शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

बधाई हो! अन्ना का लोकपाल लटक गया.

 बधाई हो! अन्ना का लोकपाल लटक गया. 

सुबह-सुबह वर्मा मिठाई के साथ हमारे घर पर धमक गये.हमने कुशल क्षेम पूछी .आज वे बहुत खुश
नजर आ रहे थे .हमने उनके चेहरे पर फुट रही ख़ुशी को देख कर पूछा-

वर्माजी,आज बहुत खुश नजर आ रहे हो ?क्या कोई परमोशन हो गया है क्या?

वर्माजी बोले -भाईसाहब ,इसे आप परमोशन ही समझ लीजिये. बधाई हो!लोकपाल लटक गया है.
वर्माजी हमारे पडोसी थे और सरकार के ऊँचे ओहदे पर विराजमान भी थे .हम कुछ समझ नहीं
पाए थे इसलिए उनसे विस्तार से जानना चाहा .
उन्होंने खुश होकर बताया-अन्ना की मांग पर जब देश के लोग भ्रष्टाचार पर आवाज बुलंद कर रहे थे
तब हमारी तो जान पर बन आई थी .हमारा केरियर ही पानी पानी हो रहा था.बड़ी रकम चुकाकर यह
मलाईदार नौकरी पायी थी कि अन्ना टपक पड़े .हम तो सचमुच के फँस गये थे .लाखो रूपये बाँट दिए थे
और लोकपाल के कारण उस पैसे की रिकवरी की संभावना पर पानी फिर रहा था .शनि देव की साढासाती
साफ दिखाई दे रही थी मगर भला हो सरकार का की वो लच्चर बिल लायी जिस पर सहमती बननी नहीं
थी और रात बारह बजे जनसेवकों ने लोकपाल की बारह बजा दी .

हम हेबताये से उनका चेहरा देख रहे थे और उनके द्वारा लाया गया मिठाई का डिब्बा हमें मुंह चिढ़ा रहा था .
वर्माजी के जाने के बाद हमने टी.वी.  पर समाचार लगाए तो सुनाई दिया की लोकपाल लटक गया है .

हमारा दिल रोने को कर रहा था की दरवाजे की घंटी फिर से बज गयी .अनमने भाव से दरवाजा खोला
तो सामने नेताजी खड़े थे .हाथ में लड्डू भरा थाल था .हमें देखते ही बोले -लो लड्डू खाओ बेटा!
हमने पूछा -नेताजी,चुनाव तो होने बाकी है .अभी से लड्डू ?

नेताजी बोले-बेटा ,यह चुनाव जीतने के लड्डू नहीं है ,यह तो लोकपाल के लटकने की ख़ुशी में बाँट रहा हूँ .

हमने पूछा -नेताजी,लोकपाल के लटकने से आपको क्या ....?

वो बोले-बेटा,अब पुरानी फाइल खुलने का डर नहीं है,अन्ना के कारण तो जान ही सांसत में आ गयी थी .
एक बार तो लगा मृत्यु घंट बजने ही वाला है ,भगवान् के जाप भी चालु करवा दिए थे ,दिन रात यही चिंता
थी की अब क्या होगा? जमा धन भी जनता लूट लेगी और चक्की भी पिसवाएगी. जो होता है,अच्छा ही
होता है ,बड़ी मेहनत के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया इसलिए पूरी गली में लड्डू बाँट रहा हूँ.

नेताजी के जाने के बाद हमने लड्डू को जोर से आँगन में फ़ेंक दिया और मायूस होकर मातम मनाने
लगे ,मगर आज हमें सुख पूर्वक मातम भी नहीं मनाने दिया जा रहा था .हम घर की कुण्डी लगाकर रोना
चाहते थे की दरवाजे की घंटी फिर बज गयी .दरवाजे पर धर्मिबाबू खड़े थे .
हमने उनको अन्दर आने का आग्रह किया .आज बाबू बड़े खुश थे .हमने उनके चेहरे पर ख़ुशी देख कर
पूछा-बाबू आज बहुत खुश हैं क्या बात है?

धर्मिबाबू बोले-चाचा ,रेलवे की नौकरी करते अभी दौ ही बरस हुए थे की अन्ना की नजर लग गयी .इतनी
उम्र में भी बन्दर गुलाट मार रहा था.एक तो मुसीबत के मारे मुसाफिर को सोने के लिए बर्थ दो और वह
भी बिना कुछ दक्षिणा के .हम रात-रात भर जागते हैं ,घर बार छोड़ रेल के धक्के खाते हैं ....

हमने उनकी बात को बीच में काटकर उनसे पूछ ही लिया -मगर इसके बदले में वेतन तो मिलता ही है.

वो बोले -चाचा,आप भी ....इतने से वेतन के लिए कौन इस धंधे में आता है,ऊपर का व्यवहार है इसलिए
इस काम में बैठे थे .अन्ना के साथ लोगों का हुजूम देखकर तो एक बार तो मेने नौकरी छोड़ देने की ठान
ली .भला हो आपकी बहु का कि उसने हिम्मत बँधायी.लक्ष्मी के व्रत चालु किये .अन्ना को सुम्मती के
लिए मंदिरों में प्रार्थना की.अन्ना बीमार पड़े ,अनशन टूटा तो कुछ आस बंधी ,लगा देश की जनता फिर से
कुम्भकरण की नींद में सो गयी है और उधर देवदूतों ने लोकपाल को लटका दिया .आप अब मेरे द्वारा लायी
मिठाई खाईये .

