शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

माहेश्वरी सेवा सदन का चुनाव अभियान :एक समीक्षा

माहेश्वरी सेवा सदन का चुनाव अभियान :एक समीक्षा 

समाज के लिए समीक्षा प्रस्तुत करने का काम जबाबदारी पूर्ण कर्तव्य होता है इसमें
भरपूर आलोचना मिलती है कारण कि समीक्षा में लाभ और हानि दोनों को सम्यक
रूप से देखना पड़ता है .यह सब जानते हुए भी समग्र रूप से समीक्षा करने का काम
सामयिक जरुरत है .

समाज ने क्या पाया 

1. सेवा भावना को जाग्रत करना-  चुनाव समाज के लोगो को सेवा भावना से जुड़ने
    को प्रेरित कर रहे हैं ,सर्वजन सुखाय की उत्कर्ष भावना से समाज ओतप्रोत रहे इस
    उद्धेश्य की प्राप्ति में यह अभियान महत्वपूर्ण है .

2.आपसी मेलजोल को बढ़ावा -आज का युग आपाधापी का युग है,सब अपने -अपने लक्ष्य
  की दौड़ में लगे हैं ,आपसी मेलजोल कम होता जा रहा है ,इस अभियान ने समाज के
  बन्धुओं की आपसी मेलजोल की भावना में वृद्धि की है।

3.विकास के मार्ग खोजना - चुनाव अभियान से समाज दोनों पक्ष की तथ्यपूर्ण बात को
   सुनता है,समझता है ,विकास की जानकारी लेता है और अपना मंतव्य भी प्रकट करता
   है,यदि सार रूप में देखा जाए तो हम अपनी पुरानी की जा चुकी गलतियों के दोहराव से
  मुक्ति पा लेते हैं और विकास का नया मोडल बना सकते हैं

4.लोकतांत्रिक आस्था को बढावा -चुनाव हमारे गणतंत्र की भावना को पोषित करते हैं ,किसी
   एक व्यक्ति के अधिकार को समाप्त करके हर समय सभी को समान मौका मिल रहा है जो
   भी व्यक्ति इस क्षेत्र में रूचि रखता है वह चुनाव में उम्मीदवार बन कर और चुनाव जीत कर
   समाज की सेवा से जुड़ सकता है

5.यथास्थिति का अवलोकन - चुनाव अभियान के दरमियान हम उस संस्था की वर्तमान
  स्थिति का आलोचनात्मक अध्ययन कर सकते हैं और सही स्थिति को जान सकते हैं

6.राष्ट्रीय फलक पर उपस्थिति - संस्थागत चुनाव प्रक्रिया से गुजर कर हम अपने समाज को
   राष्ट्रीय पहचान दिला सकते हैं।सेवा के क्षेत्र में अग्रिम रहने से समाज की कीर्ति और यश
  फेलती है जिससे समाज का गौरव बढ़ता है

7.अन्य समाज को प्रेरणा -अच्छे प्रबन्धन और द्रुत विकास को देख कर अन्य समाज के  लोग
  प्रेरित होते हैं ,वे भी सभी और विकसित समाज के निर्माण में काम करने लग जाते हैं

       समाज ने क्या खोया 

1.द्वेष और आपसी कलह  - चुनाव प्रक्रिया जब व्यक्तिवाद के दलदल में फँस जाती है तब समाज
   में द्वेष फेल जाता है .आपसी फूट और कलह बढ़ जाती है  फलस्वरूप विकास की गति अवरुद्ध
   हो जाती है।चुनाव अभियान से द्वेष की भावना बढ़ी है ,व्यक्तिवाद का गुणगान बढ़ा है।

2.चुनावी अपव्यय -चुनाव में उचित प्रचार खर्च आवश्यक है मगर वर्तमान चुनाव ने व्यय को
   अपव्यय में बदल दिया है ,चुनावी खर्च की आचारसंहिता कहीं पर दिखाई नही दी .हर पक्ष ने
  जमकर धन का दुरूपयोग किया जो समाज के स्वास्थ्य के लिए बहुत खराब है

3.पदलोलुपता - हम सेवा के क्षेत्र में अग्रिम पंक्ति में खडा होना चाहते हैं ,सेवा में उत्कर्ष भावना
   काम करनी चाहिए .हम तन,मन,धन से जन-जन की निस्वार्थ सेवा करे मगर सेवा की भावना
   पीछे सरक गयी है और पद प्राप्ति की होड़ आगे /सामने आ गयी है

4.व्यक्तिप्रधान समाज की रचना -इन चुनावों ने समाज का "मैं"-"मैं "पने का चेहरा ज्यादा दिखाया
    है ,मेने समाज के लिए इतना समय दिया,इतना धन दिया इसलिए मैं ही योग्य हूँ कि भावना
   को पोषण मिला .

5.समाज पर धन का प्रभुत्व -हम सेवा के क्षेत्र में सेवाभावी मध्यम वर्ग को साथ लेकर चल नही
   पा रहे हैं ,क्योंकि मध्यम वर्ग के पास धन खर्च करने की ताकत नही होती है .यह वर्ग संख्या
   और योग्यता में काफी बड़ा है यदि इस वर्ग को पीछे धकेल कर समाज को आगे बढाने की
   कोशिश की जायेगी तो समग्र उन्नत समाज की रचना का ध्येय प्राप्त नहीं होगा .किसी गाडी को
   न्यूट्रल पर रखकर एक्सीलेटर देने से गाडी आगे नही बढती ,सिर्फ शोर और धुँवा होता है

6. परोपकार की भावना का ह्रास -सेवा में धन  निवेश नही बल्कि उचित वर्ग पर खर्च होना होता
   है।सेवा सदन तीर्थयात्रियो को न्यूनतम खर्च पर अधिकतम और उचित सेवा प्रदान करने के
   बनाया जाता है .यदि सेवा के क्षेत्र में लाभ कमाना उद्धेश्य बन जाए तो वह व्यावसायिक हो
   जाता है और परोपकार की भावना का ह्रास हो जाता है .सरकार वर्ग विशेष को सब्सिडी देती
  है ताकि निम्न वर्ग भी सुविधा से वंचित ना रहे .सेवा सदन भी उन तीर्थ यात्रियों को न्यूनतम
  मूल्य पर सुन्दर सेवा प्रदान करे ,यही तो वास्तविक उद्धेश्य है ,जिसे प्राप्त करना है .


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