शुक्रवार, 30 दिसंबर 2011

बधाई हो! अन्ना का लोकपाल लटक गया.

 बधाई हो! अन्ना का लोकपाल लटक गया. 

सुबह-सुबह वर्मा मिठाई के साथ हमारे घर पर धमक गये.हमने कुशल क्षेम पूछी .आज वे बहुत खुश
नजर आ रहे थे .हमने उनके चेहरे पर फुट रही ख़ुशी को देख कर पूछा-

वर्माजी,आज बहुत खुश नजर आ रहे हो ?क्या कोई परमोशन हो गया है क्या?

वर्माजी बोले -भाईसाहब ,इसे आप परमोशन ही समझ लीजिये. बधाई हो!लोकपाल लटक गया है.
वर्माजी हमारे पडोसी थे और सरकार के ऊँचे ओहदे पर विराजमान भी थे .हम कुछ समझ नहीं
पाए थे इसलिए उनसे विस्तार से जानना चाहा .
उन्होंने खुश होकर बताया-अन्ना की मांग पर जब देश के लोग भ्रष्टाचार पर आवाज बुलंद कर रहे थे
तब हमारी तो जान पर बन आई थी .हमारा केरियर ही पानी पानी हो रहा था.बड़ी रकम चुकाकर यह
मलाईदार नौकरी पायी थी कि अन्ना टपक पड़े .हम तो सचमुच के फँस गये थे .लाखो रूपये बाँट दिए थे
और लोकपाल के कारण उस पैसे की रिकवरी की संभावना पर पानी फिर रहा था .शनि देव की साढासाती
साफ दिखाई दे रही थी मगर भला हो सरकार का की वो लच्चर बिल लायी जिस पर सहमती बननी नहीं
थी और रात बारह बजे जनसेवकों ने लोकपाल की बारह बजा दी .

हम हेबताये से उनका चेहरा देख रहे थे और उनके द्वारा लाया गया मिठाई का डिब्बा हमें मुंह चिढ़ा रहा था .
वर्माजी के जाने के बाद हमने टी.वी.  पर समाचार लगाए तो सुनाई दिया की लोकपाल लटक गया है .

हमारा दिल रोने को कर रहा था की दरवाजे की घंटी फिर से बज गयी .अनमने भाव से दरवाजा खोला
तो सामने नेताजी खड़े थे .हाथ में लड्डू भरा थाल था .हमें देखते ही बोले -लो लड्डू खाओ बेटा!
हमने पूछा -नेताजी,चुनाव तो होने बाकी है .अभी से लड्डू ?

नेताजी बोले-बेटा ,यह चुनाव जीतने के लड्डू नहीं है ,यह तो लोकपाल के लटकने की ख़ुशी में बाँट रहा हूँ .

हमने पूछा -नेताजी,लोकपाल के लटकने से आपको क्या ....?

वो बोले-बेटा,अब पुरानी फाइल खुलने का डर नहीं है,अन्ना के कारण तो जान ही सांसत में आ गयी थी .
एक बार तो लगा मृत्यु घंट बजने ही वाला है ,भगवान् के जाप भी चालु करवा दिए थे ,दिन रात यही चिंता
थी की अब क्या होगा? जमा धन भी जनता लूट लेगी और चक्की भी पिसवाएगी. जो होता है,अच्छा ही
होता है ,बड़ी मेहनत के बाद सब कुछ पहले जैसा हो गया इसलिए पूरी गली में लड्डू बाँट रहा हूँ.

नेताजी के जाने के बाद हमने लड्डू को जोर से आँगन में फ़ेंक दिया और मायूस होकर मातम मनाने
लगे ,मगर आज हमें सुख पूर्वक मातम भी नहीं मनाने दिया जा रहा था .हम घर की कुण्डी लगाकर रोना
चाहते थे की दरवाजे की घंटी फिर बज गयी .दरवाजे पर धर्मिबाबू खड़े थे .
हमने उनको अन्दर आने का आग्रह किया .आज बाबू बड़े खुश थे .हमने उनके चेहरे पर ख़ुशी देख कर
पूछा-बाबू आज बहुत खुश हैं क्या बात है?

धर्मिबाबू बोले-चाचा ,रेलवे की नौकरी करते अभी दौ ही बरस हुए थे की अन्ना की नजर लग गयी .इतनी
उम्र में भी बन्दर गुलाट मार रहा था.एक तो मुसीबत के मारे मुसाफिर को सोने के लिए बर्थ दो और वह
भी बिना कुछ दक्षिणा के .हम रात-रात भर जागते हैं ,घर बार छोड़ रेल के धक्के खाते हैं ....

हमने उनकी बात को बीच में काटकर उनसे पूछ ही लिया -मगर इसके बदले में वेतन तो मिलता ही है.

वो बोले -चाचा,आप भी ....इतने से वेतन के लिए कौन इस धंधे में आता है,ऊपर का व्यवहार है इसलिए
इस काम में बैठे थे .अन्ना के साथ लोगों का हुजूम देखकर तो एक बार तो मेने नौकरी छोड़ देने की ठान
ली .भला हो आपकी बहु का कि उसने हिम्मत बँधायी.लक्ष्मी के व्रत चालु किये .अन्ना को सुम्मती के
लिए मंदिरों में प्रार्थना की.अन्ना बीमार पड़े ,अनशन टूटा तो कुछ आस बंधी ,लगा देश की जनता फिर से
कुम्भकरण की नींद में सो गयी है और उधर देवदूतों ने लोकपाल को लटका दिया .आप अब मेरे द्वारा लायी
मिठाई खाईये .

धर्मी के जाने के बाद हम भी दफ्तरों के काम से बाहर निकले .बाहर सड़क पर मायूस लोगों की भीड़ थी
चेहरे उतरे हुए थे मगर हर दफ्तर में आज रोनक थी .सब खुश थे .अन्ना की हार का जश्न चल रहा था .

हमने अपनी अर्जी बाबू को दी -बाबू ने आँखे तरेर कर कहा -चल बे ,कल आना .आज तो लोकपाल के
लटकने का जश्न है ,कल आना,काम हो जाएगा मगर हेकड़ी दिखाते खाली हाथ मत आना ,वरना काम
लोकपाल की तरह लटक जाएगा.

हम सुनहरे सपने को जल्द भूल जाना चाहते थे जो अन्ना ने दिखाया था और मन को समझा रहे थे कि
बेटा जिस तरह तेरा बाप जीया था उसी तरह से तू भी जीना सीख ले और बच्चो को भी सिखा दे क्योंकि
कोयले को कितना ही दूध से धोले मगर फिर भी वह काला ही रहेगा .            

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