धर्मी के जाने के बाद हम भी दफ्तरों के काम से बाहर निकले .बाहर सड़क पर मायूस लोगों की भीड़ थी
चेहरे उतरे हुए थे मगर हर दफ्तर में आज रोनक थी .सब खुश थे .अन्ना की हार का जश्न चल रहा था .

हमने अपनी अर्जी बाबू को दी -बाबू ने आँखे तरेर कर कहा -चल बे ,कल आना .आज तो लोकपाल के
लटकने का जश्न है ,कल आना,काम हो जाएगा मगर हेकड़ी दिखाते खाली हाथ मत आना ,वरना काम
लोकपाल की तरह लटक जाएगा.

हम सुनहरे सपने को जल्द भूल जाना चाहते थे जो अन्ना ने दिखाया था और मन को समझा रहे थे कि
बेटा जिस तरह तेरा बाप जीया था उसी तरह से तू भी जीना सीख ले और बच्चो को भी सिखा दे क्योंकि
कोयले को कितना ही दूध से धोले मगर फिर भी वह काला ही रहेगा .            

सशक्त था फिर भी कौमा में............!!!

सशक्त था फिर भी कौमा में............!!!

मेरे देश के नेता ,सचमुझ आप जनता को उल्लू बना गए हैं! न नौ मन तेल होगा ना राधा
 नाचेगी. जब मजबूत लोकपाल लाना ही नहीं था तो सारी कवायद किसलिए की गयी?


जनता भ्रष्टाचार से परेशान थी ,है मगर उससे निजात दिलाना कोई दल नहीं चाहता है.क्योंकि 
दूध का धुला कौन है या फिर हमाम में सब ..........!!


जनसेवक के मुंह से अन्ना की आलोचना.... मतलब सियार को शेर की मांद में घुसने से 
जयमाला नहीं मौत ही मिलती है,और अन्ना भी भ्रष्ट नेता को शेर की मांद में घुसाने का कह
 रहे थे !!


अन्ना आन्दोलन मुंबई में फ्लॉप हो गया !जनता के लापरवाह होने का मतलब लोकपाल लटक 
गया !!लापरवाही का फल अन्ना को नहीं जनता को ही सहते रहना है!!! 
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                                                चुटकला

पहला दल-मैंने  तो जोकपाल   की कमर तोड़ दी .


दुसरा दल-मैंने तो जोकपाल  की टांग मरोड़ दी .


तीसरा दल-मैंने तो जोकपाल की जबान खींच ली 


चौथा दल-मैंने तो जोकपाल की नस काट दी .


पांचवा दल-यह करामात तुम लोगों ने नहीं की है ,ये तो हमारी करामात थी जो ऐसा जोकपाल 
 लाये की उसमे कोई जान ही नहीं थी .
   

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

कौआ जीत गया .

 कौआ जीत गया . 

एक जंगल में पीपल और बरगद के दौ पेड़ नदी के किनारे पास पास में लगे थे.एक पेड़ पर कौए रहते
थे और दुसरे पेड़ पर हंस ,बगुले ,बतख रहते थे .हंस स्वभाव से भले थे ,बतखें लालची थी और बगुले
धूर्त थे .कौओ ने जब एक समुदाय को अलग अलग मत के साथ देखा तो उन्होंने हंसो पर शासन
चलाने की सोची ,मगर उनके स्वार्थी स्वभाव ने सज्जन हंसों से हमेशा मात खायी थी .कौए मौके की
ताक में रहते थे जब उन्होंने हंस,बगुले और बतख के विचारों की भिन्नता को देखा तो हंसों को हराने
 की तिगडम लगायी.
     कौए संख्या में ४० थे,हंस ३५ ,बगुले १० ,और बतखे १५.  हंस,बगुले और बतख कुल मिलाकर ६०
 की संख्या में थे इसलिए हंस सदैव कौओ पर भारी पड़ते थे .कौओ के कुछ घाघ नेता बगुलों के पास
गये और बोले -"बगुला भैया, आप सभी हर दिन नदी के किनारे मछलियो के शिकार के कितनी
मेहनत करते हैं .सुबह से शाम तक पूरी लगन से एकाग्र चित होकर शिकार के लिए लगे रहते हैं .
हमारे पास एक योजना है जिस पर अमल करने से आपको भरण पोषण के लिए बहुत कम मेहनत
करनी पड़ेगी "

बगुले कौओ की बात सुनकर कौओ से  योजना पूछने लगे .कौओ ने कहा-"पीपल और बरगद के पेड़
 पर रहने वालो की सारी व्यवस्था के लिए एक मुखिया चुन लेते हैं .आप लोग हंसो को देखिये ,ये लम्बी
उड़ान भरकर मोती चुनते हैं और आप लोग जल के पक्षी होने के बाद भी बड़ी मुश्किल से पेट भर पा रहे
है यदि आप हमें अपना नेता चुन ले तो फिर हम आपके  भोजन के लिए ताजा मछलियों की व्यवस्था
हर दिन कर देंगे"
.
बगुलों ने कहा -"हम हंसो से बैर नहीं ले सकते"
 .
कौओ ने समझाया- "आपको  बैर नहीं लेना है.जिस दिन पेड़ों का नेता चुनेगें उस दिन आपको गायब
रहना है" . बगुलों ने कौओ की बात मान ली .
उसके बाद कौए बतखों के पास गए और बोले -प्यारी बतखो ,आप पेट भरने के कितनी मेहनत करती
 हैं यदि आप हम लोगो को नेता चुन लो तो आपके भोजन का प्रबंध हम कर देंगे ".बतखे लालच में आ
गयी और कौओ के समर्थन में हंसो का साथ नहीं देने का वादा कर लिया .अब कौए हंसों के पास गये
और बोले - "दादा,दोनों पेड़ो का मुखिया चुन लिया जाए ताकि सब आराम से रह सके" .

