रविवार, 30 सितंबर 2012

सफलता की राह

 सफलता की राह 

एक पतँगा (उड़ने वाला कीड़ा ) खुली हुयी खडकी से कमरे के अन्दर आ गया था।मेने खिड़की
के कांच को बंद कर दिया और उस कीट को कमरे से बाहर निकालने की कोशिश की मगर
पतँगा उड़ता हुआ काँच के पास आया और बंद कांच से बाहर निकलने का प्रयास करने लगा।
मैं इस घटना को देखने लग गया।वह पतँगा बार -बार उस कांच से टकरा रहा है और बाहर
निकलने की कोशिश कर रहा है। इस घटना को मैं लगातार 10-15 मिनिट तक देखता रहा।
वह कीट बार-बार पूरी शक्ति से उस कांच से टकराता है,मगर  कमरे  की दूसरी  खिड़की या
दरवाजे से बाहर निकलने का प्रयास नहीं कर रहा है।मेने सोचा थोड़ी देर इस कांच से टकरा कर
जब यह थक जाएगा तो दूसरी खडकी या दरवाजे से बाहर निकल जायेगा। उस पतंगे से ध्यान
हटा मैं कमरे से बाहर निकल गया और अपने काम में लग गया।
       
            रात को जब मैं अपने कमरे में सोने गया तो देखा वह पतँगा कांच से टकरा-टकरा कर
मर चुका है।

          आप सोचेंगे कि इस छोटी सी घटना का ब्लॉग पर लिखने का क्या आशय ?मेने इस
घटना पर विचार किया कि यह पतंगा आसानी से अपनी जान बचा कर दूसरी खिड़की से या
दरवाजे से स्वतंत्र हो सकता था मगर यह अपना नजरिया बदल नही सका तथा बाहर निकलने
के दुसरे विकल्पों पर ध्यान नही दे सका इसलिए स्वतंत्र होने के भरसक प्रयत्न करते हुए भी
मर गया। मरा हुआ पतंगा मेरे मन में बहुत  से विचार छोड़ गया -

         क्या इस पतंगे ने बाहर निकलने के लिए प्रयत्न नहीं किया ? ..तो फिर असफल क्यों हुआ ?

        क्या यह पतंगा स्वतंत्र होकर जीना नही चाहता था ?
   
        क्या इस पतंगे की मौत इसी तरीके से होनी निश्चित थी? या यह विधि का विधान था।

       क्या यह पतंगा बार-बार की असफलता से टूट कर मर गया? या सफल होना उसके
सामर्थ्य से बाहर था ?

         ......आखिर पतंगे की प्रयत्न करने पर भी असफल रहने का कारण क्या था?

      निश्चित रूप से पतंगे के असफल होने का कारण दुसरे विकल्पों पर ध्यान ना देना यानि
खुद के नजरिये में बदलाव नही  लाना था।

        क्या हम भी कभी-कभी पतंगे जैसी कोशिश तो नही कर लेते हैं ?

       हम लोग भी जब एक ही बिंदु पर बार-बार असफल होते हैं तो इसका मुख्य
कारण सभी विकल्पों पर ध्यान नही देना या नजरिये की दिशा को समग्र रूप से नही देखना है

सफल होने के लिए प्रयत्न जरूरी है लेकिन यदि असफल रहे तो दुसरे सम्भावित विकल्प
और उनकी दिशा का बदलाव भी सोच के रखे ताकि असफलता हमारी शक्ति बन जाये।                     

रविवार, 23 सितंबर 2012

अकर्मण्य और कर्मशील

अकर्मण्य और कर्मशील 

एक पत्थर नदी के बहाव में बहता हुआ समुद्र की चट्टान के पास रुक गया। चट्टान ने उसे
उपहास के भाव से देखा और कहा - मित्र , तू सैंकड़ों मील से पानी के बहाव  के साथ बहता
रहा,पानी में बहते-बहते तू  अपना  यथा रूप भी नही बचा पाया। तू घुड़ता -पड़ता बहता रहा
और लम्बा गोल पिंड जैसा बन गया।मुझे देख मैं बरसों से एक ही जगह ताकत के साथ खड़ी
हूँ और पानी की लहरों से मुकाबला करती हूँ। तू मिलो लम्बी यात्रा करके भी आज तक क्या
कुछ पा सका है?

