सोमवार, 31 दिसंबर 2012

हम नहीं चाहते हैं कि बुराइयाँ रुके ........

हम नहीं चाहते हैं कि बुराइयाँ रुके ........

अँधेरे का विकराल अस्तित्व तब तक कायम है जब तक कोई लौ जलती नहीं है।हम कब तक
अँधेरा -अँधेरा पुकारते रहेंगे और एक दुसरे से कहते रहेंगे कि देखो,अँधेरा कितना भयावह हो
गया है।हमारे चीखने और चिल्लाने भर से अँधेरा खत्म हो जाता तो अब तक हुआ क्यों नहीं ?
हम गला फाड़ -फाड़ कर सालों से चिल्ला रहे हैं।हम दोष दर्शन कर रुक जाते हैं,हम दुसरे पर
दोष डालने के आदी हो गए हैं।हम चाहते हैं कि मैं कुछ भी कर सकता हूँ मगर दुनिया सदैव
मेरे साथ अच्छा सलूक करे।

        समस्या मूल रूप से यह है कि हम खुद को नैतिक,ईमानदार,सदाचारी और निर्भीक नहीं
बनाना चाहते हैं मगर हम चाहते हैं कि मुझ को छोड़कर सब नैतिक बन जाये!!

    भ्रष्टाचार की लड़ाई में लाखों लोग झुड़े मगर किसे ने भी सामूहिक रूप से सच्ची निष्ठा के
साथ यह कसम नहीं खायी कि मैं और मेरे बच्चे अब से भ्रष्ट आचरण नहीं करेंगे।नतीजा
ढाक के तीन पात .......

  बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर हमने खूब प्रदर्शन किया मगर किसी ने भी सामूहिक
रूप से सच्ची निष्ठां के साथ यह कसम नहीं खायी कि अब से हम या हमारे परिवार से किसी
को बलात्कारी नहीं बनने देंगे .....

  हमने सामजिक बुराइयों को हटाने के लिए कभी ठोस संकल्प नहीं लिया।हम चाहते हैं की
सामाजिक बुराई से कोई और व्यक्ति लड़े और मैं दूर से देखता रहूँ ,यह स्वप्न कैसे सच हो
सकता है ?

   हम या हमारा पुत्र जब रिश्वत का पैसा घर लाता है तो हम खुद को बुरा या पुत्र को बुरा नहीं
कहते हैं हम उसे समझदारी मान लेते हैं और दूसरा वैसा ही काम करता है तो हमारा नजरिया
बदल जाता है और वह भ्रष्ट आचरण लगने लगता है ,यह दोहरा नजरिया ही समस्या का मूल
है।

   जब हम गलत काम करते हैं और पकड़े जाते हैं तो खुद को निर्दोष साबित करने की पुरजोर
कोशिश करते हैं और दूसरा वैसा ही कर्म करता है तो उसे अपराधी मान लेते हैं।यह दोगलापन
कभी सभ्य और सुंदर समाज का निर्माण नहीं कर पायेगा।

 हम चाहते हैं कि पहले मैं या मेरा परिवार अकेला ही क्यों सुधरे,पहले वो सुधरे जिन्होंने बड़ा
अपराध किया है।हम खुद के अपराध को छोटा मानते हैं और दूसरों के अपराध को बड़ा।हम
इन्तजार करते हैं कि पहले जग सुधर जाए, खुद को बाद में सुधार ही लेंगे।

   यदि हम देश को सुधारने के फेर में पड़ेंगे तो बहुत समय गँवा देंगे मगर उससे ज्यादा नहीं
उपजा पायेंगे।यदि हम खुद को सुधार ले तो देश सुधरने में वक्त नहीं लगेगा।

  हम अनैतिकता का डटकर विरोध करे यह कदम अति आवश्यक है लेकिन साथ ही साथ
हम सामुहिक रूप से दृढ संकल्प करे कि हम खुद नैतिक और सदाचारी बनेगें।क्या हम
ऐसा करेंगे .... ? या यह प्रतीक्षा करेंगे कि पहले दुसरे लोग ऐसी प्रतिज्ञा करे और उसका पालन
करे ,यदि दुसरे लोग सुधर जायेंगे तो हम भी सुधर जायेंगे।

  देश के निर्माण के लिए हम ना तो अपराध करे और ना ही अपराध सहें।अच्छे परिणाम के
लिए हमे अपने कर्म अच्छे बनाने पड़ेंगे,यही एक रास्ता है जिस पर देर सवेर चलना पड़ेगा।
                      

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

कहाँ आकर खड़े हो गये हम ?

कहाँ आकर खड़े हो गये हम  ?

पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण करते-करते हम कहाँ आ गये ? हमने अपनी संस्कृति छोड़ी
अपनी सभ्यता छोड़ी अपने सदग्रंथ छोड़े अपना परिवेश छोड़ा।हम बिना विचार किये छोड़ते
गये अपने आचार-विचार को अपनी वेशभूषा और संस्कृति को और अंधे होकर खोटे - खरे,बुरे-
भले का विचार किये बिना ही नए विचारों के नाम पर पाश्चात्य सभ्यता को अपनाते गये ,
नतीजा हम दिशा विहीन हो गये हैं और आज राष्ट्र अनेक समस्याओं से ग्रसित हो गया है।

              हमने अपनी आश्रम जीवन प्रणाली को छोड़ा अपनी गुरुकुल प्रणाली को छोड़ा ,
उसकी जगह सह -शिक्षा को अपनाया ,मूल्यांकन कीजिये कि हमने क्या अर्जित किया।
हमारे युवा जो पहले वीर्यवान, उर्जावान, नैतिक, सुसंस्कृत, विद्वान,सदाचारी और सद्
व्यवहारी थे अब उनमे सभी सदगुणों की कमी झलकती है ,क्यों तथा इसके लिए
जिम्मेदार कौन ?

          ब्रह्मचर्य  आश्रम में 25 वर्ष की आयु तक रह कर विद्या अर्जन करना तथा सुयोग्य
नागरिक बनना होता था।इस काल में गुरु अपने शिष्यों को सुयोग्य नागरिक बनाता था,
विद्वान व्यक्ति बनाता था यानी गुरु अबोध बालक का सृजन करता था मगर वह व्यवस्था
लोप होने के बाद स्कुली शिक्षा पद्धति आई और उसके साथ ही सह शिक्षा।क्या यह शिक्षा
पद्धति हमारी संस्कृति का गौरव बढ़ा पायी है ?

            हम कहते हैं कि ये तो आदम के जमाने की सोच है?इस युग में यह संभव नहीं।आज
 विश्व कहाँ पहुँच गया है!विज्ञान कितना आगे निकल गया है!! ये सब तर्क हम दे सकते हैं
मगर मुद्दा यह है कि फिर सामाजिक समस्याएँ बढ़ी क्यों ? यदि हम आधुनिक हो गए हैं
तो हमारे समक्ष समस्यायें नहीं होनी चाहिए थी ?

            सह शिक्षा ने नारी का क्या भला किया ? सह शिक्षा ने इस देश की संस्कृति का क्या
भला किया ?हमे तुलनात्मक विचार करना ही पड़ेगा।

          हमने अपना परिवेश छोड़ा,क्या हमारे पूर्वज अपने परिवेश से असभ्य लगते थे ?
विवेकानंद और गांधी के चरित्र को जानने वाले,तिलक और पटेल को समझने वाले  इस पर
क्या तर्क देंगे ? जिस देश में युवा नारी शक्ति और लक्ष्मी के रूप में पूजीत है उस देश की नारी
पर आज जुल्म क्यों हो रहे हैं ? आज देश की नारी का स्वतंत्रता के नाम पर जितना शोषण
हो रहा है उतना इस देश की नारी का कभी नहीं हुआ था।वैदिक नारी का परिवेश और ज्ञान
आज से अच्छा था।वैदिक नारी की बोद्धिक योग्यता और व्यवहार ऊँचे दर्जे का था। भारतीय
परिवेश सोम्य था।पहनावा विकृतियों को कम कर देता है ,क्या यह सही नहीं है ?

        हर कोई कह रहा है कि समय बदल गया है,नैतिकता का ह्रास हो रहा है। बात सही है
परन्तु इसके लिए जबाबदार कौन ? इसके लिए हम सब कहीं ना कहीं जबाबदार हैं। विकृतियों
को रोकने के लिए कानून ही कठोर हो ,यह पूर्ण हल नहीं है।कानून कठोर हो और उसका पालन
भी पूर्ण रूप से शासन करवाए मगर हम भी नैतिक बने ,सद व्यवहारी बने,सौम्य परिधान
अपनाएँ, अपनी संस्कृति के अनुसार आचार विचार करे।सही और गलत परम्पराओं पर गहन
विचार करे आधुनिक बनने के लिये विचारों का स्तर ऊँचा होना चाहिए।

      हमारे चित्रपट,संचार साधन जो फूहड़ता दिखा रहे हैं उन्हें भी सोचना होगा क्योंकि वो जो
दिखाते हैं उसका असर अपरोक्ष रूप से करोड़ों लोगों पर पड़ता है।नारी देह को केन्द्रित कर
विज्ञापन दिखा कर व्यवसाय बढ़ाना या सिनेमा में फूहड़ दृश्य दिखाना क्या समस्याओं को
अनजाने में ही बढ़ावा देना नहीं है?

    सभ्य समाज के निर्माण के लिए कानून व्यवस्था, नागरिक,आध्यात्म,संस्कृति,विज्ञान
कला सभी क्षेत्र को एक मंच पर आकर सोचना होगा,तभी नए समाज का निर्माण होगा ।                             

रविवार, 23 दिसंबर 2012

माँगने गये न्याय और मिला क्रूर अत्याचार

माँगने गये न्याय और मिला क्रूर अत्याचार 

जलियाँवाला  काण्ड फिरंगियों ने गुलाम भारतीयों  पर किया उसे भूलना मुश्किल है
क्योंकि इस देश में आजादी के बाद भी आजाद भारतीयों पर इस तरह के क्रूर काण्ड
होते रहते हैं।

कानून जनता के लिए, जनता के द्वारा, होता है मगर इस देश के अहंकारी नेता इस तथ्य
को भूल जाते हैं। जब-जब भी इस देश में कोई अनाचार, अत्याचार होता है इस देश की
सरकार या तो खोटे  लुभावने वायदे करती है या कोरे आश्वासन देती है मगर पीड़ा का
माकूल ईलाज नहीं करती है , यह प्रश्न युवा भारतीयों से सहा नहीं जाता है और इसका
ठोस उत्तर पाने के लिये जब भी देश की संसद की ओर कूच करता है उसे मार-ठोक कर
भगा दिया जाता है।

जब -जब भी देश में कानून व्यवस्था पंगु और जर्जर हुयी है उसका खामियाजा आम
जनता को ही भुगतना पड़ा है क्योंकि विशिष्ट लोगों की सुरक्षा हो जाती है। संसद में
अच्छी लच्छेदार भाषा में बहस हो जाती है और स्वार्थी पक्ष देश हित को गौण करके
बहुमत के जोर पर कुछ भी करा लेने में सक्षम हो जाते हैं।क्या इसे ही सच्ची और सही
आजादी कहा जाएगा?

एक बेटी की इज्जत सरे आम देश की राजधानी में तार-तार हो जाती है परन्तु इस देश
की सरकार उस बेटी से अपनी जर्जर व्यवस्था के कारण हुए क्रूर अत्याचार के लिए उस
बेटी से माफी के दौ शब्द तक नहीं कह पाती है,यह सरकार देश को यह भी आश्वासन नहीं
दे पाती है कि आगे से हमारी व्यवस्था में ठोस परिवर्तन किये जायेंगे और किसी भी बेटी
को बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का सामना नहीं करना पडेगा।

   यदि यह बेटी किसी बड़े नेता की होती तो क्या संसद चुप बैठ जाती ?क्या जो बेटे न्याय
की गुहार लगाने सडकों पर उतरे वो यदि किसी नेता के होते और उस पर पुलिस अमानवीय
तरीके से लाठियाँ बरसाती तो नेता चुपचाप सहन कर लेते? आम जनता को कह देते हैं कि
सब्र रखिये कानून अपना काम कर  रहा है मगर यह वाकया किसी विशिष्ट के घर पर घटता
तो न्याय की परिभाषा तुरंत नहीं बदल जाती? मगर आम जनता की किसे पड़ी है? वह  तो
वोट दे दे और पाँच साल के लिए सहती रहे।

     मुझे गर्व होता है उन युवाओं पर जो अपरिचित बेटी,बहन के लिए सरकार से टकरा रहे हैं
मुझे गर्व है उन बहनों पर जो लाठियां खाकर भी इस संग्राम में खड़ी है।मुझे गर्व है उन वृद्ध
पुज्यनीयों पर जो भयंकर सर्दी में भी कड़े कानून के लिए ठिठुर रहे हैं ,मगर हमारे सिस्टम
का जर्जरित ढाँचा देश का सिर झुक देता है।

    जो नेता देश की अस्मिता की कसम खाते हैं वे देश की बेटियों को त्वरित कानून देने में भी
ढील कर रहे हैं,यह देश का पहला बलात्कार नहीं है ,जनता सहन करती आई है इसलिए और
सहन करती रहे क्या यही व्यवस्था बची रह जायेगी?

  जब भी कोई जन आन्दोलन देश करता है चाहे वह भ्रष्टाचार के खिलाफ हो या लच्चर व्यवस्था
के खिलाफ ,सरकार अपनी कमी को सुधारने की जगह जनता पर ही दमन कर देती है। इस
नजरिये को बदलना पड़ेगा क्योंकि आज का युवा अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बन रहा है।               

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध

विकृत सोच से बढ़ते हैं अपराध 

बुरी चीज शीघ्र फैल जाती है क्योंकि उसमें शक्ति लगाने की आवश्यकता नहीं पडती है।
किसी चीज के निर्माण में काफी समय लगता है और उसकी निरंतर देख-रेख रखनी
पडती है मगर उस चीज का विध्वंश करना हो तो बहुत ही कम समय लगता है।

         बलात्कार एक जघन्य अपराध है और इस के लिए दोषी को कठोर दंड होना भी
चाहिए मगर केवल पुरुष वर्ग को ही दोषी ठहरा देना पूर्ण सत्य नहीं है।

         कोई भी अपराध विकृत कल्पना में जन्म लेता है वही विकृत कल्पना विचार
बन जाती है।विकृत विचार एक परमाणु के समान है जो नष्ट नहीं होता है और वह
उस विकृत पुरुष के अवचेतन मन में दबा रहता है।विकृति जब दबी रहती है तो
वह अतृप्त इच्छा बन जाती है और उसे पूरा करने के लिए जो कर्म होता है उसे हम
अपराध कहते हैं।

          हर काम के पूर्ण होने में कुछ परिबल कारण बनते हैं जैसे-समय,स्थान,स्थिति,
बल,सहायक आदि। जब ये चीजें एक साथ मिल जाती है तो काम पूर्ण होने की संभावना
बढ़ जाती है। काम उपकार का हो अपराध का कुछ परिबलों का मिलना अनिवार्य होता है।

         विकृतियों से संघर्ष करने के लिए या उनका उन्मूलन करने के लिए केवल दण्ड
नीति ही पर्याप्त है ऐसा मानना सही हल नहीं है।दण्ड से विकृति कम हो सकती है पर
समाप्त नहीं होती है।केवल बाहरी ईलाज ही काफी नहीं है मानसिक ईलाज भी साथ
चलना चाहिए।

      बलात्कार जैसी विकृत समस्या से निपटने के लिए हमें कुछ सावधानियां रखनी
होगी -

        दण्ड की सूक्ष्मतम व्याख्या करना और विधान को कठोर बनाना।

        नारी वर्ग की स्वतंत्रता को प्रोत्साहित करना परन्तु स्वच्छंदता को कम करना।

        नारी के कार्य का समय रात्रिकालीन बहुत कम रखा जाएँ और यदि अति आवश्यक
        है तो उसकी समुचित सुरक्षा व्यवस्था की जबाबदेही निश्चित की जाये।

        नारी पुज्य रूप में प्रतिष्ठित रहे इसलिए घर के बड़ों को चाहिए कि उसके वस्त्र
       चयन में सौम्यता झलके वैसे वस्त्र ही उसे पहनाएं क्योंकि वस्त्र यदि फूहड़ होंगे तो
       उनसे भी विकृति उत्पन्न होंगी।

       पाश्चात्य सभ्यता का अन्धानुकरण ना हो उसकी अच्छी बाते ही अपनाई जाये।

       विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जीवन मूल्यों ,मानवीय मूल्यों और संवेदनाओं,
       तथा लोक व्यवहार की शिक्षा अनिवार्य रूप से पढाई जाये।              

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

मोदी की जीत का कारण: मोदी

मोदी की जीत का कारण: मोदी 

गुजरात के चुनाव के बाद नतीजे की देश प्रतीक्षा कर रहा है।मोदी जीतेंगे ,यह गुजरात का
सच है।इस बार युवा मतदाताओं के कारण, मोदी का जादू 140+ विधायक निश्चित रूप से
लायेगा।जिन सीटों पर BJP पिछली बार कम मतों से हारी थी वे तो झोली में हैं ही मगर
कांग्रेस की राष्ट्रीय स्तर पर हो रही आलोचना भी कांग्रेस को गुजरात से हासिये पर धकेल
देगी!!

