शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

माहेश्वरी सेवा सदन का चुनाव अभियान :एक समीक्षा

माहेश्वरी सेवा सदन का चुनाव अभियान :एक समीक्षा 

समाज के लिए समीक्षा प्रस्तुत करने का काम जबाबदारी पूर्ण कर्तव्य होता है इसमें
भरपूर आलोचना मिलती है कारण कि समीक्षा में लाभ और हानि दोनों को सम्यक
रूप से देखना पड़ता है .यह सब जानते हुए भी समग्र रूप से समीक्षा करने का काम
सामयिक जरुरत है .

समाज ने क्या पाया 

1. सेवा भावना को जाग्रत करना-  चुनाव समाज के लोगो को सेवा भावना से जुड़ने
    को प्रेरित कर रहे हैं ,सर्वजन सुखाय की उत्कर्ष भावना से समाज ओतप्रोत रहे इस
    उद्धेश्य की प्राप्ति में यह अभियान महत्वपूर्ण है .

2.आपसी मेलजोल को बढ़ावा -आज का युग आपाधापी का युग है,सब अपने -अपने लक्ष्य
  की दौड़ में लगे हैं ,आपसी मेलजोल कम होता जा रहा है ,इस अभियान ने समाज के
  बन्धुओं की आपसी मेलजोल की भावना में वृद्धि की है।

3.विकास के मार्ग खोजना - चुनाव अभियान से समाज दोनों पक्ष की तथ्यपूर्ण बात को
   सुनता है,समझता है ,विकास की जानकारी लेता है और अपना मंतव्य भी प्रकट करता
   है,यदि सार रूप में देखा जाए तो हम अपनी पुरानी की जा चुकी गलतियों के दोहराव से
  मुक्ति पा लेते हैं और विकास का नया मोडल बना सकते हैं

4.लोकतांत्रिक आस्था को बढावा -चुनाव हमारे गणतंत्र की भावना को पोषित करते हैं ,किसी
   एक व्यक्ति के अधिकार को समाप्त करके हर समय सभी को समान मौका मिल रहा है जो
   भी व्यक्ति इस क्षेत्र में रूचि रखता है वह चुनाव में उम्मीदवार बन कर और चुनाव जीत कर
   समाज की सेवा से जुड़ सकता है

5.यथास्थिति का अवलोकन - चुनाव अभियान के दरमियान हम उस संस्था की वर्तमान
  स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन कर सकते हैं और सही स्थिति को जान सकते हैं

6.राष्ट्रीय फलक पर उपस्थिति - संस्थागत चुनाव प्रक्रिया से गुजर कर हम अपने समाज को
   राष्ट्रीय पहचान दिला सकते हैं।सेवा के क्षेत्र में अग्रिम रहने से समाज की कीर्ति और यश
  फेलती है जिससे समाज का गौरव बढ़ता है

7.अन्य समाज को प्रेरणा -अच्छे प्रबन्धन और द्रुत विकास को देख कर अन्य समाज के  लोग
  प्रेरित होते हैं ,वे भी सभी और विकसित समाज के निर्माण में काम करने लग जाते हैं

       समाज ने क्या खोया 

1.द्वेष और आपसी कलह  - चुनाव प्रक्रिया जब व्यक्तिवाद के दलदल में फँस जाती है तब समाज
   में द्वेष फेल जाता है .आपसी फूट और कलह बढ़ जाती है  फलस्वरूप विकास की गति अवरुद्ध
   हो जाती है।चुनाव अभियान से द्वेष की भावना बढ़ी है ,व्यक्तिवाद का गुणगान बढ़ा है।

2.चुनावी अपव्यय -चुनाव में उचित प्रचार खर्च आवश्यक है मगर वर्तमान चुनाव ने व्यय को
   अपव्यय में बदल दिया है ,चुनावी खर्च की आचारसंहिता कहीं पर दिखाई नही दी .हर पक्ष ने
  जमकर धन का दुरूपयोग किया जो समाज के स्वास्थ्य के लिए बहुत खराब है

3.पदलोलुपता - हम सेवा के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति में खडा होना चाहते हैं ,सेवा में उत्कर्ष भावना
   काम करनी चाहिए .हम तन,मन,धन से जन-जन की निस्वार्थ सेवा करे मगर सेवा की भावना
   पीछे सरक गयी है और पद प्राप्ति की होड़ आगे /सामने आ गयी है

4.व्यक्तिप्रधान समाज की रचना -इन चुनावों ने समाज का "मैं"-"मैं "पने का चेहरा ज्यादा दिखाया
    है ,मेने समाज के लिए इतना समय दिया,इतना धन दिया इसलिए मैं ही योग्य हूँ कि भावना
   को पोषण मिला .

