शनिवार, 28 जनवरी 2012

पादरी की कुत्सित मानसिकता

पादरी की कुत्सित मानसिकता 

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता का झंडा लेकर भारतीय संस्कृति एवं परम्पराओं पर कुठाराघात 
करने एवं उन्हें लहू-लुहान करने की कुत्सित मानसिकता पर राम बाण प्रहार करते हुए विद्यालयों में 
छात्रों को भगवद गीता पढ़ाने के प्रदेश सरकार के निर्णय के विरोध में दायर की गयी याचिका को १० मिनट में 
ठुकरा दिया | याचिका कैथोलिक पादरी बिशप काउन्सिल से गत वर्ष अगस्त में दायर की थी | तब न्यायालय ने
वादी को गीता पढके आने के लिए कहा था |

काउन्सिल के प्रवक्ता 'फादर' आनंद मुत्तंगल की याचिका में कहा गया था की मध्य प्रदेश सरकार को "किसी एक
धर्म की शिक्षाएँ पढ़ानें की जगह सभी धर्मों को पढ़ाना चाहिए" | याचिका में भारतीय प्रतीकों, एवं कथानकों
से लिए गए नामों पर भी आपत्ति करते हुए कहा गया था कि सरकार की योजनायें जैसे "लाडली लक्ष्मी", "बलराम
 ताल","कपिल धारा" आदि हिन्दू नामों पर आधारित हैं और "सेकुलर" नहीं हैं | सरकारी कार्यक्रमों में भूमि पूजन 
करना सेकुलरिस्म का उल्लंघन है |

याचिका सुनवाई करते हुए न्यायाधीश अजित सिंह एवं संजय यादव ने वादी के अधिवक्ता से पूछा कि क्या 
उन्होंने गीता पढ़ी है | उनके उत्तरों से असंतुष्ट न्यायालय ने निर्णय दिया कि गीता निश्चित रूप से भारतीय 
दर्शन का ग्रन्थ है न कि किसी धर्म विशेष का.
ये यह मिशनरियों की हकीकत ?क्या ये लोग साम्प्रदायिकता नहीं फैला रहे हैं ?ये लोग हिन्दुस्थान 
में भी हिन्दू नाम से कुपित हो रहे हैं तो अपने देशो में हिन्दुओ के साथ कैसा बर्ताव करते होंगे ?

वादों की सेल

वादों की सेल  

हर राजनैतिक दल अपने-अपने पिटारे से बढ़िया से बढ़िया वादे निकाल रहा है.वादे बांटने में किसके 
बाप का क्या लगता है ,फोकट के ख्याल हैं फोकट में बांटने हैं फिर कंजूसी क्यों ?

सब जानते हैं की हम सत्ता में वापिस आने वाले नहीं हैं मगर छोटी सी आशा है कि शायद जनता झांसे 
में आ जाए और पांच साल का हुकुम चलाने का अधिकार मिल जाए .जनता से वोट लेना है यह तो 
हमारे नेताओ का हक़ है क्योंकि राईट टू रिजेक्ट हमारे देश में मतदाता को अभी मिला नहीं है इसलिए 
जनता किसी ना किसी को तो वोट देगी ही .किसी भी तरह का दाना ,चुग्गा ,झांसा,फरेब या लालच 
देकर सत्ता हथिया ली जाए ,फिर तो कौनसा रोज-रोज उनके रूबरू होना है ,गयी पांच साल की.आगे की 
आगे देखेंगे ,बस इस बार जनता मुर्ख बन जाए ...........

कोई जाती के नाम पर भिड़ा रहा है तो कोई धर्म के नाम पर ,किसी को मुस्लिम मलाईदार लग रहे हैं 
तो किसी को हिन्दू .कोई आरक्षण की आग उगल रहा है तो कोई मुफ्त में भत्ता बांटने की गंगा बहा 
रहा है .युवा कालेज के बच्चो को लेपटोप फ्री ,स्कुल के बच्चे को "टेबलेट कंप्यूटर फ्री ,खाना भी फ्री 
बेरोजगारी भत्ता भी ,क्या -क्या नहीं बाँट रहे हैं फ्री में ..........

