बुधवार, 20 जून 2012

साम्प्रदायिकता को पहला पत्थर कोई धर्म निरपेक्ष ही मारे !

साम्प्रदायिकता को पहला पत्थर कोई धर्म निरपेक्ष ही मारे !

क्या कोई वास्तव में निरपेक्ष हो सका है ? क्या पृथ्वी पर जितने भी धर्म हैं उनमे से कोई निरपेक्ष है
क्या विश्व का कोई भी नेता निरपेक्ष था या है ?क्या कोई समाज,जाती ,वर्ण ,वर्ग या व्यक्ति धर्म
निरपेक्ष हो सकता है ? नहीं ...नहीं ...नहीं.........

          विश्व के सभी धर्म सांप्रदायिक ही होते हैं ,विश्व की सभी जातियां साम्प्रदायिक ही होती है
विश्व के कोई भी एक धर्म का नाम बता सकते हैं जो निरपेक्ष है सापेक्ष नहीं है .विश्व की एक भी जाती
ऐसी नहीं है जो साम्प्रदायिक नहीं है .

        मनुष्य समूह में रहता है और जो समूह में रहता है उसने अपने समूह के कुछ सिद्धांत बना रखे
हैं ,उन सिद्धांतो पर चलने वाले अपने सम्प्रदाय से प्यार करते हैं .सभी मनुष्य बुद्धिजीवी हैं ,सभी ने
अपने-अपने सिद्धांत समूह के अनुकूल बनाए हैं, हो सकता है एक  समूह विशेष को दुसरे के सिद्धांत 
परस्पर प्रतिकूल लगे मगर एक बात पक्की है की व्यक्ति जिस वर्ण ,जाती,धर्म या देश में 
रहता है तथा जिस समूह के सिद्धांतो को मान्यता देता है वह सांप्रदायिक होता ही है .

          मेरे देश के राजनैतिक दलों में संप्रदाय वाद कूट-कूट कर भरा है .कोई पूंजीपति का सम्प्रदाय
है ,कोई दल समाजवाद का सम्प्रदाय है ,कोई दल दलित सम्प्रदाय है,कोई दल हिन्दू सम्प्रदाय है
तो कोई दल मुस्लिम सम्प्रदाय . सभी दल मनुष्य ने बनाए है जो अपने अपने सम्प्रदाय को अच्छा 
मानते हैं मगर वास्तव में देखा जाए तो सब के सब साम्प्रदायिक ही हैं क्योंकि सब निश्चित सिद्धांतो 
से बंधे व्यक्तियों का समूह जो हैं .

          अब प्रश्न यह उठता है कि इस देश का प्रधान धर्म निरपेक्ष होना चाहिए ! इस देश में कोई भी
ऐसा नेता है जो धर्म निरपेक्ष है .यदि एक भी नेता अपने को निरपेक्ष सिद्ध कर सके तो फिर हमें
साम्प्रदायिकता को पत्थर मारना चाहिए .पहला पत्थर साम्प्रदायिकता को वो दल का नेता मारे जो
अपने को निरपेक्ष समझता है .क्या किसी भी सम्प्रदाय में रहने वाला कोई भी निरपेक्ष व्यक्ति है ?

       इस विश्व को किसी न किसी सम्प्रदाय में रहना है ,इसलिए साम्प्रदायिक होना बुरा नहीं है .यदि
बुरा है तो हर समूह में पाए जाने वाले निंदनीय आपराधिक कृत्य . आपराधिक कृत्य /दुर्गुण /पाप ही
बुरा है ,कोई भी सम्प्रदाय बुरा कैसे हो सकता है.  

सोमवार, 18 जून 2012

जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे .

 जैसा बोओगे वैसा ही काटोगे .