हंसो ने अपनी जाती बंधुओ की संख्या जोड़ कर नेता चुनने की हामी भर दी .

निश्चित दिन पर नेता चुना जाना था .जिस दिन नेता चुनने का समय आया तो बगुले गायब हो गये.
कौए,हंस और बतखे नेता चुनने में लग गये .चुनाव के लिए एक हंस और एक कौआ उम्मीदवार के
रूप में खड़े थे .हंसो को भरोसा था बतखे इन्ही के पक्ष में रहेगी मगर बतखो ने कहा-"हंस दादा और
कौए भैया हमारे लिए तो दोनों ही अच्छे हैं इसलिए हम किसी के पक्ष या विपक्ष में नहीं जाना चाहती
हैं और ना ही हम चुनाव में मत देंगी ".
अब तो चुनाव में हंस और कौए ही बचे थे .इन दोनों के बीच में मतदान हुआ और हंस हार गये .
                  

सोमवार, 26 दिसंबर 2011

सवाल ..........?

सवाल ..........?

क्यों अन्ना हजारे की लोकप्रियता के सामने राजनैतिक नेता बौने लगते हैं?

क्या चुनाव जीतने के लिए जातिवाद का जहर फैलाना सामाजिक अपराध नहीं है ?

क्या मुस्लिम आरक्षण से मुस्लिम बिरादरी का वास्तव में  भला हो जाएगा?

क्यों राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को राजनैतिक बिरादरी पचा नहीं पाती है ?

क्यों अखरता है जनसेवकों को ,जब जनता खुद के मंच से अपनी आवाज रखना चाहती है?

कैसा कानून होना चाहिए इस पर आम जनता की भागीदारी क्यों स्वीकार नहीं होती है ,
    जबकि उस कानून को आम जनता पर लागू  करना होता है?

क्या लोकपाल के अधिकारों पर संदेह जताना लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमारा अविश्वास नहीं
   दर्शाता है?

जो नेता अन्ना पर आरोप लगाते हैं क्या वे अपने को अन्ना जितना खरा साबित कर सकते हैं?

क्या जन सेवक  नागरिको को आदेश दे इसलिए चुने जाते हैं?

क्या जनहित के मुद्दे को एक दुसरे पर कीचड़ उछाल कर दबा देना देश के हित में है?

यदि कानून बन जाने से कुछ नहीं होगा तो फिर जनलोकपाल को पारित करने में डर कैसा ?

क्या उदारीकरण का रास्ता भारत को सशक्त बना पाया है?

क्या महंगाई के आंकड़े वास्तविकता के निकट हैं और आंकड़े घटने पर वास्तव में गरीब सुखी
   हो पाता है?

क्या गरीब और अमीर का बढ़ता आर्थिक असंतुलन हमारी नीतियों पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगाता है?

क्या संसद की बहस के सामने जनता की बहस मूल्य रहित है?

क्या चुने हुए नेता ही हर बात पर ज्यादा समझ रखते हैं चाहे वे कम पढ़े-लिखे हो ?

ये कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढ़ नहीं पा रहा हूँ , मदद कीजिये.                

शनिवार, 24 दिसंबर 2011

लोकतंत्र है कहाँ?

लोकतंत्र है कहाँ?


एक मदारी चौपाल पर अपने बन्दर और जम्बुरे के साथ आ जाता है .डुगडुगी बजाता है .तमाशबीन
इकट्टे हो जाते हैं फिर जम्बुरे की आँखों पर मदारी काली पट्टी बाँध देता है और जम्बुरे को जमीन
पर लेटा देता है .जम्बुरा भी अनपढ़ और मदारी भी अनपढ़ ,मगर सवाल पेट का है,इसलिए मजमा
लगाता है ,डुगडुगी बजाता है और जम्बुरे से सवाल करता है -

 मदारी - जम्बुरे ,बता लोकतंत्र है?
जम्बुरा- उस्ताद, तमाशा देखने वाले त्रस्त है इसका मतलब लोकतंत्र है.

मदारी- जम्बुरे, कुछ और पहचान बता.
जम्बुरा- सरदार, हित की बात पर फब्तियां, अहित की बात पर शाबासी.
 
मदारी-लोकतंत्र का रंग कैसा होता है ?
जम्बुरा-उस्ताद, गिरगिट की तरह... कभी भगवा, कभी हरा, और कभी सफेद.


मदारी- क्या लोकतंत्र के आँखें होती है?
जम्बुरा- उस्ताद, आँखे तो होती है मगर या तो बंद होती है या नीची.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र करता क्या है?
जम्बुरा- सरदार, गपल्ले.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र के पैर होते हैं ?
जम्बुरा- उस्ताद, पैर तो होते हैं मगर अढाई दिन में एक फलांग आगे और एक फलांग पीछे चलता है.
   

मदारी-जम्बुरे, लोकतंत्र के हाथ होते हैं या नहीं ?
जम्बुरा-उस्ताद, हाथ तो होते हैं मगर बाँध के रखता है.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र खाता क्या है?
जम्बुरा- गरीब की हाय, मजबूर से रिश्वत.


मदारी- जम्बुरे लोकतंत्र का पेट कैसा होता है ?
जम्बुरा- हराम का पचा जाता है मगर बाहर से पिचका हुआ दिखता है.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र खुश कब होता है?
जम्बुरा- उस्ताद, जागते को सपना दिखा कर.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र रोता कब है?
जम्बुरा- कभी पांच साल में तो कभी मंझधार में.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र की ताकत क्या है?
जम्बुरा- पैसे में बिकते वोट.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र सोता कब है?
जम्बुरा- उस्ताद,दिन के उजाले में.