चुनावी वादे करनेवाले नेता और वोट करने वाली जनता दोनों ही जानते  हैं कि "क्या सच नहीं है और 
क्या सच है" मगर सभी की अपनी-अपनी गणित है .जनता अल्लादीन के जीन्न की तरह वायदों के 
काल्पनिक तोहफों को बटोरने लगी है तो कुछ चुपके-चुपके फ्री में मिलती सूरा गटक रही है तो कुछ 
जयकारे और नारे लगा कर आराम की कमाई कर रही  हैं तो चतुर लोगो की नजर धन पर टिकी है 
की कौनसा उम्मीदवार कितना ,कब, कैसे देगा .....वोट तो देना ही है ,भला तो कोई करने वाला नहीं
है यही मौक़ा है की कुछ हासिल हो जाए ,जीत हार के बाद थूके हुए पीक की जितनी कीमत भी नहीं 
रहने वाली है आम वोटर की .........

 हमारे नेता यह जानते हैं की चुनाव से पहले वादों का ढेर लगाने से नैया पार हो सकती है ,इसलिए 
खुलकर वादों की बौछार हो रही है ,खा बेटा गुड तेरा ही है .हार गए तो वादा वैसे भी पूरा करना नहीं 
है और जीत गए तो सरकारी खजाने का धन (जो जनता का ही है ) कुछ लुटा देना है और कुछ लूट
लेना है ताकि आने वाले चुनावों में फिर लुटा सके...........

क्यों नहीं देश में ऐसा कानून नेताओ और राजनैतिक पार्टियों के वास्ते बने की जो भी दल चुनावों के 
समय जो-जो वादे जनता से करता है उसे पूरा नहीं करने पर उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने के अयोग्य
 करार कर दिया जाए और उन पार्टियों के प्रमुख को जनता को बेवकूफ बनाने के आरोप में आजीवन 
कारावास की सजा दी जाए ...............

हमारे नेता यदि यह सोचते हैं की देश के युवा छात्रो को २-५ह्जार का लालच देकर ख़रीदा जा सकता
है.मेरा मानना है की आज के छात्र और युवा ऐसे राजनेताओं को नकार देंगे ,भ्रष्टाचार के खिलाफ 
अन्ना का साथ देने वाला युवा २-५ हजार के लालच में नहीं आयेंगे .आज के युवा मेहनत करना 
जानते हैं वो ठाले बैठे बेरोजगारी भत्ता लेने वाले आलसी और कामचोर नहीं है .

हमारे नेता ठोस काम की बाते नहीं करते .किस तरह मेहनत और संघर्ष करके देश को विकास की 
और ले जाया जा सकता है ऐसी बाते नहीं करते .बुनियादी समस्याओं से देश को कैसे बचाया जा 
सकेगा ऐसी बाते नहीं करेंगे .हमारे नेता एक दुसरे पर कीचड़ उछालेंगे ,हो-हा करेगे ,आरोप लगायेंगे 
झूठी बयानबाजी करेंगे ,केंकड़ावृति में व्यस्त रहेंगे .........

क्या ऐसे नेताओं को वोट करना सार्थक मतदान करना कहलायेगा ?शायद यही कारण की मेरे 
देश का ४५% मतदाता वोट करने ही नहीं जाता है क्योंकि वह जानता है इस देश के नेता उसकी 
तक़दीर नहीं लिखेंगे ,उसे अपनी तक़दीर खुद ही लिखनी है ,सिर्फ वादों से पेट की आग नहीं बुझने 
वाली है ......... और वे लोग राजनीति से दूर अपने कर्मो में व्यस्त रहते हैं............                       

बुधवार, 25 जनवरी 2012

झांकी

झांकी  

जब मैं भरत का भारत था. 
मुझ में-
शोर्य था, 
स्वाभिमान था, 
आदर्श चरित्र था, 
नीति और नियम
मेरे खून में थे,
सदविचार
मेरे ह्रदय में 
रोपे जाते थे, 
परोपकार
मेरे रग रग में था, 
जब मैं भरत का भारत था.
झूठ और फरेब से
कोसो दूर था, 
दुसरे का धन
मिटटी समान था,
सत्य और न्याय
मुझ में भरे थे, 
राजा हो या रंक
वचनों पर बंधे थे,
कथनी और करनी में 
कुछ भी फर्क न था, 
जब मैं भरत का भारत था.
मगर -
विधि कि विडम्बना 
कालचक्र कि गणना 
समझ से परे है. 
कुछ वर्षों से, 
इण्डिया देट इज  भारत हूँ .
अब -
कुत्तो से डरता हूँ 
सियारों से छिपता हूँ 
स्वाभिमान खो रहा हूँ 
झूठा बईमान हूँ 
क्योंकि,अब- 
इण्डिया देट इज  भारत हूँ .
मेरा चरित्र -जर्जर है 
नीति नियम- 
तार-तार है 
सदविचार-
तिनके-तिनके है 
संवेदना-
जार-जार है
क्योंकि,अब-  
इण्डिया देट इज  भारत हूँ .