जब देश में दौ मुख्य राजनैतिक दल थे ,तब भी जनता परेशान थी ,क्योंकि एक सत्ता के मद में
रहता था और दूसरा सिर्फ आलोचना का कीचड़ उछलता था या सत्ता को पाने की लालसा में समय
व्यतीत करता था .ऐसे में देश की जनता को लगा उसकी पीड़ तो घटने का नाम ही नहीं ले रही है
बल्कि बढ़ती ही जा रही है तो उसने तीसरा मोर्चा खोला .मगर तीसरा भी सत्ता के मद में बह गया
और जनता की टीस कम नहीं हुयी .
आखिर जनता ने अपने -अपने राज्यों में क्षेत्रीय दलों को अजमाना शुरू किया .जिस तरह छोटे
नाले थोड़ी सी बरसात में उफ़नने लगते हैं वो हाल इन क्षेत्रीय दलों  का रहा .अपने राज्य में जीत
कर राष्ट्रिय दलों को आँख दिखाने लगे और राष्ट्रीय दल भी एलायंस के नाम पर इनका उपयोग
सदुपयोग और दुरूपयोग करके अपने अपने दल की गाडी खेचने लगे मगर आम आदमी इनके
चक्कर में पीसता चला गया.
  अब पुरे राष्ट्र में इतने दल हो गए हैं कि हर गली में अध्यक्ष ,सचिव और नेता ही नजर आते हैं
आज पांच-सात सांसद रखने वाली पार्टी राष्ट्रीय राजनैतिक पार्टियों को आँखे दिखाती है और
राष्ट्रीय कहलाने वाले दल सत्ता से चिपके रहने की वृति के कारण इनकी जी -हजुरी करते रहते
हैं या फिर उन्हें सत्ता के शहद में भागीदारी दे देते हैं .बहुत बार ऐसे मौके आते हैं जब ये अपने
राज्य में तो अपने ही एलायंस का मुर्दाबाद बोलते हैं और दिल्ली में जाकर जिन्दाबाद .इनके
दोहरे चरित्र और दोहरे मापदंड से आम जनता का फोड़ा नासूर बन के रिसता जा रहा है .
     सवाल ये उठता है कि जनता की पीड़ का माकूल ईलाज क्या है ?हम आजादी के बाद से
अब तक अपनी पीड़ को कम क्यों नहीं कर पाए हैं ?हम अपनी बुनियादी जरुरतो को भी पूरा
नहीं कर पाए हैं .हमने जिस दल को भी सत्ता सोंपी उन्होंने सिवा बदहाली के अलावा हमें क्या
दिया ,सिवा आश्वासन के अलावा क्या दिया ?
    आज देश का आम आदमी समाचार में सिर्फ इन सभी छोटे -बड़े दलों की आपसी रस्साकसी
देखता है,एक दुसरे पर ठीकरे फोड़ने का खेल देखता है,स्वार्थ वश कभी इनको शत्रु के वेश में तो
कभी मित्र के परिवेश में देखता है .क्या ये दल देश के आम आदमी की आवाज बनकर काम
करते कभी नजर आये हैं ? सभी दल तभी एक सुर में बोले हैं जब इन पर ही सामूहिक रूप से
जनता के विद्रोही तेवर आये हैं .
   प्रकृति के नियम अनुसार आम जनता ने जैसा बीज बोया है ठीक वैसा ही फल उसने अब तक
पाया है .सत्ता के मद में चूर नेता को सहन किसने किया और क्यों किया ?भ्रष्टाचारी लोगो को
वोट देकर किसने जीताया ?नाकाम रह चुके जनप्रतिनिधियों को बार-बार किसने चुना और क्यों
चुना?दागदार लोगो को वोट देकर यदि हम उन्हें संसद में भेजेंगे और फिर उनसे भले काम
करने की उम्मीद भी करेंगे तो गलती आम आदमी की ही है।
     महामहिम के चुनाव के लिए आज राष्ट्रीय दल बेहाल हैं .छोटे मोटे क्षेत्रीय दल अपनी थोप रहे
हैं .हम इस तमाशे को देख कर कभी ताली पीटते हैं तो कभी शर्मिंदा होते हैं .क्या हम आजादी के
बाद से जिस बदहाली को झेल रहे हैं उसे आगे भी इसी तरह झेलते जायेंगे या फिर 2014 तक
कुछ रास्ता निकाल लेंगे ................प्रकृति का नियम तो वही का वही है जैसा बीज ,वैसी फसल .
   

