रविवार, 17 जून 2012

अनुशासन :अनमोल गुण

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अनुशासन समय को क्रमबद्ध रूप से विभाजित करके उसके हर पल को जीने की पद्धति है .नियंता
ने समय के चक्र को ब्रह्मांड के केंद्र में रखा है और सभी ग्रह क्रमबद्ध रूप से समय के घेरे में परिभ्रमण
करते हैं तो भला हम इससे विलग कैसे रह सकते हैं .
      अनुशासन का अर्थ स्व-प्रबंधन है .खुद के द्वारा खुद का प्रबन्धन .किसी का थोपा हुआ अनुशासन
कुछ समय तक सही दिशा निर्देशन कर सकता है मगर लम्बे समय तक थोपा हुआ अनुशासन मन
को कुंठित कर देता है,अनुशासनकर्ता के प्रति बागी बना देता है ,डरपोक और कायर बना देता है,हताश
और निराश बना देता है .
    हम प्राय:देखते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों पर अनुशासन के नाम पर कठोर नियम लादने की
कोशिश करते रहते हैं ,शिक्षक अपने शिष्यों के प्रति अपनाए गए कठोर आदेशो को अनुशासन के
नाम पर खपाते रहते हैं ,बड़ी-बड़ी कम्पनियों के निदेशक कड़े नियमो में कर्मचारियों को बांध कर रख
देते हैं .क्या ये सभी मनचाहा प्रतिफल पाते हैं? मेरे विचार से उत्तर है नहीं ...बिलकुल नहीं .कठोरता
ही यदि अनुशासन होती तो इस दुनिया में हम सब डंडे पकडे खड़े होते ,ना स्नेह की जरूरत होती और
ना ही मानवीय संवेदनाओं की .
   अनुशासन का अर्थ दूसरो का पथ प्रदर्शन करना है जिसका कारगार तरीका कठोर उपाय नहीं हो
सकते हैं।अनुशासन की अविरल धारा के लिये स्नेह,संवेदना,प्रेम,समर्पण और क्रमबद्ध रूप से काम के
निष्पादन को मिला देना चाहिए .
  सार्थक अनुशासन के लिए हमें अपने बच्चो का ,शिष्यों का ,कर्मचारियों का स्नेहशील पथ प्रदर्शक
बनना चाहिए .राडार जिस तरह से मार्गदर्शन करता है उसी तरह से हम भी क्या गलत है और क्या
सही  इस तथ्य को अनुगामी लोगों को बता सकते हैं मगर जबरदस्ती थोप नहीं सकते .क्योंकि
नाविक यदि राडार की दिशा के विरुद्ध चल कर गंतव्य पर पहुंचना चाहेगा तो क्या ऐसा संभव होगा?
यदि नाविक राडार के विरुद्ध चल भी देता है तो क्या राडार दिशा बताना बंद कर देता है ?नहीं ,राडार
का काम सही दिशा बताना है ,नाविक की गलती के बाद भी वह सही निर्देशन ही करता है इसी तरह
हमें भी अनुगामी वर्ग पर कुछ भी थोपना नहीं है ,योग्य दिशा निर्देशन करते रहना है .
   जब हम योग्य मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाते हैं तो अनुगामी स्वत:ही खुद को क्रमबद्धता के
साथ जोड़ने लग जाता है .खुद की इच्छा से जब अनुगामी क्रमबद्धता के साथ जुड़ता है तो उसके मन
में सकारात्मक ऊर्जा का  विकास होता है और वह कुछ कर गुजरने के लिए तैयार हो जाता है और
यही से स्व-अनुशासन का उदय होता है .
      कठोर नियम लादना या कठोर नियमो के तहत जीना अनुशासन नहीं है .अनुशासन है जीवन
शैली में क्रमबद्धता का विकास होना और इसके लिए हमें निरंतर कुछ अच्छा करने की भावना को
पोषित करते रहना है .
    अनुशासन के लिए हमें अपने आलसी स्वभाव को त्यागना है ,टालमटोल करने वाले स्वभाव को
त्यागना है ,तन्द्रा को दूर करना है तथा इसकी जगह कार्य निष्पादन में तत्परता रखना है ,उत्साही
बनना है,चरणबद्ध रूप से काम को पूरा ही करना है .
  यदि हम अपने अनुगामी का या अपना खुद का विकास चाहते हैं तो हमें कठोर नहीं बनना है सिर्फ
समय का योग्य विभाजन करके उत्तरदायित्व को तय सीमा में क्रमबद्ध रूप से पूरा करना है .आपका
यही गुण सच्चे रूप से आपमें आत्म अनुशासन की भरपूर ऊर्जा पैदा कर देगा और आप सामर्थ्यशाली
बन जाओगे .

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