मोदी की जीत के तीन प्रमुख कारण होंगे -

 मोदी की कार्यशेली
 मोदी की विकास नीति
 मोदी के गरीब मेले की सफलता

कांग्रेस की हार के तीन प्रमुख कारण होंगे - 

केन्द्र सरकार में हुये बड़े-बड़े गपल्ले यानी भ्रष्टाचार!
बेतहाशा बढती महँगाई और गलत आर्थिक नीतियाँ !
गुजरात में बिना नेता का टोला !    

गुजरात की जीत मोदी की जीत है।जनता ने वोट सिर्फ मोदी के नाम पर दिये हैं! 

गरीबी खत्म हो चुकी है!!

गरीबी खत्म हो चुकी है!! 

महँगाई को,
सरकारी आंकड़े,
कच्चा ही खा रहे हैं,
दिन -प्रतिदिन,
सिकुड़ते गरीब को,
धनवान बना रहे हैं!
जबसे-
गरीबी हटाओ का,
नारा दिया है,
तब से-
बत्तीस के धनवान!
नित्य- निरंतर,
देश में पनप रहे हैं!!
महँगाई को कोसना,
देश के अमीरों की,
आदत बन चुकी है;
फाईल कहती है,
चार रुपल्ली में,
दौ जून की रोटी,
आराम से मिल रही है!
चीखना चिल्लाना,
बिलखना और रोना,
इस देश की जनता की,
आदत बन चुकी है!
आंकड़ों के मुताबिक,
इस देश से गरीबी,
कब की ख़त्म हो चुकी है!!!






  

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

ये कैसा फर्ज


ये कैसा फर्ज 

माँ -बाप के प्रति श्रद्धा मेरे देश में कम होना मन को ठेस पहुँचाता है।पुत्र की कामना के
लिए भगवान् की चोखट पर मन्नत मांगने वाले माँ -बाप जब पुत्र पा जाते हैं और उसमे
अपने सुखद बुढ़ापे के सपने देखते हैं तो उन्हें सुकून मिलता है।बच्चों के लिए अपनी
हर सुविधा को न्योछावर कर जब वे बूढ़े हो जाते हैं। यदि  उनका जवान बेटा उनके सपनों
को निर्ममता से तहस -नहस कर देता है तो उनके दिल पर क्या गुजरती होगी ,इस बात
को महसूस करने के लिए  एक छोटा सा वृत्तांत दे रहा हूँ जो सत्य है-

               बात करीब दस साल पुरानी है।मेरे एक परिचित मुलत: राजस्थान के रहने
वाले हैं।उनके पिताजी ने इकलोते बेटे के लिए जीवन भर पुरुषार्थ कर पाई-पाई जोड़ी
और बेटे को सुरत में कपड़े की थोक व्यापार की दूकान करवा दी। बाप के द्वारा मिले
धन से बेटा सुरत में सेट हो गया और अपने व्यापार को काफी फैला लिया।

              एक दिन मैं उनकी दूकान पर बैठा था तब उनके गाँव से उनके पिताजी की
चिट्ठी आई।उन्होंने चिट्ठी पढ़ी और मुझे बताया कि उनके पिताजी की तबियत ठीक
नहीं है और उन्हें मिलने के लिए गाँव बुलाया है।

            मेने कहा-आपको गाँव पड़ेगा ,क्योंकि आप उनके इकलोते बेटे हैं?

उन्होंने कहा- बात तुम्हारी सही है परन्तु इस समय सीजन चल रही है।शादी ब्याह का
समय है।इस समय कपड़े में काफी बिक्री रहेगी और गाँव चला गया तो 15-20दिन लग
सकते हैं ऐसे में उन्हें संभावित बिक्री से होने वाले फायदे से वंचित रहना पडेगा।

मेने कहा- लेकिन आपके पास कोई विकल्प भी नहीं हैं ?

वो बोले- एक विकल्प है ,मैं उन्हें 20000/- का ड्राफ्ट भेज देता हूँ,शायद उनके पास पैसे
नहीं होंगे इसीलिए बुला रहे होंगे।पैसे मिल जाने से वे अपना इलाज करा लेंगे।

  बात यहीं पर हम दोनों के बीच उस दिन आई गई हो गयी और अगले दिन उन्होंने
20000/- का बैंक ड्राफ्ट बना कर गाँव भेज दिया।

       8-10के बाद उनके पास गाँव से रजिस्टर्ड पोस्ट से एक लिफाफा आया जो उनके
पिताजी ने भेजा था उन्होंने उस पत्र को पढ़ा और मुझसे कहा- मेरे पिताजी एकदम
बचकाना हरकत कर रहे हैं।मैने उनको 20000/-भेजे, उन्होंने वापिस लौटा दिए हैं।

मेने पूछा- ......वापिस क्यों लौटा दिए ?कुछ लिखा होगा ?

वो बोले- हाँ ,लिखा है ....और उन्होंने वह पत्र मुझे दे दिया। मेने उस पत्र को पढ़ा।
उसमे लिखा " बेटे,तुम्हारा जबाब मिला और साथ में ड्राफ्ट भी।मेने अपनी तबियत
अस्वस्थ थी इसलिए तुझे गाँव आने का लिखा था।तूने जो रूपये भेजे हैं वो तो मेरे ही
दिए हुए थे उसका कोई तकाजा मेने नहीं किया इसलिए ये रूपये वापिस भेज रहा हूँ।
मेने तो अपने बेटे को बुलाया था जो इस अवस्था में मुझे सहारा दे सकता था लेकिन
पैसे कमाने की चिंता मेरे स्वास्थ्य से बढ़कर है तेरे लिए,यह जानकार मुझे दु:ख हुआ।
तुम वहां सुखी रहो ,मेरी चिंता मत करना।मैं जैसे तैसे अपनी गाडी चला लूंगा।

    मेने वह पत्र अपने परिचित मित्र को वापिस दे दिया।कुछ दिनों बाद मालुम चला
कि मेरे परिचित व्यापारी के पिता का देहांत गाँव में हो चूका है और उनका इकलोता
बेटा  सुरत से सपरिवार अंतिम संस्कार के लिए गया है।

     यह घटना मुझे झकजोर गयी थी।मेरे भारत की यह तस्वीर कैसे बन गयी क्योंकि
मेरी संस्कृति सिखाती है-मातृ देवो भव: पितृ देवो भव: ....कहाँ खो गयी वो भावनाएँ ......                       

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

क्या गुजरात की आलोचना करना फैशन बन गया है?

क्या गुजरात की आलोचना करना फैशन बन गया है?

चुनावी गहमागहमी में राष्ट्रीय नेता गुजरात के चक्कर लगा रहे हैं और गुजरात के विकास की
मनमाफिक व्याख्या प्रस्तुत कर आलोचना करते हैं। मोदी की आलोचना हो सकती है
यह तो राजनीती की बात है मगर गुजरात की गलत आलोचना क्यों?

         आलोचना यदि तथ्यात्मक हो और उसमे दम हो तो सुनने में ठीक लगती है मगर
गलत तथ्य से की गई आलोचना केवल देश और दुनिया में गलत भ्रम पैदा करती है और
गुजरात इस देश का मानवता विहीन प्रदेश हो ऐसा सबको जानबूझ कर महसूस करा के क्या
ये राज नेता देश का भला कर रहे हैं?

          चुनावी जंग में सब दल अपनी बात रखे और वास्तविकता से जनता को परिचय कराए
यह बात स्वस्थ है लेकिन जो सत्य से विहीन बात है उसे रखना राष्ट्रिय राजनेताओं को शोभा
नहीं देता है।

            गुजरात में कुपोषण देश के अन्य राज्यों से ज्यादा है और कुपोषण के लिए श्री लंका
के कुपोषित बच्चे का चित्र जनता के सामने रख दिया जाता है क्या यह दू:खद नहीं है गुजरात
के लिए।

           गुजरात में प्रति व्यक्ति कर्ज बढ़ गया है ? गुजरात ने कर्ज लिया लिया और धन का उपयोग
विकास के कामो में किया तो क्या क्या यह कर्ज राज्य की सुविधा और सम्पति को पतन के मार्ग
में ले जाने वाला है ,यदि नहीं तो फिर भ्रमित बातें क्यों?

          गुजरात में जनता असुरक्षित जीवन जी रही है ,यह आरोप मनमोहन साहब ने लगा दिया
आरोप लगाने से पहले यह नहीं सोचा कि महाराष्ट्र में फेस बुक पर कामेंट करने से शाहीन को
प्रताड़ित किसकी सरकार में होना पड़ा और वह लडकी अपना सुरक्षित भविष्य गुजरात में क्यों
देखती है? उत्तर सीधा है गुजरात एक दशक से शांति से जी रहा है।

         गुजरात का किसान बेहाल है यह आरोप लगाने से पहले राष्ट्रीय नेता यह नहीं देखते हैं की
पैदावार के हिसाब से गुजरात अग्रिम पंक्ति में खड़ा है ,उन्हें महाराष्ट्र,बिहार,उत्तरप्रदेश के किसानो
की हालत नहीं दिखती जो BPL हैं उन्हें तो गुजरात का समृद्ध किसान भी गरीब दीखता है और
उसे सिद्ध करने के लिए समाचार पत्रों के विज्ञापन में दुसरे प्रदेश के किसान की फोटो लगा कर
झूठ फैलाया जा रहा है।

         गुजरात शिक्षा के क्षेत्र में पिछड़ा हुआ है ,कैसा बेबुनियाद आरोप है। गुजरात के अंतर्राष्ट्रीय
कक्षा के विश्व विद्यालय उन्हें क्यों नहीं दिखाई दे रहे हैं ?गुजरात के बच्चे शिक्षा के क्षेत्र में दौड़
लगा रहे हैं आने वाला समय गुजरात के ज्ञान और प्रतिभा का ही होगा।

        गुजरात का उद्योग आज मजदूरो की कमी से झुझ रहा है।manpower की कमी सब जगह है
अन्य  प्रदेशो से आने वाले लोग भी उस कमी को पूरा नही कर पा रहे हैं यह हकीकत है मगर आरोप
राष्ट्रीय नेता यह लगाते हैं की गुजरात में बेरोजगारी बढ़ रही है।गुजरात पुरुषार्थी लोगो का तीर्थ
स्थान है यहाँ काम करने वाला हर व्यक्ति समृद्ध है और जिसे काम नही करना है वह तो स्वर्ग में
भी बेरोजगारी फैला सकता है।

          गुजरात में बिजली और पानी की व्यवस्था नही है ऐसा आरोप कांग्रेस लगाती है लेकिन
आज इतने उद्योगों को 24 घंटे बिजली कौन दे रहा है ,सरदार सरोवर का पानी किसे मिल रहा है ?

       गुजरात में बड़े उद्योग ही पनप रहे हैं यह आरोप पाया बगेर है क्योंकि गुजरात में बहुत
बड़ी SSI  है छोटे और मध्यम उद्योग जाल की माफिक फैले हुए हैं।

         मोदी प्रसिद्धि घोटाला कर रहे हैं ,कोई भी घोटाला नहीं मिला तो राष्ट्रीय नेता जल भुन कर
मोदी की हर जगह हो रही काम की प्रशंसा को ही मुद्दा बना रहे हैं,क्या आज भारतीय इस नेता का
बखान कर रहा है तो मोदी से कुछ पाकर कर रहा है? क्या विदेशी लोग गुजरात के बिना भारत
अधुरा समझते हैं तो मोदी से कुछ लेकर समझते हैं? आत्म विश्वास वहीं पनपता है जो काम
करना जानता है सिर्फ बातों से कुछ नहीं होता है।

         राष्ट्रिय नेताओं ने गुजरात में आकर गुजरात की आलोचना की,उन्हें गुजरात की विशिष्टताएँ
क्यों नही दिखाई दे रही है?किसी भी राष्ट्रीय नेता ने आरोप जरुर लगाये परन्तु एक भी सकारात्मक
बात नहीं रखी। किसी भी दल ने गुजरात की प्रजा को यह विश्वास नहीं दिलाया की मोदी सरकार
ने जो विकास के झंडे गुजरात में गाड़े हैं उससे बड़े झंडे हमारी पार्टी गाड देगी क्योंकि गुजरात के
बेहतर भविष्य के लिए उनके  पास मोदी से बढिया सोच और योजना है और इमानदारी से अमल
करने का साहस है।

         गुजरात के कर्मठ लोग कर्म में विश्वास रखते हैं,गुजरात की राजनीती को समझना है तो
गुजराती मानसिकता का अध्ययन करना होगा।यह कर्मठ भूमि है ,विकास लोगो के खून में
समाया हुआ है,यहाँ काम ही पूजा है और इसी तथ्य को समझ मोदी शासन कर रहे हैं,अजेय
बने हुए हैं तथा बाकी दल सिर्फ केंकड़ा वृति में फंसे है।                   

सोमवार, 10 दिसंबर 2012

मिलन

मिलन 

रात ढ़लती गई, हम गुनगुनाते गये
शमा जलती रही, हम पिगलते रहे

रात घुटती गई, चाँद चमकता गया
हुस्ने-आग में खुद  को  जलाते रहे

लटा उड़ती गई, तारे झलकते रहे
रात भर गेसुओं से यूँ उलझते रहे

आँखें जगती गई, नशा छाता रहा
वक्त को थामने जाम छलकाते रहे

प्यास बढती गई, लब मचलते रहे
खुद को बचाने में खुद को डुबाते रहे

साँसे रूकती गई,चाँद छिपता गया
फूल खिलता रहा  भँवरे  गाते  रहे  

     

गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

विषं विषमेव सर्वकालम

विषं विषमेव सर्वकालम 

विष सदा विष ही रहता है कभी अमृत नहीं होता जैसे विष अपना स्वभाव नहीं बदलता 
इसी प्रकार अविश्वासी स्वभाव वाला मनुष्य कभी विश्वास योग्य नहीं बना करता।
                                                                                                                 ( चाणक्य )
कभी-कभी राजनीती में जनता भी धोखा खा जाती है और धूर्त के  माथे पर भी राजमुकुट 
रख देती है। क्या जनता के हीन कर्म का भोग धूर्त  को भोगना पड़ता है? ...नहीं,क्योंकि 
वह तो पहले ही सारहीन था बाद में भी सारहीन रहेगा । कर्म का सिद्धांत है जो करता है 
वही भोगता है।पर कर्म का एक सिद्धांत यह भी है कि करे कोई और भरे कोई।विचित्रता
तो तब होती है जब करने वाला भी भोगता है और दूसरा भी भोगता है।