रविवार, 17 जून 2012

अनुशासन :अनमोल गुण

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अनुशासन समय को क्रमबद्ध रूप से विभाजित करके उसके हर पल को जीने की पद्धति है .नियंता
ने समय के चक्र को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा है और सभी ग्रह क्रमबद्ध रूप से समय के घेरे में परिभ्रमण
करते हैं तो भला हम इससे विलग कैसे रह सकते हैं .
      अनुशासन का अर्थ स्व-प्रबंधन है .खुद के द्वारा खुद का प्रबन्धन .किसी का थोपा हुआ अनुशासन
कुछ समय तक सही दिशा निर्देशन कर सकता है मगर लम्बे समय तक थोपा हुआ अनुशासन मन
को कुंठित कर देता है,अनुशासनकर्ता के प्रति बागी बना देता है ,डरपोक और कायर बना देता है,हताश
और निराश बना देता है .
    हम प्राय:देखते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों पर अनुशासन के नाम पर कठोर नियम लादने की
कोशिश करते रहते हैं ,शिक्षक अपने शिष्यों के प्रति अपनाए गए कठोर आदेशो को अनुशासन के
नाम पर खपाते रहते हैं ,बड़ी-बड़ी कम्पनियों के निदेशक कड़े नियमो में कर्मचारियों को बांध कर रख
देते हैं .क्या ये सभी मनचाहा प्रतिफल पाते हैं? मेरे विचार से उत्तर है नहीं ...बिलकुल नहीं .कठोरता
ही यदि अनुशासन होती तो इस दुनिया में हम सब डंडे पकडे खड़े होते ,ना स्नेह की जरूरत होती और
ना ही मानवीय संवेदनाओं की .
   अनुशासन का अर्थ दूसरो का पथ प्रदर्शन करना है जिसका कारगार तरीका कठोर उपाय नहीं हो
सकते हैं।अनुशासन की अविरल धारा के लिये स्नेह,संवेदना,प्रेम,समर्पण और क्रमबद्ध रूप से काम के
निष्पादन को मिला देना चाहिए .
  सार्थक अनुशासन के लिए हमें अपने बच्चो का ,शिष्यों का ,कर्मचारियों का स्नेहशील पथ प्रदर्शक
बनना चाहिए .राडार जिस तरह से मार्गदर्शन करता है उसी तरह से हम भी क्या गलत है और क्या
सही  इस तथ्य को अनुगामी लोगों को बता सकते हैं मगर जबरदस्ती थोप नहीं सकते .क्योंकि
नाविक यदि राडार की दिशा के विरुद्ध चल कर गंतव्य पर पहुंचना चाहेगा तो क्या ऐसा संभव होगा?
यदि नाविक राडार के विरुद्ध चल भी देता है तो क्या राडार दिशा बताना बंद कर देता है ?नहीं ,राडार
का काम सही दिशा बताना है ,नाविक की गलती के बाद भी वह सही निर्देशन ही करता है इसी तरह
हमें भी अनुगामी वर्ग पर कुछ भी थोपना नहीं है ,योग्य दिशा निर्देशन करते रहना है .
   जब हम योग्य मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाते हैं तो अनुगामी स्वत:ही खुद को क्रमबद्धता के
साथ जोड़ने लग जाता है .खुद की इच्छा से जब अनुगामी क्रमबद्धता के साथ जुड़ता है तो उसके मन
में सकारात्मक ऊर्जा का  विकास होता है और वह कुछ कर गुजरने के लिए तैयार हो जाता है और
यही से स्व-अनुशासन का उदय होता है .
      कठोर नियम लादना या कठोर नियमो के तहत जीना अनुशासन नहीं है .अनुशासन है जीवन
शैली में क्रमबद्धता का विकास होना और इसके लिए हमें निरंतर कुछ अच्छा करने की भावना को
पोषित करते रहना है .
    अनुशासन के लिए हमें अपने आलसी स्वभाव को त्यागना है ,टालमटोल करने वाले स्वभाव को
त्यागना है ,तन्द्रा को दूर करना है तथा इसकी जगह कार्य निष्पादन में तत्परता रखना है ,उत्साही
बनना है,चरणबद्ध रूप से काम को पूरा ही करना है .
  यदि हम अपने अनुगामी का या अपना खुद का विकास चाहते हैं तो हमें कठोर नहीं बनना है सिर्फ
समय का योग्य विभाजन करके उत्तरदायित्व को तय सीमा में क्रमबद्ध रूप से पूरा करना है .आपका
यही गुण सच्चे रूप से आपमें आत्म अनुशासन की भरपूर ऊर्जा पैदा कर देगा और आप सामर्थ्यशाली
बन जाओगे .

शनिवार, 16 जून 2012

मौलिकता : एक अद्भुत गुण






सफलता कोई एक गुण नहीं है बल्कि गुणों का समूह है .यदि हम अपने व्यक्तित्व को निरंतर
टटोलते रहे तो हम अपनी कमियों तथा गुणों को जान सकते हैं .जो व्यक्ति खुद के बारे में सच्ची
जानकारी रख सकता है और खुद को ही मुर्ख नहीं बनाता है वह निश्चित ही सफल जीवन जीता है .

मौलिक आदते जो जीवन बदल देती है .

1.मौलिकता - आप दुसरे जैसा बनने की कल्पना ही मत कीजिये .आप अपने को जीना सीख
जाइये .हर व्यक्ति में किसी खास काम को करने की विशेष योग्यता होती है मगर उस पर उसका
ध्यान नहीं जाता है क्योंकि वह दुसरे जैसा बनने की कोशिश लगातार करता रहता है .इस कोशिश
में वह स्वयं को खो देता है और दुसरे की कार्बन कॉपी बन जाता है जिसकी कोई विशेष अहमियत
नहीं होती है
          कोई व्यक्ति यदि वकील के परिवार से आता है तो वह अपने बच्चों में भी वकालात के गुण
देखना पसंद करता है या कोई डॉक्टर है तो वह अपने बच्चों को डॉक्टर ही देखना पसंद करता है
जबकि ऐसा संभव नहीं है उल्टा हम अपने बच्चों की मौलिकता को छिनकर उसके भविष्य पर
प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं .
         हम अपने आदर्श व्यक्ति के गुणों का अनुकरण कर सकते हैं मगर हुबहू उस जैसा दिखने
का प्रयास करके बहरूपिये से ज्यादा कीमती कदापि नहीं हो सकते हैं .आप राम या कृष्ण नहीं
बन सकते हैं न ही विवेकानंद या सुभाष .आप महापुरुषों के गुणों का अनुकरण करे मगर उनके
जैसा दिखने की हौड में मत पडिये .आप खुद को पहचानिए ,अपनी योग्यताओं को जानिये ,अच्छे
गुणों का खुद में विकास कीजिये मगर आप "आप" ही बने रहिये .
          सफल व्यक्ति मौलिक होता है ,यह एक सार्वभोम सिद्धांत है .विश्व के किसी भी सफल व्यक्ति
की जीवनी को पढिये तो आपको सहज ही मौलिकता के गुण का महत्व समझ में आ जाएगा .
इस विश्व में जो कुछ भी नया रचा जाता है उसका रचनाकार नकलची कभी नहीं हुआ है .जितने भी
आविष्कार इस दुनिया में आये हैं वह मौलिक सुझबुझ से ही आये हैं .किसी भी वैज्ञानिक ने जो
कुछ भी खोजा वह मौलिक था ,नक़ल नहीं थी .
        मौलिकता नविन और स्वतंत्र विचारो को जन्म देती है जबकि नक़ल हमेशा बासी ही होती है
नवीन सोच एक कदम आगे ही होती है क्योंकि वह सिर्फ आपके ही मस्तिष्क में है .आप यदि
अपनी सोच को सही दिशा प्रदान करने में मेहनत करने लग जाते हैं तो आप खुद में परिवर्तन
पायेंगे ,आपका बर्ताव परिपक्व होता जाएगा ,आप जबाबदार बनते जायेंगे ,आप समय के मूल्य
को समझते जायेंगे ,आप जोखिम उठाने का माद्दा रखने वाले व्यक्ति बन जायेंगे ,आप नवीनता
को अपनाने वाले बन जायेंगे ,आपका व्यक्त्तित्व निखरता चला जाएगा .
       नक़ल करके परीक्षा पास करने वाला विद्यार्थी जीवन में असफल ही रहता है क्योंकि उसके
पास उधार का ज्ञान था .परीक्षक उन बच्चो की उत्तर पुस्तिका को कम अंक देता है जो पुस्तक
के हुबहू लिखे होते हैं ,ऐसा क्यों होता है ? कारण यही है कि परीक्षक समझ जाता है कि इस छात्र
ने या तो नक़ल की है या फिर रट्टू तोता है।
       जरा सोचिये यदि अभिताभ बच्चन ने अपनी मौलिक कला को छोड़ कवि बनने की नक़ल की
होती तो क्या होता ?यदि विश्वनाथन आनन्द अपने मौलिक खेल को छोड़ किसी कि नकल की होती
तो क्या ग्रान्ड मास्टर बन पाता ? क्रिकेट खिलाड़ी युवराज यदि मौलिक खेल नहीं खेलते तो क्या
लगातार छ: बॉल पर छ:छक्के लगा पाते ?नारायण मूर्ति यदि प्रतियोगी की सोच के पीछे भागते तो
क्या इन्फोसिस का विकास हो पाता ?
       ईश्वर ने सब को समान रूप से बनाया है .सबको स्वतंत्र मस्तिष्क दिया है ,शरीर दिया है ,बुद्धि
दी है ,यदि किसी को जन्मजात कोई कमी भी दी है तो उसमे किसी काम को करने की विशेष
योग्यता भी दी है .
      यदि सफल होने  की प्रबलतम इच्छा आपमें है या जाग चुकी है तो सर्व प्रथम आप मौलिक
बन जाईये .मौलिक सोच ,मौलिक विचार ,मौलिक कार्यशैली.फिर देखिये आप अपने में कितना
बड़ा बदलाव पाते हैं इसलिए तो कहा है -
          लीक -लीक गाडी चले ,लीक चले कपूत .
          लीक छोड़ तीनों चले ,शायर,सिंह,सपूत .

मंगलवार, 12 जून 2012

मोदी : सफल व्यक्तित्व के गुण

 मोदी : सफल व्यक्तित्व के गुण 


            नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व में क्या ख़ास है जो एक प्रभावशाली आकर्षण पैदा करती है ,इसकी
चर्चा इसलिए भी जरुरी है क्योंकि वे 2014 के चुनाव के केंद्र में है .वैसे मेरा उद्देश्य मोदी की प्रशंसा
करना नहीं है और ना ही उनकी आलोचना मेरा लक्ष्य है .मैं तो उनके कृतित्व और व्यक्तित्व के सार
को आपके सामने रख कर जीवन में सफलता प्राप्ति के योग्य तरीके कैसे बनाए जाते हैं उस पर चर्चा
करूंगा .
          लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ना :-यदि हमें उत्तर दिशा की ओर आगे बढना है तो निश्चित रूप
से हमारे कदम उत्तर की और आगे बढ़ने चाहिये ,यह बात छोटी और सरल है मगर हम इस रास्ते पर
चल के दाएँ ,बाएँ या पीछे मुड़ जाते हैं कारण कि हम अधीर हो जाते हैं मंजिल को अपनी बनायी तय
सीमा में नहीं पाकर.सफलता एक दिन के पुरुषार्थ पर नहीं मिलती इसमें काफी समय लगता है और
जब तक लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक बिना थके चलना पड़ता है .

         काम कभी छोटा या बड़ा नहीं होता :- यह बिलकुल सत्य है कि काम कभी भी छोटा या बड़ा
नहीं होता है मगर काम का निष्पादन सही तरीके से किया जाए तो वह व्यक्ति को बड़ा बना देता है .
चाहे प्रचारक की मामूली सेवा हो या संगठन की बढ़िया नीव रखने का जबाबदारी पूर्ण कार्य .आदमी को
मिलने वाली जबाबदारी को वह कैसे पूरा करता है यही उसकी सफलता के मापदंड को तय करता है .

