सोमवार, 30 जुलाई 2012

अन्ना की हार के मायने

अन्ना की हार के मायने 


मर्यादा पुरषोत्तम-
यदि हार जाते रावण से ,
तो ,
उस हार के मायने क्या होते ?
लीला पुरषोत्तम-
यदि हार जाते कंस से ,
तो,
 उस हार के मायने क्या होते ?
हार जाते गोरों से टकराते यदि भारत के सपूत -
तो,
उस हार के मायने क्या होते ?
शायद ,
मर्यादाएं तार-तार हो जाती ,
छद्म और फरेब अमर हो जाते ,
अन्याय की सर्वत्र पूजा होती ,
हठी और कामी के जयकारे होते .
मगर -
प्रकृति को कब मंजूर होता है घिनोना खेल ,
समय ने कब किया आततायियों से मेल,
सत्य ने कब सहा झूठ और फरेब .
कर्म की गति विचित्र हो सकती है -
कुछ काल के लिए राहू सूर्य को ग्रस सकता है ,
अमावस की रात चाँद को छिपा सकती है ,
मगर -
क्या काल का डंडा कभी रुका है ?
पाप का घट कभी साबूत बचा है?
कोई असुर पृथ्वी पर जिन्दा बचा है?
क्या सत  कभी असत से हारा है?
यदि ,नहीं ,तो फिर 
अब -
सत्य की हार के मायने- क्या? 
अन्ना की हार के मायने - क्या?
है ये  प्रश्न निश्चय ही डरावने ,
अन्ना की हार ,असुरों की जीत है.
अन्ना की हार ,असत्य की जीत है .
अन्ना की हार ,अनीति की जीत है .
अन्ना की हार ,समय की हार है .
मगर -
समय कभी हारा नहीं है .
समय से कोई बचा नहीं है. 
समय कभी ठहरा नहीं है .
समय घूमता है निरंतर लट्ठ लिये,
इसीलिए ,
पापी के पाप  का घट निश्चय ही  फूटता है। 







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