       छोटे पिंड रूपी पत्थर ने जबाब दिया- यह सच है की मैं पानी के साथ सैंकड़ो मील की
यात्रा करता रहा और अपना मूल स्वरूप भी नही बचा सका लेकिन मुझे ख़ुशी है कि मैं
तेरी तरह एक जगह पड़ा नही रहा।तुम वर्षो से यही पड़ी-पड़ी पानी से टकरा रही हो और
व्यर्थ पानी से टकरा कर अकर्मण्य जीवन गुजार रही हो जबकि मैं पानी के बहाव  के साथ
सदा गतिशील रहा हूँ  तेरी तरह व्यर्थ पानी से टकराता नहीं रहा और अकर्मण्य नही रहा।

  चट्टान छोटे से पत्थर की बात पर उपहास से मुस्करा उठी तभी एक राहगीर उधर से
गुजरा उसने चट्टान के पास पड़े बेलनाकार पिंड रूपी पत्थर को उठाया और उसे चट्टान
पर रख दिया। उस राहगीर ने आस-पास से कुछ फूल इकट्टे किये और श्रद्धा के साथ
उस पिंडी रूपी पत्थर पर अर्पित कर दिए  और उस पिंडी को हाथ जोड़कर उसकी शिव रूप
से स्तुति की और माथे पर चढा कर उसे ले जाने लगा।

  छोटी पिंडी ने चट्टान से कहा -हे निरर्थक चट्टान ,तुझे अब तो समझ आ गया होगा कि
गतिशील रहना कितना आवश्यक है। मेरी पानी के साथ गतिशीलता ने मुझे पूज्य बना
दिया और तेरी अकर्मण्यता के कारण तू सदियों से पानी की थपेड़े खा रही है और खाती
रहेगी।

सार - अकर्मण्य जीवन जीने का कुछ भी महत्व नही है          

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

क्या FDI भारत में घाटा उठाने आयेंगी ?

क्या FDI भारत में घाटा उठाने आयेंगी ?

बहुत शोर मचाया जा रहा  है देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों द्वारा कि FDI के भारत में रिटेल क्षेत्र में
आने से देश को फायदा होगा ! कैसे ? क्या वो लागत से कम दाम पर हमे माल बेचेंगे ?
...बिलकुल नहीं। FDI  कोई परोपकारी संस्थाएं नहीं हैं जो भारतीयों की सेवा करने के लिए आएगी।
अगर सेवा करने का उनका उद्धेश्य नहीं है तो फिर वे सस्ता माल कैसे बेचेंगे ?

    FDI  आकर के हमारी वितरण पद्धति को तहस -नहस कर देगी।ये लोग वस्तु के उत्पादन से खपत
 के बीच के मध्यस्थों को खत्म कर देंगे।उत्पादन से खपत के बीच जो लोग आजीविका कमा रहे हैं
सबसे पहले वे बेकार हो जायेंगे जो करोड़ो भारतीय हैं।

   FDI  बाहर  से पूंजी लेकर आयेगी इससे भारत की अर्थव्यवस्था में जान आएगी ,यह मानना है
हमारे भ्रमित अर्थशास्त्रियों का ? क्या रिटल में हमारे पास पैसे नहीं हैं ?क्या रिटेल में  सरकार के
ऋण का पैसा लगा है ?भारत का रिटेल भारतीयों की खुद के निवेश से चल रहा है।अगर निवेश की
जरूरत है तो सरकार बड़े उद्योग पतियों की सब्सिडी बंद कर रिटेल व्यापारियों को वह पैसा बिना
ब्याज के ,सरल किस्तों पर दे,सुधार अपने आप आ जाएगा।

   FDI  आधुनिक तकनीक लेकर आएगी जिससे उत्पादन लागत कम होगी ,ऐसा तर्क बुद्धिजीवी
देते हैं। सवाल उठता है कि क्या आजादी के बाद से अब तक हमारी सरकारे सो रही थी,लाखो -करोड़ो
के गपल्ले हो गए ,कर के पैसे का दुरूपयोग  हुआ,अनुत्पादक योजनायें चलाई मगर उत्तम तकनीक
विकसित नही की। क्यों? हमारी सरकारे अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए विदेशी मगरमच्छो
को क्यों बुला रही है ?

   विगत वर्षों में हमने कुछ नही किया ,तकनीक का विकास नही किया ,इस बात को सरकारे
 स्वीकार क्यों नहीं कर लेती। आपस में वोटों के चक्कर में सभी दल लड़ते रहे इसलिए हमारे देश
की अवगति हुयी है ,मगर अब हम ऐसा देश हित में नहीं करेंगे और देश हित के फैसले लेंगे और फैसलों
पर अमल करेंगे,यह बात कोई भी दल नही कर रहा है ।

   FDI हमे सस्ता देगी , बढ़िया सामान देगी तो क्या वो घाटा करेंगी ?नही वो हम भारतीयों का खून
चुसेंगी ,कुछ बूंद हमे देगी और बाकी सब अपने देश में ले जायेंगी।

     FDI  इस देश से कमाकर जो पैसा  से ले जायेगी वो किसका है ? निसंदेह वो पैसा हम भारतीयों
का है।विदेशी लोग हमे लूट कर ले जाएँ और हम बदतर होते जाए ये कैसा विकास है ?