5.समाज पर धन का प्रभुत्व -हम सेवा के क्षेत्र में सेवाभावी मध्यम वर्ग को साथ लेकर चल नही
   पा रहे हैं ,क्योंकि मध्यम वर्ग के पास धन खर्च करने की ताकत नही होती है .यह वर्ग संख्या
   और योग्यता में काफी बड़ा है यदि इस वर्ग को पीछे धकेल कर समाज को आगे बढाने की
   कोशिश की जायेगी तो समग्र उन्नत समाज की रचना का ध्येय प्राप्त नहीं होगा .किसी गाडी को
   न्यूट्रल पर रखकर एक्सीलेटर देने से गाडी आगे नही बढती ,सिर्फ शोर और धुँवा होता है

6. परोपकार की भावना का ह्रास -सेवा में धन  निवेश नही बल्कि उचित वर्ग पर खर्च होना होता
   है।सेवा सदन तीर्थयात्रियो को न्यूनतम खर्च पर अधिकतम और उचित सेवा प्रदान करने के
   बनाया जाता है .यदि सेवा के क्षेत्र में लाभ कमाना उद्धेश्य बन जाए तो वह व्यावसायिक हो
   जाता है और परोपकार की भावना का ह्रास हो जाता है .सरकार वर्ग विशेष को सब्सिडी देती
  है ताकि निम्न वर्ग भी सुविधा से वंचित ना रहे .सेवा सदन भी उन तीर्थ यात्रियों को न्यूनतम
  मूल्य पर सुन्दर सेवा प्रदान करे ,यही तो वास्तविक उद्धेश्य है ,जिसे प्राप्त करना है .


शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

देशी कोआ की राजनीति

1. कोआ  जब राजनीति में उतरा.................




 2 ..........................................राजनीति से कुछ खाना  सीखा 






 3 .थोडा थोडा खा कर मोटा हुआ................ .





4.......कुछ कुछ जमा कर बहुत कुछ पाया और रंगीन मिजाज बन गया .सब कोओ से अलग दिखने लगा .........
5.........................................................जो बचाया उसे दूर देश में जमा किया !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!





6....................फिर नजर गढ़ा कर देखा कि अब कहाँ से नोचना है???????????????? .................बोलो!! अब कौनसा स्केंडल बाकी है,जिसमे और ज्यादा मलाई है।.................................

                                                                                          ( छवी गूगल से साभार )




सोमवार, 20 अगस्त 2012

दस मिनिट में सफलता

दस मिनिट में सफलता

असफल वह है जो सफल होने की तीव्र इच्छा नहीं रखता है

कैसे हो दस मिनिट में सफल 

सफल होने के लिए एक लेजर बुक खाताबही डाल  लीजिये और उसके दौ पक्ष बना ले .एक पक्ष
में दिन भर का उपयोगी कार्य जो आपने किया है उसे लिख ले और दुसरे पक्ष में निरर्थक कार्य में
समय गँवाया उसका लेखा कर ले .हर सात दिन में खुद का सर्वेक्षण करते जाए .बस ......
यही है दुनियाँ बदल डालने का मूल मन्त्र ....खुद को दुनियाँ में स्थापित करने का मूल मन्त्र ......
आज से ही कीजिये ......... सफलता आपकी राह देख रही है . 

शनिवार, 18 अगस्त 2012

कर्त्तव्य ,अकर्त्तव्य ,व्यापार और राजनीति

कर्त्तव्य ,अकर्त्तव्य ,व्यापार और राजनीति 

साहब ,आजादनगर झोपड़ पट्टी के पास बलात्कार की घटना घटी है।

साहब- पकड़ के धांसू दफा लगा कर अन्दर कर दूँगा साले को ,भविष्य में किसी की हिम्मत ही
           नहीं पड़ेगी किसी लड़की को छेड़ने की .

