बुधवार, 28 मार्च 2012

पवित्रात्मा नेता और नास्तिक जनता !

 पवित्रात्मा नेता और नास्तिक जनता !

संसद एक मंदिर है ठीक वैसे ही जैसे मथुरा में श्री कृष्ण का और अवध में श्री राम का. अरे! जब
आपश्री राम और कृष्ण का आदर करते हो ,उनके श्री चरणों में शीश झुकाते हो ,बड़े ही ध्यान से
उनका नाम जप करते हो ,और उनके हर फैसले को करनी का फल मानकर स्वीकार कर लेते हो
तो फिर संसद के अन्दर विराजमान पवित्रात्मा का सम्मान क्यों नहीं करते हो ? इन पवित्रात्माओ
की लीला पर टीका टिप्पणी करना अक्षम्य अपराध है ! इनका हर फैसला उचित ही होता है उसे
सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिये क्योंकि विधि की रचना विधाता करता है या फिर ये साक्षात
पवित्रात्मा .

    जैसे पवित्र तीर्थो का सेवन करने से आत्मा प्रसन्न हो जाती है .तीर्थो की भूमि की रज मात्र से पाप
धुल जाते हैं ठीक वैसे ही इन साक्षात पवित्रात्मा के दर्शन का भी असीम फल है ,इन पवित्रात्मा की
जिस पर भी ठंडी नजर पड़ जाती है उसके वारे न्यारे हो जाते हैं ,पैदल चलने वाला फटीचर इनकी
कृपा से मोटर कार में घुमने वाला बन जाता है .कंगले भी इनकी कृपा से लक्ष्मीवान हो जाते हैं .

   भगवान् और इनके चरित्र में भी विशेष समानता है .जिस तरह भगवान् को भी अपना नाम जपने
वाला अतिप्रिय है उसी प्रकार इन्हें भी चापलूस पसंद है ,जिस प्रकार भगवान् को हरिजस गाने वाले
प्रिय हैं उसी प्रकार इन्हें भी अपना चालीसा -पुराण ,कीर्ति गाथा गाने वाला पसंद है ,जिस प्रकार प्रभु
को कानून थोपना पसंद है उसी प्रकार इन्हें भी यही पसंद है ,जिस प्रकार भगवान् नास्तिकों पर
क्रूरता दिखाते हैं उसी प्रकार ये भी इनके खिलाफ आवाज उठाने वाले बन्दों  पर क्रूरता बरसाते हैं .

     जब हम माखन चुराने वाले चोर को आदर दे सकते हैं , पल-पल छल करने वाले छलिया का
 गुणगान गा सकते हैं ,दौ भाईयो के युद्ध को रोकने की बजाय अवश्यम्भावी बना देने वाले को हम
पूज्य कह सकते हैं ,हजारो रानियों के साथ रहने वाले को मायापति कह सकते हैं तो फिर इन
पवित्रात्माओ को आदर क्यों नहीं दे सकते हैं?
चोर कन्हेया भी थे और ये भी ,छल वो भी करते थे और ये भी ,महाभारत चक्रधारी ने भी होने दिया
और ये भी हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख इसाई में छ्मकले करवाते रहते हैं ,वो महारसिक था तो ये भी
रसिकहैं मंदिर के आसन पर बैठकर लीला देखते हैं किसी  भी कोण से बाँके से कम नहीं है दो अंगुल
बढ़कर ही हैं उस कालिया से, मगर फिर भी इनको आदर नहीं देना इनके साथ न्याय नहीं है.

     भगवान् के समकक्ष इन पवित्रात्मा के खिलाफ करोडो सिरफिरे पैदा हो गये इनके इन्द्रासन को
चुनोती देने लग गये .इनकी रासलीला के चटकारे लेने लग गये .इन पवित्रात्मा की बैचेनी जायज है
अगर देश की जनता का इनसे मोहभंग तेजी से इसी तरह होता रहा तो इनकी अर्चना और पूजा का
स्वरूप बदल कर रोद्र ना बन जाए ,महा आरती ना उतार दे बागी भगत !

   स्तुति और वन्दना के समकक्ष ये पवित्रात्मा जो भी लीला करते हैं उस लीला में अचानक अवरोध
 उत्पन्न करने वाले विद्रोही भगतो का टोकना इन्हें बुरा लगता है.कन्हेया की लीला में सुदर्शन का
कमाल था तो इन पवित्रात्मा की लीला में वोट का कमाल है .

    जिस तरह पापी अपने को गंगा स्नान से पवित्र करता है ,चोर उचक्का प्रभु मंदिर में जाकर दोष
मार्जन करता है ,धूर्त ठग दान दक्षिणा करके धन को शुद्ध करता है ठीक उसी प्रकार ये भी अपने को
शुद्धोत्तम मान चुके हैं क्योंकि ये भी चुनावी वेतरनी पार करके  मंदिर में बैठे हैं .इन्हें अपराधी
मानने और कहने से गरिमा भंग होती है .जैसे तुलसी अपने जीवन में काम लोलुप रहे थे मगर राम 
चरित्र लिखने के बाद आदरणीय बन गये ,परम साधू हो गये .जब तुलसी को आदर से याद किया 
जाता है तो इन पवित्रात्मा को भी पवित्र मान लेना चाहिए,आखिर ये भी जनता से चुनकर भेजे
गये हैं .

   संसद में विराजमान पवित्रात्मा आज सच के अदने से व्यक्ति से, हर उस आदमी से परेशान है
जो अंधे को अँधा कहता है ,काणे को काणा कहता है .देश में नास्तिक बढ़ते जा रहे हैं जो इनमे
अश्रद्धा रखते हैं . इन सब पवित्रात्मा को संगठित होकर देश के नास्तिको पर वार करना चाहिये.


                   
           

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