    आम भारतीय खुद के बनाये जुगाड़ से पेट पाल रहा है,87%भारतीय गरीब और मध्यम वर्गीय
है,सरकार हमे ज्ञान का विकास दे,हमे नई तकनीक दे,मगर हमे लूटने वाले FDI के राक्षस नही दे।                      

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

तालाब में मगरमच्छ छोड़ने के फायदे

तालाब में मगरमच्छ छोड़ने के फायदे 

इस देश के तालाब में विदेशी मगरमच्छ बसाने बहुत जरूरी हो गया है। विदेश  का मगरमच्छ
आपके तालाब में लाना इसलिए जरूरी है ताकि  तालाब  में सालो से  जन्मी  मछलियों  का
सफाया हो सके।

   तालाब में बहुत सी मछलियों के कारण पानी शुद्ध भी रह सकता है और छिछला भी हो जाता
है। अर्थशास्त्र  के नजरिये से तालाब का पानी छिछला हो रहा है इसलिए पानी का शुद्ध होना जरूरी
है और पानी की शुद्धता में मछलियाँ एक बड़ी बाधा है इसलिए हर बड़े  तालाब  में  कुछेक  मगर-
मच्छ का होना भी जरूरी है।

     मगरमच्छ के आने से मछलियों के जीवन पर अचानक संकट आ जाएगा ऐसा कुछ नही होगा।
कारण  कि जो भी मगरमच्छ आपके तालाबों में छोड़े जाने वाले हैं वे बहुत ही अनुभवी हैं।शिकार
कैसे करना है, वे उत्तम तरीके से जानते हैं। विदेश  के  मगरमच्छ  गणितज्ञ हैं   और  तालाब  की
मछलियों की गिनती करके उचित मात्रा में खायेंगे।ऐसा नहीं है कि ये  सारी  मछलियों  को डकार
जायेंगे।जो मछलियाँ इनके इशारे पर थिरकेंगी उन्हें दास बना लिया जाएगा और जीवन दान बख्श
 दिया जाएगा।जो उधम मचाने वाली और डटकर स्वाभिमान की रक्षा के लिए आक्रमण करेंगी ये
मगर सिर्फ उनका भोजन ही आरोगेंगे।

  नेताओं का तर्क है कि तालाब में मगर आने से तालाब की शोभा बढ़ जायेगी।ये मगर इतने विशाल-
काय होंगे कि जैसे ही नगर के तालाब में कूदेंगे वैसे ही देशी मछलियाँ पानी के बाहर गिरकर तड़फेंगी।
तड़फती मछलियों का नजारा आपके जीवन में 1947 के बाद पहली बार देखने को मिलेगा।

      विदेशी मगरमच्छो के कारण मगरमच्छो के आका जो देश के बाहर बैठे हैं वे सब बहुत खुश होंगे
और देश के सांडो की प्रसंशा करेंगे। विदेशी गीद्ध हमारी प्रसंशा करे ,यह हमारा सौभाग्य होगा।जब
हमारे सांड बाहर जायेंगे तब इनको चारा डाला जाएगा जो अक्षय होगा,इन सांडो की 14 पुश्ते पेट
भरकर खाने पर भी चारा खत्म नही होगा।

    मगरमच्छ तालाब में होंगे और वे देशी मछलियों का शिकार करेंगे और उससे जो लोमहर्षक दृश्य
उत्पन्न होगा उसे हमारे देशी मगरमच्छ लुफ्त उठाकर देखेंगे। विदेशी  मगरमच्छ  का  जो  भोजन
बचेगा उसका जायका देशी मगरमच्छ लेंगे। इस  तरह  से  देशी  मगरमच्छो  के  लिए  नया पर्यटन
स्थल का भी निर्माण होगा।

      मछलियों का जीवन भी कोई जीवन है ?हजारो नगरो में अरबो मछलियाँ जीवन भुगत रही है।
उनकी नियति में तो मरना ही लिखा है।देशी मछलियाँ देशी मगरमच्छो का निवाला बने या बगुलों
या गिद्धों का,इससे देशी मछली पर क्या फर्क पड़ता है।मछली का तो शिकार होना ही है,उसे बगुला
खाए,गिद्ध खाए या विदेशी मगरमच्छ ,क्या फर्क पड़ेगा देशी मछली को जो इतनी चिल्ला रही है।

