शनिवार, 28 जुलाई 2012

पक्ष में भी ताली - विरोध में भी ताली

 पक्ष में भी ताली - विरोध में भी ताली 


यार ,भीड़ नहीं जुट रही है जंतर-मंतर पर .क्या अन्ना का जादू उतर गया या फिर भ्रष्टाचार
से  जनता ने तालमेल स्वीकार कर लिया .

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इस देश में और भी समस्याएं हैं फिर एक ही मुद्दे पर बार-बार अनशन क्यों ?लगता है इन्हें
और मुद्दे सूझ ही नहीं रहे हैं.

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दोस्त ,इस देश में राजनीती से अच्छे लोग दूर रहना चाहते हैं ,अब जो राजनीती में हैं उनसे
आम की आशा करना व्यर्थ नहीं है ?

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यार,अन्ना ये सब दखल अन्दाजी क्यों कर रहे हैं जब वे जानते हैं की इस देश में जनता नहीं
संसद ही सर्वोपरि है,जैसा बोया है वैसा ही पाना है .

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दोस्त,गप्पले और घोटाले ,अनाचार और दुराचार,सत्ता का मद और सत्ता से अत्याचार  ये सब
पहली बार तो नहीं हो रहा है ,युगों से चला आ रहा है फिर इस प्रश्न को बार-बार उठाना कितना
प्रासंगिक है?

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यार,मेने कितने सवाल किये मगर तुम एक का भी जबाब नहीं दे रहे हो ,क्यों

.........क्योंकि मैं एक जिन्दा लाश हूँ ,मुझे ना अपनी फिक्र है ना आने वाली पीढ़ियों की .मैं तो
बस ताली बजाना चाहता हूँ कभी अन्ना के पक्ष में तो कभी अन्ना के विरोध में .कभी भ्रष्टाचार
के विरोध में तो कभी भ्रष्ट लोगो के पक्ष में.  काम निकलना चाहिये,क्या अन्ना क्या नेता   .




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