            यदि लोग यह सोच कर नागराज को पालते हैं कि इसको तो मैं रोज दूध पिलाता 
हूँ इसलिए यह मुझे नहीं डसेगा या डस भी लेगा तो रोज दुध पीने के कारण नागराज का 
जहर भी अमृत बन गया होगा और उसका कोई दुष्प्रभाव शरीर पर नहीं पड़ेगा।हम अंधे 
होकर किसी तथ्य की मनमाफिक व्याख्या करने में स्वतंत्र हैं मगर हमारी गलत व्याख्या 
करने से तथ्य नहीं बदल जाता है क्योंकि विष सदैव विष ही रहता है।दुर्जन उदारता का 
व्यवहार पाकर भी अवसर पाते ही अनिष्ट करने से नहीं चुकता है।

             विषेले साँप को कभी भी यह भय नहीं होता है कि विष के कारण समाज में उसका 
अपमान या तिरस्कार होगा।

              जो हो रहा है अच्छे के लिए हो रहा है।जो हुआ वह अच्छा ही हुआ।धूर्त का चरित्र 
जान और परख लेने का सुअवसर मिलने के कारण निकट भविष्य में जो अवसर आ रहा 
है उस पर सही निर्णय अवश्य ही भुक्त भोगी लेंगें क्योंकि वे जान गए है कि अयोग्य फैसला 
लिया तो नतीजा उन्हें भी भोगना है और दुसरो को भी मज़बूरी में भी भोगना पडेगा।            

बुधवार, 5 दिसंबर 2012

FDI ,नेता और आम भारतीय

FDI ,नेता और आम भारतीय 

रिटेल में FDI पर सरकार और नेता क्या कहते हैं इस बात को महात्मा गांधी की विकास
नीति से शुरू करेंगे। महात्मा गांधी वो  शख्सियत है जिसको नमन सब पार्टियां करती है
परन्तु उसकी विचारधारा से भी पर्याप्त  दुरी भी सब ने बना रखी है।गांधी को नमन भी
उनके नाम पर वोट मिल जाते हैं इसलिए ज्यादातर करते हैं।

              महात्मा गांधी के कहने भर से देशवासियों ने विदेशी कपड़ो की होली जला दी
और खादी  के वस्त्र धारण कर लिए ,क्यों हुआ होगा उस समय ऐसा ? क्योंकि उस नेता में
देश प्रेम छलकता था और देशवासी उसका अनुकरण करते थे। गांधी ने कुटीर और लघु
उद्योगों के द्वारा देश के विकास का खाका खींचा क्योंकि गांधी को मालुम था भारत के प्राण
गाँवों में बसते हैं मगर इस विचारधारा को तुरंत ही  हांसिये पर धकेल दिया गया।

              गांधी ने फिरंगियों को बाहर किया ताकि देशवासियों का शोषण भविष्य में ना हो।
क्या उस समय भारत की गरीबी को गांधी नहीं जानते थे?गांधी जानते थे की गरीबी और
गरीब की मज़बूरी क्या होती है इसीलिए तो वे अध नंगा फकीर बने रहे। जो व्यक्ति भारत
की गरीबी को जानता हो क्या उसके पास उसका समाधान नहीं था? समाधान था,इसीलिए
गांधी कुटीर और लघु उद्योग चाहते थे ,सबको स्वाभिमान से जीता देखना चाहते थे,मगर
उनकी नीति को नहीं अपनाया गया इसलिए आज गरीब मिटता जा रहा है।

             अब बात FDI की ,सरकार तर्क देती है कि FDI से बिचोलिये खत्म हो जायेंगे।
यह बात सच है कि करोड़ो बिचोलिये खत्म हो जायेंगे,आत्म हत्या कर लेंगे या भिखारी
बन जायेंगे;मगर ये बिचोलिये हैं कौन? क्या वे भारतीय लोग नहीं हैं या ये विदेशी लोग हैं।
करोड़ो भारतीयों को बिचोलिये  बना कर सरकार उनकी रोटी छिनना क्यों चाहती है?जो
लोग खुद की व्यवस्था बना कर ,खुद की अल्प पूंजी लगाकर,खुद पुरुषार्थ और मेहनत कर
सरकार पर बिना भार बने अपना परिवार पाल रहे हैं वो बिचोलिये कैसे हो सकते हैं वो
तो भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रमुख अंग हैं।उन करोड़ो भारतीयों को बेरोजगारी के खप्पर
में क्यों होमना चाहती है सरकार?

           सरकार का दूसरा तर्क है कि बिचोलिये जब हट जायेंगे तो भारतीयों को सस्ते दामों
पर वस्तुए उपलब्ध हो जायेंगी।किन भारतीयों के लिए चीजें सस्ती होगी? 90%गरीब लोगों
के लिए या 10%अमीर लोगों के लिए ?क्योंकि 90% भारतीय तो गरीब है।क्या भारत में जीने
का वास्तविक अधिकार 10% के लिए ही होना चाहिए ?क्या सिर्फ 10%लोगो के लिए FDI
को लाकर 90%लोगो का शोषण वाजिब होगा?

           सरकार कहती है कि किसान FDI को अपना माल ऊँचे मूल्य पर बेच कर शोषण
मुक्त हो जाएगा ,क्या FDI समर्थित मूल्य से ऊपर दाम किसानो को देगा ?भारत की खेती
छोटे-छोटे भूमि के टुकडो में बँटी हुई है।ज्यादातर किसानो के पास पाँच -सात एकड़ जमीन
भी नहीं है।यदि एक एकड़ में तीन से चार बोरी गेंहू का उत्पादन मान लिया जाए तो 20-25
बोरी गेंहू किसान की पैदावार हुयी ,उसमे से किसान अपने उपयोग के लिए 10-12 बोरी गेंहू
रख लेता है और बाकी बाजार में बेचता है तो क्या FDI गाँव-गाँव जाकर वह धान लेगी ?
हर खेत की उपज का दाना अलग-अलग होता है ,क्या FDI सबके अलग-अलग किस्म के
धान को ऊँचे भाव में खरीद पाएगी?अगर नहीं तो फिर उस धान को कौन खरीदेगा ?बिचोलिये
को तो आप खत्म कर देंगे!

            सरकार कहती है किसान की फसल का 30-35%भाग वर्तमान में नष्ट हो जाता है।
कैसे हो जाता है ?जो किसान दिन रात मेहनत करके सोना उपजाता है वह उसे नष्ट होने देगा ?
किसान  की फसल में प्रमुख रूप से चावल,गेंहूँ मक्का,बाजरा,जीरा,सरसों,चना,मुंग आदि दाले
आती है ,क्या ये फसलें सड़ के खराब हो जाती है?.....फिर क्यों अनर्गल बातें की जाती है।

किसान सब्जियों में आलू,प्याज,लहसुन बड़ी मात्रा में पैदा करता है उसको सहेजने के लिए
कोल्ड स्टोरेज गाँव-गाँव में चाहिए,क्या FDI गाँव-गाँव में कोल्ड स्टोरेज का निर्माण करेगी
और कहेगी -हे किसान!तुम कोल्ड स्टोरेज में अपनी फसल रख लो और जब सही भाव आये
तब बेच लेना!! जो काम सरकार को करना चाहिए वह तो हो नहीं रहा और हम दूसरों के भरोसे
देश को छोड़ देना चाहते हैं।

             सरकार कहती है कि कोई नुकसान देश को नहीं होगा,देश की तरक्की होगी FDI के
आने से ?क्या FDI कोई परोपकारी संस्था है जो अपने देश का धन भारत में लुटाने आयेगी ?
FDI भारत से कमा कर अपने देश में धन ले जाने के लिए आएगी। FDI की दुकाने हर गली
नुक्कड़ में नहीं लगने वाली है इसलिए सब खुदरा व्यापारियों को नुकसान नहीं होगा,यह
सरकार कहती है,मगर 100/-के पिज्जा बर्गर की होम डिलेवरी करने वाली FDI 1000/-के
सामान की होम डिलेवरी नही करेगी?कीमतों को डम्पिंग करके छोटे किराना को नहीं डकार
जायेगी?

       हमारा ही आलू ,हमारा ही प्याज,हमारा ही आटा , मैदा ,हमारे ही आदमी उनका सिर्फ
बनाने का तरीका और उसके बदले में ले लिया चोखा नफा ...यह है FDI .  
                 

सोमवार, 3 दिसंबर 2012

भीड़ का टोटा

भीड़ का टोटा 

नेताजी की,
चुनावी सभा का,
आयोजन तय हो गया।
शामियाना वाला
सस्ते में, 
भोंपू वाला
पांच पर पांच फ्री
स्कीम में,
फूल वाला
पहनी माला वापिस लेकर
आधे में सेट हो गया।
बचा है मसला-
ताली बजाने वालो का,
जो रेट से अपसेट है,
पिछली बार से इस बार,
चढ़े तीन गुणे रेट है।
नेताजी ने पूछा -
ताली बजाने के रेट,
क्यों बहुत ज्यादा है?
महंगाई का दर,
पाँच साल से,
सिर्फ दस टका है।
कार्यकर्त्ता ने कहा -
भीड़ वाला
कुछ यूँ कहता है, 
दस टका का आंकड़ा,
पूरी तरह खोटा है।
इसलिये बाजार में,
ताली बजाने वाली
भीड़ का भारी टोटा है।
      

रविवार, 2 दिसंबर 2012

पतन का कारण


पतन का कारण 


हम सब सफलता चाहते हैं मगर फिर भी लक्ष्य दूर हो जाता है।लक्ष्य के दूर होने का
 कारण क्या है?

शास्त्र पतन के तीन कारण बताते हैं -1. लोभ  2. प्रमाद (आलस्य )3.विश्वास 

लोभ :- लोभ चाहे धन की प्राप्ति का हो,काम की प्राप्ति का हो या सम्पति की प्राप्ति का
     प्रारम्भ में आकर्षक लग सकता है मगर उसका अंत खराब ही रहता है।धन
    यदि बुध्धि से सात्विक प्रयत्न करके पुरुषार्थ से प्राप्त किया जाता है तो सफलता की
    पहचान होता है मगर प्राप्त धन का केवल संग्रह ही हो तो वह धन भी लोभ को बढ़ा
    देने में सक्षम हो जाता है और मन में असन्तुष्टि पैदा कर देता है।बहुत से चरित्रवान
    लोग सामाजिक,राजनैतिक या धार्मिक क्षेत्र में आते हैं और उन में से बड़ी संख्या में
   लोग उस क्षेत्र में आने का असल उद्धेश्य भूल जाते हैं और लालसा ,इच्छा ,लालच के
   चक्रव्यूह में फँस जाते हैं।लोभ जैसे ही उन पर बलवान होता है उनसे अनैतिक काम
   करवा लेता है परिणाम यह होता है कि वे मृत्यु तुल्य दू:ख भोगते हैं।
                   धन कमाना अच्छी बात है परन्तु उसका सदुपयोग करना उससे भी अच्छी
  बात है।धन के सदुपयोग का आडम्बर भी दु:ख देता है,मन को अशांत कर देता है।कीर्ति
  और वाहवाही का लोभ भी शान्ति नहीं देता चाहे क्षेत्र परमार्थिक भी क्यों न हो।

               काम का लोभ नाना प्रकार के बन्धनों में डाल देता हैऔर अपयश का कारण
   बनता है।काम का लोभ रावण की मौत का कारण बना,काम के वशीभूत होकर कामी
  दुराचार में रच जाता है और समाज में अशांति उत्पन्न कर खुद अपराधी का जीवन
  भोगता है।

          जमीन,सम्पति का लोभ महाभारत के भयानक युद्ध का कारण बना।ताकत के बल
   पर,अन्याय के जोर पर,बाहुबल का भय पैदा कर सम्पति का अर्जन कभी भी सुखद
   भविष्य नहीं देता है।


प्रमाद (आलस्य):-  हर काम में प्रमाद की आदत बना लेना पतन का मार्ग है।प्रमाद समय
    के मूल्य को नहीं पहचानता है और समय पुन: आता नहीं है। प्रमाद किसी भी उम्र में हो
    हानि ही पहुंचाता है।विद्यार्थी यदि प्रमाद करता है तो अकुशल रह जाता है,व्यापारी यदि
    प्रमाद करता है तो हानि सहता है,राजा यदि प्रमाद करता है तो सत्ता दुश्मन के हाथ चली
   जाती है, सेवक यदि प्रमाद करता है तो दण्ड का भागी बनता है।परिवर्तन का होते रहना
   एक सिद्धांत है और उसको रोकने की चेष्टा प्रमादी ही करता है जो कुचेष्टा के भयंकर
   परिणाम भी भोगता है।वेद चरेवेति -चरेवेति का मन्त्र देते हैं।विवेका नन्द उठो!जागो!का
   मन्त्र देते हैं।प्रमाद नहीं करने वाला सामान्य प्राणी है और सामान्य गति ही रख पाता है
  तो भी देर सवेर लक्ष्य को पा लेता है।


विश्वास  :- विश्वास  एक विराट शब्द है और उसका सही अर्थ नहीं करने पर पतन का
     कारण बन जाता है। सम्यक विश्वास ,अति विश्वास ,अंध विश्वास या शंका का
     स्वभाव ; इन सब में विश्वास सम्यक होना चाहिए सजग होना चाहिए। विश्वास
    तराजू है ,किसी पर भी विश्वास करने से पहले उसे विश्लेषण पर रखना चाहिए,
    परखना चाहिए,तथ्यात्मक जाँच करनी चाहिए।अति विश्वास आत्मघाती होता
    है ,अंध विश्वास मृत्यु तुल्य परिणाम देता है और शंका का स्वभाव तुच्छ  बना
    देता है।


यदि हम सफल होना चाहते हैं तो इन पर सतत निगाह रखनी चाहिये।              

शनिवार, 1 दिसंबर 2012

चुहिया और शेर

चुहिया और शेर 

जँगल का राजा शेर एक सरोवर के पास बैठा सुस्ता रहा था।शेर को वहाँ देख पानी
पीने के लिए आने वाले पशु दूर से ही वापिस निकल जाते,मगर शेर भी वहां जम
कर बैठ गया था।बेचारे पशु क्या करे ,इन्तजार के सिवा कोई उपाय नहीं बचा था।

   सरोवर से दूर काफी पशु इकट्टा हो गए। सांड ने हाथी से कहा- दादा ,आप तो
शेर से काफी बड़े हैं ,वजनदार डील है फिर शेर से क्यों डर रहे हैं ?

  हाथी बोला- बात डर या मोटे होने का नहीं है दरअसल इस सरोवर में पानी कम
है इसलिए सोचता हूँ कि यदि मैं अकेला सारा पानी पी गया तो आप सब प्यासे
रह जायेंगे इसलिए पानी पीने का विचार बदल चूका हूँ।

   तभी वहां पर गेंडा आ गया उसने भी शेर को देखा तो वहीँ रुक गया। उसे रुकते
देख हाथी ने कहा -गेंडा बेटे ,सरोवर पर पानी पीने आये हो तो यहाँ क्यों रुक गए?

  गेंडे ने कहा-दादा, मैं तो आपको देख कर यहाँ तक चला आया,मुझे प्यास नहीं है
बस आपसे भेंट नहीं हुयी थी इसलिए आपको देख ईधर चला आया।

     थोड़ी देर में बाघ भी पानी पीने आ गया ,मगर शेर को देख वह भी हाथी ,सांड
और गेंडे के पास रुक गया।सांड ने बाघ से कहा -आप बहुत प्यासे लग रहे हैं ,क्या
सरोवर पर जा रहे हैं?

   बाघ ने कहा-नहीं ,मैं तो गुफा की तरफ जा रहा था आप सब को देख इधर चला
आया।यहाँ हाथी दादा,गैंडा भैया को देख मिलने चला आया।

  थोड़ी देर में एक प्यासी चुहिया वहां आ गयी।हाथी,गेंडे,सांड,बाघ को देख वह भी
वहां रुक गयी।गेंडे ने कहा -चुहिया बहन ,क्या पानी पीने जा रही हो?

 चुहिया बोली -हाँ भैया, प्यास लगी है मगर आप सब यहाँ क्या कर रहे हैं ?

सांड बोला- बहन हम तो गप शप के लिए रुक गए हैं।तुम सरोवर तक जा रही हो
तो शेर आका को जगा देना।

  चुहिया सरोवर की तरफ चल पड़ी और सरोवर पर सुस्ता रहे शेर के पंजे पर
खुजाली करते बोली -आका उठो?

 शेर ने कहा-मैं यहाँ सुस्ता रहा हूँ ,शाम तक यहीं रुकुंगा,तुम जाओ।

चुहिया ने फिर खुजाली करते हुए कहा-आका उठो।

शेर ने कहा-तुम चली जाओ ,मुझे सुस्ताने दो।

चुहिया फिर शेर के पंजे पर चढ़ कर बोली-आका उठो।

शेर को आराम के वक्त चुहिया का खलल जँचा नहीं।उसने जोर से दहाड़ कर पंजा
घुमाया , पंजे पर बैठी चुहिया सरोवर के बीच में जा गिरी और मर गयी।

सार- बिना सोचे समझे किसी की बात पर अमल करना  मुसीबत को सामने से न्योता देना है।                        

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

नस पकडिये और दबाइये!!

नस पकडिये और दबाइये!!

नस पकड़ना भी एक विद्या है ,यह कला स्कुल या कॉलेज में नहीं पढाई जाती है।इसको सिखने
के लिए कई शातिर या घाघ लोगों के चरित्र पर PHD करनी पडती है।नस दबाने से जीवन
में सफलता बिना कुछ करे कराये मिल जाती है।जो लोग कहते हैं कि सफलता का बाई पास
नहीं होता उसे नस पकड़ने और उचित समय पर दबाना सीखना चाहिए।

                  हमारे पहचान वाले एक दुस्साहसी ने एक आम आदमी की नस पकड़ी।बेचारा आम
आदमी उसके चरण पखारने लगा और उसकी चरण रज को माथे चढाने लगा।दुस्साहसी को
आम आदमी धीरे-धीरे भेंट चढाने लगा अब तो द्स्साह्सी के मजे हो गए।उसके मजे एक कोतवाल
की आँखों की किरकिरी बन गये और कोतवाल ने उस दुस्साह्सी की नस पकड ली और दबाई।
नस दबाते ही दुस्साहसी घबराया और टें -टें  करने लगा।अब कोतवाल के भी मजे हो गए।जब
मन करा नस दबा दी और सेवा पूजा कराने लगता।

                   कोतवाल की नस विद्या अफसर को समझ पड़ी तो अफसर ने भी विद्या सिख ली और
कोतवाल की नस दबा दी।कोतवाल इशारे पर नाचने लगा और अफसर के मजे हो गये।अफसर की
राजाशाही से उपरी अफसर जल उठा ,मैं बडासाहेब होकर भी मजे नहीं और ये अफसर मजे लूट
रहा है ,बड़े अफसर ने खोज की , नस विद्या की जानकारी हासिल की तो उसका प्रयोग भी कर
दिया छोटे अफसर पर।विद्या ने असर दिखाया और बड़े साहेब के भी ऐश हो गयी।

                 बड़े साहेब की ऐश नेताजी को मालुम पड़ी तो नेताजी ने जांच बैठा दी।जांच से जो रिपोर्ट
आई उसे पढ़कर नेताजी भोंच्चके रह गए।उन्होंने भी जन सेवा का काम दूर करके नस पकड़ने की
विद्या सिख ली,अब तो सब कुछ व्यवस्थित हो गया,सब एक दूजे की नस पकडे थे।सबके मौज थी.
सबको मजे में देख पराये पक्ष के नेता का पेट दर्द करने लगा उन्होंने सबको मस्त देखा तो गहन
छानबीन में लग गए और नस विद्या के कोर्स को सिख गए।अब तो वो भी नस पकड के दबाते रहते
हैं और सुख भोग रहे हैं।

                   नोट:- इस विद्या में सज्जन कहलाने वाले सरल लोग नापास होते रहे हैं और होते रहेंगे।                      

सोमवार, 26 नवंबर 2012

जुगाड़ और तिकड़म

 जुगाड़ और तिकड़म


राजनीतिक दल का,
सदस्य बनने की जुगाड़ में,
हम-
दल के दफ्तर में पहुँचे,
परचा भरा,
सदस्य बन गये;
सभा में बैठे,
कुछ की सुन के,
कान  पक गये,
हम अपने आप उठे ,
और बोले -चुप बे  चोर!!
इतना कहते ही,
मच गया वहाँ,
अफरातफरी और शोर,
तभी
एक सफेदपोश उठा,
और चिल्लाया-
किसने दी?
इस ईमानदार को,
राष्ट्रीय दल में ठोर ?
यह,
हमारे चरित्र को पढ़ता है!
हमें नापता है,तौलता है!
हम जो बोलते हैं, उसे समझता है!
हर बात को भाँपता है,परखता है! 
नहीं समझ पायेगा यह,
देश की राजनीती का यह दौर!!
फेँक दो इसे फिर से सड़क पर,
लगा कर दोनों हाथों का जोर।

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हमने पूछा-
गुरु,
राजनीति और तिकड़म में,
अब  फर्क  क्या?
वो बोले-
वत्स,
गांधी के साथ,
राजनीती और तिकड़म,
थे,
सीधी रेखा के दौ छोर।
गाँधी के बाद, 
समय के साथ,
रेखा की कमर को,
झुकाने का चला खेल!
वो मरोड़ते गये, 
वो झुकती गयी,
झुकते -झुकाते,
अब हो चुके ,
उस रेखा के छोर गोल-मटोल !! 

शनिवार, 24 नवंबर 2012

हो-हा मन्त्र !

हो-हा मन्त्र !

हो-हा करना सिर्फ मूर्खो की ठेकेदारी नहीं है इसके बेहतरीन फायदे देख अच्छे  भले लोग भी
हो-हा करते नजर आ रहे हैं।इस देश में हो-हा मन्त्र से गरीब को नुकसान होता है क्योंकि
यह मन्त्र सिर्फ इस बेचारे की कुंडली में ही नीच घर में बैठा होता है।हो-हा करने से कई बड़ी
गलतियों के कुफल से मुक्ति मिल जाती है।यह मन्त्र अकेले में कम प्रभावशाली मगर
सामूहिक रूप से जपने पर तुरन्त मोटा प्रभाव छोड़ता है। इस मन्त्र का प्रथम अक्षर दम
लगाकर लम्बे श्वास से बोला जाता है।सामूहिक जाप में इसे एक लय में नहीं गाया जाता
है। समूह के लोग जो इसका तुरंत प्रभाव चाहते हैं इसे एक के बाद एक क्षण दौ क्षण के बाद
जोर से चिल्ला कर बोले। 

     हो-हा करने के कई फायदे हैं-

     1.अगर आवश्यक या प्राथमिक काम पूरा नहीं हुआ है या शुरू ही नहीं किया है और उस की
        जाँच होनी हो तो हो-हा करके बचा जा सकता है।

     2.अगर  कोई जबाबदारी थी और उसे निभाया नहीं गया हो तो हो-हा करके बचा जा सकता
        है।

     3. ऐसा  काम जिसके करने से लुच्चई को फंदा लगता हो और बिना लुच्चई के काम नहीं
         चल सकता हो तो हो-हा करना एक वैकल्पिक जरुरत बन जाता है।

      4. अगर झूठ की पोल खुलती हो और उससे झूठ के साबित हो जाने की प्रबल सम्भावना
          हो तो हो-हा का प्रयोग किया जा सकता है।

      5.तेजाबी सत्य जो व्यक्तित्व को नंगा करने पर तुला हो और तथाकथित आबरू नीलाम
          होने की कगार पर हो तो हो-हा करना ही अंतिम ब्रह्मास्त्र होता है।

      6. पुराने इल्जाम और पाप का घड़ा फूटने ही वाला हो तो हो-हा सिरप की तरह काम करता
          है।हो-हा के बीच पाप का घड़ा फूट भी जाए तो आवाज ही नहीं आती है।

      7. हो-हा आसुरी मन्त्र है जिसे असुर और नकली सभ्य समान रूप से जप सकते हैं।यह मन्त्र
          कारगर यानि अनुभूत सिद्ध है जिसका प्रयोग आये दिन (अ)पथ-प्रदर्शक करते रहते हैं।

      8. स्कुल,कॉलेज,सभा,खेल,राजनीती सब जगह, हो-हा प्रभावी उपाय के रूप में काम करता
           है।यदि पढ़ना नहीं है तो हो-हा मचाये , मूल मुद्दे से सभा को भटकाना हो तो हो-हा कीजिये
           कोई बढ़िया या घटिया काम जिसे नहीं होने देना या होने देना है तो हो-हा कीजिये।

      9. हो-हा मन्त्र का उपयोग बच्चे,किशोर,युवा,अधेड़,बुजुर्ग,स्त्री,पुरुष,नपुंसक सभी समान रूप
          से कर सकते हैं।

    10. हो-हा मन्त्र से अखाद्य वस्तुएँ आसानी से व्यावहारिक तरीके से हजम हो जाती है।तेज
          चीख-पुकार में देशी- डालडा सब स्वाहा हो जाता है।

   11. धोखा,विश्वासघात,धूर्तता,छल,ठगी आदि कार्य में इस महामंत्र का सामूहिक जाप कुछ
         मिनिट तक किया जाए तो तुरंत सफलता मिलती है।

   12. चोर,मक्कार,लुटेरे,कर्तव्य विमूढ़,ढ़ोंगी,द्रोही हो-हा मन्त्र का खूब इस्तेमाल करते हैं और
        यह प्रभावी मन्त्र मन चाहा फल भी तुरन्त दे देता है।           

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

दीपक और आतिशबाजी

दीपक और आतिशबाजी 

दीपक टिमटिमाता हुआ अँधेरे को चित्त कर रहा था ,तभी उसके पास पड़ी आतिशबाजी ने
कहा -दीप अब टिमटिमाना बंद करो।इस जमाने में तुझे कौन पूछता है।मुझे देखो ,मैं
आकाश की ऊँचाइयों को छू कर जगमगाती हूँ।

दीप ने कहा - तुम्हारा अहंकार ठीक नहीं है आतिश! ये सही है कि तुम दूर आकाश में जाकर
जगमगाती हो,मगर तेरी वह जगमगाहट क्षणिक है ,कुछ पलों के बाद तेरा अस्तित्व खत्म
हो जाता है मगर मैं जमीन पर रहकर भी लम्बे समय तक अँधेरे से संघर्ष करता हूँ और
लोगो को अँधेरे से लड़ने की प्रेरणा देता रहता हूँ

सार - मिथ्या आडम्बर से बचकर लोक हित का कार्य करने वाला श्रेष्ट होता है।    

रविवार, 11 नवंबर 2012

मच्छर पुराण के महत्वपूर्ण अंश .............

मच्छर  पुराण के महत्वपूर्ण अंश .............

मच्छ पुराण  सनातन काल से है और मच्छर पुराण का उल्लेख ताजा है।विकास की 
परिभाषा में मच्छर कहीं फिट नहीं बैठता है मगर फिर भी नई ऊर्जा उत्पन्न कर देता 
है यह आज का सच है ।

मकड़ियाँ जाले बुनती है, उनमे खुद सुरक्षित रहती है और मच्छरों को फँसा कर पेट
भरती है मगर मच्छर मकड़ियों को डंक मारे और मकड़ी दर्द से बिलबिलाये ऐसा 
सनातन में नहीं परन्तु इस नये दौर का सच है। 

मच्छर के काटने पर खुजला कर आत्म संतुष्टि प्राप्त करना सनातन है मगर अब सिर्फ 
खुजलाने से काम नहीं बनता है।अब मच्छर के जहर से अधिक खुद के खून में जहर 
पैदा करना जरूरी है।

मच्छर गंदगी से फैलता है यह सनातन है मगर गंदगी में रचे बसे कीड़े फलफुल रहे हैं 
और मच्छर कभी कभी भिनभिनाते हैं यह आज का सच है।

मच्छर के काटने पर बैचेनी आती है यह वेद भी कहते हैं मगर किसी दुश्मन को मच्छर 
काटने पर आनन्द हिलौरे मारता है यह वर्तमान का आठंवा सुख है और मच्छर अपनों 
को डंक मारे तो महान दू:ख है ।

मच्छर रोग फैलाते हैं यह सनातन है मगर मच्छर रोगी को बार बार काटे और उसका 
परिणाम निरोगी शरीर का बनना हो यह भी कटु सत्य है।

मच्छर के संगीत से मन उचाट खा जाता है यह सार्वभोमिक है मगर जोंक का मन ही 
उचाट खाए और बाकी का मन खुश हो जाये यह अभी का दर्शन है।

मच्छर से बस्ती परेशान यह सर्वत्र जन का कहना है मगर मच्छर से सिर्फ सत्ता परेशान 
और बस्ती मौज में यह आधुनिक सिद्धांत है।

मच्छर मच्छर होता है यह पोराणिक सच है मगर मच्छर की भी बड़ी औकात होती है 
यह इस जमाने का सच है 

मच्छर के काटने पर आदमी की मौत यह होता आया है मगर मच्छर के काटने से कोबरा 
की मौत यह अभी का सच है  

   
  

शनिवार, 10 नवंबर 2012

भीड़ तंत्र

भीड़ तंत्र 

वो -
काले दाग, 
जो सत्य की कब्र में दफन थे, 
एक मुँह फट की बदोलत, 
सफेद खादी के घेरे को तोड़,
देश भर में बिखर गए हैं।
किसी अकेले के दाग होते 
तो- 
लीप पोत कर साफ कर देते ;
मगर- 
ये तो भ्रष्ट मोतियों की लड़ी है,
जिसका धागा,मोती और पेंडल 
सब काला और वक्र है।
एक काला दुसरे को काला बता रहा है! 
एक चोर दुसरे को चोर बता रहा है !
असमंजस में आम आदमी ? 
चोरो से वफा की बातें सुन रहा है!
और वो  काला- 
किराये की भीड़ को, 
खुद की बेगुनाही का चाँद 
खुद के हाथ में दिखा रहा है!
मगर- 
भीड़ को
उसकी कहाँ परवाह, 
कि, 
वह काला है या सफेद? 
वह तो टकटकी बांधे 
उस ओर देख रहा है,  
जो -
चंद नोटों से इन्हें खरीद लाया है।      

रविवार, 4 नवंबर 2012

झूठा सच

झूठा सच 

देश में फर्जी आंकड़ो के तहत झूठ फैलाना तथाकथित  शिष्ट लोगो के जीवन का अंग बनता
जा रहा है। सिक्के के एक पहलू  को दिखा कर भ्रम पैदा किया जा रहा है।

आंकड़ा आया देश की 40% फसल उचित व्यवस्था के अभाव में नष्ट हो जाती है 

एक किसान से पूछा गया -आपके पास कितना बीघा खेत है?

उत्तर था- तीन बीघा।

आपके खेत में एक फसल कितने बोरी होती है?

गेंहू बोने पर आठ बोरी।

क्या तुम्हारे पास साधन नहीं होने से तीन बोरी गेंहू नष्ट हो जाता है?