मदारी- लोकतंत्र के कपडे कैसे होते हैं?
जम्बुरा- उस्ताद, मुझे तो दिखाई नहीं देते.


मदारी- लोकतंत्र का चेहरा कैसा?
जम्बुरा- चेहरा नहीं उस्ताद, चेहरे पर चेहरा.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र में सुखी कौन?
जम्बुरा- इस लोक में तो तंत्र सुखी.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र कहाँ नहीं ?
जम्बुरा- मुझ में, तुझ में और अपने बन्दर में.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र है कहाँ ?
जम्बुरा- ".........................................."












शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

अब चोर जमात है खतरे में

अब चोर जमात है खतरे में


ये इन्कलाब के नारे ,
ये बगावत के नारे, 
अब सहन नहीं होंगे;
क्योंकि-
यह जेहाद फैलाते है, 
सोये हुए को जगाते है, 
कायरों में जान फूंकते है. 
इसी इन्कलाब ने- 
फिरंगियों को खदेड़ा था, 
भारतीयों को जोड़ा था, 
आपातकाल को मरोड़ा था,
आज यही इन्कलाब- 
बच्चे,बुड्ढे,युवा,सब के खून में उबल रहा है; 
सच्चाई का गरमागरम लावा उगल रहा है; 
अधिकारों को पाने का संग्राम सिखा रहा है; 
चुने हुए शातिरों पर सीधी अंगुली तान रहा है.
यह बुझने वाला दीया-
पल-पल नयी मशाल जला रहा है.
यह बुझने वाला दीया 
पल-पल नयी जोत फैला रहा है.
टिमटिमाते दीये पर, 
आंधी बन कर टूट पड़ो.
मुट्ठी बनते हाथों पर, 
 कहर बन कर फूट पड़ो.
अभिव्यक्ति की आजादी पर, 
सीधा-सीधा वार करो .
अधिकार मांगनेवालो पर, 
मुक्का बन कर बरस पड़ो.   
सख्त लोकपाल के आने पर, 
हर दल का पग है दलदल में .      
भूलो अपने मतभेदों को 
अब चोर जमात है खतरे में






रविवार, 18 दिसंबर 2011

हिन्दुस्तान कब कहेगा ?

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने कहा है कि ब्रिटेन एक ईसाई देश है और ''हमें ये बताने
 में डरना नही चाहिए''.


सवाल यही से उठता है हम विश्व को कब कहेंगे कि भारत भी हिन्दू राष्ट्र है.हमारे नेता अपने 
को सर्वधर्म का सिर्फ सन्देश सुनाते हैं मगर तुष्टिकरण कि राजनीति करते हैं.

जब ये लोग मंच से मुस्लिम तुष्टिकरण कि बात सार्वजनिक रूप से करते हैं तो कोई भी दल 
यह कहने का साहस नहीं करते हैं कि ये गलत है, यह अन्याय है, पक्षपात कि राजनीति है.


आज हिन्दू अपने ही देश में बेगाना हो गया है ,नेता लोग एक ही भाषा समझते हैं -वोट 
और वोट बैंक. हिन्दू भी यदि संगठित रूप से वोट बैंक बन जाए तो क्या मजाल हिन्दू हित 
कि अनदेखी हो, मगर हिन्दू कि आपस कि लड़ाई ही उसे डूबा रही है.


क्या दलित, अनुसूचित जनजाति,जनजाति ये सभी हिन्दू नहीं है ?मगर हिन्दुओ को आपस में 
लड़ाकर विभेद पैदा किया जा रहा है और राजनीति कि रोटियाँ सेकी जा रही है .


आरक्षण के नाम पर ,जाती के नाम पर ,धर्म के नाम पर हिन्दू हितों को ही कोसा जाता है ?
कोई दल यह नहीं कहता कि आरक्षण का आधार जाती नहीं आर्थिक स्थिति होनी चाहिए ?


जाती के नाम पर दलित,अगड़ा,पिछड़ा ,जनजाति ,अनुसूचित जाती ये सब हिन्दुओ को तोड़ने 
या कमजोर करने वाली बातें है.


जब कोई नेता ऐसा बातें मंच से करता है तो कोई भी आवाज नहीं होती है,ये कैसा सर्वधर्म 
समभाव है ?एक को सुविधा और एक कि अनसुनी .


दोष भी हिन्दुओ का है क्योंकि वे वोट बैंक नहीं हैं .            

गुरुवार, 15 दिसंबर 2011

क्षणिकाएँ -- जन लोकपाल

क्षणिकाएँ 

जन लोकपाल  


सरकारी कयास,
जनता के,
फोड़ लो- कपाल,
अन्ना के प्रयास-
जन लोकपाल .



सम्पूर्ण भ्रष्टाचार,
नहीं मिटा सकता,
जन  लोकपाल.
इसलिए -
सरकार चाहती है लाना,
low -कपाल .


जन लोकपाल के
अर्ध  विराम,
मंजूर नहीं है.
उभर रही है,
आम सहमती ,
लग जाए ,
पूर्ण विराम.
 






  

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

मनुष्य स्वभाव का विश्लेषण

 मनुष्य स्वभाव का विश्लेषण 

मानस मर्मज्ञ मुरारी बापू के श्री मुख से मनुष्य स्वभाव का विश्लेषण सुना ,तब लगा की हमारे पौराणिक 
ग्रन्थ गहन विश्लेषण के बाद ही लिखे गए हैं .मनुष्य का स्वभाव कितने प्रकार का हो सकता है .हम यदि 
किसी के स्वभाव को समझ सकने में सफल हो जाते हैं तो बहुत से व्यवधानों से बच सकते हैं .मनुष्य 
का स्वभाव हमारे महर्षियों ने १४ प्रकार का बताया है -


१.मिट्टी -मिट्टी का स्वभाव पानी डालने पर कोमल और पानी सुखाने पर कठोर होता है .जब तक 
      ज्ञान दो ,समझ दो तब तक कोमल और जैसे ही ज्ञान देना बंद करो स्वभाव पुन:कठोर हो जाता है. 


२.छलनी-जब अनाज छानने के लिए छलनी में अनाज डाला जाता है तब छलनी के छिद्रों से अधपका
    और कणी अनाज बाहर निकल जाता है .छलनी सार रूप अनाज को अपने अन्दर रख लेती है ठीक 
    इसी तरह मनुष्य का भी स्वभाव होता है ऐसे लोग सार बात को ग्रहण कर लेते हैं और थोथी बातें 
    बाहर फ़ेंक देते हैं .


३. भैसा - भैसा आलस का प्रतिक माना गया है ,भैंस दिन भर पानी में रहने के बाद भी पानी पीने का 
       काम घर पर ही करती है और पानी से निकल कर गन्दा कीचड़ खुद पर उंडेल लेती है ,ठीक ऐसा
      भी स्वभाव होता है सही स्थान ,समय और परिस्थिति का उपयोग नहीं कर पाते या फिर आज के 
      काम को कल पर टालते रहते हैं और जग हंसाई के काम कर बैठते हैं. 


४. हंस   -हंस उपयोगी वस्तु को ग्रहण कर लेता है और विवेकशील प्राणी होता है ,किसी के काम में 
        बाधा नहीं डालता है इसी तरह के स्वभाव वाले लोग विवेकशील होते हैं .जानबूझ कर आग 
        लगाने का काम नहीं करते हैं .


५.तोता  - तोता रट्टा लगाने वाला जीव है जो अर्थ समझे बिना सिर्फ रटता रहता है ,ठीक ऐसे ही 
      स्वभाव वाले लोग सूक्तियों या मर्म को समझे बिना शास्त्रों को घोकते रहते हैं जबकि पल्ले कुछ 
      भी नहीं पड़ता है और उनका ज्ञान भ्रम या छलावा उत्पन्न कर देता है.


६.घोडा   -     घोड़े पर बैठकर घुड़सवार जब उसका मार्गदर्शन करता है तब तक घोडा लक्ष्य की और 
         दौड़ लगाता है और घुड़सवार के उतरते ही एक जगह खडा हो जाता है यानि इस तरह के लोग 
        जब तक हाथ में डंडा होता है तब तक काम करते हैं .डंडा गायब होते ही पहले जैसा बन जाते हैं .


७.बिल्ली  -बिल्ली को रबड़ी खिलाओ या बादाम केसर का दूध पिलाओ मगर चूहा देखते ही छलांग 
     लगाती है .ऐसे आदमी को स्वार्थी स्वभाव की उपमा दी गयी है. 


८.कोआ -काक की गंदगी में चोंच मारने की बुरी आदत होती है.कोआ अकृतज्ञ होता है .इस प्रकार के 
     इंसान जिस व्यक्ति के कारण उन्नति हुई है उसका भी नुकसान करने से नहीं चुकते हैं.


९.मच्छर  -मच्छर स्वभाव के लोग अकारण ही बक-बक करने लग जाते हैं तथा शांति और आराम में 
       खलल डालने का काम करते हैं.दुसरे का सुख -चैन इन्हें फूटी आँख नहीं सुहाता है.


१०.जोंक या ज्लौक   -पानी में आडी होकर चलने वाली जंतु जो दुसरे का खून चूसने का स्वभाव रखती
       है इस स्वभाव के लोग जानबूझ कर आग  लगाते हैं और दबे कुचले का खून चुंसते हैं. 


११.छिद्र कुम्भ  ऐसा घडा जिसके पेंदे में छेद हो .ऐसे लोग कोई भी बात नहीं समझने वाले मुर्ख होते हैं.
        समझ बिलकुल टिकती नहीं ,ज्ञान को तुरंत बाहर फेंक देते हैं .


१२.पशु  -पशु अभ्यास तथा चिंतन रहित जीने वाला प्राणी है.पशु और भैंस में इतना ही अंतर है की पशु 
     पानी के तट को छिछ्लाता नहीं है जबकि भैंस पानी पीकर सिंग से पानी को छिछला कर देती है.


१३.सांप    - सांप को दूध पिलाने पर भी जहर ही उगलता है उसके पास विष के अलावा कुछ भी नहीं 
       होता है ,ऐसे लोग उपकार का बदला भी अपकार से चुकाने वाले होते हैं .


१४.पत्थर  -पत्थर पर कितना ही शीतल जल बरसा दो मगर उस की कठोरता पर कोई फर्क नहीं पड़ता 
       इस प्रकार के लोग प्रेम और संवेदना से रहित होते हैं .


       हमें पग-पग पर ऐसे ही लोग मिलते रहते हैं यदि हम उनके स्वभाव को परख नहीं पाते हैं तो 
जीवन भर हानि उठाते रहते हैं. 
   

मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

यह भी सच है ---------

यह भी सच है ---------

 जनहित की चुपड़ी बातों से चौपाल पर वोट फँसाये जाते हैं.


