रविवार, 16 सितंबर 2012

शत्रु का उपकार वाला व्यवहार भी विषकुम्भ


शत्रु का उपकार वाला व्यवहार भी विषकुम्भ 

एक किसान के खेत में एक साँप रहता था।उस साँप से किसान और उसका परिवार हमेशा
भयभीत रहता था। किसान बहुत से उपाय कर चुका मगर वह साँप को पकड़ नहीं सका।
किसान जब भी उस साँप को पकड़ने के लिये दोड़ता साँप फुफकार करके उसे भयभीत कर
देता और तेजी से रेंगकर अपनी बाम्बी में घुस जाता।
          एक दिन एक सपेरा किसान के खेत के पास से गुजरा। किसान ने खेत में साँप रहने
की बात उस सपेरे को बतायी और साँप से मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की। किसान की प्रार्थना
सुन सपेरे ने कहा -मुझे साँप की बाम्बी दिखा दो ,मैं साँप के भय से तुम्हें मुक्त कर दूंगा।
          किसान उस सपेरे को साँप की बाम्बी के पास ले गया तथा सांप की बाम्बी को खोदने
के औजार भी ले आया। सपेरे ने किसान से पूछा -तुम ये सब औजार किस लिए लाये हो ?
   किसान बोला- इन औजारों का उपयोग करके आप आसानी से साँप को पकड़ सकते हैं।
सपेरा बोला- साँप की बाम्बी खोदने से वह पकड़ा जाएगा ,यह सम्भव नही है। मैं साँप का
जन्मजात दुश्मन हूँ और मैं अच्छी तरह जानता हूँ कि दुश्मन के साथ कब,कैसा व्यवहार
करना चाहिये।
        सपेरे की बात सुनकर किसान चुप हो गया। सपेरे ने किसान को कहा -तुम इस बाम्बी
के पास में पानी का छिडकाव कर दो और कटोरा भरकर दूध ले आओ।किसान ने बाम्बी के
पास जल छिडकाव कर दिया और दूध भी रख दिया।
      वातावरण में ठंडक देख कर साँप प्रसन्न हुआ।बाम्बी के अन्दर दूध की महक भी पहुंच
रही थी। साँप का मन बाम्बी से बाहर निकलने का हो रहा था लेकिन वह आशंकाग्रस्त हो
गया कि जी किसान रोज उसके पीछे भागता है वह कोई चाल तो नहीं चल रहा है ?
     थोड़ी देर बाद सपेरे ने किसान से कहा - तुम अब यहाँ से हट जाओ ,क्योंकि साँप तुम्हारी
गंध के कारण बाहर नहीं आयेगा।किसान के वहां से हट जाने के बाद सपेरे ने अपने झोले से
पुंगी निकाली और मधुर तान छेड़ दी।
     साँप पहले से ही वातावरण में ठंडक और दूध की खुशबु से बाहर निकलना चाहता था
मगर किसान के शरीर की गंध की वजह से नही आ रहा था।अब किसान भी वहां से चला
गया था इसलिए उसका मन बाहर निकलने को हो रहा था। सपेरे की पुंगी से निकलने वाली
मादक तान से सांप मस्त हो गया।
      साँप असमय में प्राप्त हो रही ठण्डक ,दूध पिने के लोभ और कर्णप्रिय धुन पर नाचने के
मौह के वशीभूत होकर बाम्बी से बाहर निकल कर सपेरे की पुंगी की धुन पर थिरकने लगा।
सपेरे ने देखा कि साँप पूरी तरह पुंगी की धुन में मस्त हो गया है तो फुर्ती से सांप की फण को
पकड लिया। साँप सपेरे की मजबूत पकड में छटपटा रहा था।

नीति - अप्रिये कृतं प्रियमपि द्वेष्यं भवति

  शत्रु के मीठे दीखने वाले बर्ताव को विष्कुम्भ के समान अनर्थकारी ही मानना चाहिये।                         

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