उत्तर था- क्यों मेरा मजाक कर रहे हैं बाबू, मेरी पूरी पैदावार से पांच सेर गेंहू नष्ट हो जाता
है क्योंकि फसल को भरने के बोरे नहीं हैं मेरे पास,अगर बोरे  मिल जाते तो सेर भर भी
खराब नहीं होते।
                       ----------------------------------------------

एक माली से पूछा गया - आप सब्जी की बाड़ी में सब्जियां उगाते हैं?

उत्तर था -जी,आधा बीघा जमीन पर बाड़ी की है,चार-पांच तरह की सब्जियाँ बोता  हूँ।

आपके पास सब्जियों को मंडी तक ले जाने के पर्याप्त साधन नही होने से आधी सब्जियां
सड़ जाती है ?

माली बोला -बाबू, आधी सब्जी कैसे सड़ने दूंगा? हर दिन बाड़ी की देखरेख करता हूँ,जो
सब्जी पैदा होती है उसे ताज़ी ही साईकिल पर रख कर कस्बे में ले जाता हूँ और बेच
देता हूँ।
                      --------------------------------------------------

एक फल वाले से पूछा - आपने क्या बोया है।

उत्तर था -चीकू की फसल लेता हूँ।

क्या आपके पास साधन नही होने के कारण चीकू पेड़ पर या खेत में पड़े-पड़े सड़ जाते हैं

उत्तर था -बाबू,आप शहर से आये लगते हैं।पेड़ पर चीकू पका हुआ नहीं पैदा होता।फल को
लगाने और पकने में समय लगता है।हम अधपका चीकू  उतारते रहते हैं और बाजार में
बेचते हैं।अधपका चीकू सप्ताह भर तक खराब नहीं होता है।

                ---------------------------------------------------------

 एक किसान से पूछा -आपने खेत में क्या बोया था ?

उत्तर था- इस बार जीरा लगाया था

क्या जीरे की फसल का उचित भंडारण नहीं होने से जीरा  40% तक सड़ जाता है

उत्तर था-सा,ब, आपको कागजी ज्ञान है व्यवहारिक ज्ञान में कोरे लगते हो।आगे से ऐसा
सवाल किसी से ना करो इसलिए बता देता हूँ कि जीरा सालों तक सड़ता नहीं है।

                         --------------------------------------------------

हम आगे बढे और एक किसान से पूछा -आपने क्या बोया है
उत्तर था -ग्वार
क्या आपके गाँव में शीत गृह है जिसमे गवार की फसल को रखा जा सके ताकि ग्वार सड़े
नहीं।
उत्तर था -हा-हा-हा- ग्वार दस साल तक भी नहीं सड़ता है बाबू ! मगर तुम ये सब क्यों
पूछ रहे हो !!

मेने कहा -भाई ,सरकार कहती है कि किसान जो उपजाता है उसका 40%भाग साधन
नहीं होने के कारण नष्ट हो जाता है।उसकी उपज नष्ट नहीं हो इसलिए देश को FDI की
आवश्यकता है जो घर बैठे आपकी फसल खरीद लेगी और उचित भाव भी देगी।

उत्तर था- किस सरकार की बात करते हो भाई ,जो किसान को अच्छा बीज और खाद भी
मुफ्त में नहीं दे सकती है ,बीजली का भारी बिल भरवाती है और समय पर बिजली भी
नहीं देती है, रही बात फसल बेचने की तो इतनी समझ तो हम में भी आ गयी है कि खेत
पर फसल नही बेचना है ,उचित भाव बाजार में मिलने तक इन्तजार करना है।

                     ---------------------------------------------

ये सब सुन कर क्या अब भी रिटेल FDI की जरुरत किसान के लिए महसूस करेंगे ,
देश को गुमराह ना करे।रिटेल में FDI सिर्फ बेरोजगारी उत्पन्न करेगी।पेट दुखता है
माथा दबाने से क्या फायदा ?FDI हर बिमारी का राम बाण इलाज तो नहीं हो सकती है                   
   

    

शनिवार, 3 नवंबर 2012

तेरी भी वाह -मेरी भी वाह!

तेरी भी वाह -मेरी भी वाह!

एक चोर ने दुसरे चोर पर आरोप लगाते हुये कहा -तूने जमीन लुटी!
दुसरे ने कहा -तुमने खजाना लुटा !!
पहले ने कहा -तूने दोनों लुटे !
दुसरे ने कहा -तूने भी दोनों लुटे और साथ में दलाली भी !
पहले ने कहा -ये सब तो तूने भी किया और साथ में फर्जीवाड़ा भी !
दुसरे ने कहा -तेरे को मौका मिले तो तू क्या पीछे रहेगा ?
पहले ने कहा -मौका मिलने पर करूंगा ,अभी तो तू जेब भर रहा है।
दुसरे ने कहा -छुटपुट चिल्लर तो तुझे भी लुटने दे रहा हूँ।
पहले ने कहा - तू मुझे बदनाम करता है
दुसरे ने कहा -तू भी तो मुझ पर कालिख पोतता है।
पहले ने कहा- तू मुझ पर आरोप लगाता है।
दुसरे ने कहा -तू कौनसा मुझे बख्शता है।
पहले ने कहा -मुझे अपनी दूकान चलानी है!
दुसरे ने कहा- मुझे कौनसा धंधा बंद करना है !
 
 इतने में तीसरे को आता देख दोनों एक साथ चिल्लाये -

चुप कर बे,लगता है मालिक आ रहा है ,तू मेरी वाह कर और मैं तेरी .


शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !

भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता  !

कोई कुर्सी दे दे बाबा ! भ्रष्टाचार के नाम पर कोई  पद दे दे बाबा !!कोई छोटा मोटा पद ही दे दे
बाबा! बाहर से किसी की पुकार सुनकर मैं हतप्रभ रह गया।मन में उत्सुकता जगी और घर
के दरवाजे को खोल कर बाहर की  ओर झाँका, एक खुबसुरत जवान खड़ा था चोखट पर !

  मेने उससे पूछा -अरे! नौजवान ,किस तरह से माँगता है, टेर लगानी भी नहीं आती तुझे?

वह बोला -आपको गलतफहमी हो रही है श्रीमान ,मैं सही टेर लगा रहा हूँ।इस देश में भगवान्
के नाम पर न्याय नहीं मिलता है।मैं जब तक भगवान् के नाम पर माँगता था तब तक फटे-
हाल था मेरे पर मौन अटेक की  नीति कथा सुना दी जाती थी।मेने  ऊपर नजर दौड़ाई,मगर
वह भी मेरा मन मौह न सका ,पेट को राहू ल गा। आँधी छा गयी सपनों पर।

अब क्या चाहते हो ?

कुर्सी! कैसी भी हो, चलेगी।तुम बेवकूफ बन कर झूठे,मक्कार,फरेबी या धूर्त को भी दरवाजे पर
आने पर अपना भाग्य तक दे देते हो।मैं तुम्हें सच कह कर माँग रहा हूँ ,मुझे भी एक बार दे दो।

टूटी हुई  कुर्सी से क्या हासिल हो जाएगा जवान! मेने पूछा।

वो बोला- टूटी हुयी कुर्सी भी भ्रष्टाचार की संगत से चेहरा बदल लेगी।या तो दाता उसे दुरुस्त
कर देगा या नई दे देगा।

ऐसा कैसे हो सकता है प्यारे?

कुर्सी के खेल में ऐसा ही होता आया है सा,ब।जिसकी  जैसी बाजीगिरी वैसी ही ऊँची कुर्सी। मैं
भी अव्वल बाजीगर बनूँगा ,बस एक बार मदद कर दीजिये बाबू।एक बार आप देकर देखिये,
इतना बड़ा अहसान फरामोस बनूंगा की तू पुकारेगा तब भी याद नहीं करूंगा।गन्दी नाली का
कीड़ा समझूंगा ....सच कहता हूँ बाप ,बस कुर्सी दिला दो सा,ब।

मेरे को गाली देकर मुझसे ही कुछ उम्मीद लगा बैठे हो ?

तुम तो बरसों से मूढ़ थे बाप, कोई तेरे कंधे पर हाथ रख कर ले गया और गाल पर मार कर
छोड़ दिया मगर मैं ऐसा नहीं हूँ अन्नदाता।मैं कोई उम्मीद दिखा कर डकेती नहीं कर रहा
हूँ ,मैं सच कह कर मांग रहा हूँ।भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे बाबा।

मैं देने को मना कर दूँ तो ?

वह बोला-तो तेरा ही नुकसान होगा दाता।मुझे नहीं देगा तो किसी बेवफा के जाल में फंसेगा।
माथा धुन धुन कर रोयेगा और कहेगा उस मनहूस घड़ी में किस पर मुहर छाप दी ......

वह अगले घर की तरफ बढ़ गया था और जोर से टेर लगाई-कोई टूटी फूटी कुर्सी दे दे बाबा,
भ्रष्टाचार के नाम पर दे दे दाता !!            
          

शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

मुहब्बत एक दरिया है .........

मुहब्बत एक दरिया है .........

मुहब्बत  एक  दरिया  है,  जो  डूब  गया   वो  दीवाना।
शमा   तो एक जरिया है , जो  मिट गया  वो परवाना।।

आँखों   के  सागर  में मोती , चुनता  गया  वो  दीवाना।
प्यासी  है  होटों  की  धरती  ,बरस   गया  वो  परवाना।।
कुछ कहना था कह न पाया, चुपचाप  सहे  वो  दीवाना।
शब्द, तो बात का जरिया है, जो  मौन  रहे  वो परवाना।।

उड़े  हवा में   केश  घटा  बन , उलझ  गया  वो  दीवाना।
साँसों  में  है  गीतों  की  धुन , थिरक गया  वो परवाना।।
अंगडाई  में  यौवन  का धन , खरच   सका  वो दीवाना।
इश्क,तो आग का दरिया है,जो जलता चला वो परवाना।।                      

कुंदन  सा बदन  चेहरा चन्दन , दहक  गया वो दीवाना।
मदहोश अदा चंचल चितवन , बहक  गया  वो परवाना ।।
दिल के कागज पे   इबादत ,  लिखता गया  वो दीवाना।
यार,तो प्यार की हथकड़ियाँ,जो बंधता गया वो परवाना।।


                                                                                                    (छवि गूगल से साभार )  


  

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

पुतला और रावण


पुतला और रावण 

एक रावण के पुतले को, एक रावण के हाथों फूंकते देखा !

जनता के मीठे  सपनों को, धुं -धुं  करके  जलते  देखा !!

रावण के पुतले को बेबस, रावण पर सुरक्षा कवच देखा !

पुतले के कद से कुछ बढ़कर, रावण के पद- कद को देखा !!

पुतले में मायावी  देखा , एक बाजीगर को जिन्दा देखा !

पुतले में रक्षित लज्जा थी , एक लाज लुटता रावण देखा !!

अहंकार पुतले में देखा, रावण को अट्टहास लगाते  देखा!

एक रावण को एक रावण से,खुल्लम खुल्ला लड़ते देखा!!

धुं -धुं करके जला पुतला,  एक रावण को जिन्दा देखा !

भूखा नंगा मालिक देखा,  राजतिलक नौकर का देखा !!

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

आम आदमी

आम आदमी 

 क्या रावन लँका में पैदा होते हैं ?

पता नहीं ,मगर यहाँ स्वदेशी का खूब चलन है !!
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विजया दशमी की शुभ कामनाएँ ,आम जनता को छोड़कर ... ?

क्योंकि आम जनता के पटाखे फूटते हैं!!

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एक ही थेली के चट्टे-बट्टे , सिद्ध कीजिये ?

पक्ष और विपक्ष को गले मिलते देखिये !!

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एक वचन या  बहु वचन - सदाचार और भ्रष्टाचार ?

सदाचार तो एक जैसा ही होता है पर भ्रष्टाचार तो बहुआयामी  रंगीला ..!!

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भक्त - गुरूजी,सुख और दुःख कैसे जाने ?

गुरु-  जिसको सबने मिल कर चुना वह दुःख और जो चुना गया
         वह सुख।

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गाँव-गाँव में फर्जीवाड़ा पहुंचाईये ?

सरल ,बस बाप ... आप मनरेगा को खूब  दूध पिलाईये !!

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"कोयला के सानिध्य" की करामात बतलाईये  ?

कोयला अन्दर से भी काला और बाहर से भी, मगर सानिध्य पाने
वाला अन्दर से काला और बाहर से धोल्ला !!

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कानून अपना काम करेगा ?

.................आम आदमी पर !!

न्यायालय में देख लेंगे ?

...................आम आदमी को !!

कानून के हाथ लम्बे होते हैं ?

.................आम आदमी तक !!
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रविवार, 21 अक्तूबर 2012

फूल और काँटे

फूल और काँटे 

गुलाब के पेड़ पर पहले काँटों ने जन्म लिया और उसके बाद फूल ने।काँटे उम्र में फूल से
बड़े थे मगर हर प्राणी उनसे दुरी बनाना पसंद करता था।यह बात काँटो को पसंद नहीं
आयी।

काँटों ने फूल से कहा - फूल ,हम और तुम एक ही माँ की सन्तान हैं।हम तुम्हारे से पहले
इस सँसार में आये हैं लेकिन कारण क्या है कि तुम अल्पायु होकर भी लोगों को पसंद
आते हो जबकि हम दीर्घायु होकर भी हीन समझे जाते हैं?

फूल ने जबाब दिया- ज्येष्ठ भ्राता , हम कितना लम्बा जीये यह बात महत्वहीन है।महत्व
इस बात का है कि हम जीये  किस तरह। हमारे गुण और कर्म ही मुख्य है।मैं अल्प जीवन
पाकर भी जग को सुगन्धित करता हूँ और मुस्कराता रहता हूँ और तुम दीर्घायु होकर भी
कभी जग में सुगंध नहीं बिखेर पाये और जीवन में मुस्करा नहीं पाये।

सार - चरित्रवान और गुणी बनो और बनाओ।        

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

आक और केक्टस

आक और केक्टस 

एक जंगल में आक और केक्टस के पौधे पास-पास में लगे
हुए थे।केक्टस पर कांटे और सुन्दर फूल लगे थे।केक्टस के
पास लगे आक के पौधे पर भी फूल लगे थे मगर कुरूप थे।

केक्टस अपने पर लगे लुभावने फूलों को देख मन ही मन
हर्षित हो रहा था ,उसने पास लगे आक के बड़े-बड़े पत्तों वाले
पौधे से कहा -
आक,तेरे में कुछ भी अच्छा नहीं है ,तू विष से भरा दूध
वाला विषैला पौधा है तेरे हर अंग में जहर है तथा तेरे
फूल भीअजीब सी दुर्गन्ध फैलाते हैं।




आक उत्तर दिया -  केक्टस,
मैं मानता हूँ कि तुम पर सुन्दर फूल आते हैं,मगर बिना सुगंध
वाले फूल सिर्फ देखने में ही अच्छे लगते हैं किसी के  काम  नहीं
आते तुम  खुद  भी  कंटीली झाडी हो ,तुम फूलों के साथ मोहक
लगते हो लेकिन किसी को सुन्दर बना नहीं सकते। मेरा आकार
और रंग रूप भले ही कुरूप है।मेरेशरीर में विषैला दूध जरुर है
मगर फिर भी मैं लोकोपयोगी हूँ। मेरा अंग-अंग उपयोगी है जो
मनुष्यों के चरम रोग ,वायुविकार,अंधेपन को ठीक कर देता है।

सार -मनुष्य यदि सिर्फ खुद के लिए ही जीता है तो वह
समाज के लिए सारहीन है चाहे वह दिखने में सुन्दर या
धनी क्यों न हो। कडवे स्वभाव वाला बैडोल व्यक्ति यदि
लोक उपकारक काम करता है तो समाज के लिए वह
स्तुत्य है।

                                                                                                                 (छवि- गूगल से साभार)                 


                                                                                                                                                    

