गुरुवार, 24 मई 2012

मनदुख का अ(न)रथ- शास्त्र उधारीकरण ! उधारीकरण !! उधारीकरण !!!

 मनदुख  का अ(न)रथ- शास्त्र उधारीकरण ! उधारीकरण !! उधारीकरण  !!!


मेने मनदुख से पूछा -मनदुख ,देश कैसे चलता है ?
मनदुख बोला- उधारीकरण से .
मेने पूछा -उदारीकरण की बात तो सुनी थी मगर ये उधारीकरण कहाँ से आ गया .
मनदुख बोला -शुरू से हम उधारीकरण ही लाये थे मगर जनता इसे उदारीकरण समझ बैठी थी 
    जब आम आदमी ने इसे उदारीकरण के रूप में अपना लिया तो हम भी उदारीकरण कहने 
   लग गए .
मेने पूछा -मनदुख ,तुम तो पढ़े लिखे हो ,उधारीकरण को ज़रा विस्तार से समझायेंगे .
मनदुख बोला -उधारीकरण दुसरो पर रुआब डालने की कला है .अगर जेब में पैसे नहीं है तो 
    फिक्र क्यों करे .दोस्त से एक की जगह पाँच उधार ले लो और उसमे से तुरंत दौ रूपये उस 
   दोस्त पर उड़ा दो,शेष बचे तीन रूपये दुसरे दोस्त पर खर्च कर डालो और अगले दिन उससे 
   दस रूपये उधार मांग लो .इस तरह दोस्त भी बढ़ाते रहो और उधारीकरण भी चलने दो।
मेने कहा -मनदुख ,इससे तो कर्ज का अम्बार लग जायेगा .कर्ज चुकाया कैसे जायेगा ?
मनदुख बोला-बेटा रामभरोसे ,तुम बुद्धू है रे .अरे पैसा चुकाने की बात सोचता ही क्यों है ,
   सब कुछ राम आसरे चलने दे .पैसे उधार ले ,पैसे खर्च कर और सम्पर्क बढ़ा ,रूतबा बढ़ा ,
   कर्ज लेकर बंगला खरीद और चुपचाप बंगले को गिरवी रख बेंक में .बेंक से मिले पैसों से 
   जलसा कर .तेरा भभका देखकर लोग हैरान रह जाए ,फिर कर्ज ले उस बंगले के सहारे 
   मेलजोल वाले से .
मेने कहा -मनदुख ,मगर यह चक्र कब तक चलेगा ,आखिर तो मेरे से सब पैसे वापिस लेंगे 
   जब वो कर्ज चुकाने की बात करेंगे तब क्या होगा ?
मनदुख  बोला- अरे भले आदमी ,तू इस चक्कर को तब तक चला जब तक तू जिन्दा है और 
   तेरे मरने के बाद कोई तेरे पीछे उगरानी करने के लिये आने वाला नहीं .
   मगर लेनदार मेरे बच्चो से कर्ज अदा करने को कहेंगे तब क्या होगा ?
मनदुख बोला-तेरे मरने पर कुछ लेनदार तो रो कर रह जायेंगे और कुछ लेनदार जो ढिड होंगे 
   उनको बंगले का डिस इन्वेस्टमेंट करके तेरे बच्चे मूल रकम चुका देंगे और  समाज में अपना 
  ईमानदारी का रूतबा कायम करेंगे और फिर उधारीकरण की नीति पर आगे बढ़ जायेंगे .
"......मगर आखिर में किसी ना किसी को तो यह कर्ज चुकाना ही पडेगा ना मनदुख " मेने 
  डरते हुये पूछा .
मनदुख  बोला-यह पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहेगा और तेरे पोते के पोते यानी हजारो लोगों में 
    बँट जाएगा.
मेने कहा -मनदुख ,इसका मतलब मेरी सात पुस्ते  मुझे कोसती  रहेगी.
मनदुख  बोला -रामभरोसे ,एक बात याद रखना ,खुद मरने पर जग प्रलय . अपनी कट गयी 
   ना ,फिर सबकी चिंता मत कर .जैसे देश चलता है वैसे तू भी चल ..........            

सोमवार, 14 मई 2012

क्या हम 60 वर्ष की उपलब्धियों से संतुष्ट हैं ?

क्या हम 60 वर्ष की उपलब्धियों से संतुष्ट हैं ? 

हमारे लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था परिपक्व उम्र की हो गयी मगर देशवासियों ने अब तक क्या पाया ?
यह सवाल हर एक भारतीय के लिए अहम् और चिंतन के योग्य है .