साहब उसके कपडे और रहन-सहन से ठीक घर का नजर आता है. 

साहब-  बढ़िया !उसने ऐश की,मजे लूटे ,अब देखना भारी दफा को हल्की करवाने के भरपूर
            नोट मिलेंगे .वैसे भी ऐसे मामले में ज्यातर दोनों पक्ष दोषी होते हैं .अपनी तो ऐश हो
            जायेगी .

साहब वह लड़की अपने बाप की जगह आपका नाम दे रही है!!!

साहब- छोड़ना मत उस कमीने को .आज उसकी मौत ने दावत दे दी है .पूरी रात मार मार कर
           हुलिया बदल दूँगा और ऐसा फिट करूंगा की सालो बाहर नहीं आ पायेगा
.
साहब ,वह बहुत बड़े नेता का बेटा है !!

साहब- क्या बात करते हो ?अब उस नेता ने मेरी लड़की के साथ अपने लड़के की शादी नहीं
           की तो उसका तो पूरा दाँव  ही फेल हो जाएगा .उस लड़के को मारना मत ,पहले बात
           करके देख लेता हूँ ,बात बन गयी तो बल्ले-बल्ले .बड़े घर का जमाई बैठे -बैठे मिल सकता
           है.वैसे ही बेटी तो पराया धन होती है ,हाथ तो पीले करने ही थे .भूल सुधार भी हो जायेगी
           और बेटी भी ऊँचे घर में राज करेगी .     

वह ...............?


वह ...............?

उसकी गणित बहुत अच्छी है ,सवाल कैसा भी हो यदि उसे नहीं भी आता है तो उस सवाल
का उत्तर इस तरह पेश करता है कि बाकी सबकी की गणित को फेल बता देता है ,आंकड़े
का करतब का अच्छा जानकार है ,किधर का मिंडा किधर इस तरह फिट करता है कि
लोग  उसे मास्टर माइंड कहते हैं .
कभी कभी उसे दिन में भी नहीं दीखता है मगर अँधेरे में भी चश्मा लगाकर सब पढ़ लेता
है .जब भी उसे गड़बड़ दिखने लगता है उसकी आदत है झट से चश्मा उतार लेता है और
अंधा बन जाता है.
वह बहुत मधुर आवाज में बोलता है ,चोर उच्चके को डाँटते समय भी वह उपदेश की प्यारी
भाषा का प्रयोग करता है .गपलेबाज उठाईगीरे उसकी डांट को प्रवचन समझ कर बुरा भी नहीं
मानते हैं 
वह  पैसे को छूता तक भी नहीं ,अपनी मेहनत की कमाई भी शुद्ध जल से  धोकर काम में लेता
है,वह ईमानदार है कोई उसके सामने चोरी भी कर ले तो भी वह आँख बंद कर  लेता है मगर
खुद चोरी नहीं करता है
वह संत है ,उसके मन में चोरों के प्रति भी घृणा नहीं है.वह चोरो का भी भला ही करता है,परोपकार
उसके खून में है इसलिए किसी पर अँगुली भी नहीं उठाता है.
यदि उसके सामने कोई सच बोलता है तो वह नजरे झुका लेता है और उसके सामने झूठ कोई
बोलता है तो वह चुप्पी साध लेता है .
दुसरे गाँव के लोग उसे आदर से पंडितजी कहते हैं और वह भी उन्हें ज्ञान बांटता है ,उसके ही ज्ञान
से लोग उसे ठग लेते हैं तब भी वह अधीर नहीं होता है और खुद को मुर्ख नहीं समझता है.
जब भी उसे पंचायत में बिठाया जाता है वह सबकी वाह वाही लुटता है क्योंकि वह अपनी बात
रखता ही नहीं है
वह संवेदनशील है .चोर,उच्चके ,धूर्त ,मक्कार ,झूठे और नास्तिक सबके प्रति संवेदना रखता
है .अपने मुंह से बुरा कहकर अपनी जबान कभी गन्दी नहीं करता है।
वह धन्य है ,धन्य है .
 
