रविवार, 15 जनवरी 2012

गणतंत्र भारत और व्यथित भारतीय

गणतंत्र भारत और व्यथित भारतीय 

कथनी करनी का फर्क राजनेताओ ,धार्मिक बाबाओं और समाजसेवको में फैला है और इस कारण
आम भारतीय व्यथित है इस आक्रोश को वो चप्पल जूते उछालकर,थप्पड़ मरकर या कालिख पोतकर
दिखा रहा है .यह बात सही है की ऐसी घटनाएं निंदनीय होनी चाहिये क्योंकि सभ्य लोकतंत्र में विरोध
प्रगट करने के और भी तरीके हैं मगर सवाल यह उठता है कि फिर आम भारतीय ऐसा क्यों कर रहा है.
इसका कारण है -भ्रष्ट नेता ,धन के लोभी बाबा लोग,कथनी करनी का फर्क ,निचे दर्जे क़ी सियासत,
आश्वासनों का ढेर ,लालफीताशाही ,रिश्वत ,कालाबाजारी,काम  में लेटलतीफी,महंगाई और बेरोजगारी .

            हमारे देश के नेता कहते कुछ हैं और करते कुछ हैं ,समस्याओं का हल आरोप -प्रत्यारोप मढने
तर्क-कुतर्क देकर या बहाना बनाकर खोजते हैं . बात महंगाई क़ी आती है तो महंगाई के गिरते आंकड़े
दिखाकर जनता को बरगलाने क़ी कोशिश क़ी जाती है .बात बेरोजगारी क़ी आती है तो जनता को
विकसित भारत के सपने दिखा कर चुप कर दिया जाता है ,बात रिश्वत खोरी क़ी आती है तो सभी दल
सोगंध के सच्चे  बन कर रिश्वत खोरी से लड़ने के लिए मुठ्ठियाँ कसते दिखाई जरुर देते हैं मगर यथार्थ
में नतीजा ढाक के तीन पात होता है .काम के लिए समय तय करने क़ी बात होती है मगर काम नहीं
होता है .युवाओं को काम देने क़ी बात कही जाती है तो सरकार मुंह लटका के खड़ी हो जाती है.बढ़ते
भाव से जनता निजात चाहती है तो सस्ते में चीजे उपलब्ध कराने क़ी राजनीति खेली जाती है .आखिर
क्या करे आम आदमी ,कहाँ जाए और किससे कहे अपना दुखड़ा ......जब सारे रास्ते बंद नजर आने
लगे तो हताश आदमी का आक्रोश जूते ,चप्पल,कालिख का सहारा लेकर बाहर उभर जाता है .

              जनसेवक पैसेवाले बनते जा रहे हैं और आम भारतीय गरीब .ऐसा क्यों हुआ .हमारे ही द्वारा
निर्मित सिस्टम के कारण .आज जैसे ही कोई दल चुनाव जीत जाता है तो जनता के साथ पांच साल
तक अपनी विचारधारा थोप देता है ,कोई उनसे ये कहने क़ी जरुरत करता है आप गलत हैं तो उत्तर
मिलता है जनता ने हमें चुनकर भेजा है इसलिए पांच साल तक हम सर्वोपरि हैं ,हमें भोगिये ,सहन
कीजिये .जब देश हित गौण हो जाता है पक्ष का हित ऊपर हो जाता है तब आम व्यक्ति व्यथित हो
खुद के ठगे जाने को सह नहीं पाता है और अपनी जान पर खेल कर भी किसी को थप्पड़ या किसी को
जूता मार देता है .

         मेरे राष्ट्र के बाबा लोग आज धन लोलुप हो गए हैं .हर नामी बाबा आलिशान फार्म हाउस यानि
आश्रम के नाम पर देश में जगह-जगह सम्पत्ति खड़ी कर रहे हैं .आलिशान चमचमाती कारों में घूमते हैं
अपने कारखाने चला रहे हैं ,पुस्तके बेच रहे हैं .ऐसे ढोंगी बाबा जब जनता को आदर्शो क़ी माला जपने
का उपदेश देते हैं तो जनता पर क्या सही असर पडेगा?बाबा लोग कंचन और कामिनी में लिप्त पाए
जाते हैं और आम जनता को उपदेश करते हैं क़ी सदाचारी बने ,क्या ऐसा उपदेश और ऐसे बाबा ढोंगी
नहीं हैं .अस्तेय और अपराग्रह को बाबा लोग अपने जीवन में नहीं उतार पाते हैं और लोगों को शिक्षा
देते हैं .आज देश का हर नामी बाबा करोडो रूपये संचय कर रहा है ,आखिर क्या जरुरत है संचय करने
क़ी ,वास्तव में ये लोग जिस भी धर्म के प्रचार में लगे हैं उस धर्म के आस्थावानों क़ी भावनाओं का
शोषण करते हैं ,भगवा  पहन कर राजनीती के आदर्श उपस्थित करने क़ी जगह खुद अपनी राजनैतिक
पार्टी खड़ी करने क़ी बात करते हैं या अपनी सशस्त्र सेना खड़ी करने का एलान करते हैं ,क्या धार्मिक
चोले पहनने का यही अर्थ बाकी बचा है .और ऐसे में कोई व्यथित स्याही उंढेल देता है तो ..........

         मेरे गणतंत्र में यदि राष्ट्रिय नेता कथनी करनी के फर्क को कम कर दे ,बाबा लोग कूटनीति क़ी
जगह आदर्श नागरिक गढने क़ी प्रक्रिया में लग जाए तो व्यथित भारतीय को नयी दिशा मिल सकती है
                

कोई टिप्पणी नहीं: