शनिवार, 16 जून 2012

मौलिकता : एक अद्भुत गुण






सफलता कोई एक गुण नहीं है बल्कि गुणों का समूह है .यदि हम अपने व्यक्तित्व को निरंतर
टटोलते रहे तो हम अपनी कमियों तथा गुणों को जान सकते हैं .जो व्यक्ति खुद के बारे में सच्ची
जानकारी रख सकता है और खुद को ही मुर्ख नहीं बनाता है वह निश्चित ही सफल जीवन जीता है .

मौलिक आदते जो जीवन बदल देती है .

1.मौलिकता - आप दुसरे जैसा बनने की कल्पना ही मत कीजिये .आप अपने को जीना सीख
जाइये .हर व्यक्ति में किसी खास काम को करने की विशेष योग्यता होती है मगर उस पर उसका
ध्यान नहीं जाता है क्योंकि वह दुसरे जैसा बनने की कोशिश लगातार करता रहता है .इस कोशिश
में वह स्वयं को खो देता है और दुसरे की कार्बन कॉपी बन जाता है जिसकी कोई विशेष अहमियत
नहीं होती है
          कोई व्यक्ति यदि वकील के परिवार से आता है तो वह अपने बच्चों में भी वकालात के गुण
देखना पसंद करता है या कोई डॉक्टर है तो वह अपने बच्चों को डॉक्टर ही देखना पसंद करता है
जबकि ऐसा संभव नहीं है उल्टा हम अपने बच्चों की मौलिकता को छिनकर उसके भविष्य पर
प्रश्न चिन्ह लगा देते हैं .
         हम अपने आदर्श व्यक्ति के गुणों का अनुकरण कर सकते हैं मगर हुबहू उस जैसा दिखने
का प्रयास करके बहरूपिये से ज्यादा कीमती कदापि नहीं हो सकते हैं .आप राम या कृष्ण नहीं
बन सकते हैं न ही विवेकानंद या सुभाष .आप महापुरुषों के गुणों का अनुकरण करे मगर उनके
जैसा दिखने की हौड में मत पडिये .आप खुद को पहचानिए ,अपनी योग्यताओं को जानिये ,अच्छे
गुणों का खुद में विकास कीजिये मगर आप "आप" ही बने रहिये .
          सफल व्यक्ति मौलिक होता है ,यह एक सार्वभोम सिद्धांत है .विश्व के किसी भी सफल व्यक्ति
की जीवनी को पढिये तो आपको सहज ही मौलिकता के गुण का महत्व समझ में आ जाएगा .
इस विश्व में जो कुछ भी नया रचा जाता है उसका रचनाकार नकलची कभी नहीं हुआ है .जितने भी
आविष्कार इस दुनिया में आये हैं वह मौलिक सुझबुझ से ही आये हैं .किसी भी वैज्ञानिक ने जो
कुछ भी खोजा वह मौलिक था ,नक़ल नहीं थी .
        मौलिकता नविन और स्वतंत्र विचारो को जन्म देती है जबकि नक़ल हमेशा बासी ही होती है
नवीन सोच एक कदम आगे ही होती है क्योंकि वह सिर्फ आपके ही मस्तिष्क में है .आप यदि
अपनी सोच को सही दिशा प्रदान करने में मेहनत करने लग जाते हैं तो आप खुद में परिवर्तन
पायेंगे ,आपका बर्ताव परिपक्व होता जाएगा ,आप जबाबदार बनते जायेंगे ,आप समय के मूल्य
को समझते जायेंगे ,आप जोखिम उठाने का माद्दा रखने वाले व्यक्ति बन जायेंगे ,आप नवीनता
को अपनाने वाले बन जायेंगे ,आपका व्यक्त्तित्व निखरता चला जाएगा .
       नक़ल करके परीक्षा पास करने वाला विद्यार्थी जीवन में असफल ही रहता है क्योंकि उसके
पास उधार का ज्ञान था .परीक्षक उन बच्चो की उत्तर पुस्तिका को कम अंक देता है जो पुस्तक
के हुबहू लिखे होते हैं ,ऐसा क्यों होता है ? कारण यही है कि परीक्षक समझ जाता है कि इस छात्र
ने या तो नक़ल की है या फिर रट्टू तोता है।
       जरा सोचिये यदि अभिताभ बच्चन ने अपनी मौलिक कला को छोड़ कवि बनने की नक़ल की
होती तो क्या होता ?यदि विश्वनाथन आनन्द अपने मौलिक खेल को छोड़ किसी कि नकल की होती
तो क्या ग्रान्ड मास्टर बन पाता ? क्रिकेट खिलाड़ी युवराज यदि मौलिक खेल नहीं खेलते तो क्या
लगातार छ: बॉल पर छ:छक्के लगा पाते ?नारायण मूर्ति यदि प्रतियोगी की सोच के पीछे भागते तो
क्या इन्फोसिस का विकास हो पाता ?
       ईश्वर ने सब को समान रूप से बनाया है .सबको स्वतंत्र मस्तिष्क दिया है ,शरीर दिया है ,बुद्धि
दी है ,यदि किसी को जन्मजात कोई कमी भी दी है तो उसमे किसी काम को करने की विशेष
योग्यता भी दी है .
      यदि सफल होने  की प्रबलतम इच्छा आपमें है या जाग चुकी है तो सर्व प्रथम आप मौलिक
बन जाईये .मौलिक सोच ,मौलिक विचार ,मौलिक कार्यशैली.फिर देखिये आप अपने में कितना
बड़ा बदलाव पाते हैं इसलिए तो कहा है -
          लीक -लीक गाडी चले ,लीक चले कपूत .
          लीक छोड़ तीनों चले ,शायर,सिंह,सपूत .

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