संसद के जन्म के समय हम नैतिक, ईमानदार,मेहनती और राष्ट्र भक्त थे हमारे नेता भी राष्ट्र के हित 
को प्रधान समझते थे .समय के साथ-साथ हमारे मार्गदर्शक नेता नैतिकता,ईमानदारी और राष्ट्र प्रेम 
को भूलते चले गये जिसका कुप्रभाव "यथा राजा तथा प्रजा" के रूप में पुरे देश पर पडा और हम भ्रष्ट 
देश के रूप में विश्व भर में बदनाम होते जा रहे हैं.

हमारी संसद का बाल्यकाल प्रभावशाली था ,हमने अपना संविधान बनाया उसमे कुछ मुद्दों पर लचीला 
-पन रह गया हमारे उस समय के नेता यह जानते थे मगर उनकी सोच थी कि  आने वाली पीढियां इन 
कमियों को दूर कर लेगी या इस लचीलेपन का गैर फायदा उठाने की कभी सोचेगी भी नहीं मगर हम 
इतने निचे गिर गये कि हम जैसे-जैसे परिपक्वता की और बढ़ते गये वैसे-वैसे हम संविधान के 
लचीलेपन  का अपने स्वार्थ के लिए गैर फ़ायदा उठाते गये और नतीजा यह है कि देश का धन हमने 
ही लूटकर विदेशो में जमा करा दिया .आज यह हालत हो गए कि देश का धन कुछ हजार हाथो में 
सिमट गया और करोडो हाथ दौ समय की रोटी के लिए तरस गये.

एक वह भी संसद का समय था जब हमारे रेल मंत्री रेल दुर्घटना का नैतिक दायित्व स्वयं पर लेकर 
पद से इस्तीफा दे देते थे और आज हालात यह हैं की देश की दुर्दशा की जबाबदारी कोई भी दल खुद 
पर नहीं लेता ,सभी लीपापोती कर कुर्सी (पद )से चिपके पड़े हैं .येन केन प्रकारेण सत्ता चाहिये ,
हरेक दल सत्ता का भूखा हो गया . प्रजा को लालच देकर ,जातिवाद फैलाकर या किसी वर्ग विशेष को 
अतिरिक्त सुविधा देकर, कैसे भी,सत्ता भोगना ही प्रमुख उद्देश्य हो गया और इसका नतीजा यह है कि 
इस देश का नागरिक जन्म लेते ही भारतीय बनने की जगह हिन्दू,मुस्लिम,इसाई,अगड़ा,पिछड़ा 
बन कर रह गया.

संसद का वह बाल्यकाल कितना गौरव शाली था जब देश का  प्रधान मंत्री संवेदनशील था .देश की 
सेना के गौरव पर गाये गये गीत पर रो पड़ता था और आज हालात यह हो गए कि हम सेना को 
दिए गए फ्लेट भी डकार गये हैं ,हम सेना अध्यक्ष पर भी अनर्गल बोल पड़ते हैं .हम देश की सीमाओं 
की सुरक्षा करने वाले सैनिको को माकूल सैनिक व्यवस्था भी समय पर नहीं दे रहे हैं तथा  सुरक्षा 
के लिए जरुरी सामग्री में भी खुद का कमीशन बना खराब सामग्री जवानो को दे रहे हैं.

संसद के बाल्यकाल में हमारे प्रधानमन्त्री ने नारा दिया था -जय जवान ,जय किसान .मगर हम 
जैसे-जैसे परिपक्व होते गये हमारा किसान हासिये पर ढकेला गया और हालात यह कि वह अन्न 
उपजा कर भी भूखा है,बेहाल है और आत्म ह्त्या करने को मजबूर है .हमने सब कुछ बाजार के 
हवाले कर दिया .हम ना तो उसे सस्ता बीज दे पा रहे हैं ना ही सस्ती बिजली .हम ना तो उसे उपज 
का सही मूल्य दे पा रहे हैं और ना ही अनाज भंडारण की उचित व्यवस्था. हमने उसे बेहाल राम 
भरोसे छोड़ दिया है . 