किसान का पसीना तब तक ही खुशबूदार होता है जब तक वह वोट नहीं दे देता.

दलित के घर फेरी देने से राज सिंहासन का शुभ योग बन जाता है.


राजतिलक के लिए युवराज ही चुना जाता है, बुद्धिमान नहीं .


गांधी विचार के लोग बखेड़े खड़े कर देते हैं इसलिए गांधी जाती को मजबूत करते हैं .


अल्पसंख्यक वेतरनी नदी को पार लगाने वाली नौका ही तो है .


आयात किये गये विचार देशी पुराणों कि सूक्तियों से बढ़कर माने जाते हैं .


विदेशो में सम्मान पाने के लिये स्वाभिमान को बेच देना किफायती सौदा है. 


दागी लोगों को ही मंदिर रास आते हैं ,शरीफ तो दूर से ही कन्नी काट लेते हैं .


महंगाई को कम करने के लिये आंकड़ों के झाड़ पर वार कीजिये .


समस्या का सबसे अच्छा हल उसे अनदेखा करने में है.


सवा सौ को खुश करने से इक्कीस है एक घर की चमचागिरी करना.


पूंछ को मजबूती से पकड़ के रखिये आप कहीं ना कहीं तो पहुँच ही जायेंगे .


राम सुमिरन से जग पार और वंश सुमिरन से चुनाव पार . 


वादा करने में कंजूसी क्यों ,कंजूसी अमल करने पर रखिये.


मुकर जाना या धोखा देना कला है ,सज्जन इसमें अनाड़ी सिद्ध होते हैं.


दाम से काम, सफलता का शोर्ट-कट फॉर्मुला है.


जन सामान्य का पेट सरकार की आलोचना करने से भर जाता है.


न्याय की बात से दुश्मनी पनपती है इसलिए गूंगे बहरों के दुश्मन कम होते हैं.


अवमानना का दोषी नेता नहीं होता है,क्योंकि वह पहुँच से परे है.


अड़ियल लोग सच को पकडे रहने की बेवकूफी करते हैं,दूर द्रष्टा छोड़ देते हैं .


दौ कौमो में संघर्ष -संभावना है शीघ्र चुनाव होंगे.


शहर की सड़के साफ है ,मतलब लाल बत्ती इस रास्ते से जायेगी.    





           

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

गूंगी बस्ती ...........jagran junction forum

गूंगी बस्ती ...........


गूंगी बहरी जिन्दी लाशें, हर तरफ बिखरी पड़ी है .
आज यहाँ की सारी बस्ती, दिन में भी सोयी पड़ी है.


बस्ती में बसते गूंगों को, सही गलत की कहाँ पड़ी है.
जान बची तो लाखों पाये,सड़ते सच की किसे पड़ी है.


लड़ पड़ते छोटी बातों पर, बड़ी बात की किसे पड़ी है.
मेरी माला - तेरी टोपी,हर बात यही पर फँसी पड़ी है.


आग लगी है जिसके घर में ,तुमको उसकी क्यों पड़ी है.
बुझ जाये तो मिल के आना,जंग लड़ने की कहाँ अड़ी है.


लुटपाट चोरी मक्कारी, दलदल में यह नाव धंसी है.
चोर लुटेरे करे फैसले ,सच सुने ,कहे,तो मौत खड़ी है.  

      

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

थूंक के चाटना

थूंक के चाटना  


भरी दोपहर में बच्चों के हो-हल्ले ने हमारी नींद में खलल डाल दी थी, रविवार को ही थकान उतारने का
समय मिलता है और इस दिन भी बच्चों का हंगामा .हम तेस में आ गए ,फटाफट कमीज डाली और
निकले बच्चो को सबक सिखाने .

 बच्चों इस भरी दोपहरी में क्यों चिल्ला रहे हो ?

एक बच्चा बोला -"अंकल ,हम सरकार -सरकार खेल रहे थे मगर टौमी ने गलत फैसला लिया इसलिए
ये हो-हल्ला हो गया."

हमने टौमी की खबर ली -क्यों रे ,क्या फैसला कर दिया की इतना हंगामा कर दिया ?

टौमी बोला-"अंकलजी ,हम दूकान लगा रहे थे इसलिए रामू ,शामू ,बबली ,बबलू की दुकाने बंद करने का
आदेश दिया ,लेकिन ये मेरी बात को मान ही नहीं रहे थे .

हमने उन बच्चों से पूछा -टौमी को तुम लोगो ने अपना लीडर चुना और इसकी बात भी नहीं मानकर
तुम खेलने की जगह लड़ने लग गये,ऐसा मत करो ,और बिना हो-हल्ला किये खेलो .

बच्चे बोले-अंकल ,हम जब तक फैसला टौमी नहीं बदलता है तब तक नहीं मानने वाले.ये हम चारों को
नुकसान पहुंचा करके खुद अकेला दूकान चलाना चाहता है.

हमने कहा-बच्चो ,टौमी की सोच बड़ी है .देखो ,टौमी की बड़ी दूकान से तुम लोगो को चोकलेट सस्ती
मिलेगी .ये ज्यादा मात्रा में खरीद कर सस्ता लेगा और तुम्हे भी सस्ता देगा .

मेरी बात का विरोध कर रामू बोला -लेकिन अंकल हम चारों की तो दुकाने बंद हो गयी ना .हम ये बात
नहीं मानेगे .तभी शामू चिल्लाया -अंकल -हाय-हाय .

मेरे विरोध में सभी बच्चे नारे लगाने लगे तो मेने उनको डपट कर चुप किया और बोला -टौमी ,इनकी
बात मान ले और हंगामा ख़त्म कर .