        बाज नजर :-बाज जमीन से काफी ऊँचाई पर उड़ता रहता है मगर उसका लक्ष्य मात्र उड़ना नहीं
है.बाज का उद्देश्य मौके का सही चयन करके सटीक वार करना है और यदि मौका नहीं मिल रहा है तो
मौके की खोज में निरंतर गतिशील रहना है क्योंकि गति ही मौके का निर्माण करती है

        आलोचकों की हर बात का प्रत्युत्तर नहीं देना :- आलोचकों का कार्य है टीका -टिप्पणी करना
वे लोग निर्बाध रूप से अपना कार्य करते रहते हैं यदि आलोचना को सही रूप में समझा जाए तो वह
लक्ष्य की ओर आगे ही बढ़ाती है क्योंकि आलोचक "क्या सही हो सकता है" पर काम करता है यदि
कोई खोटी आलोचना भी करता है तो जबाब देने से क्या फायदा क्योंकि असत्य सिर्फ भ्रम फैला सकता
है सत्य को जकड़ नहीं सकता .

        सौ सुनार की एक लुहार की:- बहुत बक-बक करने वाला वाणी विलास में डूब जाता है वह
भूल जाता है कि उसने कब क्या बोला,कहाँ और क्यों बोला .बात बात पर स्टेटमेंट देने वाले की कद्र
भी नहीं होती है .मगर जब भी बोलो तो विषय पर पूरी तैयारी के साथ बोलो .थोथी बातो से कब तक
किसी को मुर्ख बनाया जा सकता है भला .

        सेनापति बनना :- यदि नेतृत्व करना है तो पहले सेना की टुकड़ी को खुद के इशारे पर चलना ही
सिखाना पड़ता है जो रंगरूट अनुशासन से बाहर हो उसे दण्ड की भाषा से समझाया जाता है ,यह हो
सकता है कि दंड बहुत कम होता है या उचित या फिर ज्यादा .एक टुकड़ी के दौ सेनापति कैसे हो सकते
हैं .

     सिर्फ जीत का लक्ष्य :- जीत का ही महत्व होता है हार का नहीं .हम अंतिम गेंद पर हारे या अंतिम
विकेट पर.इसका कोई मूल्य नहीं होता है

     साम दाम दण्ड भेद की नीति :-काम  को युक्ति पूर्वक अंजाम देना ही सफलता है .महत्वपूर्ण कार्य
शांति से,प्रार्थना से,धन से,दण्ड से,भेद से कैसे भी पूरा कर लेने वाला ही विजेता होता है ,सही समय पर
सही नीति का प्रयोग असफलता को पास ही नहीं फटकने देती।

    तूफान के गुजरने का इन्तजार :- तूफान का पूरी ताकत के साथ सामना करने के बजाय उसके
गुजर जाने तक इन्तजार करना ही सही नीति  है .

   हवा कोई भी दिशा की ओर चले मगर पाल सही बांधना चाहिए   :- हवा का काम है बहना .कभी
अनुकूल तो कभी प्रतिकूल मगर दोनों ही परिस्थिति में रुकना नहीं चाहिए बस हवा का रुख देख कर पाल
सही बाँध कर चलते रहना चाहिए


    लूज बॉल पर सिक्सर :- यदि हम पूर्ण सतर्क हैं तो समय का पूरा -पूरा फायदा उठाना चाहिये .जैसे
ही समय अनुकूल मिले बड़ी जोखिम उठा ले यदि प्रतिद्वन्धी भूल कर बैठा है तो लाभ उठा ले .

     बेदाग़ और बिंधास छवि :- छवि बेदाग़ भी हो और बिंधास भी

     बढ़िया शब्द कोष और उच्चारण  :- सुन्दर शब्द हो,व्याकरण सही हो,उच्चारण बढ़िया हो 

ये कुछ गुण हैं जो मेने मोदी में देखे हैं यदि इन गुणों पर हम भी अमल करे तो सफल जीवन जी सकते हैं

             

सोमवार, 11 जून 2012

धृतराष्ट्र तो राजा थे ,प्रधानमंत्री कैसे हो सकते हैं !!

धृतराष्ट्र तो राजा थे ,प्रधानमंत्री कैसे हो सकते हैं !!

किरण बेदी ने जब कहा कि प्रधानमंत्री हैं धृतराष्ट्र तो हम चकर खा गये ,क्योंकि हमें अपने ज्ञान
पर पक्का भरोसा था कि धृतराष्ट्र राजा थे वे कभी प्रधानमन्त्री रहे ही नहीं .हमने अपने ज्ञान को
दुरस्त करने के लिये महाभारत खोल ली और पढ़ा कि धृतराष्ट्र राजा थे,आँखों से अंधे थे .पुत्रों के
मौह में रचे-बसे थे ,पुत्र के राजतिलक के लिए वह सब कुछ किया जो नीति के चेप्टर में नहीं था.

        मगर क्या किरण बेदी ये सब नहीं जानती थी ,क्या उनसे कुछ भूल हो गयी .कौरव वंश के
समय धृतराष्ट्र राजा थे उन्हें कोई रिमोट से कंट्रोल नहीं करता था ,मनमर्जी के मालिक थे मगर
प्रधानमंत्री तो मनमर्जी कैसे करे ?आखिर (लोकतंत्र के प्रति) निष्ठावान हैं, नहीं है क्या?

             धृतराष्ट्र तो अंधे थे बिलकुल दिखाई नहीं देता था उनके पास कोई सेटेलाईट भी नहीं था
  मगर प्रधानमन्त्री तो अंधे हैं ही नहीं शायद यह हो सकता है कि वे वही देखते हैं जो सेटेलाईट
  से दिखाया जाता है या फिर जानबुझ कर वो नहीं देखते जिसे देखकर कुछ करना पड़ जाए.

       धृतराष्ट्र को पुत्र मौह था,उनकी ललक थी कि पुत्र गद्दी संभाल ले मगर प्रधानमन्त्री तो ऐसे
लोभ में नहीं हैं वो तो सज्जन और परोपकारी पुरुष हैं जिसकी गद्दी है उसे संभालने को दे देंगे.
इसमें शंका -कुशंका करने का कोई स्थान नहीं है .है क्या?

    धृतराष्ट्र की छाप जैसा वह थे वैसी ही थी ,उन्होंने अपनी हसरतों को कभी छिपाया नहीं .ना
उन्होंने पुत्र मौह को छिपाया और ना ही कभी अपनी संकीर्ण छवि को मगर प्रधानमन्त्री के
जहाज के निचे अगर भ्रष्ट सुनामी भी आ जाये तो भी वे मजबूत ईमानदार छवि रखते हैं .ये
ठीक है कि वे छोटे लोगो के लिए कुछ नहीं करते मगर मजबूत लोगो के लिए तो भले काम
करते ही हैं.

     धृतराष्ट्र राजा थे इसलिए उन्हें अपने कुकर्मो का भान था और जानबूझ कर किये जा रहे थे
 मगर प्रधानमन्त्री तो सरल हैं इसलिए खुद के अंत:करण जैसा ही सबका अंत:करण देखते हैं.
उनके निचे गपले  घोटालो के बवंडर भले ही उड़ रहे हो मगर वो उन बवंडरो से दूर सहज -शांत
स्वरूप हैं।

     प्रधानमंत्री सहज, सरल,ईमानदार,ज्ञानी,विद्धवान हैं उनके लिये  ऐसा विशेषण असहज है
बेदीजी, आप उन्हें धृतराष्ट्र ना कह कर कुछ और कह दीजिये ना, प्लीज ! नहीं तो धृतराष्ट्र को
बुरा लगेगा .                