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

संस्कृति का फर्क

संस्कृति  का फर्क 

नवरात्रि के पर्व पर दौ संस्कृतियाँ एक साथ देखने को मिल रही है।एक और भारतीय
संस्कृति का गौरव है तो दूसरी और पाश्चात्य संस्कृति का पतन।
   
मैं शाम के समय मंदिर में गया था।   वहां पर एक अपूर्व  सुन्दरी   चितचोर  के साथ
खड़ी है।उस अपूर्व सुन्दरी  के  अंग-अंग  से सौन्दर्य  टपक रहा है मगर फिर भी लोग
शांत हैं। मुग्धता  के साथ   अपूर्व सुन्दरी को निहार रहे हैं।किसी की नजरो में अश्रद्धा
नहीं है।  अहोभाग्य हैं  उस युग  के लोग  जिन्होंने  साक्षात  राजदुलारी  सीताजी  को
निहारा होगा और राजाराम की निकटता पायी होगी।इनकी पत्थर की प्रतिमा में आज 
भी अद्भुत ताकत है कि जनकदुलारी जो युवा हैं ,उनको सभी बच्चे बूढ़े नौजवान आदर
से प्रणाम कर रहे हैं श्री राम के श्री विग्रह के समक्ष शीश झुका रहे हैं।

 जब में यहाँ से बाहर निकलता हूँ और थोड़ी ही दुरी पर चल रहे गरबा नृत्य के पंडाल
की ओर चला जाता हूँ। यहाँ भी  पाश्चात्य  परिधान  में कसी  हुयी  युवा नारियां जीती
जागती खड़ी है ,यहाँ भी सैंकड़ो लोग खड़े हो कर नृत्य देख भी रहे हैं मगर देखने वालो
की नजरो में श्रद्धा का भाव नहीं है ,सब और विकार भरा है,कामुकता का साम्राज्य है।

   मेरे मन में एक प्रश्न कौंधा - क्या कारण है कि  जिस  भारतीय  नारी  की पत्थर की
प्रतिमा को  देख  कर  मन  में नारी  के समक्ष सर झुक जाता है, जिस भारतीय नारी के
प्रतीक  चित्र को  सामने  देख  हम  शक्ति  स्वरूप से हाथ जोड़ते हैं , जिस भारतीय युवा
नारी के  विग्रह  को देख  कर ही  मन  के पाप  धुल जाया  करते  हैं  मगर जो नारियां
पाश्चात्य  परिधान  में ,बदन  से कसे  हुए कपड़ो में ज़िंदा खड़ी है,नृत्य कर रही हैं उनको
लोग विकार से देखते हैं ,कामुकता से देखते हैं ,उन को ललचाई नजरो से देखते हैं?

    लोग , जो मंदिर में थे और नारी के स्वरूप को हाथ जोड़े श्रद्धा से खड़े थे वे मन्दिर
से बाहर आकर श्रद्धा क्यों भूल गए ? क्यों आया  यह प्राचीन और अर्वाचीन भारतीय
नारी के रूप में फरक ?क्या पुरुष समाज आडम्बर कर रहा है या भारतीय नारी
पश्चिमी संस्कृति अपनाने के चक्कर में अपना गौरव खोती  जा रही है ?       

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

जादूगर

जादूगर 

जादूगर अपना तामझाम समेट रहा था।
मेने  पूछा- कहाँ चल दिये सम्राट ?
वो बोले -आज से ये धंधा बंद!
मेने पूछा-   क्या हुआ ?
जादूगर बोला - जब से इस देश में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं तब से लोगो को
मेरी हाथ की सफाई में मजा भी नहीं आता।सब बोलते हैं असली में गायब
करने वाले तुर्मखां बैठे हैं तो नकली को क्यों देखे।

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जादूगर अपने बरसों पुराने जादू दिखा रहा था तभी दर्शक में से आवाज
आयी ....कुछ नया दिखाओ।
जादूगर बोला - सरकार,मैं सरदार नहीं हूँ,मामूली आदमी हूँ।नया देखना
है तो अखबार में  पढो, समाचार में सुनो। मैं तो पुराना ही दिखाऊंगा।   


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मेने जादूगर से पूछा - आपकी कला में और भ्रष्ट नेता की कला में अंतर
क्या है ?
जादूगर बोला -मेरी कला में जो नही दीखता उसका भी अस्तित्व बना
रहता है और भ्रष्ट नेता की कला में जो बचा है वह भी गायब हो जाता है।

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रविवार, 14 अक्तूबर 2012

चोर बाजार

चोर बाजार 

शहर की गलियों में चोर बाजार का नजारा साप्ताहिक देखा जा सकता है।चोर बाजार में
चोरों की काफी जातियां देखने को मिल जाती है।कुछ कच्चे चोर,कुछ पक्के चोर,कुछ
लुख्खे चोर,कुछ अनुभवी चोर ,कुछ उठाईगीरे तो कुछ सफेद कॉलर .....!!

   चोर बाजार की खासियत यह होती है कि वहाँ जो माल होता है वह आम जनता का होता
है, चोरों को उस सामान की कीमत नहीं देनी पडती है! माल जनता का बिना कीमत के
हासिल करते हैं और उसी जनता को कीमत लेकर बेच देते हैं!!

  कच्चे चोरों की ढेरियों में पुराना माल होता है मगर सफेदपोश की ढेरियों में यकीनन
बढिया माल होता है।

मेने एक सफेदपोश चोर से पूछा -चोर जी, (आजकल चोरों को भी अदब से बोलना पड़ता है
वरना अपने लम्बे हाथों से मुसीबत खड़ी कर देते हैं) आप बढिया माल सस्ते में क्यों बेच
देते हैं ?

  सफेदपोश चोर बोला- हमारा मकसद चोरी करके पूरा का पूरा ह्ड्फ करना नहीं रहता है
हम चोरी करते हैं वो भी आँखों में धुल झोन्क  कर ..हमे लोग चोर मानने भी संदेह करते हैं
लोग हमारी इज्जत करते हैं .जब हम उन्हें उनका माल सस्ते में लुटाते हैं तो वो हमारा
आभार मानते हैं।समाज में मान सम्मान भी मिलता है तथा लोग और-और की रट  लगाये
हमारे इर्दगीर्द घूमते रहते हैं।

हमने पूछा- चोर जी , आप इन कच्चे चोरों के बारे में  भी कुछ सोचते होंगे?

वो बोले - ये कच्चे चोर ही हमारी बदनामी का कारण बनते हैं।पूरी योजना से काम नहीं करते
और उजुल -फिजूल चोरियां करते रहते हैं। कच्चे चोरों की वजह से आम जनता हमे भी शक
से देखने लग जाती है।हम चाहते हैं कि ये कच्चे चोर शातिर चोरों से शिक्षण ले ताकि इज्जत
पर आँच ना आये।

हमने पूछा- क्या आपको भी इज्जत की परवाह  होती है ?

वो बोले- हम क्या झुग्गी बस्तियों वाले नजर आते हैं,अरे!हम भी अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग
हैं ,बड़े घरों से ताल्लुक रखते हैं .....ये तो धंधा ही ऐसा है ,इस वास्ते करते हैं।

हमने पूछा- आदरणीय (आधुनिक समय में सम्मान देने का चलन है), पक्के चोर भी कभी
पकड़े जाते हैं  ?

    वो बोले - वैसे तो शातिर चोर घाघ होते हैं,आगे-पीछे की सोच कर काम करते हैं।ये तो
अहंकारवश या फिर स्टिंग ओपरेशन से फँस जाते हैं मगर चलते पुर्जे होने के कारण कभी
इन पर अपराध साबित नहीं होता है।ये हमारे प्रियपात्र होते हैं।

हमने पूछा- आप श्री श्रीमंत , पक्के और अनुभवी चोर में कोई बुनियादी फर्क बतायेंगे ?

वो बोले- क्यों नहीं, अनुभवी चोर खुद अपने हाथों से चोरी नहीं करता है सिर्फ चोरी की योजना
समझाता है और हिस्सा बटोर लेता  है।पक्का चोर उस योजना पर सतर्कता से काम करता है।

 हमने पूछा - श्रीमान (ये अपने को आदर्श घरानों के बताते हैं इसलिए ये इसके हकदार माने
जाते हैं), उठाईगीरे की आपकी नजर में क्या परिभाषा है?

  वो बोले- ये हमारी बिरादरी के नहीं हैं , ये तो वे लोग हैं जो बिना काम के हैं,ना तो इनके घर में
कुछ माल मिलता है ना ही ये हमारी सहायता करते हैं।ये लोग तो पाँच -दस की चोरी करते भी
नहीं हिचकाते।हम जल्दी ही इनको जनता के हाथों पिटवायेंगे।

हमने पूछा- आप अपने धंधे के भविष्य को कैसा देखते हैं ?

वो बोले-  इस देश में यह धंधा कभी फेल नहीं होगा क्योंकि यहाँ की जनता लापरवाह,भोली,
भुल्लकड़ है।यहाँ के लोग सज्जन हैं ,डरपोक हैं ,असंगठित हैं।इन्हें अपने झगड़ो से भी कभी
फुरसत नहीं मिलती है क्योंकि ये अलग-अलग  जातियों में बँटे हैं।ये लोग जब पड़ोसी के घर
चोरी होती है तो खुश हो जाते हैं .......... हा हा हा !!

चोर महाशय को हँसता देख हम अपनी कमजोरी को भांप कर वहां से खिसक लेते हैं .........।                 

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

लूट सके तो लूट .......

लूट सके तो लूट .......

ये तुलसी के राम नाम की लूट तो नही है मगर इसके काफी करीब जरुर है।राम के नाम
की लूट में इस लूट में कुछ फर्क है,राम नाम की लूट पर सबका समान अधिकार है और
इस लूट में जिसके हाथ में लाठी है उसके हाथ ही भेंस है।तुलसी के राम नाम को नही लूटने
पर पछताना पड़ता है और इस लूट में भी पछताना पड़ता है सिर्फ समय का फेर है तुलसी
अन्तकाल में पछताने की बात करते हैं तो इसमें पाँच साल की ही मर्यादा है उसके बाद
जनता चाहे तो एक्सपायरी डेट डाल सकती है।

      लूट डाकू भी करते थे सा'ब, मगर अक्ल से नही करते थे सिर्फ दुसाहस के बल पर करते
थे  मगर यह लूट दुसाहस के बल पर नही अधिकार पा कर और पाने के पश्चात दुरूपयोग
करके की जाती है। डाकूजी की लूट में बेचारे को काफी तकलीफ थी क्योंकि सिस्टम का
सहयोग नही था  मगर इसमें वो तकलीफ नही है सिस्टम के टूटे भागे अस्थि पंजर पूरा
सहयोग करते हैं। डाकू को लूट के पश्चात बीहड़ों का रुख करना पड़ता था मगर इसमें यह
परेशानी नहीं है,लूट के पश्चात आराम से कुर्सी पर चिपक सकते हैं।लूट के पैसे को भी डाकू
देश की गुफाओं और  घने बीहड़ों  में छिपाते  थे  मगर इस लूट में  बेखटके लूट का पैसा
सात समुंदर पार भेज सकते हैं।

   तुलसी की लूट में समय की मर्यादा बीच में जाती है क्योंकि रात-दिन तो लूट नहीं सकते
राम का नाम,आवश्यक काम में तुलसी की लूट में व्यवधान आ जाता है  मगर इस लूट में
व्यवधान नहीं है जब आपका जी जाता ,लूट मचा लो,इस लूट को अंजाम देने के लिए पहले
दिमाग की जरूरत भी नहीं थी  मगर कुछ समय से विद्रोही चिंचडे इस कदर चिपकने लग
गये हैं कि सावधानी आवश्यक है।

     तुलसी के राम नाम की लूट में और इस लूट में एक बुनियादी फर्क भी है।राम नाम की
लूट जो लुटेरा बनता है उसके खाते में ही जमा होती है ,लूट के धन का हस्तांतरण नहीं है,
मगर इस लूट में हस्तांतरण आराम से किये जा सकता है।इस लूट को  बेटे,दामाद किसी
के नाम पर भी हस्तांतरण कर सकते हैं या किसी के नाम पर भी ऋण दिखा कर भी जमा
कर सकते हैं।

    तुलसी के राम नाम की लूट में परलोक सुधरता है ,वर्तमान लोक में सुधार हर किसी की
नजर नहीं आता क्योंकि तुलसी की लूट में दिखावा नहीं होता ,जगत पर कम और आत्मा
को लाभ ज्यादा होता है मगर इस लूट में लोक सुधरता है और परलोक होता भी है इस पर
सोचने की जरूरत नहीं है।यह लूट जगत को दिखाई देती है और उड़ते पंखिड़े चाटुकारिता के
गीत भी गाते हैं।

  तुलसी के राम के नाम को लुटने के लिए ध्यान ,सुचिता,शुद्धता और एकाग्रता की जरूरत
पडती है मगर  इस  लूट  में  इसमें में से एक भी गुण की जरूरत नहीं पडती है। इस लूट में
ईमानदारी का नकाब पहन कर भी लाभ पाया और दिलाया जा सकता है।इसमें समान विचार
वाले लुटेरे जनता की सेवा,पूजा,अर्चना के नाम पर मिलझुल कर लूट सकते हैं।

   तुलसी के राम नाम की लूट में पापी और परोपकारी का भेद नहीं है जैसे ही राम नाम का
रंग लगता है पाप भी तिरोहित होने लग जाता है मगर अफसोस ...इस लूट में यह सुविधा
नहीं है। इस लूट में आम जनता को अलग रखा जाता है क्योंकि वही तो बकरा है ......!!         

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

सीख

सीख 

1.गली की सडक पर एक व्यक्ति ने रात की बासी रोटियाँ फ़ेंक दी। गली के कुत्ते जो आराम से
पास-पास पड़े उंग रहे थे वे रोटियाँ देख कर उनकी ओर लपक पड़े।रोटियाँ काफी थी मगर
कुत्ते आपस में झगड़ पड़े।कोई भी कुत्ता रोटी नहीं खा रहा था ,एक दुसरे पर गुर्रा रहे थे और
काट रहे थे तभी दूसरी गली का एक कुत्ता वहां आ गया।सभी कुत्ते चोकन्ने हो गए और सब
मिलकर बाहर के कुत्ते पर पिल्ल पड़े।बाहर का कुत्ता बड़ी मुश्किल से खुद को बचाता हुआ
गली से निकल पाया।

2.गली की सडक पर एक व्यक्ति ने रात की बासी रोटियाँ फ़ेंक दी। गली के कुत्ते जो आराम से
पास-पास पड़े उंग रहे थे वे रोटियाँ देख कर उनकी ओर लपक पड़े।रोटियाँ काफी थी मगर
कुत्ते आपस में झगड़ पड़े।कोई भी कुत्ता रोटी नहीं खा रहा था ,एक दुसरे पर गुर्रा रहे थे और
काट रहे थे तभी दूसरी गली का एक कुत्ता वहां आ गया।उसने देखा रोटियाँ भी खूब पड़ी है
और ये एक ही गली के कुत्ते लड़ रहे हैं क्यों नहीं इनकी लड़ाई को और बढ़ा दिया जाए ताकि
रोटियों से पेट भर सके। उस कुत्ते ने आपस में लड़ रहे कुत्तों के कान के पास जाकर कुछ
कहा उसके बाद तो गली के कुत्ते और ज्यादा भोंक- भोंक कर लड़ने लगे और बाहर वाला कुत्ता
आराम से पेट भर कर चलता बना।

3. गली की सडक पर एक व्यक्ति ने रात की बासी रोटियाँ फ़ेंक दी। गली के कुत्ते जो आराम से
पास-पास पड़े उंग रहे थे वे रोटियाँ देख कर उनकी ओर लपक पड़े।रोटियाँ काफी थी मगर
कुत्ते आपस में झगड़ पड़े।कोई भी कुत्ता रोटी नहीं खा रहा था ,एक दुसरे पर गुर्रा रहे थे और
काट रहे थे तभी दूसरी गली का एक कुत्ता वहां आ गया।उसने देखा रोटियाँ भी खूब पड़ी है
और ये एक ही गली के कुत्ते लड़ रहे हैं,ना तो ये रोटियाँ खुद खा रहे हैं और हो सकता है उसे भी
ना खाने दे।कुत्ते ने एक उपाय सोचा और गली के कुत्तों के कान के पास जाकर कुछ कहा।सभी
कुत्ते गुर्राना बंद कर रोटियों के ढेर की ओर गये और बाहर वाले कुत्ते के साथ मिलकर प्रेम से
पेट भरने लगे।

परिस्थिति नंबर एक यह सिखाती है कि घर के भीतर भले ही आपस में मतभेद हो मगर बाहर
के लोग उन मतभेदों पर टाँग अडाने लगे तो सब मिलकर उसका प्रतिकार करे ताकि परिवार की
अखंडता पर खतरा ना आ पाए।

परिस्थिति नंबर दौ यह सिखाती है कि आपस की कलह के कारण हाथ में आया अवसर भी
चला जाता है और उसका फायदा गैर लोग उठा ले जाते हैं।

परिस्थिति नंबर तीन यह सिखाती है आपस का मतभेद यदि मिलकर नहीं सुलझाया जा सके
तो बाहर के किसी योग्य,निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा शांति पूर्ण हल निकला लिया जाए ताकि सब
प्रेम से जी सके।

         

बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

जीने की कला

जीने की कला 

एक व्यक्ति बार-बार जीवन में आ रही विषम परिस्थितियों से तंग आकर निराश हो गया।
प्रतिकुल स्थितियों के कारण एक रात घर छोड़ कर जंगल की और चल दिया।जंगल में
एक संत का आश्रम था। उस व्यक्ति ने सोचा- जंगल में मारा-मारा फिरने की बजाय क्यों
नही संत का चेला बनकर वीतरागी बन शेष जीवन व्यतीत कर लिया जाये? ऐसा विचार
कर वह संत के आश्रम की ओर चल पड़ा।

          उस व्यक्ति ने संत को नमन किया और संत के समक्ष शेष जीवन वीतरागी बन कर
जीने की अपनी चाहना को भी रख दिया।

     संत ने पूछा- तुम वैराग्य क्यों धारण करना चाहते हो?