टौमी सभी बच्चों को अपने खिलाफ देख बोला -अंकल ,आप कहते हैं तो मैं अपना फैसला बदल लेता
हूँ ,अब इन चारों की दुकाने बंद नहीं होगी .

सभी बच्चे खुश हो गये .तभी बबलू बोला -हम टौमी को इसे माफ नहीं करेंगे .हम उसको एक शर्त
पर अपने साथ खेलने देंगे यदि वह थूंक कर चाटे.

बबलू की बात सुन कर मुझे भी पसीने आ गये .अब तो सभी बच्चे बबलू के समर्थन में एक हो गये .
मैं तो बिना बात ही फँस गया था ,अब कैसे बच्चो को समझाया जाए .बच्चे फिर हो-हल्ला करने लग
गये .टौमी भी बेचारा बन गया था .थोड़ी देर के हंगामे के बाद टौमी ने कहा -मैं एक शर्त पर ही थूंक
कर चाटूंगा?

सभी बच्चा पार्टी ने हो-हल्ला बंद किया और टौमी से शर्त पूछी .टौमी ने कहा -मेरे थूंक कर चाटने के
बाद खेल शान्ति से चलेगा और लीडर मैं ही रहूंगा.

बच्चे थोड़ी देर विचार विमर्श में लग गये और फिर टौमी की बात मान ली .

टौमी भी खुश होकर झट से अपनी हथेली पर थूंका और फट से चाट लिया .

बच्चो का खेल फिर से शुरू हो गया और मेने भी आई आफत को टलते देख घर का रुख किया            

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

गीता - निराशा और असफलता से मुक्ति की गाथा

गीता - निराशा और असफलता से मुक्ति की गाथा 


हम दौ बाते सहने में असमर्थ होते है -पहली वस्तु दु:ख और दूसरी असफलता .इन दोनों ही परिस्थियों में 
व्यक्ति टूट जाता है ,उसे हर अगला कदम हताशा से भरा लगता है .जब भी व्यक्ति हताश होता है तो उसे 
दुनिया के सभी रंग फीके लगते है ,उसे अपने जीने का मौह भी नहीं रहता है. 


निराशा और असफलता में साम्यता - व्यक्ति के निराश होने और असफल होने के विभिन्न कारण हो 
सकते हैं लेकिन इन परिस्थियों में साम्यता भी है .जब भी हम इन परिस्थितियों से गुजरते है तब हमें 
अपना लक्ष्य बहुत दूर लगता है ,हमारी चेतना कुंठित हो जाती है,विवेक काम करना बंद कर देता है ,मन 
ऐसे समय में आँसू ही बहाता है .इन परिस्थियों से सहज रूप से कैसे बचे ?किन सिद्धांतो से जिए की हम 
पर बुरा समय अपना प्रभाव न दिखा पाये. इसका सही उत्तर है" श्रीमद भगवद गीता "


गीता पर चर्चा से पहले हम यह समझ ले की असफलता क्यों मिलती है?


असफल होने के कारण -


१.कमजोर इच्छा शक्ति का होना -हमारे में प्रबल इच्छा होनी चाहिए ,जैसे अन्तरिक्ष में उपग्रह को स्थापित 
करते समय उसकी उड़ान की तीव्रता प्रबल रखी जाती है .तोप से निकलने वाला गोला भी प्रबल गति के 
कारण सटीक स्थान पर मार करता है ,ठीक इसी तरह इच्छा शक्ति भी प्रबल होनी चाहिये.


२.बार -बार बदलता लक्ष्य - हम जब अपना लक्ष्य तय करते है उसके बाद उसका पीछा करने में पूरी तरह 
एकाग्र नहीं रहते ,थोड़ी सी भी लक्ष्य में बाधा दिखाई देने पर हम उस लक्ष्य को छोड़ नया लक्ष्य तय कर 
लेते हैं जबकि होना यह चाहिये की लक्ष्य पर पहुँचने के लिए एक योजना के असफल होने पर दूसरी 
योजना का क्रियान्वन .


३.विषय वस्तु पर कमजोर पकड़- हम गहन अध्यन के बिना ही किसी काम को शुरू कर देते हैं ,हम 
प्राप्त सूचनाओं का विश्लेकष्ण नहीं करते हैं और विपरीत परिणाम प्राप्त करते हैं.


४.ढिंढोरा पीटना - आपकी योजना बहुत गुप्त रहनी चाहिये जब तक की आपका काम ख़त्म होने को 
नहीं आ जाता ,मगर व्यक्ति अपने ही मन्त्र को अपनी ही योजना को बडाई मारने के लालच में उगल
देता है और असफल हो जाता है.

५.समय सीमा नहीं बनाना -व्यक्ति अपना लक्ष्य तय कर लेता है ,बढ़िया योजना बना लेता है और 
क्रियान्वन भी शुरू कर देता है मगर समय सीमा नहीं रखने से समय ही उस योजना को चाट जाता है.


६.स्वयं का गलत मूल्यांकन -हर आदमी दूसरों का मूल्यांकन बहुत मितव्ययता से करता है मगर खुद 
का मूल्यांकन बढ़ चढ़ कर करता है और मुझे सब कुछ आता है, का भ्रम पाल लेता है ,इस गलती का 
परिणाम असफल बना देता है.


७.पूर्वाग्रह - व्यक्ति जो पूर्वाग्रह में जीता है ,मन ही मन प्रश्न करता है और मन ही मन से जो उसे उचित 
लगे वह उत्तर गढ़ लेता है ,ऐसे व्यक्ति सत्य को परखना ही नहीं चाहते और असफल जीवन जीते हैं.


