रविवार, 2 सितंबर 2012

आह !व्यंग्य 

सेवा सदन पर ,
सिर फुटव्वल देख ,
समाज रत्न की
मूर्ति से आवाज आई-
सेवा !अरे, कहाँ गयी ?
प्रत्युत्तर मिला-
इस सदन से बाहर ,
आसरा ढूंढ़ रही हूँ ,
इस बस्ती में अब ,
सिर फुटव्वल बची है,
चाहते हो तुम यहाँ बसे रहना ,
तो-
आँखे और कान बंद रखना ,
क्योंकि -
तुम आँखे खोलोगे
तो देख नहीं पाओगे छटपटाती सेवा,
तुम कान खोलोगे
तो सुनोगे  सिर्फ आत्म- प्रसंशा
चाहते हो सर्वजन सुखाय
तो
चलो मेरे साथ
हम ढूंढ़ते हैं दूर इस सदन से
सच्चे सेवक के दिल में आशियाना। 

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अरे! क्या कर रहे हो आजकल ?
वो बोले -
समाजसेवी की कोचिंग ले रहा हूँ।
हम बोले -
कुछ समझे नही ,विस्तार से बताओ
वो बोले -
सेवा को भावना से नही अर्थ से जोड़ना ,
पदलोलुपता से त्याग को घटाना,
अहंकार से अपव्यय को गुणा  करना ,
सामाजिक एकता का भागाकार करना
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