हमारी परिपक्वता ने हमें क्या दिया ?संसद सर्वोच्च है इस बात पर कोई भी भारतीय को ऐतराज 
नहीं है .ऐतराज इस बात पर है कि संसद भवन में बैठे सांसद अपने को सर्वोच्च समझने लग गये 
हैं चाहे उनकी दाढ़ी में तिनका भी क्यों ना हो .दोनों हाथो से देश की जनता के धन को लुटने वाले ,
देश के धन को अनुपयोगी काम में खर्च करने वाले नेताओं पर जब प्रजा अंगुली उठाती है तो उस 
अंगुली को ही दोषी करार दे दिया जाता है .क्या यह सही मानसिकता है?

हम 60 सालो में देशवासियों को जीने का अधिकार भी पूर्ण रूप से नहीं दे पाए हैं .देश की बड़ी 
जनसंख्या के पास रहने को छत नहीं ,पीने को साफ पानी नहीं ,शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं,
दौ समय की रोटी की व्यवस्था नहीं ,देश के गाँवों में बिजली-सड़क की व्यवस्था नहीं ,आखिर ऐसा
 क्यों ? इस सवाल पर कहीं चर्चा नहीं ,गंभीरता नहीं, उल्टा यह समझाया जाता है कि यदि तुम गाँव 
में रहकर 26/-और शहर में रहकर 35/- कमा लेते हो तुम गरीब नहीं.

हमारे सरकारी रत्न उद्योग उदारीकरण और निजीकरण के हवाले बिकते गये .हर भारतीय पर कर्ज 
30000/- का हो गया . हम अपने ही करोडो नागरिको की रोजी रोटी को एफ डी आई के हाथो में दे देना 
चाहते हैं,क्यों ? हम अपनी नाकामियों पर कितने साल पर्दा डाल सच्चाई से मुंह मोड़ते रहेंगे?
इस सवाल पर कितने जनसेवक मनन करते हैं .हम यदि परिपक्व हो गए हैं तो हमें समस्याओं 
को अनदेखा करके नहीं बैठना है उनका हल ढूढ़ना है ........ 
जनसेवक                        

सोमवार, 7 मई 2012

तुलसी और मनीप्लांट

तुलसी और मनीप्लांट 


एक वाटिका में तुलसी और मनीप्लांट पास-पास
में लगे थे .तुलसी की झाडी  छोटी थी और 
मनीप्लांट से विविध शाखाएं निकलकर पास के पेड़
के सहारे काफी फैल चुकी थी .

एक दिन मनीप्लांट ने तुलसी से व्यंग्य से कहा "इस
वाटिका में हम दोनों का जन्म साथ-साथहुआ है 
लेकिन तुम अभी तक छोटी झाडी ही बने हो और मैं 
कितना विस्तार कर चुकी हूँ ".
तुलसी का पौधा मनीप्लांट की बात पर मुस्करा के रह गया .कुछ समय 
बीत गया .एक दिन वाटिका के माली ने मनीप्लांट की बहुत सी शाखाओं 
को काट  कर छोटी कर दी और मनीप्लांट को काफी छोटा कर दिया .

मनीप्लांट अपनी दशा पर फफक कर रो पड़ा और तुलसी के पेड़ से 
बोला -"इस माली ने जगह- जगह से मुझे काट दिया और मेरे विस्तृत 
रूप को छोटा कर दिया .मैं पहले मस्त हवा की बाँहों में पेड़ पर झूलती 
रहती थी मगर आज जमीन  पर बदहाल पड़ी हूँ जबकि उस माली ने 
तुझे किसी भी तरह की क्षति नहीं पहुंचाई और तेरी श्रधा के साथ परिक्रमा करके चला गया.मेरे 
साथ यह अन्याय क्यों हुआ?जबकि फल तुम भी नहीं देते हो और मैं भी नहीं देती" .

तुलसी की झाडी ने जबाब दिया-"यह सही है की मेरे पर फल  नहीं आते मगर मुझ में और तुममे 
स्वभाव का बड़ा फर्क है .तुम परजीवी हो और दुसरो के सहारे आगे बढती हो जबकि मैं छोटी झाडी 
जरुर हूँ मगर अपनी जड़ों की ताकत पर खड़ी रहती हूँ .जब मेरे को मालूम चला की मैं फल नहीं दे
सकती हूँ तब इस विषम परिस्थिति में मेने अपने में गुणों का विकास किया जबकि तुम सारहीन 
विभिन्न शाखाएं फैला कर बढती रही .तुम्हारी सारहीनता के कारण ही माली ने तुझे काट कर बौना
कर दिया और मेरी उपयोगिता और गुणों से प्रभावित होकर मुझे क्षति पहुंचाए बिना मेरी परिक्रमा 
कर के चला गया .  

(छवि -गूगल से साभार . )