       

   

  


       


शनिवार, 21 जनवरी 2012

मानसिक तनाव :एक घातक बिमारी

मानसिक तनाव :एक घातक बिमारी 

हम जैसे जैसे आधुनिक तकनीक से जुड़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे हमारे जीवन को यंत्रवत बनाते जा रहे हैं.
निसंदेह हम तकनीक से बहुत कुछ हासिल कर पाए हैं और कर रहे हैं लेकिन हम अति आपाधापी के 
कारण खोते जा रहे हैं कुछ मानवीय गुण जो प्रकृति ने हम सबको उपहार में दे रखे हैं.जब तकनीकी
साधन कम थे उस समय भी सभ्यता अपने चरम पर थी लोगो में प्रेम था ,अपनापन था,धीरज था ,
साहस था ,सोने की चिड़ियाँ था मेरा देश मगर आज तकनीकी विकास के बावजूद ना तो मेरा देश 
सोने की चिड़ियाँ रहा और ना ही देश वासी संतुष्ट नागरिक .इसके बहुत कारण हो सकते हैं जिसमे 
तनाव की भी बड़ी भूमिका है 
        क्या है तनाव - तनाव एक विषम परिस्थिति से उत्पन्न डांवाडोल सोच है जो सही मार्गदर्शन के 
अभाव से पैदा होती है.जब भी हम उस परिस्थिति को बदलने की कोशिश करते हैं जो बदली नहीं जा 
सकती फिर भी हम परिस्थिति से तालमेल नहीं बैठाकर अपनी ऊर्जा का व्यय करते रहते हैं .हम 
बबूल के पेड़  से आम प्राप्ति के यत्न करते हैं तब फल प्रतिकूल ही पाते हैं और यही प्रतिकूल फल हमें 
बैचेन कर देता है यानि तनाव ग्रस्त कर देता है 

       तनाव के कारण -

१.भय की विचारधारा -जब साहस की जगह भय हमारे पर हावी हो जाता है तो हम किसी भी काम को 
शुरू नहीं करते या शुरू करते ही आशंका ग्रस्त हो जाते हैं की काम में असफलता ना मिल जाये.हमारी 
यही सोच हमारे विवेक को कुंठित कर देती है और हम तनावग्रस्त हो जाते हैं.
          
२.धीरज की कमी- हम उपयुक्त समय आने से पहले ही अधीर हो जाते हैं,किसी भी व्यवधान पर तत्काल 
विजय चाहते हैं ,काम में लगने वाले काल से पहले परिणाम प्राप्त कर लेना चाहते हैं मगर ऐसा होता नहीं 
है और तब हम बुद्धि को एकाग्र रख पाने में असमर्थ हो जाते हैं और धीरज खोकर गलत और उलटे निर्णय 
कर लेते हैं .
  
३.खोखले संकल्प - हम अपने संकल्प मजबूत नहीं बनाकर खोखले बना लेते हैं .जिस भी काम को हाथ
 में लेते हैं उसे करने से पहले दुनिया के सामने अपने संकल्प प्रगट कर देते हैं जब हाथ में लिया काम 
पर्याप्त समय और भरपूर मेहनत मांगता है तब हम ऐसा कर नहीं पाते ,समय और मेहनत की कमी के 
कारण जब काम असफल होने लगता है तो हम तनाव में आ जाते हैं 
  
४.सामंजस्य की कमी-सफलता के लिए बेहतर तालमेल होना बहुत जरुरी होता है ,जब हम इस सिद्धांत 
से हटकर टीम वर्क को भूल जाते हैं और लक्ष्य से दूर फेंक दिये जाते हैं तब हम तनाव महसूस करते हैं.

५.सहयोग की कमी-किसी भी लक्ष्य की पूर्ति के लिए सहयोग करना और सहयोग पाना बहुत जरुरी 
होता है ,हम उदार भावनाओं की बजाय क्षुद्र सोच के बन जाते हैं तब हम महसूस करते हैं की दुनिया 
बहुत स्वार्थी है ,हर तरफ असहयोग करनेवालों से पाला पड़ने लगता है और हम तनावग्रस्त हो जाते हैं. 

६.नकारात्मक सोच- किसी भी विषय वस्तु पर हमारी सोच यदि आरम्भ में ही नकारात्मक हो जाये तो
हम सहजता से तनाव के शिकार हो जाते हैं .हमारी कल्पनाएँ डराने वाली होगी ,पराजय वाली होगी तो 
तनाव से हमें कौन बचा सकता है.