  

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

स्वतंत्र भारत की समस्याएं और संभावित निराकरण

स्वतंत्र भारत की समस्याएं और संभावित निराकरण 

1.राष्ट्रप्रेम के जज्बे का गिरता हुआ स्तर .
2.दम तोडती मातृभाषा,घुटती हुयी राष्ट्रभाषा ,पोषण पा रही अंग्रेजी भाषा .
3.चरित्र निर्माण विहीन शिक्षा पद्धति,जो सफल नागरिक देने में पूर्ण रूप से असफल हो रही है ।
4.देश में नागरिक भारतीय की जगह हिन्दू,मुस्लिम, इसाई आदि से जाने जाते हैं यानि फुट डालो
   और राज करो .
5.आर्थिक असमानता -97% पूंजी 3% जनता के हाथ में यानी गलत और असफल आर्थिक नीतियाँ .
6.गुलामी की मानसिकता में जीने वाली जनता .
7.अपरिपक्व न्याय व्यवस्था .
8.संविधान सुधार में ढिलाई .
9.दोषपूर्ण सार्वजनिक वितरण प्रणाली
10.पदलोलुप,भ्रष्ट और चरित्रहीन होता शासक वर्ग
11.नारे ज्यादा ,काम कम
12.बेलगाम चुनावी खर्च
13.राष्ट्र के धन का भरपूर दुरूपयोग और लूट .
14.बुनियादी जरुरत की जगह लोकलुभावन अपव्यय बढ़ाने वाली योजनाओं पर बेशुमार खर्च
15.साख खोती पत्रकारिता

समस्याओं का निराकरण

1.राष्ट्रप्रेम की भावना को राष्ट्रपुरुषो के जीवन चरित्र  से जगाया जाता है ,महापुरुषों के सिद्धांतो
   को जीवन में उतार कर पोषित किया जाता है और श्री कृष्ण गीता के दैवीय गुणों से पराकाष्ठा
   पर पहुंचाया जा सकता है .
2.मनुष्य मातृभाषा में ही पहले सोचता है और फिर बोलता है .मातृभाषा का महत्व हमें समझना
   होगा और पुरे हिन्दुस्थान को राष्ट्र भाषा से ही जोड़ना होगा .विदेशी भाषा का स्थान राष्ट्र भाषा से
   ऊपर कभी भी नहीं होना चाहिए ,चीन इसका जीवंत उदाहरण है।
3.शिक्षा पद्धति में भयंकर खामियां हैं ,यह सम्यक और समग्र विकास नहीं करती है सिर्फ आर्थिक
   नागरिक पैदा करती है जो थोडा सा ज्ञान पाकर संवेदनाहिन  बन रहे हैं.
4.संविधान में जरुरी संशोधन किया जाना चाहिए .शिक्षा में नाम के बाद जाती की जगह नागरिकता
   को स्थान दिया जाना चाहिए.संविधान में अगडी जाती  ,पिछड़ी जाती ,अनुसूचित जाती का
   इस्तेमाल नहीं हिकार संपन्न भारतीय,मध्यम वर्ग,गरीब वर्ग का इस्तेमाल हो ताकि सभी का
   सम्यक विकास हो सके।   
5.कर ढाँचे में सुधार ,शिक्षा व्यवस्था को निशुल्क ,आर्थिक आधार पर आरक्षण व्यवस्था लागू कर
   सुधार किया जाना चाहिए .किसान और असंगठित मजदूरो के हितो का ख्याल जरुरी बन गया है .
6.गुलामी की मानसिकता को हटाने के लिए हमें गुलामी के चिन्हों को हटाना होगा .हमें स्वदेशी
   भावना को बढ़ाना होगा .नागरिक मातृभाषा और राष्ट्रभाषा के बल पर सर्वोच्च सेवा क्षेत्र में पहुँच
  सके ऐसी व्यवस्था देनी पड़ेगी .
7.न्याय व्यवस्था पर पुन: विचार होना चाहिए ,पुरे राष्ट्र में सेमीनार हो,बहस हो ,श्रेष्ठ न्यायविदो को
  इस क्षेत्र में जरूरी सुधार के काम पर लगाना चाहिए ताकि त्वरीत न्याय मिल सके .
8.संविधान की कुछ धाराओ में कमी रह गयी है जिसका फायदा शातिर लोग उठा रहे हैं ,उन्हें बदलना
   चाहिए ताकि भ्रष्ट व्यवस्था से हम उबार सके.राजनैतिक पार्टियां यदि राष्ट्र हित में जरुरी संशोधन
   नहीं करती है तो जनता के मत को प्रमुखता दी जानी चाहिए .
9.सार्वजनीक वितरण प्रणाली में खामियां हैं और इसी कारण सरकार द्वारा खर्च किया गया एक रुपया
   जनता तक पहुँचते-पहुँचते दस पैसा बन जाता है और 90पैसा सरकारी अमला लुट लेता है.इसलिए
   सत्ता का विकेंद्रीकरण आवश्यक हो गया है.हर गाँव के पास सत्ता हो ताकि पैसे का सदुपयोग हो सके।
10.सांसदों ,विधायको,पार्षदों ,सरपंच आदि के उम्मीदवारों की योग्यता पुन:तय की जाए .उनकी
    शैक्षणिक योग्यता,उम्र,और निष्कलंक होने के मायने तय हो .भ्रष्टाचार में लिप्त जन प्रतिनिधियों
    के परिवार को चुनाव लड़ने के अयोग्य माना  जाए और भ्रष्टाचार पर कडक कानून बने .
11.कथनी और करनी के फर्क को हटाया जाए .सरकारी नौकरशाहों के कार्य को तय समय सीमा में
    पूरा किया जाने पर जोर दिया जाए.राजनैतिक दल जो भी वादे  अपने चुनावी मेनिफेस्टो में रखते
    हैं और सत्ता में आने पर पूरा नहीं करते हैं तो उन पर जनता से धोखाधड़ी के तहत कानूनी कार्यवाही
    हो
12.चुनावी खर्च में उम्मीदवार को पोस्टर ,बैनर नहीं लगाने दे ,उनके प्रचार के लिए उन्हें आकाशवाणी ,
    दूरदर्शन का निशुल्क उपयोग तय किया जाए.
13.राष्ट्र के धन का सदुपयोग होना चाहिए .किस गाँव या शहर के लिए किस मद पर कितना खर्च होगा
    इसकी जानकारी सम्बंधित विभाग के कार्यालय के बाहर बोर्ड पर लगी हो
14.वोटो की राजनीती के लिए लोकलुभावन योजनाओं पर खर्च बंद हो ,हर क्षेत्र  की बुनियादी जरुरतो
    को तय किया जाए और धन को पहले बुनियादी जरुरतो पर ही खर्च किया जाना चाहिए.
15.पत्रकारिता की जबाबदेही तय हो ,उनके सही और सच्चे प्रश्नों का उत्तर देने की जबाबदारी तय हो .
    उनके अधिकारों को बढाया जाए और मिडिया गलत पाया जाए या खोटी सुचना देता है तो समुचित
    दंड की व्यवस्था हो        


शहीद की वेदना

शहीद की वेदना 

अमर जवान ज्योति से,
निकली थी एक सिसकी .
मेने पूछा  -
शहीद,
तुम-
वीर थे,बहादुर थे. 
वतन पर मर मिटे थे. 
तुम्हारी वीर गाथा से, 
इतिहास भरा पड़ा है. 
तुम- 
हँसते-हँसते, 
चढ़ गए थे सूली पर. 
गोरों की गोलियों को, 
लेते थे सीधा छाती पर.
मगर- 
आज तुम मायूस क्यों?
आज तुम सुबकते क्यों?
शहीद बोला-
गैरो ने ढाया सीतम, 
तब इन्कलाब कह गये. 
देखा -
अपनों का अपनों पर सीतम ,
हाय!अब आंसू सिसकी रह गये !!


रविवार, 5 अगस्त 2012

मित्र दिन


मित्र दिन 

मित्र दिन का भारतीय संस्कृति में कितना महत्व है ,यह मैं नहीं जान पाया मगर इतना जानता हूँ कि मित्रता को जीया जाता है ,हर पल महसूस किया जाता है,सिर्फ एक दिन नहीं ,जीवन पर्यंत ........

