गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

सच को क्यों मारा जा रहा है




२७ फरवरी २००२ को गोधरा रेलवे स्टेशन पर अयोध्या से लौट रहे हिन्दू तीर्थयात्रियो से भरी
रेलगाड़ी के एक डिब्बे में आग लगाकर ५९ यात्रियों को मारने वाले किस धर्म के लोग थे और
उन्होंने बेकुसूर ५९ तीर्थयात्रियो को जिनमे २५ महिलाए और १५ बच्चे भी शामिल थे
उनको जिन्दा किस मजहब के लोगो ने और क्यों जलाया ?


इस बात पर न्याय अंधा हो जाता है ,क्यों ?


हिन्दू यात्रियों को जिन्दा जलाया गया इस बात पर  आततायियो को कोई दोषी क्यों नहीं मान
रहा है जिन्होंने यह अधम कृत्य किया था ,उनकी कहीं चर्चा नहीं होती ;

इस बात पर न्याय भी बहरा हो जाता है, क्यों ? 

क्या हिन्दू की जान गयी वह कीमती नहीं थी ,


इस बात पर न्याय पट्टी बाँध लेता है ,क्यों?


पूरा गुजरात इस सच को जानता है और बार बार मोदी को चुनकर भेजता आया है 
क्योंकि गुजरात छद्म धर्मनिरपेक्षता और धर्मनिरपेक्षता को अच्छी तरह समझता है  
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इन दंगों में कुल १०४४ लोग मारे गए, जिनमें ७९० मुस्लिम और २५४ हिन्दू थे.
२५४८ घायल, २२३ लापता, ९१९ महिलायें विधवा हुईं और ६०६ बच्चे अनाथ. 
सात साल बाद लापता लोगों को भी मृत मान लिया गया और मृतकों की संख्या 
१२६७ हो गयी.पुलिस ने दंगों को रोकने में लगभग १०००० राउण्ड गोलियां चलायीं,
जिनमें जिनमें ९३ मुसलमानों और ७७ हिन्दुओं की मौत हुई. दंगों के दौरान 

१७९४७ हिन्दुओं और ३६१६ मुस्लिमों को गिरफ्तार किया गया बाद में कुल

मिला कर २७९०१ हिन्दुओं को और ७६५१ मुस्लमों को गिरफ्तार किया गया.

ये आंकड़े http://en.wikipedia.org/wiki/2002_Gujarat_violence साईट से मिले हैं.

ये आंकड़े सरकारी हैं और गैरसरकारी आंकड़ों के हिसाब से २००० से ज्यादा लोग

इन दंगों में मारे गए, लेकिन हमेशा ही गैर सरकारी आकडे सरकारी आंकड़ों

से ज्यादा होते हैं……..पर महत्वपूर्ण विषय ये है यदि सरकार और पुलिस मूक 

दर्शक बनी थी या हिन्दुओं का साथ दे रही थी तो पुलिस की गोली से ७७ हिन्दुओं

की मौत कैसे हो गयी…….. पुलिस ने २७००० से अधिक हिन्दुओं को क्यों गिरफ्तार किया जबकि मुस्लिमों को कम ……?




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