७.आडम्बरपूर्ण जीवन पद्धति-हम दिखावा ,भभका ,अतिश्योक्ति का जीवन चाहते हैं ,झूठी शान शोकत 
दिखाना चाहते हैं ,कर्ज लेकर भी तफरीह करना चाहते हैं तो तनाव रहेगा ही .पैसा नहीं है फिर भी देखा-
देखी में खर्च करना है ,ऋण लेकर दान करना है ;यह आडम्बर तनाव देने वाला होता है .
   
८.ज्ञान का अभाव- जब हम किसी विषय वस्तु के बारे में ठीक से नहीं जानते हैं तो व्यर्थ में अपनी सोच 
की ऊर्जा नष्ट नहीं करनी चाहिए .हमें उस विषय के बारे में सही जानकारी प्राप्त करनी चाहिए ताकि हम 
समस्या को सही रूप से समझ सके और उससे परास्त कर सके .
   
९.जितेन्द्रियता का अभाव -हमारे तनाव ग्रस्त हो जाने का यह भी एक बड़ा कारण है ,हम अपने शरीर
के अंगों पर काबू नहीं रख पाते .जीभ पर काबू नहीं रह पाता और उटपटांग बक देते हैं बुद्धि पर पकड़ 
नहीं रहती उलटा सोच लेते हैं ,आँखों पर काबू नहीं रख कर गलत नजरिये से विषय को देख लेते हैं 
मन पर काबू नहीं रखते और कल्पनाओं के घोड़े दौडाते हैं और तनाव में जीते हैं. 
  
१०.असंतुष्टि - जो वर्तमान में प्राप्त है जिसका आन्नद लिया जा सकता है उसका उपयोग नहीं करते हैं
और जो नहीं है उसे नहीं पाकर दुखी हैं लालसा कभी तृप्त नहीं होती उसकी भूख पाने के बाद और बढ़ 
जाया करती है और यही प्रवृति हमारे जीवन को तनाव ग्रस्त बना देती है .

तनाव का फल -

१.शारीरिक रुग्णता -बिमारी 
२.कार्य में असफलता 
३.परिवार से अलगाव 
४.समाज से दुरी 
५.गरीबी का जीवन 
६.आत्महत्या जैसे कुकृत्य 
७.पोरुषहीन जीवन 

तनावमुक्त कैसे बने .

१.सकारात्मक सोच 
२.दैवीय गुणों का विकास करे 
३.योग्य मार्गदर्शन में काम करे
४.कर्तव्य कर्म करे ,परिणाम की चिंता ना करे.
५.समय का उचित वर्गीकरण करे .
६.तनाव के कारण की खोज की शुरुआत अपने से शुरू करे.
७.परहित और स्वहित में उचित तालमेल बैठाए.
८.जो प्राप्त है उसे प्रसन्नता से स्वीकार करे और कदम दर कदम आगे बढे .
९.अपनी दिनचर्या व्यवस्थित रखे 
१०.मुस्कराना सीखे .

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

हाथी

हाथी 

एक भारतीय चीनी पर्यटक से पूछता है - आपको हमारा ताज और नबाबो की नगरी कैसी लगी ?
चीनी-    विस्मय जनक !
भारतीय- कैसे ?
चीनी -इस ठण्ड के मौसम में आम भारतीय बिना गरम कपडे के ठिठुर रहा है और मोटी मोटी
मूर्तियों को मोटे कपड़ो से ढक के रखा है .वाह !भारतीयों की विचित्र सोच .........


जंगल के बिल्ली कुत्ते खरगोश इकट्टे होकर हाथी दादा के पास गए और बोले -दादा इस बार 
ठण्ड ज्यादा है ,आप भाई बंधुओ समेत आगरा जाकर आ जाये ताकि वापिस आने पर हमारे 
लिए भी गरम कम्बल ले आये 
हाथी ने पूछा - क्या आगरा में गरम कम्बल मुफ्त मिलते हैं ?
जानवर बोले -नहीं दादा ,वहां आपकी मूर्तियों पर आयोग मेहरबान है .....
हाथी ने पूछा -वो कैसे ?
जानवर बोले -दादा,आपकी मूर्तियों को ठण्ड नहीं लगे इसलिए मोटे कपड़ो से ढका जा रहा है 
आप सब वहां जायेंगे तो आपको भी गरम कम्बल से ढक देंगे और वापिस जंगल में आने पर 
हम सबको गरम कम्बल दे देना ताकि सर्दी में आराम आ जाये  .

एक हिंदी के शिक्षक लखनऊ में घूम रहे थे .चोराहों- पार्को में लगी हाथियों की ढकी हुयी मूर्तियों 
को गौर से देख रहे थे .थोड़ी देर बाद वे एक स्कुल में पहुंचे और छात्रो से पूछा -'अ' और बड़ी "ई"की 
मात्रा में क्या अंतर है ?
एक छात्र बोला-गुरूजी ,"अ" की मात्रा नंगी है और "ई" की मात्रा ढकी हुयी है !
गुरूजी बोले -मतलब ...?
छात्र बोला -गुरूजी -"हाथ" में नंगापन है और हाथी में ढकापन है.


बहन चिल्लाई -हाथी को ढका पर हाथ को क्यों नहीं ?
भैया बोला - हाथ में लकीरे हैं और वो भी अल्पसंख्यक है,  कहीं लकीरे नाराज नहीं हो जाये.इसलिए 
हाथ को नहीं ढका.
बहन-.फिर हाथी को क्यों ढका ?
भैया - हाथी फिर से हाथ की लकीर ना मिटा दे ..........            

रविवार, 15 जनवरी 2012

गणतंत्र भारत और व्यथित भारतीय

गणतंत्र भारत और व्यथित भारतीय 

कथनी करनी का फर्क राजनेताओ ,धार्मिक बाबाओं और समाजसेवको में फैला है और इस कारण
आम भारतीय व्यथित है इस आक्रोश को वो चप्पल जूते उछालकर,थप्पड़ मरकर या कालिख पोतकर
दिखा रहा है .यह बात सही है की ऐसी घटनाएं निंदनीय होनी चाहिये क्योंकि सभ्य लोकतंत्र में विरोध
प्रगट करने के और भी तरीके हैं मगर सवाल यह उठता है कि फिर आम भारतीय ऐसा क्यों कर रहा है.
इसका कारण है -भ्रष्ट नेता ,धन के लोभी बाबा लोग,कथनी करनी का फर्क ,निचे दर्जे क़ी सियासत,
आश्वासनों का ढेर ,लालफीताशाही ,रिश्वत ,कालाबाजारी,काम  में लेटलतीफी,महंगाई और बेरोजगारी .

            हमारे देश के नेता कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं ,समस्याओं का हल आरोप -प्रत्यारोप मढने
तर्क-कुतर्क देकर या बहाना बनाकर खोजते हैं . बात महंगाई क़ी आती है तो महंगाई के गिरते आंकड़े
दिखाकर जनता को बरगलाने क़ी कोशिश क़ी जाती है .बात बेरोजगारी क़ी आती है तो जनता को
विकसित भारत के सपने दिखा कर चुप कर दिया जाता है ,बात रिश्वत खोरी क़ी आती है तो सभी दल
सोगंध के सच्चे  बन कर रिश्वत खोरी से लड़ने के लिए मुठ्ठियाँ कसते दिखाई जरुर देते हैं मगर यथार्थ
में नतीजा ढाक के तीन पात होता है .काम के लिए समय तय करने क़ी बात होती है मगर काम नहीं
होता है .युवाओं को काम देने क़ी बात कही जाती है तो सरकार मुंह लटका के खड़ी हो जाती है.बढ़ते
भाव से जनता निजात चाहती है तो सस्ते में चीजे उपलब्ध कराने क़ी राजनीति खेली जाती है .आखिर
क्या करे आम आदमी ,कहाँ जाए और किससे कहे अपना दुखड़ा ......जब सारे रास्ते बंद नजर आने
लगे तो हताश आदमी का आक्रोश जूते ,चप्पल,कालिख का सहारा लेकर बाहर उभर जाता है .

              जनसेवक पैसेवाले बनते जा रहे हैं और आम भारतीय गरीब .ऐसा क्यों हुआ .हमारे ही द्वारा
निर्मित सिस्टम के कारण .आज जैसे ही कोई दल चुनाव जीत जाता है तो जनता के साथ पांच साल
तक अपनी विचारधारा थोप देता है ,कोई उनसे ये कहने क़ी जरुरत करता है आप गलत हैं तो उत्तर
मिलता है जनता ने हमें चुनकर भेजा है इसलिए पांच साल तक हम सर्वोपरि हैं ,हमें भोगिये ,सहन
कीजिये .जब देश हित गौण हो जाता है पक्ष का हित ऊपर हो जाता है तब आम व्यक्ति व्यथित हो
खुद के ठगे जाने को सह नहीं पाता है और अपनी जान पर खेल कर भी किसी को थप्पड़ या किसी को
जूता मार देता है .

