बुधवार, 5 सितंबर 2012

भला आदमी

भला आदमी 

रेल में भीड़ थी ,मेरे पास आरक्षण टिकिट नहीं था ,मैं आरक्षित डिब्बे में चढ़ गया .टिकिट चेकर
आया ,मुझे इस डिब्बे से उतर जाने की हिदायत दी।

मेने अनुनय विनय की ,एक नोट उसकी और बढ़ाया ...........

उसने तल्खी से जबाब दिया - दिखता नहीं,पूरी गाडी पैक है ,यह डिब्बा आपको छोड़ना पडेगा।  

मैं उसके पीछे-पीछे गया फिर से अनुनय विनय की ,उसने सवालिया नजर से मुझे  घुरा,मेने एक
नोट और जेब से निकाला .

वह बोला -गाडी फिलहाल पैक है ,मैं डिब्बा चेक कर लूँ ,उसके बाद देखेंगे।

मेने उसका पीछा नहीं छोड़ा , फिर अनुनय विनय की। उसने कुछ शालीनता से  मेरी ओर देखा
मेने फिर एक नोट बढ़ाया ............

वह बोला -डिब्बे में भीड़ देखिये ,इस भीड़ के हिसाब से बर्थ नामुमकिन है .

मेने फिर उससे अनुनय विनय की ,उसने मेरी तरफ देखा ,मैं जेब में तीनो नोट रख कर बड़ा नोट
निकाल कर उसे दिखाया .........

अब वह बोला-आप काफी परेशान हैं ,भले आदमी लग रहे हैं ,मैं आपकी मदद कर देता हूँ।

मैं बोला -आप भले हैं सर ,वरना इस भीड़ में कौन किसकी सुनता है आपने कन्फर्म सीट देकर
अहसान किया है .

वो बोला-आप ही भले हैं भाई ,वरना एक-दौ नोट से ज्यादा हमारी कद्र कौन करता है।

तभी पास में बैठा यात्री बोला -ना तुम भले हो ना ये भला है। तुम्हारी जेब से निकला बड़ा बापू
भला है।
सार -कोई इसे व्यवहार कहता है ,कोई अपराध। कोई इसे आवश्यक समझता है तो कोई काम
        निकालने का तरीका।                                     

कोई टिप्पणी नहीं: