शनिवार, 28 जनवरी 2012

वादों की सेल

वादों की सेल  

हर राजनैतिक दल अपने-अपने पिटारे से बढ़िया से बढ़िया वादे निकाल रहा है.वादे बांटने में किसके 
बाप का क्या लगता है ,फोकट के ख्याल हैं फोकट में बांटने हैं फिर कंजूसी क्यों ?

सब जानते हैं की हम सत्ता में वापिस आने वाले नहीं हैं मगर छोटी सी आशा है कि शायद जनता झांसे 
में आ जाए और पांच साल का हुकुम चलाने का अधिकार मिल जाए .जनता से वोट लेना है यह तो 
हमारे नेताओ का हक़ है क्योंकि राईट टू रिजेक्ट हमारे देश में मतदाता को अभी मिला नहीं है इसलिए 
जनता किसी ना किसी को तो वोट देगी ही .किसी भी तरह का दाना ,चुग्गा ,झांसा,फरेब या लालच 
देकर सत्ता हथिया ली जाए ,फिर तो कौनसा रोज-रोज उनके रूबरू होना है ,गयी पांच साल की.आगे की 
आगे देखेंगे ,बस इस बार जनता मुर्ख बन जाए ...........

कोई जाती के नाम पर भिड़ा रहा है तो कोई धर्म के नाम पर ,किसी को मुस्लिम मलाईदार लग रहे हैं 
तो किसी को हिन्दू .कोई आरक्षण की आग उगल रहा है तो कोई मुफ्त में भत्ता बांटने की गंगा बहा 
रहा है .युवा कालेज के बच्चो को लेपटोप फ्री ,स्कुल के बच्चे को "टेबलेट कंप्यूटर फ्री ,खाना भी फ्री 
बेरोजगारी भत्ता भी ,क्या -क्या नहीं बाँट रहे हैं फ्री में ..........

चुनावी वादे करनेवाले नेता और वोट करने वाली जनता दोनों ही जानते  हैं कि "क्या सच नहीं है और 
क्या सच है" मगर सभी की अपनी-अपनी गणित है .जनता अल्लादीन के जीन्न की तरह वायदों के 
काल्पनिक तोहफों को बटोरने लगी है तो कुछ चुपके-चुपके फ्री में मिलती सूरा गटक रही है तो कुछ 
जयकारे और नारे लगा कर आराम की कमाई कर रही  हैं तो चतुर लोगो की नजर धन पर टिकी है 
की कौनसा उम्मीदवार कितना ,कब, कैसे देगा .....वोट तो देना ही है ,भला तो कोई करने वाला नहीं
है यही मौक़ा है की कुछ हासिल हो जाए ,जीत हार के बाद थूके हुए पीक की जितनी कीमत भी नहीं 
रहने वाली है आम वोटर की .........

 हमारे नेता यह जानते हैं की चुनाव से पहले वादों का ढेर लगाने से नैया पार हो सकती है ,इसलिए 
खुलकर वादों की बौछार हो रही है ,खा बेटा गुड तेरा ही है .हार गए तो वादा वैसे भी पूरा करना नहीं 
है और जीत गए तो सरकारी खजाने का धन (जो जनता का ही है ) कुछ लुटा देना है और कुछ लूट
लेना है ताकि आने वाले चुनावों में फिर लुटा सके...........

क्यों नहीं देश में ऐसा कानून नेताओ और राजनैतिक पार्टियों के वास्ते बने की जो भी दल चुनावों के 
समय जो-जो वादे जनता से करता है उसे पूरा नहीं करने पर उन्हें आजीवन चुनाव लड़ने के अयोग्य
 करार कर दिया जाए और उन पार्टियों के प्रमुख को जनता को बेवकूफ बनाने के आरोप में आजीवन 
कारावास की सजा दी जाए ...............

हमारे नेता यदि यह सोचते हैं की देश के युवा छात्रो को २-५ह्जार का लालच देकर ख़रीदा जा सकता
है.मेरा मानना है की आज के छात्र और युवा ऐसे राजनेताओं को नकार देंगे ,भ्रष्टाचार के खिलाफ 
अन्ना का साथ देने वाला युवा २-५ हजार के लालच में नहीं आयेंगे .आज के युवा मेहनत करना 
जानते हैं वो ठाले बैठे बेरोजगारी भत्ता लेने वाले आलसी और कामचोर नहीं है .

हमारे नेता ठोस काम की बाते नहीं करते .किस तरह मेहनत और संघर्ष करके देश को विकास की 
और ले जाया जा सकता है ऐसी बाते नहीं करते .बुनियादी समस्याओं से देश को कैसे बचाया जा 
सकेगा ऐसी बाते नहीं करेंगे .हमारे नेता एक दुसरे पर कीचड़ उछालेंगे ,हो-हा करेगे ,आरोप लगायेंगे 
झूठी बयानबाजी करेंगे ,केंकड़ावृति में व्यस्त रहेंगे .........

क्या ऐसे नेताओं को वोट करना सार्थक मतदान करना कहलायेगा ?शायद यही कारण की मेरे 
देश का ४५% मतदाता वोट करने ही नहीं जाता है क्योंकि वह जानता है इस देश के नेता उसकी 
तक़दीर नहीं लिखेंगे ,उसे अपनी तक़दीर खुद ही लिखनी है ,सिर्फ वादों से पेट की आग नहीं बुझने 
वाली है ......... और वे लोग राजनीति से दूर अपने कर्मो में व्यस्त रहते हैं............                       

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