शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

सशक्त था फिर भी कौमा में............!!!

सशक्त था फिर भी कौमा में............!!!

मेरे देश के नेता ,सचमुझ आप जनता को उल्लू बना गए हैं! न नौ मन तेल होगा ना राधा
 नाचेगी. जब मजबूत लोकपाल लाना ही नहीं था तो सारी कवायद किसलिए की गयी?


जनता भ्रष्टाचार से परेशान थी ,है मगर उससे निजात दिलाना कोई दल नहीं चाहता है.क्योंकि 
दूध का धुला कौन है या फिर हमाम में सब ..........!!


जनसेवक के मुंह से अन्ना की आलोचना.... मतलब सियार को शेर की मांद में घुसने से 
जयमाला नहीं मौत ही मिलती है,और अन्ना भी भ्रष्ट नेता को शेर की मांद में घुसाने का कह
 रहे थे !!


अन्ना आन्दोलन मुंबई में फ्लॉप हो गया !जनता के लापरवाह होने का मतलब लोकपाल लटक 
गया !!लापरवाही का फल अन्ना को नहीं जनता को ही सहते रहना है!!! 
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                                                चुटकला

पहला दल-मैंने  तो जोकपाल   की कमर तोड़ दी .


दुसरा दल-मैंने तो जोकपाल  की टांग मरोड़ दी .


तीसरा दल-मैंने तो जोकपाल की जबान खींच ली 


चौथा दल-मैंने तो जोकपाल की नस काट दी .


पांचवा दल-यह करामात तुम लोगों ने नहीं की है ,ये तो हमारी करामात थी जो ऐसा जोकपाल 
 लाये की उसमे कोई जान ही नहीं थी .
   

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