मित्रता निस्वार्थ भावनाओं से शुरू होती है ,त्याग से पोषित होती है ,प्रिय व्यवहार से उत्कृष्टता पर पहुँचती है और निजी स्वार्थ पर ख़त्म हो जाती है .

एक दुसरे से स्वार्थ कि पूर्ति करने वाले लोग मित्र नहीं समान विचारों वाले व्यक्तियों का समूह होता है जो समय,स्थान और परिस्थिति  के अनुसार बदलता रहता है .

मित्र से आशा पूर्ति कि याचना करना ,सहयोग मांगना मित्रता का प्राकृत रूप नहीं है क्योंकि मित्रता में सुख दुःख अलग -अलग नहीं होते और कहने या बताने कि आवश्यकता नहीं होती है.

मित्र वही है जो हमें कर्तव्य मार्ग से नहीं भटकाए ,सदाचार से नही डिगाए,लालटेन कि माफिक पथ-प्रदर्शन में सहयोग करे .

कलाई पर धागा बाँध कर मित्र बनाना आसान है मगर उस धागे कि पवित्रता को उम्र भर निभाना सरल नहीं है .

समय व्यतीत करने के लिए जो समूह बनता है उसमे मित्र भाव नहीं रहता है

मित्र गरीब,अमीर,ऊँचे कुल का ,निचे कुल का नहीं होता है ,मित्रता आत्मिक सम्बन्ध है .

मित्र को प्रणाम नहीं किया जाता है क्योंकि वहां ह्रदय आलिंगन का ही महत्व है

मित्रता के लिए ह्रदय कि विशालता चाहिए ,धन के खर्च कि आडम्बरता नहीं

आपके कुल ,धन ,पदवी को देखकर जो लोग आपमें रूचि लेते हैं ,मीठा व्यवहार करते हैं वे तो ठग हैं वो मित्रता के सही पात्र नहीं होते .

मित्र कम रखे जा सकते हैं मगर सच्चे होने चाहिये

आपकी बेवजह या वजह कैसे भी यदि आपकी कोई अति प्रशंसा करे वह व्यक्ति निश्चित रूप से स्वार्थी है ,आपका सिर्फ उपयोग करके अपना काम निकालना चाहता है .

मित्रता में वचन भंग नहीं होता और ना ही खोटे वचन दिए जाते हैं.मित्रता में अपनी योग्यता के अनुसार कर्तव्य का पालन किया जाता है  