८.बिना विचारे काम करना - हम समय ,परिस्थिति ,स्थान ,सहयोगी और प्रतिस्पर्धी को समझे बिना 
काम कर लेते हैं और असफल होकर रोते रहते हैं.


९.अनुत्साह और आलसीपन -जब भी हमारा उत्साह कमजोर पड़ जाता है या हम काम के प्रति सजग 
नहीं रहते तब हम अवश्य ही काम बिगाड़ लेते हैं .


१०.अकर्मण्यता और टालमटोल - करने योग्य काम को नहीं करना और न करने योग्य काम करने से 
या फिर कर्तव्य कर्म को टालते रहने से हम असफल हो जाते हैं .


कैसे सफलता की तरफ ले जाती है भगवद गीता 


भगवद गीता निराशा से मुक्त कर देती है ,हर श्लोक अपने आप में परिपूर्ण है .महाभारत में कृष्ण सिर्फ 
सारथि धर्म को ही निर्वाह करते हैं ,मतलब यह की यदि मनुष्य प्रबल आत्मविश्वास से कर्म करने के 
पग भरता है तो प्रकृति उसका मार्गदर्शन करने के तैयार रहती है ,जरुरत है मजबूती से खडा होने की .
गीता "मेरापन " और " हमारा पन" यानि स्वार्थ तथा एकता की भावना के हानि और लाभ को दिखाती 
है.गीता दैवीय गुणों के विकास का मार्ग दिखाती है .गीता कर्म के हर अंग की विवेचना तर्क संगत रूप 
से करती है,गीता नीति को स्थापित करवाती है ,गीता अन्याय से लड़ने की शक्ति देती है ,गीता प्रेम के 
रूप का सूक्ष्मता से वर्णन करती है .गीता सच्चे वैराग्य में जीना सिखाती है ,गीता मृत्यु के भय से 
मुक्त करती है ,गीता निराशा को सहज ही तौड़ देती है .गीता कठिन परिस्थियों से संरक्षण करना सिखाती 
है .गीता व्यवस्था सिखाती है .इतनी बड़ी कौरव सेना से जीतना कोई आसान काम नहीं था लेकिन सही 
व्यवस्था से बड़े बड़ों पर काबू पाया जा सकता है .


गीता की व्याख्या ,टीका जरुर पढ़े .आप किसी भी धर्म के हो मगर जीवन को सच्चे अर्थ में जीना चाहते हैं 
तो विभिन्न विद्वानों द्वारा की गयी गीता की व्याख्या को पढ़े ,समझे और अमल करे .सी राजगोपालाचारी 
विनोबा,गांधी सभी दिग्गज स्वतंत्रता सेनानियों पर श्रीमद भगवत गीता का गहरा प्रभाव था 


हम अपने अमूल्य ग्रन्थ का बार बार मनन करे और निराशा से मुक्त हो सफल जीवन जिये.              

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

स्मार्टनेस

 स्मार्टनेस 


झूठ बोलना एक कला है ,मेहनत का काम है क्योंकि झूठ बोलने के बाद बोलने वाले को बोला गया झूठ
हर वक्त याद रखना पड़ता है ,बार-बार बोले हुए झूठ को स्मृति कोष में संचय करके रखना पड़ता है ,यदि
सावधानी नहीं रखी जाती है तो जबान कभी भी सच्च उगल देती है और झूठ नंगा हो जाता है.

किसी को विश्वास दिला कर धोखा देना सामान्य बुद्धि वाले का काम नहीं है.धोखा देने से पहले संवेदनाओं
और मन के कोमल भावों की ह्त्या करनी पड़ती है ,इसमें तपना पड़ता है .चेहरे पर प्रेम के बनावटी भाव
लाना और उसे बनाए रखना ,एक  लम्बी साधना है धोखा देना .

शब्दों से भ्रम फैलाने के लिए शब्द कोष को खंगालना पड़ता है ,विद्वता का काम है यह .विभिन्न अर्थ वाले
शब्दों का प्रयोग कोई हंसी खेल नहीं है.भ्रम में सामने वाला घाघ यदि नहीं फंसता है तो उन्ही शब्दों की
व्याख्या बदल देना एक निपुणता वाली बात है .

छल की रचना करना कोई सामान्य योजना बनाने जैसा नहीं है .असत्य को सही ठहराना और सटीक तर्क
प्रस्तुत करना एक कठिन विद्या है .

करोडो लोगों को मुर्ख बनाना भी विद्वता की निशानी है ,किसी को झांसे में लेने के लिए सुनहरे सपने
बुनने के लिए दिन रात एक करना पड़ता है ,नए पुराने ग्रंथों को पढ़ना पड़ता है उसके बाद पूर्ण रूप से
नयी कहानी तैयार करनी पड़ती है.

वर्ग विभेद फैलाना भी दुष्कर काम है ,इसमें विभिन्न जातियों के धर्मों का अध्ययन करना पड़ता है ,
उनकी दुखती नस को पकड़ना  पड़ता है,विभिन्न वर्गों की एकजुटता को तोड़ना पड़ता है ,धीमा जहर
फैलाना बहुत दुष्कर कर्म है .

काम निकाल लेना भी एक कला है ,इसके लिए प्रेम का ढोंग रचना पड़ता है ,स्नेह दिखाना पड़ता है ,
लोगो की समस्याओं से सिफ्त पूर्वक झुड़ने का दिखावा करना पड़ता है जब तक काम बन नहीं जाता
है तब तक सहन करना पड़ता है