रविवार, 10 जून 2012

भारतीय राजनैतिक दलों की छत्तीसी

भारतीय राजनैतिक दलों  की छत्तीसी  


1.परिवारवाद का दलदल
2.व्यक्ति ही सर्वेसर्वा
3.कुर्सी से चिपके नेता
4.देशहित से किनारा
5.मज़बूरी के गठबंधन
6.खोखला चरित्र
7.लोकव्यवहार की कमी
8.आम जनता से कोसों दूर
9.भ्रष्ट आचरण
10.जी हुजुरी
11.चाटुकारों की भीड़
12.सत्य को अनदेखा करने की प्रवृती
13.जातिवाद के समीकरण
14.धन का कुप्रयोग
15.जिसकी लाठी उसकी भैंस
16.अपराधिक गतिविधियों में लिप्तता
17.गलतियों के पुतले
18.ठीकरे दुसरो पर फोड़ने का स्वभाव
19.फटे में टांग अडाने में आगे
20.वचन भंग के दोषी
21.धूर्तता ही नीति
22.इन्द्रिय लोलुपता
23."आ बैल मुझे मार" वाले निर्णय
24."चलता है" तो बदलाव क्यों
25. देखना है! देख रहे है!!देखेंगे !!!
26.गंभीर निर्णय के समय टालमटोल 
27.आडम्बर में विश्वास
28.भाषण बाजी में अगाड़ी
29.अलग डफली अलग राग
30.झूठे का बोलबाला
31.वोट मेनेजमेंट
32.आंकडों की कलाबाजी
33.समय का दुरूपयोग
34.हवन में हड्डियाँ डालना
35.संवेदन हिन हर्दय
36.केंकड़ा वृती     

शुक्रवार, 8 जून 2012

डीजल,पैट्रोल और राशन प्रणाली

डीजल,पैट्रोल और राशन प्रणाली

हमारे देश की अर्थ व्यवस्था डीजल तथा पैट्रोल की बढती दरों के कारण डगमगा जाती है .हमारे देश में
पेट्रोलियम पदार्थों की खोज पर अभी तक गंभीरता से किसी भी सरकार ने काम नहीं किया है .हमें
अपनी आवश्यकता की पूर्ति के लिए विदेशो पर निर्भर रहना पड़ रहा है .दिन -प्रतिदिन खपत बढ़ती
जा रही है और आपूर्ति के लिए बहुमूल्य विदेशी धन के कोष को खर्च करना पड़ता है .सरकार इस सेवा
को धीरे -धीरे सब्सिडी मुक्त करना चाहती है और इस कारण डीजल तथा पेट्रोल महंगा होता जा रहा है .
सरकार पेट्रोलियम पदार्थो को सब्सिडी मुक्त कर दे मगर इन सभी पेट्रोलियम पदार्थो को राशन प्रणाली
के अन्तर्गत वितरण भी सुचारुरूप से करना शुरू करे ताकि आम गरीब भारतीय पर पेट्रोलियम पदार्थों
की बढती दरो का दुष्प्रभाव कम से कम पड़े .
   वर्तमान में डीजल तथा पेट्रोल खुल्ले बाजार में सबको समान भाव में उपलब्ध है ,अगर इनकी दरे
बढती है तो उच्च वर्ग पर इसका कुछ भी दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है .उच्च वर्ग बिना कोर कसर के इन
पदार्थो का भरपूर उपयोग करता है .उच्च वर्ग के पास क्रयशक्ति है मगर आम भारतीय की क्रयशक्ति
कम होती जा रही है ऐसे में सरकार जो वर्तमान में पेट्रोलियम पदार्थो पर सब्सिडी दे रही है उसका
फायदा आम भारतीय को नहीं मिल रहा है क्योंकि ना तो आम भारतीय के पास कारे हैं और ना ही
टू व्हिलर .इन पदार्थों की सब्सिडी का उपयोग धनी भारतीय ही कर रहा है जबकि बोझ समान रूप
से सब भारतीयों पर पड़ रहा है .
   अगर सरकार वास्तव में आम भारतीयों का हित चाहती है तो पैट्रोल और डीजल पर राशन प्रणाली
लागू कर देनी चाहिए .टू व्हिलर, ट्रेक्टर,ऑटो तथा टेक्सी को एक निश्चित मात्रा में सस्ती दर पर पैट्रोल
तथा डीजल मिले तथा  सरकारी परिवहन के साधनों को पूरी जरुरत का पेट्रोल -डीजल सस्ता उपलब्ध
हो बाकी सब साधनों को बाजार भाव से पेट्रोलियम पदार्थ उपलब्ध हो ,इससे आम भारतीयों पर बढती
दरो का कम प्रभाव पडेगा .जितना पेट्रोल डीजल इन लोगो को सस्ती दरो पर उपलब्ध कराया गया है
उसका भार भी मुक्त रूप से उपलब्ध पेट्रोलियम पदार्थो पर जोड़ दिया जाए ताकि बढ़ी दरो का प्रभाव
उसी वर्ग पर पड़े जो उसे उठाने में सक्षम है .