         मेरे राष्ट्र के बाबा लोग आज धन लोलुप हो गए हैं .हर नामी बाबा आलिशान फार्म हाउस यानि
आश्रम के नाम पर देश में जगह-जगह सम्पत्ति खड़ी कर रहे हैं .आलिशान चमचमाती कारों में घूमते हैं
अपने कारखाने चला रहे हैं ,पुस्तके बेच रहे हैं .ऐसे ढोंगी बाबा जब जनता को आदर्शो क़ी माला जपने
का उपदेश देते हैं तो जनता पर क्या सही असर पडेगा?बाबा लोग कंचन और कामिनी में लिप्त पाए
जाते हैं और आम जनता को उपदेश करते हैं क़ी सदाचारी बने ,क्या ऐसा उपदेश और ऐसे बाबा ढोंगी
नहीं हैं .अस्तेय और अपराग्रह को बाबा लोग अपने जीवन में नहीं उतार पाते हैं और लोगों को शिक्षा
देते हैं .आज देश का हर नामी बाबा करोडो रूपये संचय कर रहा है ,आखिर क्या जरुरत है संचय करने
क़ी ,वास्तव में ये लोग जिस भी धर्म के प्रचार में लगे हैं उस धर्म के आस्थावानों क़ी भावनाओं का
शोषण करते हैं ,भगवा  पहन कर राजनीती के आदर्श उपस्थित करने क़ी जगह खुद अपनी राजनैतिक
पार्टी खड़ी करने क़ी बात करते हैं या अपनी सशस्त्र सेना खड़ी करने का एलान करते हैं ,क्या धार्मिक
चोले पहनने का यही अर्थ बाकी बचा है .और ऐसे में कोई व्यथित स्याही उंढेल देता है तो ..........

         मेरे गणतंत्र में यदि राष्ट्रिय नेता कथनी करनी के फर्क को कम कर दे ,बाबा लोग कूटनीति क़ी
जगह आदर्श नागरिक गढने क़ी प्रक्रिया में लग जाए तो व्यथित भारतीय को नयी दिशा मिल सकती है
                

बुधवार, 11 जनवरी 2012

फतवा

फतवा 


फतवा पढने का ठेका सिर्फ किसी एक कौम की जागीर नहीं है .हर किसी को अपना अपना फतवा
पढने का हक़ है .कोई बुर्का डालने का फतवा पढता है तो कोई टुके कपडे पहनने का.कोई अभिव्यक्ति
को रोकने का फतवा पढता है तो कुदेर-कुदेर कर सच सामने लाने का .
        एक वकील साहब को अपनी पार्टी के खिलाफ कडवा सच लिखा हुआ हजम नहीं हुआ तो वे पढ़
बैठे फतवा कि सार्वजनिक मंच पर लिखना बंद होना चाहिए क्योंकि ये उनके आराध्य के खिलाफ
कडवा मजाक है .
       एक वकील साहब हैं की बाल की खाल निकाल कर दशा और ग्रह खराब करते जा रहे हैं लुंगी
वाले बाबू की .उनका दावा है की मयखाने में जाने वाला सादा और कोरा ही बाहर थोड़ी आता है .
     राजनीती वाले लोग तो फतवे का आधुनिक नाम रख ही चुके हैं ,वो जानते हैं फतवा नाम देने से
चुने हुए लोग सीधे सीधे मानेगें नहीं और नहीं मानने से हाई कमान शब्द का भी कोई औचित्य नहीं
इसलिए उन्होंने नाम दे दिया "व्हिप ".व्हिप की नहीं मानकर आत्मा की आवाज की जो प्रतिनिधि
मानता है उसका तो अंतिम संस्कार ही होता है अब .
     बात लोकपाल की ही ले लीजिये -सरकार ने पढ़ा ,हम जो लाये हैं वो ही मजबूत ,टिकाऊ ,सुन्दर
लोकपाल है और ऐसे ही लोकपाल की देश को जरुरत है मगर अन्ना भड़क उठे और बोले-नहीं ,ये
लोकपाल नहीं चलेगा ,लोकपाल के पास तो संत्री से मंत्री तक का इलाज हो पक्का ताबीज हो ताकि
A _B _C _D _ चारो के चारो चक्कर लगाते रहे .
   बात चुनाव की हो तो हर दल अपना अपना फतवा पढ़ देता है ,एक दल को लगा अल्पसंख्यक के 
बिना नाव डूब ही जायेगी इसलिए ९%आरक्षण का मन्त्र पढ़ दिया ,मन्त्र भी तभी सिद्ध होते हैं जब
सच्चे मन से पढ़े जाये वरना तो बेकार ही जाते हैं .
     बात फतवे की चल रही थी की चुनाव आयोग ने हुक्म (फतवा नाम चीलर लग रहा है )दिया -
शहर गाँव जहां भी हाथी की मूर्ति दिखाई दे उसे ढक दिया जाये ,क्योंकि हाथी की माया दलित  को 
मालामाल कर सकती है अब ये तर्क कुतर्क है ,ऐसा कौन कहे .
    एक फतवा आया था FDI  का. लेकर जरुर आयेंगे भले ही अर्थ का अनर्थ हो .जब जनता ने लाल
आँख की तो वो बोले -अभी नहीं पर बाद में जरुर लायेंगे आपकी छाती पर मुंग दलवाने,पहले वोट
कर लो फिर देंखे किसकी मझाल जो हमें ही रोके .
    एक फतवा आया की ३२/- कमाने वाले अमीर भारतीय है जब यह फतवा गले नहीं उतरा तो वो 
बोले-हम ८०% जनता को २/-किलो गेंहू ३/-किलो चावल १/-किलो मोटा अनाज देंगे एक दिन में 
१ किलो भी खा जाएगा तो भी ३१/- की बचत यानी आय का ९७% बचत ३% खर्च ,अब बोलो ३२/- 
कमाने वाला अमीर है की नहीं !
      फतवा देश के किसी भी कौने से कोई भी कभी भी पढ़ सकता है .बंगाल क्वीन ने क्या पढ़ा है
कि बेचारा हाथ लकवा ग्रस्त हो गया ,उधर दक्षिण से फतवा आया .....और दो! इतने से काम नहीं
चलेगा ,बात मान लो वरना वक्र गति होगी शिवा के देश में .
                     