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

राजनीति से रामराज्य की स्थापना का प्रश्न

राजनीति  से रामराज्य की स्थापना का प्रश्न 


टीम अन्ना ने देश के समक्ष प्रश्न रखा है कि क्या राजनीति में आकर ही इस देश में बदलाव की आशा
करनी चाहिए ?इस देश के वर्तमान राजनेता इस तरह संवेदन हिन हो गए हैं कि जनता की इच्छा के
प्रति उन्हें कोई लगाव नहीं रह गया है ?इस देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ आमरण अनशन पर बैठे
लोगो से बात नहीं करके ये मूढ़ नेता अहंकारी या राज धर्म से च्युत नहीं हो गए हैं ?
भारत की वर्तमान तस्वीर 
1.करोड़ो लोगो को पीने का पानी,दौ जुन की रोटी और माथे पर छत का कोई बंदोबस्त 
आजादी के बाद से नहीं हो पाया है 
2.शिक्षा की लचर व्यवस्था है ,हजारो गाँवों में शिक्षा की समुचित व्यवस्था नहीं है 
3.लाखो लोग कुपोषण और भुखमरी के शिकार हैं 
4.स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था निम्न कोटि की है 
5.देश का 97%धन देश के 3%लोगो के हाथ में है 
6.किसान को ना समय पर उचित कीमत पर बीज  उपलब्ध है और ना ही बिजली .
किसान गरीब होता जा रहा है ,देश का पेट भरने वाला किसान खुद आत्महत्या करने 
के लिये मजबूर हो गया है 
7. हर काम के लिए रिश्वत देनी पड़ रही है 
8.राजनेता भ्रष्ट होते जा रहे हैं
9.राजनीती को पैसा बनाने का सुगम रास्ता बना दिया गया है 
10.राजनेता और बड़े उद्योगपति मिलकर भ्रष्टचार कर रहे हैं।
11.टैक्स की मार से जनता बेहाल है 
12.जनता राजनेताओ के घटिया चरित्र का अनुकरण करने को मजबूर होती जा रही है 
13.राजनीती में परिवारवाद का रोग फैल चुका है 
14.स्वार्थी राजनेता देश हित को गौण बनाते जा रहे हैं 
15.भारत की संस्कृति का जानबूझ कर ह्रास किया जा रहा है 
16.भारतियों को जाती,धर्म ,अगड़े-पिछड़े में बांट कर राजनेता अपना-अपना उल्लू 
सीधा कर रहे हैं 
17.गरीब भारतीयों को टैक्स के घेरे में लेकर लुटा जा रहा है और अमीर भारतीयों को 
अपरोक्ष रूप से छुट दी जा रही है 
18.कानून का पालन सिर्फ गरीब भारतीयों को करना है यदि कोई मजबूर होकर या पेट 
भरने के लिए चोरी जैसा घ्रणित काम करता है तो उसके लिए दंड का विधान है मगर 
अमीर लोग उस कानून को ठेंगा दिखा देते हैं 
19.जनकल्याण की योजनाओं के नाम पर  सरकारी अमला जनता के धन को लुट 
रहा है और सरकार वोटो के लालच में अनुपयोगी योजनाओं को चालु रखती है 
20.आतंकवाद से लड़ने के लिए कोई ठोस कदम सरकार नहीं उठा पायी है .बम्ब 
विस्फोट और आतंकी घटनाओं में जनता मारी जाती है 
21.हर समस्या को अनदेखा किया जा रहा है या जांच बैठाने की बात कहकर उस समस्या 
पर पर्दा डाल दिया जाता है 
22छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीयों में भेदभाव किया जा रहा है 


इस देश में समस्याएँ बहुत है ,इलाज नहीं है।कुछ लोग गांधीवादी विचारधारा से दौ-दौ हाथ करते हैं
तब सारे दल एक जुट होकर उनका मखोल उड़ाते हैं .ऐसे प्रतिकूल समय में क्या करे भारतीय ,यह
प्रश्न है।
अन्ना टीम इस प्रश्न का हल राजनीती में आकर करना चाहती है ,शायद यह ठीक भी है क्योंकि
देश के संविधान में जरुरी परिवर्तन की अति आवश्यकता है जिसे देश हित की सोच वाले लोग
मिलकर ही कर सकते हैं
टीम अन्ना का यह निर्णय देश को नयी आशा देता है ,नई रौशनी देता है .हम अपने देश की पहचान
भ्रष्ट देश के रूप में सहन नहीं कर सकते .    

संगत का असर


संगत का असर 


एक वाटिका में कुछ गमलों में काफी पौधे लगे थे .एक श्रद्धालु महिला नियम पूर्वक उस
वाटिका में आती और तुलसी के गमले में लगी तुलसी की रोली  अक्षत से पूजा करती .
एक बच्चा नियमित रूप से उस महिला को पूजा करते देखता था .एक दिन उसने उस
महिला से पूछा -आंटी ,आप रोज किसकी पूजा करने आती है ?
महिला ने जबाब दिया-तुलसी की .
बच्चा बोला - आंटी, आप तुलसी की पूजा करती हैं या उसके बिलकुल पास में लगे ग्वार भाटे
के पौधे की ....
महिला ने देखा वह प्रतिदिन जिस गमले में लगी तुलसी की रोज पूजा करती है उस गमले के
पास में ग्वार भाटे का गमला रखा है ,जब वह तुलसी के रोली और अक्षत चढ़ाती है तब पास
के गमले में लगे ग्वार भाटे के पौधे पर भी रोली के छींटे लग जाते थे और अक्षत भी उस पर
गिर जाते थे .उस महिला ने बच्चे को अपने पास बुलाया और कहा -बेटा,मैं पूजा तो तुलसी की
ही प्रतिदिन करती हूँ परन्तु पास के गमले पर रोली और अक्षत अनजाने में ही लग जाते हैं ,
तुम इससे एक बात सीख सकते हो ?
बच्चा बोला- मैं क्या बात सीख सकता हूँ ?
महिला बोली- अच्छे लोगो की संगत करना .ये ग्वार भाटे का कंटीला पौधा तुलसी की संगती में
रहने के कारण अकारण ही पूजा जाने लगा ,यदि मनुष्य सिर्फ अपनी संगती सुधार ले और
सज्जन और विद्धवानो की संगती में रहने लग जाए तो संसार में पूजा जा सकता है .
 