     मगरमच्छो के आने से हमारी ताकत बढ़ेंगी।ये मगर जब मछलियों को डकारेंगे जो उनके पेट
से जो अवशिष्ट बाहर निकलेगा उसको हम देश के लोगो को बेचेंगे,यह आय हमे मुफ्त में मिलेगी।
मगर का अवशिष्ट खेतों में जाएगा उससे पैदावार बढ़ेंगी,उससे जो दाना पैदा होगा उसे तालाबो में
डालेंगे उससे छोटी मछलियाँ खुराक बनाएंगी।जब वो बड़ी हो जायेगी तो फिर से मगर का शिकार
बनेगी ,फिर लोमहर्षक दृश्य होगा फिर से देशी गिद्ध और देशी मगर की दावत होगी।      

                        

सार्थक प्रयत्न

सार्थक  प्रयत्न 

दौ मित्र जंगल से निकल रहे थे।थोड़ी देर चलने के बाद एक सरोवर से पहले उन्होंने दौ पेड़ देखे।
एक पेड़ सूख कर ठूँठ में बदल चूका था और दूसरा पेड़ अभी नव पल्लवित था।ठूँठ को देख कर
पहला मित्र बोला - देखो,यह पेड़ भयंकर ताप और पानी नहीं मिलने के कारण सूख चुका है।हमें
प्रयत्न पूर्वक इस पेड़ की सेवा करनी चाहिए ताकि यह फिर से हरा-भरा हो सके।
  दुसरा बोला- मित्र, यह पेड़ पूर्णतय सूख चुका है इसलिए इसका हरा-भरा होना अब नामुमकिन
है। हमें छोटे नवपल्लवित पेड़ की देखरेख करनी चाहिए ताकि यह सघन छायादार पेड़ बन सके।
  पहला बोला-नहीं, इस पेड़ का बिता हुआ काल निश्चित रूप से बढ़िया रहा होगा।यह पेड़ ना जाने
कितने पथिकों को ठंडी हवा दे चुका होगा,इसकी देखरेख ठीक रहेगी।
   दुसरा बोला- तुम्हारी बात सही हो सकती हैमगर अब इसमें जीवन का कोई चिन्ह दिखाई नहीं
देता इसलिए इसे काट कर जलाने या लकड़ी के सामान बनाने के काम में लेना चाहिये।
  पहला मित्र बोला- तुम स्वार्थ भरे नजरिये से इसे देख रहे हो।मैं कोशिश करूँगा कि यह ठूँठ पहले
की तरह हरा-भरा हो जाए ,मैं इसे रोज जल और समय पर खाद दूँगा।
   दुसरा मित्र बोला- मैं इस नवपल्लवित हो रहे पेड़ की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाऊंगा और समय-
समय पर जल और खाद दूँगा।
     दोनों मित्र अपने-अपने श्रम से ठूँठ और नए पेड़ की सेवा में लग गये। कालान्तर में सुरक्षा और
समय पर जल तथा खाद पाकर नया पेड़ फलने-फूलने लगा और ठूँठ खाद और पानी पाकर भी वैसा
ही बना रहा।
   दुसरे मित्र के पेड़ को फलता-फूलता देख कर पहला मित्र निराश हो गया।वे दोनों एक नीतिज्ञ के
पास गये और सारी बात बता दी।
  नीतिज्ञ ने कहा -आप दोनों ने पूर्ण प्रयत्न किया है मगर एक को उचित सफलता मिली और एक को
कर्म करने के बाद भी असफलता हाथ लगी।सफल होने वाले मित्र ने भविष्य की ओर देखा और प्रयत्न
किया जबकि असफल होने वाले मित्र ने भावावेश में निर्णय लिया और अच्छे भूतकाल से बंधा रहा।
इसलिए भूतकाल की जगह सफल होने के लिए भविष्य पर नजर रखो क्योंकि समय परिवर्तन शील
है और उसके साथ चलने में ही बुद्धिमत्ता है,लकीर के फकीर बने रहने से कुछ हासिल नहीं किया जा
सकता है।

नीति - कार्यनुरूप: प्रयत्न:  

