शनिवार, 21 जनवरी 2012

मानसिक तनाव :एक घातक बिमारी

मानसिक तनाव :एक घातक बिमारी 

हम जैसे जैसे आधुनिक तकनीक से जुड़ते जा रहे हैं वैसे-वैसे हमारे जीवन को यंत्रवत बनाते जा रहे हैं.
निसंदेह हम तकनीक से बहुत कुछ हासिल कर पाए हैं और कर रहे हैं लेकिन हम अति आपाधापी के 
कारण खोते जा रहे हैं कुछ मानवीय गुण जो प्रकृति ने हम सबको उपहार में दे रखे हैं.जब तकनीकी
साधन कम थे उस समय भी सभ्यता अपने चरम पर थी लोगो में प्रेम था ,अपनापन था,धीरज था ,
साहस था ,सोने की चिड़ियाँ था मेरा देश मगर आज तकनीकी विकास के बावजूद ना तो मेरा देश 
सोने की चिड़ियाँ रहा और ना ही देश वासी संतुष्ट नागरिक .इसके बहुत कारण हो सकते हैं जिसमे 
तनाव की भी बड़ी भूमिका है 
        क्या है तनाव - तनाव एक विषम परिस्थिति से उत्पन्न डांवाडोल सोच है जो सही मार्गदर्शन के 
अभाव से पैदा होती है.जब भी हम उस परिस्थिति को बदलने की कोशिश करते हैं जो बदली नहीं जा 
सकती फिर भी हम परिस्थिति से तालमेल नहीं बैठाकर अपनी ऊर्जा का व्यय करते रहते हैं .हम 
बबूल के पेड़  से आम प्राप्ति के यत्न करते हैं तब फल प्रतिकूल ही पाते हैं और यही प्रतिकूल फल हमें 
बैचेन कर देता है यानि तनाव ग्रस्त कर देता है 

       तनाव के कारण -

१.भय की विचारधारा -जब साहस की जगह भय हमारे पर हावी हो जाता है तो हम किसी भी काम को 
शुरू नहीं करते या शुरू करते ही आशंका ग्रस्त हो जाते हैं की काम में असफलता ना मिल जाये.हमारी 
यही सोच हमारे विवेक को कुंठित कर देती है और हम तनावग्रस्त हो जाते हैं.
          
२.धीरज की कमी- हम उपयुक्त समय आने से पहले ही अधीर हो जाते हैं,किसी भी व्यवधान पर तत्काल 
विजय चाहते हैं ,काम में लगने वाले काल से पहले परिणाम प्राप्त कर लेना चाहते हैं मगर ऐसा होता नहीं 
है और तब हम बुद्धि को एकाग्र रख पाने में असमर्थ हो जाते हैं और धीरज खोकर गलत और उलटे निर्णय 
कर लेते हैं .
  
३.खोखले संकल्प - हम अपने संकल्प मजबूत नहीं बनाकर खोखले बना लेते हैं .जिस भी काम को हाथ
 में लेते हैं उसे करने से पहले दुनिया के सामने अपने संकल्प प्रगट कर देते हैं जब हाथ में लिया काम 
पर्याप्त समय और भरपूर मेहनत मांगता है तब हम ऐसा कर नहीं पाते ,समय और मेहनत की कमी के 
कारण जब काम असफल होने लगता है तो हम तनाव में आ जाते हैं 
  
४.सामंजस्य की कमी-सफलता के लिए बेहतर तालमेल होना बहुत जरुरी होता है ,जब हम इस सिद्धांत 
से हटकर टीम वर्क को भूल जाते हैं और लक्ष्य से दूर फेंक दिये जाते हैं तब हम तनाव महसूस करते हैं.

५.सहयोग की कमी-किसी भी लक्ष्य की पूर्ति के लिए सहयोग करना और सहयोग पाना बहुत जरुरी 
होता है ,हम उदार भावनाओं की बजाय क्षुद्र सोच के बन जाते हैं तब हम महसूस करते हैं की दुनिया 
बहुत स्वार्थी है ,हर तरफ असहयोग करनेवालों से पाला पड़ने लगता है और हम तनावग्रस्त हो जाते हैं. 

६.नकारात्मक सोच- किसी भी विषय वस्तु पर हमारी सोच यदि आरम्भ में ही नकारात्मक हो जाये तो
हम सहजता से तनाव के शिकार हो जाते हैं .हमारी कल्पनाएँ डराने वाली होगी ,पराजय वाली होगी तो 
तनाव से हमें कौन बचा सकता है.

७.आडम्बरपूर्ण जीवन पद्धति-हम दिखावा ,भभका ,अतिश्योक्ति का जीवन चाहते हैं ,झूठी शान शोकत 
दिखाना चाहते हैं ,कर्ज लेकर भी तफरीह करना चाहते हैं तो तनाव रहेगा ही .पैसा नहीं है फिर भी देखा-
देखी में खर्च करना है ,ऋण लेकर दान करना है ;यह आडम्बर तनाव देने वाला होता है .
   
८.ज्ञान का अभाव- जब हम किसी विषय वस्तु के बारे में ठीक से नहीं जानते हैं तो व्यर्थ में अपनी सोच 
की ऊर्जा नष्ट नहीं करनी चाहिए .हमें उस विषय के बारे में सही जानकारी प्राप्त करनी चाहिए ताकि हम 
समस्या को सही रूप से समझ सके और उससे परास्त कर सके .
   
९.जितेन्द्रियता का अभाव -हमारे तनाव ग्रस्त हो जाने का यह भी एक बड़ा कारण है ,हम अपने शरीर
के अंगों पर काबू नहीं रख पाते .जीभ पर काबू नहीं रह पाता और उटपटांग बक देते हैं बुद्धि पर पकड़ 
नहीं रहती उलटा सोच लेते हैं ,आँखों पर काबू नहीं रख कर गलत नजरिये से विषय को देख लेते हैं 
मन पर काबू नहीं रखते और कल्पनाओं के घोड़े दौडाते हैं और तनाव में जीते हैं. 
  
१०.असंतुष्टि - जो वर्तमान में प्राप्त है जिसका आन्नद लिया जा सकता है उसका उपयोग नहीं करते हैं
और जो नहीं है उसे नहीं पाकर दुखी हैं लालसा कभी तृप्त नहीं होती उसकी भूख पाने के बाद और बढ़ 
जाया करती है और यही प्रवृति हमारे जीवन को तनाव ग्रस्त बना देती है .

तनाव का फल -

१.शारीरिक रुग्णता -बिमारी 
२.कार्य में असफलता 
३.परिवार से अलगाव 
४.समाज से दुरी 
५.गरीबी का जीवन 
६.आत्महत्या जैसे कुकृत्य 
७.पोरुषहीन जीवन 

तनावमुक्त कैसे बने .

१.सकारात्मक सोच 
२.दैवीय गुणों का विकास करे 
३.योग्य मार्गदर्शन में काम करे
४.कर्तव्य कर्म करे ,परिणाम की चिंता ना करे.
५.समय का उचित वर्गीकरण करे .
६.तनाव के कारण की खोज की शुरुआत अपने से शुरू करे.
७.परहित और स्वहित में उचित तालमेल बैठाए.
८.जो प्राप्त है उसे प्रसन्नता से स्वीकार करे और कदम दर कदम आगे बढे .
९.अपनी दिनचर्या व्यवस्थित रखे 
१०.मुस्कराना सीखे .

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