बुधवार, 1 अगस्त 2012

जनता की सहन शक्ति और जन लोकपाल के सिपाही

जनता की सहन शक्ति और जन लोकपाल के सिपाही 

प्रसंग मर्यादा पुरषोत्तम श्री राम से जुडा  है .सीता के अन्वेषण के पश्चात लंका पर धावा करने
की तैयारी थी ,श्रीराम अनुज के साथ पूरी सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँच चुके थे .भगवन राम
समुद्र से विनय कर रहे थे मगर समुद्र रास्ता देने को तैयार नहीं था .राम ने साम नीति का
उपयोग करते हुये अनशन किया मगर तीन दिन बीत जाने के बाद भी समुद्र श्री राम को रास्ता देने
को राजी नहीं हुआ तब श्री राम जो स्वयं मर्यादा पुरषोत्तम थे कि मर्यादा भी टूट गयी और कुटिल,
शठ, अहंकारी के लिए प्रयुक्त की जाने वाली दंड निति का सहारा लेने की घोषणा कर दी .प्राण संकट
में देख समुद्र दंडवत हो गया और अपने ऊपर सेतु बंधवाने को राजी हो गया .

  अन्ना और उसके सिपाही मूढ़ सरकार से एक सशक्त लोकपाल देश के लिए मांग रहे हैं और महीनो से
अपनी मांग रख रहे हैं मगर सरकार एक सशक्त लोकपाल देने का इरादा नहीं रखती ...क्यों ?इसका
कारण देश के सामने स्पष्ट है .आज अन्ना अपने सहयोगियों के साथ भूखे रहकर अनशन कर रहे हैं
और मतिभ्रमित देश के शासक अड़े हुए हैं कि लोकपाल अभी नहीं आना है

यह देश की जनता की सब्र की परीक्षा है मगर कब तक भूखे रहकर परीक्षा देना है क्या संवेदनहीन
सरकार को पाठ पढाने के लिए हर भारतीय को अनशन के लिये उतरना पडेगा?

क्या अन्ना और उसकी टीम खुद के लिए सरकार से कुछ मांग रही है ?क्या लोकपाल के लाने से देश
को विपत्ति से झुझना पड  जाएगा?आखिर इतना अहंकार क्यों ?

जिनको हमने ही गद्दी पर बिठाया आज वो लोग अपने राज धर्म को भूल गए हैं ,जनता के प्रति अपने
कर्तव्यो को भूल गए हैं उनको याद है सिर्फ अपने अधिकार जो जनता ने ही उन्हें सुशासन के लिये दिए
हैं.

कानून संसद में ही बनेगा यह ठीक है ,जनता से चुने हुए प्रतिनिधि ही कानून बनायेंगे यह भी उचित है
मगर कानून जनता की आकांक्षा पर खरा उतरना चाहिए ताकि जन-प्रतिनिधि या सरकारी नौकर पर
उस कानून का कडक रूप से इस्तेमाल हो सके ताकि जनता के धन का दुरूपयोग रुक सके .

अन्ना की निति साम निति है जिसका अभी तक पुरे देश में समर्थन है मगर यदि उन्होंने मर्यादा को
हाथ में ले लिया तब क्या होगा ...जनता को क्रोध में लाने का काम कौन कर रहा है ?

समय हर पापी को उचित दंड देता रहा है और सत्य की स्थापना होती रही है .इस काल में भी सत्य
को रोका नहीं जा सकता है हो सकता है कुछ भारतियों को जान भी जोखिम में डालनी पड़ जाए.
देश के लिए मर मिटने वाले मतवाले कभी भी किसी भी काल में कम नहीं हुए हैं

 अन्ना शायद अपनी शांति की नीति में बदलाव लायेंगे ,कब?यह देखना है।