधा होगी .अगर ऐसे ही विधेयक बनते रहे तो आम आदमी का क्या होगा ?
 क्या भारत के विकास की गाथा हम नहीं लिख कर विदेशी लिखेंगे .एक इस्ट इंडिया को हटाने में 
लाखों लोगो ने जान की कुर्बानी दी थी तो अब तो लाखों विदेशी कम्पनियां हमारा क्या हाल करेगी ? क्या 
हम नादानी भरे कदम उठाकर कुर्बानियां ही देते रहेंगे? 


२. अर्थ शास्त्र का सामान्य नियम है कि बड़ी मछली छोटी मछलियों को निगल जाती है .हमारे देश के प्रधान 
  तो खुद अर्थशास्त्री हैं .कैसा विकसित भारत चाहते हैं ? आम आदमी के समझ से परे है.भारत के प्राण आज 
  भी गाँवों में ही बसते हैं यदि उन प्राणों पर ही संकट आ जाएगा तो भारत कि तगदिर क्या होगी ?आज हर 
 चीज का केन्द्रीयकरण होता जा रहा है .देश का पैसा अमीरों के हाथों में जा रहा है .गरीब को ३२/- वाला धनी
 बनाया जा रहा है ,बढ़ता आर्थिक असन्तुलन भयावह भविष्य कि और खिंच रहा है ,गाँवों में उद्योग पनप ही 
नहीं रहे हैं क्योंकि वंहा बुनियादी सुविधाओं का खाका ही तैयार नहीं किया जा रहा है .मज़बूरी में गाँवों कि दौड़ 
  शहरों कि तरफ है और हमारे नेता हैं कि एक दुसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगाकर कर्तव्य कि इति श्री कर लेते 
हैं.जनता बेचारी हर एक को आजमाकर थक चुकी है ,कही क्षितिज नजर नहीं आ रहा है.


३.हमारे देश में अरबों रूपये सालाना कमाने वाली कम्पनियों पर भी ३०% टेक्स है और उच्च मध्यम वर्ग के 
   लोगो पर भी कुछ सीमा कि राहत के बाद ३०% टेक्स है .क्या उच्च में वर्ग और अरबों रूपये सालाना कमाने 
  वाली कम्नियों का एक ही स्तर है ? लेकिन वसूली के लिए यही वर्ग है .सौ बड़े घराने लाखों करोड़ रूपये बैंकों 
 से कर्ज लेकर वापस नहीं कर रहे हैं या उन पर कोई दबाब नहीं है परन्तु एक किस्त समय पर नहीं भरने वाले 
 को डी फोल्टर लिस्ट का भय सताता है .२-३ किस्तों का समय पर भुगतान नहीं कर पाने वाला तो बेहाल हो 
 जाता है 


४.दवा पर छपी MRP को ही ले लीजिये .सरकार कहती है जीवन रक्षक दवा को टेक्स मुक्त किया जाएगा .मेरे 
ख्याल से दवा होती ही जीवन रक्षक है.सरकार हर दवा को टेक्स मुक्त करे और MRP का नियम तय करे .
आज दवा पर ४०से ५०% तक ज्यादा रेट लिखी रहती है ,क्यों ? दवा जैसे क्षेत्र पर कोई पाबंदी नहीं ,मनमर्जी 
का रेट छाप दे और मजबूर भारतीय ठगाता रहे .


५.पीने का बोतल बंद पानी १२ से २० रूपये लीटर में रिटेल में बिकता है ,हमारा ही पानी जमीन से खिंच कर 
हमें वापिस इतने महंगे दाम पर खरीदना पड़ रहा है ,कारण सरकार पीने के पानी कि समुचित व्यवस्था करने 
 में विफल रही है ,बेचारा मजदुर जब रोजी रोटी के लिए बाहर यात्राएं करता है तो उसका धन पानी में खर्च हो 
जाता है ,लेकिन किसी को पड़ी नहीं है .


६.हमारे देश के पानी को ठंडा पेय वाली कम्पनियां बर्बाद कर रही है .जिस देश में सभी को पीने योग्य पानी 
नहीं मिल पा रहा है उस देश को ठंडा पेय बनाने वाली कम्पनियों कि कँहा आवश्यकता है ?मगर राजस्व के 
बहाने लाखों लीटर पानी हर दिन बर्बाद होने दिया जा रहा है और लोग पानी को तरसते हैं.


७.आज हर कौम जब शान्ति से जी रही है ,अपने अपने जीवन यापन में लगी है ऐसे में साम्प्रदायिकता का 
विधेयक लाने कि तैयारी क्यों हो रही है ?क्या हम भारतीय रोजी रोटी को छोड़ फिर जातीवाद पर खून 
खराबा करे ? अरे!जीने दो सबको ,अपनी दूकान चलाने के लिए बिना जरुरत के कानून ना लाओ .तू हिन्दू ,
तू मुस्लिम ,तू दलित ...............क्यों मानवता में विभेद पैदा कर रहे हो ?यदि कानून ही जातिवादी हो 
जाएगा तो मानवता कहाँ जायेगी  .


८.काम हो तो हंगामा और काम नहीं हो तो हंगामा .कैसी स्तरहीन राजनीति पनपती जा रही है .सिर्फ तू -तू 
मैं-मैं .जनता कि समस्याओं से किसी को लेना देना नहीं .देश के विकास कि कोई बात नहीं .हर सत्र में लोक 
-सभा हंगामे कि भेंट चढ़ जाती है .करोडो रूपये स्वाहा हो जाते हैं .चोरो के बचाव कि तोड्जोड़ में सत्र ख़त्म .
सब पार्टियों को मत कि बेजा फिकर मतदाता कि किसी को पड़ी नहीं .मतदाता फटेहाल है तो है मगर वह 
हमें वोट देकर निहाल कर दे ,बस यही चाहते हैं पक्ष -विपक्ष के लोग ......
                        

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