सार-   प्रयत्न कार्य के अनुरूप होने पर ही सफलता मिलती है।     

रविवार, 16 सितंबर 2012

शत्रु का उपकार वाला व्यवहार भी विषकुम्भ


शत्रु का उपकार वाला व्यवहार भी विषकुम्भ 

एक किसान के खेत में एक साँप रहता था।उस साँप से किसान और उसका परिवार हमेशा
भयभीत रहता था। किसान बहुत से उपाय कर चुका मगर वह साँप को पकड़ नहीं सका।
किसान जब भी उस साँप को पकड़ने के लिये दोड़ता साँप फुफकार करके उसे भयभीत कर
देता और तेजी से रेंगकर अपनी बाम्बी में घुस जाता।
          एक दिन एक सपेरा किसान के खेत के पास से गुजरा। किसान ने खेत में साँप रहने
की बात उस सपेरे को बतायी और साँप से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। किसान की प्रार्थना
सुन सपेरे ने कहा -मुझे साँप की बाम्बी दिखा दो ,मैं साँप के भय से तुम्हें मुक्त कर दूंगा।
          किसान उस सपेरे को साँप की बाम्बी के पास ले गया तथा सांप की बाम्बी को खोदने
के औजार भी ले आया। सपेरे ने किसान से पूछा -तुम ये सब औजार किस लिए लाये हो ?
   किसान बोला- इन औजारों का उपयोग करके आप आसानी से साँप को पकड़ सकते हैं।
सपेरा बोला- साँप की बाम्बी खोदने से वह पकड़ा जाएगा ,यह सम्भव नही है। मैं साँप का
जन्मजात दुश्मन हूँ और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि दुश्मन के साथ कब,कैसा व्यवहार
करना चाहिये।
        सपेरे की बात सुनकर किसान चुप हो गया। सपेरे ने किसान को कहा -तुम इस बाम्बी
के पास में पानी का छिडकाव कर दो और कटोरा भरकर दूध ले आओ।किसान ने बाम्बी के
पास जल छिडकाव कर दिया और दूध भी रख दिया।
      वातावरण में ठंडक देख कर साँप प्रसन्न हुआ।बाम्बी के अन्दर दूध की महक भी पहुंच
रही थी। साँप का मन बाम्बी से बाहर निकलने का हो रहा था लेकिन वह आशंकाग्रस्त हो
गया कि जी किसान रोज उसके पीछे भागता है वह कोई चाल तो नहीं चल रहा है ?
     थोड़ी देर बाद सपेरे ने किसान से कहा - तुम अब यहाँ से हट जाओ ,क्योंकि साँप तुम्हारी
गंध के कारण बाहर नहीं आयेगा।किसान के वहां से हट जाने के बाद सपेरे ने अपने झोले से
पुंगी निकाली और मधुर तान छेड़ दी।
     साँप पहले से ही वातावरण में ठंडक और दूध की खुशबु से बाहर निकलना चाहता था
मगर किसान के शरीर की गंध की वजह से नही आ रहा था।अब किसान भी वहां से चला
गया था इसलिए उसका मन बाहर निकलने को हो रहा था। सपेरे की पुंगी से निकलने वाली
मादक तान से सांप मस्त हो गया।
      साँप असमय में प्राप्त हो रही ठण्डक ,दूध पिने के लोभ और कर्णप्रिय धुन पर नाचने के
मौह के वशीभूत होकर बाम्बी से बाहर निकल कर सपेरे की पुंगी की धुन पर थिरकने लगा।
सपेरे ने देखा कि साँप पूरी तरह पुंगी की धुन में मस्त हो गया है तो फुर्ती से सांप की फण को
पकड लिया। साँप सपेरे की मजबूत पकड में छटपटा रहा था।

नीति - अप्रिये कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति

  शत्रु के मीठे दीखने वाले बर्ताव को विष्कुम्भ के समान अनर्थकारी ही मानना चाहिये।                         

शनिवार, 15 सितंबर 2012

थप्पड़ मारकर गाल लाल

थप्पड़ मारकर गाल लाल 

एक चोपाल पर कुछ युवा बैठे थे ,तभी वहाँ पर गाँव का वृद्ध जो खुद को बहुत नीतिज्ञ समझता
था,आया। युवक उस समय अपनी-अपनी ताकत की बाते कर रहे थे।उनके टमाटर जैसे गाल
देख कर उस वृद्ध को उनकी ताकत से इर्ष्या हो गयी।कुछ देर वह उन सबकी बाते सुनता रहा
और फिर बोला -मुझे भी आप जैसा लाल टमाटर जैसा गाल चाहिए।
   युवको ने उस वृद्ध को समझाया -आप का गाल उम्र के तकाजे की वजह से लाल नहीं हो सकता
मगर वह हर कीमत पर लाल गाल की रट लगाए रहा।युवक विचार विमर्श करके बोले -आपकी
बुद्धि सठिया गयी है ,आप जानते हैं आपके गाल लाल नहीं हो सकते मगर फिर भी जिद करते हैं
तो एक तरीका है -आप अपने हाथो से गाल पर तब तक थप्पड़ मारते जाए जब तक गाल लाल
नहीं हो जाये।
बुढ्ढे ने दनादन गाल पर थप्पड़ जमाये ,गाल लाल हो गये।वहाँ से उठ कर वृद्ध व्यक्ति दुसरे चोपाल
की ओर बढ़ गया ,उस चोपाल पर कुछ रईस बुजुर्ग बैठे थे।उन बुजुर्गों ने आगन्तुक वृद्ध के सूजे
हुए गाल देख कर पूछा -महाशय ,आपके गाल लाल -लाल होकर सूज क्यों गये हैं।वृद्ध ने अपनी
नई ताकत आने की बात कही।
उन वृद्ध रईसों ने ठहाका लगाया और अपनी रईसी के बातों में लग गये। उनकी बाते सुनकर उस
वृद्ध को भी रईसी दिखाने की तलब जगी।उसने उन रईसों से पूछा-मेरे को भी अब रईस दिखना है
कोई उपाय बताएं।वो रईस बोले -हम लोगो ने जवानी में खूब मेहनत की तब जाकर अब रईसी
भोग रहे हैं। मगर वह वृद्ध रईसी हर कीमत पर दिखनी चाहिए कि बात पर अड़ गया और उनसे
उपाय पूछने लगा।
उन रईस वृद्धों ने आपस में विचार-विमर्श किया।उन्हें लगा कि इसकी बुद्धि सठिया गयी है ,वे बोले
"तेरे बाप-दादा की सम्पति बेच कर तू कुछ दिन हमारे जैसी रईसी दिखा सकता है लेकिन आखिर
में तेरे को कंगला होना पड़ेगा "
उस वृद्ध को जवानी और रईसी ही जँच रही थी।वह वहां से जाते हुए बोला -मुझे जाना होगा और पुरखों
की सम्पत्ति को बेच कर रईसी लानी होगी।वह बोला-"मित्रो में अब जाता हूँ ,मैं अब मर सकता हूँ
मगर बिना रईसी जीवन के नहीं रह सकता हूँ।मैं सब बेच कर कुछ दिन का रईस बनूंगा।
वह वृद्ध अपने सठिया पन  के कारण अपनी सम्पत्ति बेच दी उसके पागलपन का नतीजा उसके बच्चे
भोग रहे हैं।
 सार -  आज भी ऐसे रईस भावी पीढ़ी को खाई में धकेल खुद रईस दिखने की हौड़ में लगे हैं                        

जाना होगा ।

जाना होगा ।

नेताजी बोले -
क्या हमें 
जाना होगा,,,,,,,
जनता चुप थी।
वो फिर बोले - 
जाना होगा ;;;;;
जनता घुर रही थी।
वो फिर बोले -  
जाना होगा .........
जनता तिलमिला रही थी।
वो फिर बोले -
जाना होगा !!!!
जनता बोली -
हाँ, अब जाना होगा।।। 

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

21 वीं सदी

21 वीं सदी 

हमने पूछा -
नेताजी;
घोटाले पर घोटाले,
कर के पैसों की लूट,
विकराल होता भ्रष्टाचार,
रुका हुआ विकास,
रोता हुआ किसान,
बेहाल नागरिक,
उद्योगपतियो की चांदी,
महंगाई की आंधी,
क्या करेंगे आप कुछ टिपण्णी ?
नेताजी बोले-
ये अर्थहीन बातें,
अनर्थ उपजा रही है।
हमारी नीति को , 
उलटा समझा रही है!  
प्रजा चाहती है जाना,
उनीसवीं सदी में ,
हम ले जा रहे हैं उनको,
अब इक्कीसवीं सदी में।  

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

कटाक्ष : परिचय कथा

कटाक्ष : परिचय कथा 

आपका नाम ?
उत्तर मिला - अभिव्यक्ति।
क्या चाहती हो?
सुख का बसेरा।
यहाँ से चली जाओ ,यहाँ जिसकी लाठी उसकी भेंस वाला हाल है।
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आपका नाम ?
उत्तर मिला - वाणी।
क्या चाहती हो?
उत्तर मिला - स्वतंत्रता।
यहाँ लोकतंत्र है,दूसरी जगह ढुंढ़ो।
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आपका नाम ?
उत्तर मिला -  घोटाला।
कहाँ रहते हो ?
उत्तर मिला - देश खाऊ के इर्द-गिर्द।
क्या चाहते हो ?
प्रजा सोती रहे ,मैं जगता रहूँ।
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आपका नाम ?
उत्तर मिला- लूट।
कहाँ रहती हो ?
उत्तर मिला - सत्ता के क्षेत्रफल में।
क्या चाहती हो?
उत्तर मिला - जबान को लगाम।  
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आपका नाम ?
उत्तर मिला - सूक्ति
यहाँ क्यों आयी ?
उत्तर मिला- लोक-मंदिर में रहने।
अब कहाँ जा रही हो?
उत्तर मिला-  बेइज्जती की रपट लिखाने।
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आपका नाम ?
उत्तर मिला- लेखनी
क्या काम करती हो ?
उत्तर मिला - प्रतिबिम्ब दिखाना।
........मगर तुम्हें निमंत्रण नही था, बिन बुलाई मेहमान।
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आपका नाम ?
उत्तर मिला - मौन
पहले कहाँ थे ,अब कहाँ हो ?
उत्तर मिला - ऋषियों की कुटिया में ,अब लुटेरो की बस्ती में।
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 आपका नाम ?
उत्तर मिला -समय।
क्या करते हो ?
उत्तर मिला - परिवर्तन।
कब करोगे ?
जब तुम अपने अधिकार के लिए लड़ोगे।
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आपका नाम ?
उत्तर मिला - रिमोट।
तुम अपाहिज कैसे हुये ?
उत्तर मिला - पैदायश ही ऐसी है, गैरों के हाथो की पुतली हूँ
काम के हो, सिंहासन पर बैठ जाओ।
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शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

सेवा और आडम्बर

सेवा और आडम्बर 

सोमवार के दिन एक सेठ शिवालय में शिव का दुग्धाभिषेक करने के लिए जा रहे थे .पांच सेर का 
बर्तन दूध से लबालब था .उनके पीछे-पीछे एक गरीब किसान  लोटे में दूध लिए शिवालय की ओर 
बढ़ रहा था .शिवालय के बाहर एक गरीब भिखारिन ने सेठ को बड़े बर्तन में दूध ले जाते देख उनके 
पास गयी और बोली- "मेरा बच्चा कल से भूखा और बीमार है ,आप थोडा दूध दे दीजिये" 
.
सेठ ने भिखारिन और उसके अबोध बच्चे को देखकर दुतकारते हुआ बोला - चल हट !सुबह-सुबह 
ही पीछे पड़ जाते हैं ,भगवान् के अभिषेक का दूध मांगते हुए भी शर्म  नहीं आती।

भिखारिन दुत्कार खा कर भी कातर स्वर से बोली -सेठजी ,थोडा सा दूध दे दीजिये ,सच कहती हूँ 
बच्चा कल से भूखा है।

सेठ चीखता हुआ बोला -बच्चा भूखा है तो पैदा ही क्यों किया ,जहाँ देखो भिखमंगे पहले से तैयार 
मिलते हैं ,ठीक से शिव अर्चना भी नहीं करने देते ...... मुझे दे दो की रट लगाये रहते हैं। 
 
सेठ बडबडाता मंदिर में चला गया भिखारिन  मंदिर की ड्योढ़ी पर बैठ गयी .थोड़ी देर में गरीब 
किसान भी मंदिर के पास पहुँच गया ,वह भिखारिन एक आस के साथ खड़ी हुयी और किसान से 
कातर स्वर से बोली- "यह अबोध बच्चा कल से बीमार है,कुछ भी नहीं खाया है ,थोडा सा दूध बच्चे 
को दे दो ,भगवान तेरा भला करेगा ..."

उस किसान ने एक नजर से उस भिखारिन को और उसके बच्चे को देखा ,फिर अपने हाथ में पकड़े 
दूध के लोटे को देखा .कुछ देर वह सोचता रहा ,मंदिर की तरफ बढ़ते कदम रुक गए ,नन्ही जान का 
रुदन सुनकर उसने उस लोटे का दूध भिखारिन के कटोरे में डाल दिया .भिखारिन दुआ करती हुयी 
चली गयी .

किसान ने अपना खाली लोटा जल से भरा और शिव को अर्पित कर दिया ,शिव के पास बैठा हुआ
सेठ विभिन्न मंत्रो का उच्चारण करता हुआ दूध शिवलिंग पर अर्पण कर रहा था जो छोटी नाली से 
बहता हुआ मंदिर के बाहर नाले में गिर रहा था .

सार - धर्म ढ़कोसला या आडम्बर नही है,धर्म मानवता की सेवा से महकता है।     

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

कोयला

 देश लुटते है ...! 

फिरंगी की भाषा,
सफेद जक्क कपड़े,
चापलूसी बोली,
नफ्फट ,
बेशर्म ,
वादा और भरोसा
सरेआम तोड़ते हैं!
मकसद है इनका
चल देश लुटते हैं .........!!

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कोयला 

कोयला-
बुरी चीज है।
जब जले,
तो हाथ जला दे ;
जब बुझे,
तो कालिख लगा दे।
हम शराफत के बंदे,
इस को मिटाने पर तुले हैं,
मगर-हाय ! रे,निर्दयी केग!
इस पर भी बवंडर फैला रहे हैं .........!!
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ख़ामोशी 

मेरी ख़ामोशी,
तेरी बक-बक से लाख अच्छी है।
क्या पाया बक-बक करने से ?
जाँच, जुल्म,और जख्मों के सिवा, 
काश-
सच को जानकर खामोश रहता,
तो,
जो ताज मेरे सिर पर है,
वह ताज कल तेरे सिर होता !

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चापलूसी

कौन कहता है, 
चापलूसी को अवगुण,
है यह हुनर से कम नहीं,
सच बोलने से कुछ उखड़ता नहीं,
मगर-
चापलूस को कोई उखाड़ सकता नहीं !

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 उसको क्या कहते हैं ?

एक मंदिर में !
खुलकर होती-
गुथमगुत्थी ... !  
हाथापाई ....!
झगडे-लड़ाई ...!
गाली-गलोच .....!
मारा - मारी ...!
धक्का-मुक्की ...!
फेंका-फेंकी ...!
चोर .. ! चोरी ...!
सीना जोरी ...!
छिना झपटी ...!
शोर-शराबा ...!
देश -खराबा ...!
मिले जहाँ ये दर्शन, 
बोलो,उसको क्या कहते हैं ?   
 






 

बुधवार, 5 सितंबर 2012

भला आदमी

भला आदमी 

रेल में भीड़ थी ,मेरे पास आरक्षण टिकिट नहीं था ,मैं आरक्षित डिब्बे में चढ़ गया .टिकिट चेकर
आया ,मुझे इस डिब्बे से उतर जाने की हिदायत दी।

मेने अनुनय विनय की ,एक नोट उसकी और बढ़ाया ...........

उसने तल्खी से जबाब दिया - दिखता नहीं,पूरी गाडी पैक है ,यह डिब्बा आपको छोड़ना पडेगा।  

मैं उसके पीछे-पीछे गया फिर से अनुनय विनय की ,उसने सवालिया नजर से मुझे  घुरा,मेने एक
नोट और जेब से निकाला .

वह बोला -गाडी फिलहाल पैक है ,मैं डिब्बा चेक कर लूँ ,उसके बाद देखेंगे।

मेने उसका पीछा नहीं छोड़ा , फिर अनुनय विनय की। उसने कुछ शालीनता से  मेरी ओर देखा
मेने फिर एक नोट बढ़ाया ............

वह बोला -डिब्बे में भीड़ देखिये ,इस भीड़ के हिसाब से बर्थ नामुमकिन है .

मेने फिर उससे अनुनय विनय की ,उसने मेरी तरफ देखा ,मैं जेब में तीनो नोट रख कर बड़ा नोट
निकाल कर उसे दिखाया .........

अब वह बोला-आप काफी परेशान हैं ,भले आदमी लग रहे हैं ,मैं आपकी मदद कर देता हूँ।

मैं बोला -आप भले हैं सर ,वरना इस भीड़ में कौन किसकी सुनता है आपने कन्फर्म सीट देकर
अहसान किया है .

वो बोला-आप ही भले हैं भाई ,वरना एक-दौ नोट से ज्यादा हमारी कद्र कौन करता है।

तभी पास में बैठा यात्री बोला -ना तुम भले हो ना ये भला है। तुम्हारी जेब से निकला बड़ा बापू
भला है।
सार -कोई इसे व्यवहार कहता है ,कोई अपराध। कोई इसे आवश्यक समझता है तो कोई काम
        निकालने का तरीका।                                     

रविवार, 2 सितंबर 2012

आह !व्यंग्य 

सेवा सदन पर ,
सिर फुटव्वल देख ,
समाज रत्न की
मूर्ति से आवाज आई-
सेवा !अरे, कहाँ गयी ?
प्रत्युत्तर मिला-
इस सदन से बाहर ,
आसरा ढूंढ़ रही हूँ ,
इस बस्ती में अब ,
सिर फुटव्वल बची है,
चाहते हो तुम यहाँ बसे रहना ,
तो-
आँखे और कान बंद रखना ,
क्योंकि -
तुम आँखे खोलोगे
तो देख नहीं पाओगे छटपटाती सेवा,
तुम कान खोलोगे
तो सुनोगे  सिर्फ आत्म- प्रसंशा
चाहते हो सर्वजन सुखाय
तो
चलो मेरे साथ
हम ढूंढ़ते हैं दूर इस सदन से
सच्चे सेवक के दिल में आशियाना। 

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अरे! क्या कर रहे हो आजकल ?
वो बोले -
समाजसेवी की कोचिंग ले रहा हूँ।
हम बोले -
कुछ समझे नही ,विस्तार से बताओ
वो बोले -
सेवा को भावना से नही अर्थ से जोड़ना ,
पदलोलुपता से त्याग को घटाना,
अहंकार से अपव्यय को गुणा  करना ,
सामाजिक एकता का भागाकार करना
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