रविवार, 1 जनवरी 2012

सफल जीवन पद्धति का निर्माण- तुलसी की "मानस"से

सफल जीवन पद्धति का निर्माण- तुलसी की "मानस"से  


तुलसी की मानस में सिर्फ आध्यात्म ही नहीं है ,इसमें सफल जीवन पद्धति के सिद्धांत छिपे हैं.हम
अपने धर्म ग्रंथो के मर्म को समझे बिना टीका या आलोचना कर देते हैं,यह सही नहीं है.तुलसी की
मानस में शरुआत में ही सफल जीवन पर चर्चा आ जाती है .


"भवानीशंकरो वन्दे श्रद्धाविश्वासरुपिणौ"

श्रद्धा और विश्वास ये शब्द जीवन सिद्धांत हैं .हम जब भी समझने योग्य हो जाते हैं यानी पांच वर्ष से
ऊपर की आयु के हो जाते हैं तब से ये सिद्धांत हमारे जीवन पर प्रभाव छोड़ना शुरू कर देते हैंऔर
मृत्युपर्यंत हमारे जीवन पथ बने रहते हैं .

बचपन में हम KG क्लास से विद्या अध्ययन शुरू करते हैं तब हमें अंक या शब्द क्या होते हैं इसकी
समझ नहीं होती है ,माँ या गुरु के साथ रह कर हम अंक या शब्द सीखने की कोशिश करते हैं मगर
हम सीखते हैं अपने ऊपर विश्वास और अक्षर पर श्रद्धा रख कर ही .अपने कर्म के ऊपर प्रबल श्रद्धा हो
और खुद पर अडिग विश्वास हो तो नवसृजन संभव हो जाता है .दुनिया में आज तक जितने भी प्रयोग
हुए हैं चाहे वे सामाजिक परिवर्तन हो,आर्थिक ,राजनैतिक या वैज्ञानिक ;सभी परिवर्तन के लिये
परिवर्तन कर्ता में ये दोनों गुण अवश्यम्भावी होते ही हैं .इन गुणों के बिना कुछ भी संभव नहीं है .कथा
में राम को भगवान् नहीं मानकर समझने के लिए कुछ समय के लिए पात्र समझ ले तो तुलसी के इस
पात्र में ये दोनों गुण कूट-कूट कर भरे थे ,चाहे वे यज्ञ रक्षा का कर्म करते हैं या धनुष भंग का या रावण
वध का .कहने का तात्पर्य यही है की हमारे जीवन में ये गुण अति आवश्यक हैं इन गुणों के बिना
 हमारा जीवन कुछ महत्व का नहीं है .कोई भी महापुरुष की जीवनी पढ़िये  चाहे विश्व के किसी भी देश
से हो हमें उनके जीवन में ये दोनों गुण प्रबलता से काम करते दिखेंगे .

तुलसी अगले ही श्लोक में ज्ञान यानि बोध की वंदना करते हैं .हम जब तक अज्ञान में रहते हैं तब
 हमारी परख की क्षमता काफी कम होती है .हमारे में ज्ञान की कमी के कारण अपने पर विश्वास
 नहीं होता है और आत्मविश्वास की कमी को पूरा करना है तो जिस भी क्षेत्र में कार्यरत हैं मगर
 उसका पूरा ज्ञान होना ही चाहिए उसके बिना अधकचरा ज्ञान सब क्षेत्र में हमें असफलता देता है.

तुलसी का अगला श्लोक कहता है - वन्दे विशुद्धविज्ञानौ .................

जब हमें किसी भी विषय का ज्ञान हो जाता है तो उसे यूँ ही मान नहीं ले.हमारा ज्ञान विशुद्ध विज्ञान
सम्मत होना चाहिए .तुलसी चाहते हैं की व्यक्ति अपने ज्ञान को खूब जांचे,परखे और हर काल पर
उसका परिक्षण करे .कोई भी तथ्य सिद्धांत का रूप तभी धारण करता है जब वह हर काल में सही
हो .तुलसी के अनुसार विशुद्ध विज्ञान ही धर्म है बाकी सब आडम्बर .

जो लोग तुलसी की यह कह कर निंदा करते हैं की तुलसी नारी जीवन को हेय या ताड़ना के योग्य
समझते थे वे उसे गलत व्याख्या के रूप में लेते है .तुलसी फिर अगले श्लोक में कहते हैं कि नारी
उत्पति,स्थिति और संहार करने वाली शक्ति से संचित है ,सम्पूर्ण कल्याण उसके ही कारण से होते हैं.

तुलसी अगले सोरठे में मनुष्य जीवन में बुद्धि के महत्व को प्रणाम करते हैं ,हमारे में सुबुद्धि और
कुबुद्धि दोनों ही सदैव रहती है ,तुलसी कहते हैं कि सुबुद्धि से सभी कार्य सिद्ध हो जाते है इसीलिए
तुलसी ने बुद्धि को विनायक कहा है .हम जब भी किसी भी कार्य को शुरू करते हैं तब आम भाषा में
कहते हैं कि काम का श्री गणेश हो जाये.श्री गणेश से तात्पर्य जब भी काम कि शुरुआत करनी हो
उसके पहले श्रद्धा ,विश्वास,कार्य के होने कि प्रणाली का सम्पूर्ण ज्ञान ,उस ज्ञान को विशुद्ध रूप से
परख ले और फिर काम को बुद्धिमानी से शुरू करे .किसी भी काम कि सफलता के ये आवश्यक
तत्व हैं ,इनके बिना कार्य पूर्ण रूप से सफल नहीं होता है.

खुद तुलसी ने जब इस महाग्रंथ की रचना शुरू की तब उनके अन्दर खुद पर कितना विशवास रहा
होगा कितनी श्रद्धा रही होगी अपने कर्म पर .तुलसी ने ज्ञान को विज्ञान सम्मत करके ही इस ग्रन्थ
की रचना की होगी .क्या तुलसी को इस ग्रन्थ को लिखने से पहले यह आभास हो गया था की उनका
ग्रन्थ विश्व विख्यात महाकाव्य बनकर करोडो लोगो का उपकार करेगा .इसका उत्तर है "हाँ "
क्यों ? क्योंकि जिस व्यक्ति में अपने आप पर प्रबल आत्मविश्वास हो ,उसके कर्म पर उसे पूर्ण श्रद्धा हो ,
उसका ज्ञान सम्पूर्ण और तर्क तथा विज्ञान सम्मत हो :कार्य करने से पहले सुबुद्धि का उपयोग किया 
गया हो तो वह काम सफल ही होता है इसमें किंचित मात्र भी संदेह नहीं किया जा सकता है.


हम भी अपने कर्म के प्रति श्रद्धा रखे ,अपने पर प्रबल विश्वास रखे,विषय की तह तक अपने ज्ञान को
ले जाये,विज्ञान सम्मत तरीके से काम करे और काम का उद्देश्य खुद के भले के साथ लोक हित भी हो
कार्य स्वत:सिद्ध हो जाता है.

आइये हम मानस आधारित जीवन सिद्धांतो को अपनाए और नव वर्ष तथा जीवन को सफलता से
जिये और सफल बने .