गुरुवार, 6 सितंबर 2012

कोयला

 देश लुटते है ...! 

फिरंगी की भाषा,
सफेद जक्क कपड़े,
चापलूसी बोली,
नफ्फट ,
बेशर्म ,
वादा और भरोसा
सरेआम तोड़ते हैं!
मकसद है इनका
चल देश लुटते हैं .........!!

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कोयला 

कोयला-
बुरी चीज है।
जब जले,
तो हाथ जला दे ;
जब बुझे,
तो कालिख लगा दे।
हम शराफत के बंदे,
इस को मिटाने पर तुले हैं,
मगर-हाय ! रे,निर्दयी केग!
इस पर भी बवंडर फैला रहे हैं .........!!
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ख़ामोशी 

मेरी ख़ामोशी,
तेरी बक-बक से लाख अच्छी है।
क्या पाया बक-बक करने से ?
जाँच, जुल्म,और जख्मों के सिवा, 
काश-
सच को जानकर खामोश रहता,
तो,
जो ताज मेरे सिर पर है,
वह ताज कल तेरे सिर होता !

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चापलूसी

कौन कहता है, 
चापलूसी को अवगुण,
है यह हुनर से कम नहीं,
सच बोलने से कुछ उखड़ता नहीं,
मगर-
चापलूस को कोई उखाड़ सकता नहीं !

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 उसको क्या कहते हैं ?

एक मंदिर में !
खुलकर होती-
गुथमगुत्थी ... !  
हाथापाई ....!
झगडे-लड़ाई ...!
गाली-गलोच .....!
मारा - मारी ...!
धक्का-मुक्की ...!
फेंका-फेंकी ...!
चोर .. ! चोरी ...!
सीना जोरी ...!
छिना झपटी ...!
शोर-शराबा ...!
देश -खराबा ...!
मिले जहाँ ये दर्शन, 
बोलो,उसको क्या कहते हैं ?   
 






 

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