शनिवार, 24 दिसंबर 2011

लोकतंत्र है कहाँ?

लोकतंत्र है कहाँ?


एक मदारी चौपाल पर अपने बन्दर और जम्बुरे के साथ आ जाता है .डुगडुगी बजाता है .तमाशबीन
इकट्टे हो जाते हैं फिर जम्बुरे की आँखों पर मदारी काली पट्टी बाँध देता है और जम्बुरे को जमीन
पर लेटा देता है .जम्बुरा भी अनपढ़ और मदारी भी अनपढ़ ,मगर सवाल पेट का है,इसलिए मजमा
लगाता है ,डुगडुगी बजाता है और जम्बुरे से सवाल करता है -

 मदारी - जम्बुरे ,बता लोकतंत्र है?
जम्बुरा- उस्ताद, तमाशा देखने वाले त्रस्त है इसका मतलब लोकतंत्र है.

मदारी- जम्बुरे, कुछ और पहचान बता.
जम्बुरा- सरदार, हित की बात पर फब्तियां, अहित की बात पर शाबासी.
 
मदारी-लोकतंत्र का रंग कैसा होता है ?
जम्बुरा-उस्ताद, गिरगिट की तरह... कभी भगवा, कभी हरा, और कभी सफेद.


मदारी- क्या लोकतंत्र के आँखें होती है?
जम्बुरा- उस्ताद, आँखे तो होती है मगर या तो बंद होती है या नीची.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र करता क्या है?
जम्बुरा- सरदार, गपल्ले.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र के पैर होते हैं ?
जम्बुरा- उस्ताद, पैर तो होते हैं मगर अढाई दिन में एक फलांग आगे और एक फलांग पीछे चलता है.
   

मदारी-जम्बुरे, लोकतंत्र के हाथ होते हैं या नहीं ?
जम्बुरा-उस्ताद, हाथ तो होते हैं मगर बाँध के रखता है.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र खाता क्या है?
जम्बुरा- गरीब की हाय, मजबूर से रिश्वत.


मदारी- जम्बुरे लोकतंत्र का पेट कैसा होता है ?
जम्बुरा- हराम का पचा जाता है मगर बाहर से पिचका हुआ दिखता है.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र खुश कब होता है?
जम्बुरा- उस्ताद, जागते को सपना दिखा कर.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र रोता कब है?
जम्बुरा- कभी पांच साल में तो कभी मंझधार में.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र की ताकत क्या है?
जम्बुरा- पैसे में बिकते वोट.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र सोता कब है?
जम्बुरा- उस्ताद,दिन के उजाले में.


मदारी- लोकतंत्र के कपडे कैसे होते हैं?
जम्बुरा- उस्ताद, मुझे तो दिखाई नहीं देते.


मदारी- लोकतंत्र का चेहरा कैसा?
जम्बुरा- चेहरा नहीं उस्ताद, चेहरे पर चेहरा.


मदारी- जम्बुरे,लोकतंत्र में सुखी कौन?
जम्बुरा- इस लोक में तो तंत्र सुखी.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र कहाँ नहीं ?
जम्बुरा- मुझ में, तुझ में और अपने बन्दर में.


मदारी- जम्बुरे, लोकतंत्र है कहाँ ?
जम्बुरा- ".........................................."












कोई टिप्पणी नहीं: