मंगलवार, 18 सितंबर 2012

सार्थक प्रयत्न

सार्थक  प्रयत्न 

दौ मित्र जंगल से निकल रहे थे।थोड़ी देर चलने के बाद एक सरोवर से पहले उन्होंने दौ पेड़ देखे।
एक पेड़ सूख कर ठूँठ में बदल चूका था और दूसरा पेड़ अभी नव पल्लवित था।ठूँठ को देख कर
पहला मित्र बोला - देखो,यह पेड़ भयंकर ताप और पानी नहीं मिलने के कारण सूख चुका है।हमें
प्रयत्न पूर्वक इस पेड़ की सेवा करनी चाहिए ताकि यह फिर से हरा-भरा हो सके।
  दुसरा बोला- मित्र, यह पेड़ पूर्णतय सूख चुका है इसलिए इसका हरा-भरा होना अब नामुमकिन
है। हमें छोटे नवपल्लवित पेड़ की देखरेख करनी चाहिए ताकि यह सघन छायादार पेड़ बन सके।
  पहला बोला-नहीं, इस पेड़ का बिता हुआ काल निश्चित रूप से बढ़िया रहा होगा।यह पेड़ ना जाने
कितने पथिकों को ठंडी हवा दे चुका होगा,इसकी देखरेख ठीक रहेगी।
   दुसरा बोला- तुम्हारी बात सही हो सकती हैमगर अब इसमें जीवन का कोई चिन्ह दिखाई नहीं
देता इसलिए इसे काट कर जलाने या लकड़ी के सामान बनाने के काम में लेना चाहिये।
  पहला मित्र बोला- तुम स्वार्थ भरे नजरिये से इसे देख रहे हो।मैं कोशिश करूँगा कि यह ठूँठ पहले
की तरह हरा-भरा हो जाए ,मैं इसे रोज जल और समय पर खाद दूँगा।
   दुसरा मित्र बोला- मैं इस नवपल्लवित हो रहे पेड़ की सुरक्षा के लिए बाड़ लगाऊंगा और समय-
समय पर जल और खाद दूँगा।
     दोनों मित्र अपने-अपने श्रम से ठूँठ और नए पेड़ की सेवा में लग गये। कालान्तर में सुरक्षा और
समय पर जल तथा खाद पाकर नया पेड़ फलने-फूलने लगा और ठूँठ खाद और पानी पाकर भी वैसा
ही बना रहा।
   दुसरे मित्र के पेड़ को फलता-फूलता देख कर पहला मित्र निराश हो गया।वे दोनों एक नीतिज्ञ के
पास गये और सारी बात बता दी।
  नीतिज्ञ ने कहा -आप दोनों ने पूर्ण प्रयत्न किया है मगर एक को उचित सफलता मिली और एक को
कर्म करने के बाद भी असफलता हाथ लगी।सफल होने वाले मित्र ने भविष्य की ओर देखा और प्रयत्न
किया जबकि असफल होने वाले मित्र ने भावावेश में निर्णय लिया और अच्छे भूतकाल से बंधा रहा।
इसलिए भूतकाल की जगह सफल होने के लिए भविष्य पर नजर रखो क्योंकि समय परिवर्तन शील
है और उसके साथ चलने में ही बुद्धिमत्ता है,लकीर के फकीर बने रहने से कुछ हासिल नहीं किया जा
सकता है।

नीति - कार्यनुरूप: प्रयत्न:  

सार-   प्रयत्न कार्य के अनुरूप होने पर ही सफलता मिलती है।     

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