वह व्यक्ति बोला - इस संसार में कोई सार नजर नहीं आता,हर कोई दु:खी है,हर समय कोई
ना कोई संघर्ष और विषम परिस्थिति आती रहती है। मेरे जीवन में भी काफी मुश्किले आती
रही,मैं लड़ते-लड़ते तंग आ गया इस कारण संसार से मौह भी खत्म हो गया , अब शेष जीवन
प्रभु के नाम में व्यतीत करना चाहता हूँ।

  संत ने कहा - तुम आज की रात यहाँ आराम करो,कल मेरे साथ जल्दी उठ के जंगल में
चलना।

    दुसरे दिन भोर के समय वह व्यक्ति साधू के संग जंगल की ओर चल पड़ा। संत उसे
दलदल से भरे सरोवर के किनारे ले गया और बोला -इस सरोवर में उतर कर कुछ कमल के
फूल तोड़ लाओ ?

  वह व्यक्ति सरोवर की और कुछ कदम बढ़ा,उसके पैर कीचड़ में धँसने लगे।कदम दर कदम
वह गहरा धँसता जा रहा था कहीं और ज्यादा ना धंस जाए यह सोच कर वह रुक गया और
बाहर की और लौट आया।

संत ने पूछा- तुम वापिस क्यों लौट आये ?

उस व्यक्ति ने कहा - दलदल से डरकर।

 उसका उत्तर सुनकर संत बोले -तुम यहीं रुको मैं कमल पुष्प लेकर आता हूँ।

 संत ने उस सरोवर का निरिक्षण किया और एक लम्बा रास्ता तय कर कमल पुष्प ले आये
और उस व्यक्ति से कहा -तुम पुष्प लाने में असमर्थ क्यों रहे ?

उस व्यक्ति ने कहा -खुद को कदम दर कदम दलदल में फँसते देख कर।

तुम दलदल में क्यों फँसे ? संत ने पुन: प्रश्न किया।

वह व्यक्ति बोला - इसका कारण मैं नही जानता .........

संत ने कहा -तुमने सरोवर का पूरी तरह से निरिक्षण नहीं किया और नजदीक के रास्ते से
तुरंत पुष्प ले आने के चक्कर में दलदल में धँस गये।अब तुम वापिस अपने घर लौट जाओ
और आगे से जो भी काम करो उसके पहले पूरी तरह हर आने वाली परिस्थिति का अवलोकन
करो,रास्ता चाहे लम्बा हो उसे चुन लो मगर जल्दबाजी में दलदल से भरे छोटे रास्ते को मत
चुनो तब तुम्हें यह संसार सुन्दर लगेगा ।

सार- सफलता का कोई शोर्ट -कट नहीं होता है।हर कदम धीरे उठाओ मगर ऐसा एक भी
कदम मत उठाओ की चार कदम पीछे होना पड़े।
      
               

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

तीन लाइन


तीन लाइन 

एक प्रखर संत रामचरित का गान करने के लिए शहर में पधारे हुये थे।आयोजक मण्डल की
व्यवस्था के अनुसार हर दिन पाठ के आरम्भ होने से पहले व्यासपीठ पर विराजमान संत
का स्वागत करना होता था।एक दिन के लिए मेरा भी नाम स्वागतकर्ता में लिखा था।

       मैं उहापोह की स्थिति में था।मेरे मन में बार-बार एक सवाल कौंधता था कि श्री संत
के स्वागत करने के योग्य मैं  हूँ? मैं आत्मचिंतन करता रहा।

        नियत दिन मेरा नाम भी स्वागतकर्ता के रूप में मंच से पुकारा गया। मैं मंच पर नहीं
पहुँचा क्योंकि मेरी आत्मा मुझे मना कर रही थी।

       कथा के विराम के बाद आयोजक मंडल के सदस्य ने मुझसे पुछा -"आप संत श्री का
स्वागत करने मंच पर नहीं पहुंचे ,क्या आप नियत समय पर नहीं आये थे?

  मेने कहा -"ऐसी बात नही थी,मैं कथा श्रवण के लिए सही समय पर पहुँच गया था लेकिन
मैं उनके स्वागत करने के योग्य खुद को नहीं पा सका।

   आयोजक मंडल के सदस्य ने पूछा - आपने खुद को छोटा क्यों समझा ?

 मेने कहा -उसके कुछ कारण थे।जब आध्यात्मिक संत के स्वागत करने की बात आई तो
मैं पुराने ख्यालो में खो गया था। जब मैं कक्षा दौ का विद्यार्थी था,हमारे शिक्षक श्रुतिलेख के
समय एक वाक्य लिख देते थे और हमें उस लाइन को बार-बार लिखना होता था। हमारे
शिक्षक लिखाते थे -
                          1.सदा सत्य बोलो।

                          2.बड़ों का आदर करो।

                          3.दीन- दुखियों की सेवा करो।

मैं अभी तक इतने सालों के बाद भी पूर्ण रूप से ये तीन बातें भी अमल नहीं कर पाया हूँ
इसलिए मेरा साहस नहीं हो पाया कि मैं संत के स्वागत कर्ता के रूप में मंच पर हाजिर
हो पाऊं।            

शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

गुण-अवगुण


गुण-अवगुण 

एक हलवाई चीनी के बताशे बना रहा था।चीनी के गोल में एक कंकड़ गिर गया और कड़ाई
में तल कर बताशे से चिपक गया। उस कंकड़ ने बताशे से कहा - तेरे साथ तला जाने के
कारण अब मैं भी बताशा बन गया हूँ।

बताशे ने कहा - मेरे आवरण में छिप जाने से तेरे अन्दर छिपी कठोरता कम नही हो जाने
वाली है।तुम मेरे सम्पर्क में जरुर आ गये मगर तुम्हारी कठोरता और अहं कम नहीं हुआ
है।तेरा यह झूठा दिखावा भविष्य में सामने आने ही वाला है।

  अगले दिन उस हलवाई की दूकान से एक ग्राहक ने बताशे खरीद लिये।वह कंकड़ भी
बताशे के मोल बिक गया।उस कंकड़ ने बताशे से कहा -तुम तो कह रहे थे कि मेरी कठोरता
सामने आ जायेगी मगर देख,आज मैं तेरे मूल्य के बराबर हो गया हूँ।

बताशे ने कहा -गुण और अवगुण कभी छिपते नहीं हैं,समय आने पर प्रगट हो जाने वाले हैं।

          उस ग्राहक ने बताशे घर लाकर दूध में डाल दिये।दूध के सम्पर्क में आते ही बताशे ने
 कंकड़ से कहा -अपने-अपने गुण-अवगुण की परीक्षा का समय आ गया है ,मैं तो अपने मूल
स्वरूप रस में परिवर्तित हो जाऊँगा और तुम कंकड़ ही रह जाओगे ?

  कंकड़ ने कहा - तुम स्वरूप बदल सकते हो तो मैं भी रूप बदल कर महीन रेत में बदल
जाऊँगा।

 उबलते हुए दूध में बताशे और कंकड़ ने रूप बदल लिया।कंकड़ बारीक रेत  बन गया  और
बताशा रस बन गया । उस ग्राहक ने उस दूध को पी लिया और कंकड़ तथा बताशा उसके
शरीर में पहुंच गये।शरीर में पहुंचने के उपरान्त महीन मिट्टी बने कंकड़ ने बताशे के
रस से कहा -मैं भी तुम्हारे साथ दूध में घुल कर यहाँ आ गया हूँ ,अब बोलो गुण और अवगुण
में क्या फर्क रहा।

           बताशे ने कहा- गुण और अवगुण में काफी फर्क होता है।समय आने पर मालुम पड़
 जाएगा।

 शरीर की ग्रन्थियों ने बताशे के रस को अलग किया और उसे  मनुष्य के खून में पहुंचा दिया
और महीन रेत  बने कंकड़ को अलग किया और अवशिष्ट मार्ग से बाहर निकाल दिया।

सार- छली लोग साधुता का संग करे या वेश बदल ले मगर उनके अवगुण देर-सवेर प्रगट
हो ही जाते हैं।        

रविवार, 30 सितंबर 2012

सफलता की राह

 सफलता की राह 

एक पतँगा (उड़ने वाला कीड़ा ) खुली हुयी खडकी से कमरे के अन्दर आ गया था।मेने खिड़की
के कांच को बंद कर दिया और उस कीट को कमरे से बाहर निकालने की कोशिश की मगर
पतँगा उड़ता हुआ काँच के पास आया और बंद कांच से बाहर निकलने का प्रयास करने लगा।
मैं इस घटना को देखने लग गया।वह पतँगा बार -बार उस कांच से टकरा रहा है और बाहर
निकलने की कोशिश कर रहा है। इस घटना को मैं लगातार 10-15 मिनिट तक देखता रहा।
वह कीट बार-बार पूरी शक्ति से उस कांच से टकराता है,मगर  कमरे  की दूसरी  खिड़की या
दरवाजे से बाहर निकलने का प्रयास नहीं कर रहा है।मेने सोचा थोड़ी देर इस कांच से टकरा कर
जब यह थक जाएगा तो दूसरी खडकी या दरवाजे से बाहर निकल जायेगा। उस पतंगे से ध्यान
हटा मैं कमरे से बाहर निकल गया और अपने काम में लग गया।
       
            रात को जब मैं अपने कमरे में सोने गया तो देखा वह पतँगा कांच से टकरा-टकरा कर
मर चुका है।

          आप सोचेंगे कि इस छोटी सी घटना का ब्लॉग पर लिखने का क्या आशय ?मेने इस
घटना पर विचार किया कि यह पतंगा आसानी से अपनी जान बचा कर दूसरी खिड़की से या
दरवाजे से स्वतंत्र हो सकता था मगर यह अपना नजरिया बदल नही सका तथा बाहर निकलने
के दुसरे विकल्पों पर ध्यान नही दे सका इसलिए स्वतंत्र होने के भरसक प्रयत्न करते हुए भी
मर गया। मरा हुआ पतंगा मेरे मन में बहुत  से विचार छोड़ गया -

         क्या इस पतंगे ने बाहर निकलने के लिए प्रयत्न नहीं किया ? ..तो फिर असफल क्यों हुआ ?

        क्या यह पतंगा स्वतंत्र होकर जीना नही चाहता था ?
   
        क्या इस पतंगे की मौत इसी तरीके से होनी निश्चित थी? या यह विधि का विधान था।

       क्या यह पतंगा बार-बार की असफलता से टूट कर मर गया? या सफल होना उसके
सामर्थ्य से बाहर था ?

         ......आखिर पतंगे की प्रयत्न करने पर भी असफल रहने का कारण क्या था?

      निश्चित रूप से पतंगे के असफल होने का कारण दुसरे विकल्पों पर ध्यान ना देना यानि
खुद के नजरिये में बदलाव नही  लाना था।

        क्या हम भी कभी-कभी पतंगे जैसी कोशिश तो नही कर लेते हैं ?

       हम लोग भी जब एक ही बिंदु पर बार-बार असफल होते हैं तो इसका मुख्य
कारण सभी विकल्पों पर ध्यान नही देना या नजरिये की दिशा को समग्र रूप से नही देखना है

सफल होने के लिए प्रयत्न जरूरी है लेकिन यदि असफल रहे तो दुसरे सम्भावित विकल्प
और उनकी दिशा का बदलाव भी सोच के रखे ताकि असफलता हमारी शक्ति बन जाये।                     

रविवार, 23 सितंबर 2012

अकर्मण्य और कर्मशील

अकर्मण्य और कर्मशील 

एक पत्थर नदी के बहाव में बहता हुआ समुद्र की चट्टान के पास रुक गया। चट्टान ने उसे
उपहास के भाव से देखा और कहा - मित्र , तू सैंकड़ों मील से पानी के बहाव  के साथ बहता
रहा,पानी में बहते-बहते तू  अपना  यथा रूप भी नही बचा पाया। तू घुड़ता -पड़ता बहता रहा
और लम्बा गोल पिंड जैसा बन गया।मुझे देख मैं बरसों से एक ही जगह ताकत के साथ खड़ी
हूँ और पानी की लहरों से मुकाबला करती हूँ। तू मिलो लम्बी यात्रा करके भी आज तक क्या
कुछ पा सका है?

       छोटे पिंड रूपी पत्थर ने जबाब दिया- यह सच है की मैं पानी के साथ सैंकड़ो मील की
यात्रा करता रहा और अपना मूल स्वरूप भी नही बचा सका लेकिन मुझे ख़ुशी है कि मैं
तेरी तरह एक जगह पड़ा नही रहा।तुम वर्षो से यही पड़ी-पड़ी पानी से टकरा रही हो और
व्यर्थ पानी से टकरा कर अकर्मण्य जीवन गुजार रही हो जबकि मैं पानी के बहाव  के साथ
सदा गतिशील रहा हूँ  तेरी तरह व्यर्थ पानी से टकराता नहीं रहा और अकर्मण्य नही रहा।

  चट्टान छोटे से पत्थर की बात पर उपहास से मुस्करा उठी तभी एक राहगीर उधर से
गुजरा उसने चट्टान के पास पड़े बेलनाकार पिंड रूपी पत्थर को उठाया और उसे चट्टान
पर रख दिया। उस राहगीर ने आस-पास से कुछ फूल इकट्टे किये और श्रद्धा के साथ
उस पिंडी रूपी पत्थर पर अर्पित कर दिए  और उस पिंडी को हाथ जोड़कर उसकी शिव रूप
से स्तुति की और माथे पर चढा कर उसे ले जाने लगा।

  छोटी पिंडी ने चट्टान से कहा -हे निरर्थक चट्टान ,तुझे अब तो समझ आ गया होगा कि
गतिशील रहना कितना आवश्यक है। मेरी पानी के साथ गतिशीलता ने मुझे पूज्य बना
दिया और तेरी अकर्मण्यता के कारण तू सदियों से पानी की थपेड़े खा रही है और खाती
रहेगी।

सार - अकर्मण्य जीवन जीने का कुछ भी महत्व नही है          

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

क्या FDI भारत में घाटा उठाने आयेंगी ?

क्या FDI भारत में घाटा उठाने आयेंगी ?

बहुत शोर मचाया जा रहा  है देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा कि FDI के भारत में रिटेल क्षेत्र में
आने से देश को फायदा होगा ! कैसे ? क्या वो लागत से कम दाम पर हमे माल बेचेंगे ?
...बिलकुल नहीं। FDI  कोई परोपकारी संस्थाएं नहीं हैं जो भारतीयों की सेवा करने के लिए आएगी।
अगर सेवा करने का उनका उद्धेश्य नहीं है तो फिर वे सस्ता माल कैसे बेचेंगे ?

    FDI  आकर के हमारी वितरण पद्धति को तहस -नहस कर देगी।ये लोग वस्तु के उत्पादन से खपत
 के बीच के मध्यस्थों को खत्म कर देंगे।उत्पादन से खपत के बीच जो लोग आजीविका कमा रहे हैं
सबसे पहले वे बेकार हो जायेंगे जो करोड़ो भारतीय हैं।

   FDI  बाहर  से पूंजी लेकर आयेगी इससे भारत की अर्थव्यवस्था में जान आएगी ,यह मानना है
हमारे भ्रमित अर्थशास्त्रियों का ? क्या रिटल में हमारे पास पैसे नहीं हैं ?क्या रिटेल में  सरकार के
ऋण का पैसा लगा है ?भारत का रिटेल भारतीयों की खुद के निवेश से चल रहा है।अगर निवेश की
जरूरत है तो सरकार बड़े उद्योग पतियों की सब्सिडी बंद कर रिटेल व्यापारियों को वह पैसा बिना
ब्याज के ,सरल किस्तों पर दे,सुधार अपने आप आ जाएगा।

   FDI  आधुनिक तकनीक लेकर आएगी जिससे उत्पादन लागत कम होगी ,ऐसा तर्क बुद्धिजीवी
देते हैं। सवाल उठता है कि क्या आजादी के बाद से अब तक हमारी सरकारे सो रही थी,लाखो -करोड़ो
के गपल्ले हो गए ,कर के पैसे का दुरूपयोग  हुआ,अनुत्पादक योजनायें चलाई मगर उत्तम तकनीक
विकसित नही की। क्यों? हमारी सरकारे अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए विदेशी मगरमच्छो
को क्यों बुला रही है ?

   विगत वर्षों में हमने कुछ नही किया ,तकनीक का विकास नही किया ,इस बात को सरकारे
 स्वीकार क्यों नहीं कर लेती। आपस में वोटों के चक्कर में सभी दल लड़ते रहे इसलिए हमारे देश
की अवगति हुयी है ,मगर अब हम ऐसा देश हित में नहीं करेंगे और देश हित के फैसले लेंगे और फैसलों
पर अमल करेंगे,यह बात कोई भी दल नही कर रहा है ।

   FDI हमे सस्ता देगी , बढ़िया सामान देगी तो क्या वो घाटा करेंगी ?नही वो हम भारतीयों का खून
चुसेंगी ,कुछ बूंद हमे देगी और बाकी सब अपने देश में ले जायेंगी।

     FDI  इस देश से कमाकर जो पैसा  से ले जायेगी वो किसका है ? निसंदेह वो पैसा हम भारतीयों
का है।विदेशी लोग हमे लूट कर ले जाएँ और हम बदतर होते जाए ये कैसा विकास है ?

    आम भारतीय खुद के बनाये जुगाड़ से पेट पाल रहा है,87%भारतीय गरीब और मध्यम वर्गीय
है,सरकार हमे ज्ञान का विकास दे,हमे नई तकनीक दे,मगर हमे लूटने वाले FDI के राक्षस नही दे।                      

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

तालाब में मगरमच्छ छोड़ने के फायदे

तालाब में मगरमच्छ छोड़ने के फायदे 

इस देश के तालाब में विदेशी मगरमच्छ बसाने बहुत जरूरी हो गया है। विदेश  का मगरमच्छ
आपके तालाब में लाना इसलिए जरूरी है ताकि  तालाब  में सालो से  जन्मी  मछलियों  का
सफाया हो सके।

   तालाब में बहुत सी मछलियों के कारण पानी शुद्ध भी रह सकता है और छिछला भी हो जाता
है। अर्थशास्त्र  के नजरिये से तालाब का पानी छिछला हो रहा है इसलिए पानी का शुद्ध होना जरूरी
है और पानी की शुद्धता में मछलियाँ एक बड़ी बाधा है इसलिए हर बड़े  तालाब  में  कुछेक  मगर-
मच्छ का होना भी जरूरी है।

     मगरमच्छ के आने से मछलियों के जीवन पर अचानक संकट आ जाएगा ऐसा कुछ नही होगा।
कारण  कि जो भी मगरमच्छ आपके तालाबों में छोड़े जाने वाले हैं वे बहुत ही अनुभवी हैं।शिकार
कैसे करना है, वे उत्तम तरीके से जानते हैं। विदेश  के  मगरमच्छ  गणितज्ञ हैं   और  तालाब  की
मछलियों की गिनती करके उचित मात्रा में खायेंगे।ऐसा नहीं है कि ये  सारी  मछलियों  को डकार
जायेंगे।जो मछलियाँ इनके इशारे पर थिरकेंगी उन्हें दास बना लिया जाएगा और जीवन दान बख्श
 दिया जाएगा।जो उधम मचाने वाली और डटकर स्वाभिमान की रक्षा के लिए आक्रमण करेंगी ये
मगर सिर्फ उनका भोजन ही आरोगेंगे।

  नेताओं का तर्क है कि तालाब में मगर आने से तालाब की शोभा बढ़ जायेगी।ये मगर इतने विशाल-
काय होंगे कि जैसे ही नगर के तालाब में कूदेंगे वैसे ही देशी मछलियाँ पानी के बाहर गिरकर तड़फेंगी।
तड़फती मछलियों का नजारा आपके जीवन में 1947 के बाद पहली बार देखने को मिलेगा।

      विदेशी मगरमच्छो के कारण मगरमच्छो के आका जो देश के बाहर बैठे हैं वे सब बहुत खुश होंगे
और देश के सांडो की प्रसंशा करेंगे। विदेशी गीद्ध हमारी प्रसंशा करे ,यह हमारा सौभाग्य होगा।जब
हमारे सांड बाहर जायेंगे तब इनको चारा डाला जाएगा जो अक्षय होगा,इन सांडो की 14 पुश्ते पेट
भरकर खाने पर भी चारा खत्म नही होगा।

    मगरमच्छ तालाब में होंगे और वे देशी मछलियों का शिकार करेंगे और उससे जो लोमहर्षक दृश्य
उत्पन्न होगा उसे हमारे देशी मगरमच्छ लुफ्त उठाकर देखेंगे। विदेशी  मगरमच्छ  का  जो  भोजन
बचेगा उसका जायका देशी मगरमच्छ लेंगे। इस  तरह  से  देशी  मगरमच्छो  के  लिए  नया पर्यटन
स्थल का भी निर्माण होगा।

      मछलियों का जीवन भी कोई जीवन है ?हजारो नगरो में अरबो मछलियाँ जीवन भुगत रही है।
उनकी नियति में तो मरना ही लिखा है।देशी मछलियाँ देशी मगरमच्छो का निवाला बने या बगुलों
या गिद्धों का,इससे देशी मछली पर क्या फर्क पड़ता है।मछली का तो शिकार होना ही है,उसे बगुला
खाए,गिद्ध खाए या विदेशी मगरमच्छ ,क्या फर्क पड़ेगा देशी मछली को जो इतनी चिल्ला रही है।

     मगरमच्छो के आने से हमारी ताकत बढ़ेंगी।ये मगर जब मछलियों को डकारेंगे जो उनके पेट
से जो अवशिष्ट बाहर निकलेगा उसको हम देश के लोगो को बेचेंगे,यह आय हमे मुफ्त में मिलेगी।
मगर का अवशिष्ट खेतों में जाएगा उससे पैदावार बढ़ेंगी,उससे जो दाना पैदा होगा उसे तालाबो में
डालेंगे उससे छोटी मछलियाँ खुराक बनाएंगी।जब वो बड़ी हो जायेगी तो फिर से मगर का शिकार
बनेगी ,फिर लोमहर्षक दृश्य होगा फिर से देशी गिद्ध और देशी मगर की दावत होगी।      

                        

सार्थक प्रयत्न

सार्थक  प्रयत्न 

दौ मित्र जंगल से निकल रहे थे।थोड़ी देर चलने के बाद एक सरोवर से पहले उन्होंने दौ पेड़ देखे।
एक पेड़ सूख कर ठूँठ में बदल चूका था और दूसरा पेड़ अभी नव पल्लवित था।ठूँठ को देख कर
पहला मित्र बोला - देखो,यह पेड़ भयंकर ताप और पानी नहीं मिलने के कारण सूख चुका है।हमें
प्रयत्न पूर्वक इस पेड़ की सेवा करनी चाहिए ताकि यह फिर से हरा-भरा हो सके।
  दुसरा बोला- मित्र, यह पेड़ पूर्णतय सूख चुका है इसलिए इसका हरा-भरा होना अब नामुमकिन
है। हमें छोटे नवपल्लवित पेड़ की देखरेख करनी चाहिए ताकि यह सघन छायादार पेड़ बन सके।
  पहला बोला-नहीं, इस पेड़ का बिता हुआ काल निश्चित रूप से बढ़िया रहा होगा।यह पेड़ ना जाने
कितने पथिकों को ठंडी हवा दे चुका होगा,इसकी देखरेख ठीक रहेगी।
   दुसरा बोला- तुम्हारी बात सही हो सकती हैमगर अब इसमें जीवन का कोई चिन्ह दिखाई नहीं
देता इसलिए इसे काट कर जलाने या लकड़ी के सामान बनाने के काम में लेना चाहिये।
  पहला मित्र बोला- तुम स्वार्थ भरे नजरिये से इसे देख रहे हो।मैं कोशिश करूँगा कि यह ठूँठ पहले
की तरह हरा-भरा हो जाए ,मैं इसे रोज जल और समय पर खाद दूँगा।
   दुसरा मित्र बोला- मैं इस नवपल्लवित हो रहे पेड़ की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाऊंगा और समय-
समय पर जल और खाद दूँगा।
     दोनों मित्र अपने-अपने श्रम से ठूँठ और नए पेड़ की सेवा में लग गये। कालान्तर में सुरक्षा और
समय पर जल तथा खाद पाकर नया पेड़ फलने-फूलने लगा और ठूँठ खाद और पानी पाकर भी वैसा
ही बना रहा।
   दुसरे मित्र के पेड़ को फलता-फूलता देख कर पहला मित्र निराश हो गया।वे दोनों एक नीतिज्ञ के
पास गये और सारी बात बता दी।
  नीतिज्ञ ने कहा -आप दोनों ने पूर्ण प्रयत्न किया है मगर एक को उचित सफलता मिली और एक को
कर्म करने के बाद भी असफलता हाथ लगी।सफल होने वाले मित्र ने भविष्य की ओर देखा और प्रयत्न
किया जबकि असफल होने वाले मित्र ने भावावेश में निर्णय लिया और अच्छे भूतकाल से बंधा रहा।
इसलिए भूतकाल की जगह सफल होने के लिए भविष्य पर नजर रखो क्योंकि समय परिवर्तन शील
है और उसके साथ चलने में ही बुद्धिमत्ता है,लकीर के फकीर बने रहने से कुछ हासिल नहीं किया जा
सकता है।

नीति - कार्यनुरूप: प्रयत्न:  

सार-   प्रयत्न कार्य के अनुरूप होने पर ही सफलता मिलती है।     

रविवार, 16 सितंबर 2012

शत्रु का उपकार वाला व्यवहार भी विषकुम्भ


शत्रु का उपकार वाला व्यवहार भी विषकुम्भ 

एक किसान के खेत में एक साँप रहता था।उस साँप से किसान और उसका परिवार हमेशा
भयभीत रहता था। किसान बहुत से उपाय कर चुका मगर वह साँप को पकड़ नहीं सका।
किसान जब भी उस साँप को पकड़ने के लिये दोड़ता साँप फुफकार करके उसे भयभीत कर
देता और तेजी से रेंगकर अपनी बाम्बी में घुस जाता।
          एक दिन एक सपेरा किसान के खेत के पास से गुजरा। किसान ने खेत में साँप रहने
की बात उस सपेरे को बतायी और साँप से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। किसान की प्रार्थना
सुन सपेरे ने कहा -मुझे साँप की बाम्बी दिखा दो ,मैं साँप के भय से तुम्हें मुक्त कर दूंगा।
          किसान उस सपेरे को साँप की बाम्बी के पास ले गया तथा सांप की बाम्बी को खोदने
के औजार भी ले आया। सपेरे ने किसान से पूछा -तुम ये सब औजार किस लिए लाये हो ?
   किसान बोला- इन औजारों का उपयोग करके आप आसानी से साँप को पकड़ सकते हैं।
सपेरा बोला- साँप की बाम्बी खोदने से वह पकड़ा जाएगा ,यह सम्भव नही है। मैं साँप का
जन्मजात दुश्मन हूँ और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि दुश्मन के साथ कब,कैसा व्यवहार
करना चाहिये।
        सपेरे की बात सुनकर किसान चुप हो गया। सपेरे ने किसान को कहा -तुम इस बाम्बी
के पास में पानी का छिडकाव कर दो और कटोरा भरकर दूध ले आओ।किसान ने बाम्बी के
पास जल छिडकाव कर दिया और दूध भी रख दिया।
      वातावरण में ठंडक देख कर साँप प्रसन्न हुआ।बाम्बी के अन्दर दूध की महक भी पहुंच
रही थी। साँप का मन बाम्बी से बाहर निकलने का हो रहा था लेकिन वह आशंकाग्रस्त हो
गया कि जी किसान रोज उसके पीछे भागता है वह कोई चाल तो नहीं चल रहा है ?
     थोड़ी देर बाद सपेरे ने किसान से कहा - तुम अब यहाँ से हट जाओ ,क्योंकि साँप तुम्हारी
गंध के कारण बाहर नहीं आयेगा।किसान के वहां से हट जाने के बाद सपेरे ने अपने झोले से
पुंगी निकाली और मधुर तान छेड़ दी।
     साँप पहले से ही वातावरण में ठंडक और दूध की खुशबु से बाहर निकलना चाहता था
मगर किसान के शरीर की गंध की वजह से नही आ रहा था।अब किसान भी वहां से चला
गया था इसलिए उसका मन बाहर निकलने को हो रहा था। सपेरे की पुंगी से निकलने वाली
मादक तान से सांप मस्त हो गया।
      साँप असमय में प्राप्त हो रही ठण्डक ,दूध पिने के लोभ और कर्णप्रिय धुन पर नाचने के
मौह के वशीभूत होकर बाम्बी से बाहर निकल कर सपेरे की पुंगी की धुन पर थिरकने लगा।
सपेरे ने देखा कि साँप पूरी तरह पुंगी की धुन में मस्त हो गया है तो फुर्ती से सांप की फण को
पकड लिया। साँप सपेरे की मजबूत पकड में छटपटा रहा था।

नीति - अप्रिये कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति

  शत्रु के मीठे दीखने वाले बर्ताव को विष्कुम्भ के समान अनर्थकारी ही मानना चाहिये।