शनिवार, 27 अक्तूबर 2012

मुहब्बत एक दरिया है .........

मुहब्बत एक दरिया है .........

मुहब्बत  एक  दरिया  है,  जो  डूब  गया   वो  दीवाना।
शमा   तो एक जरिया है , जो  मिट गया  वो परवाना।।

आँखों   के  सागर  में मोती , चुनता  गया  वो  दीवाना।
प्यासी  है  होटों  की  धरती  ,बरस   गया  वो  परवाना।।
कुछ कहना था कह न पाया, चुपचाप  सहे  वो  दीवाना।
शब्द, तो बात का जरिया है, जो  मौन  रहे  वो परवाना।।

उड़े  हवा में   केश  घटा  बन , उलझ  गया  वो  दीवाना।
साँसों  में  है  गीतों  की  धुन , थिरक गया  वो परवाना।।
अंगडाई  में  यौवन  का धन , खरच   सका  वो दीवाना।
इश्क,तो आग का दरिया है,जो जलता चला वो परवाना।।                      

कुंदन  सा बदन  चेहरा चन्दन , दहक  गया वो दीवाना।
मदहोश अदा चंचल चितवन , बहक  गया  वो परवाना ।।
दिल के कागज पे   इबादत ,  लिखता गया  वो दीवाना।
यार,तो प्यार की हथकड़ियाँ,जो बंधता गया वो परवाना।।


                                                                                                    (छवि गूगल से साभार )  


  

गुरुवार, 25 अक्तूबर 2012

पुतला और रावण


पुतला और रावण 

एक रावण के पुतले को, एक रावण के हाथों फूंकते देखा !

जनता के मीठे  सपनों को, धुं -धुं  करके  जलते  देखा !!

रावण के पुतले को बेबस, रावण पर सुरक्षा कवच देखा !

पुतले के कद से कुछ बढ़कर, रावण के पद- कद को देखा !!

पुतले में मायावी  देखा , एक बाजीगर को जिन्दा देखा !

पुतले में रक्षित लज्जा थी , एक लाज लुटता रावण देखा !!

अहंकार पुतले में देखा, रावण को अट्टहास लगाते  देखा!

एक रावण को एक रावण से,खुल्लम खुल्ला लड़ते देखा!!

धुं -धुं करके जला पुतला,  एक रावण को जिन्दा देखा !

भूखा नंगा मालिक देखा,  राजतिलक नौकर का देखा !!

मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

आम आदमी

आम आदमी 

 क्या रावन लँका में पैदा होते हैं ?

पता नहीं ,मगर यहाँ स्वदेशी का खूब चलन है !!
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विजया दशमी की शुभ कामनाएँ ,आम जनता को छोड़कर ... ?

क्योंकि आम जनता के पटाखे फूटते हैं!!

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एक ही थेली के चट्टे-बट्टे , सिद्ध कीजिये ?

पक्ष और विपक्ष को गले मिलते देखिये !!

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एक वचन या  बहु वचन - सदाचार और भ्रष्टाचार ?

सदाचार तो एक जैसा ही होता है पर भ्रष्टाचार तो बहुआयामी  रंगीला ..!!

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भक्त - गुरूजी,सुख और दुःख कैसे जाने ?

गुरु-  जिसको सबने मिल कर चुना वह दुःख और जो चुना गया
         वह सुख।

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गाँव-गाँव में फर्जीवाड़ा पहुंचाईये ?

सरल ,बस बाप ... आप मनरेगा को खूब  दूध पिलाईये !!

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"कोयला के सानिध्य" की करामात बतलाईये  ?

कोयला अन्दर से भी काला और बाहर से भी, मगर सानिध्य पाने
वाला अन्दर से काला और बाहर से धोल्ला !!

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कानून अपना काम करेगा ?

.................आम आदमी पर !!

न्यायालय में देख लेंगे ?

...................आम आदमी को !!

कानून के हाथ लम्बे होते हैं ?

.................आम आदमी तक !!
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रविवार, 21 अक्तूबर 2012

फूल और काँटे

फूल और काँटे 

गुलाब के पेड़ पर पहले काँटों ने जन्म लिया और उसके बाद फूल ने।काँटे उम्र में फूल से
बड़े थे मगर हर प्राणी उनसे दुरी बनाना पसंद करता था।यह बात काँटो को पसंद नहीं
आयी।

काँटों ने फूल से कहा - फूल ,हम और तुम एक ही माँ की सन्तान हैं।हम तुम्हारे से पहले
इस सँसार में आये हैं लेकिन कारण क्या है कि तुम अल्पायु होकर भी लोगों को पसंद
आते हो जबकि हम दीर्घायु होकर भी हीन समझे जाते हैं?

फूल ने जबाब दिया- ज्येष्ठ भ्राता , हम कितना लम्बा जीये यह बात महत्वहीन है।महत्व
इस बात का है कि हम जीये  किस तरह। हमारे गुण और कर्म ही मुख्य है।मैं अल्प जीवन
पाकर भी जग को सुगन्धित करता हूँ और मुस्कराता रहता हूँ और तुम दीर्घायु होकर भी
कभी जग में सुगंध नहीं बिखेर पाये और जीवन में मुस्करा नहीं पाये।

सार - चरित्रवान और गुणी बनो और बनाओ।        

शनिवार, 20 अक्तूबर 2012

आक और केक्टस

आक और केक्टस 

एक जंगल में आक और केक्टस के पौधे पास-पास में लगे
हुए थे।केक्टस पर कांटे और सुन्दर फूल लगे थे।केक्टस के
पास लगे आक के पौधे पर भी फूल लगे थे मगर कुरूप थे।

केक्टस अपने पर लगे लुभावने फूलों को देख मन ही मन
हर्षित हो रहा था ,उसने पास लगे आक के बड़े-बड़े पत्तों वाले
पौधे से कहा -
आक,तेरे में कुछ भी अच्छा नहीं है ,तू विष से भरा दूध
वाला विषैला पौधा है तेरे हर अंग में जहर है तथा तेरे
फूल भीअजीब सी दुर्गन्ध फैलाते हैं।




आक उत्तर दिया -  केक्टस,
मैं मानता हूँ कि तुम पर सुन्दर फूल आते हैं,मगर बिना सुगंध
वाले फूल सिर्फ देखने में ही अच्छे लगते हैं किसी के  काम  नहीं
आते तुम  खुद  भी  कंटीली झाडी हो ,तुम फूलों के साथ मोहक
लगते हो लेकिन किसी को सुन्दर बना नहीं सकते। मेरा आकार
और रंग रूप भले ही कुरूप है।मेरेशरीर में विषैला दूध जरुर है
मगर फिर भी मैं लोकोपयोगी हूँ। मेरा अंग-अंग उपयोगी है जो
मनुष्यों के चरम रोग ,वायुविकार,अंधेपन को ठीक कर देता है।

सार -मनुष्य यदि सिर्फ खुद के लिए ही जीता है तो वह
समाज के लिए सारहीन है चाहे वह दिखने में सुन्दर या
धनी क्यों न हो। कडवे स्वभाव वाला बैडोल व्यक्ति यदि
लोक उपकारक काम करता है तो समाज के लिए वह
स्तुत्य है।

                                                                                                                 (छवि- गूगल से साभार)                 


                                                                                                                                                    

शुक्रवार, 19 अक्तूबर 2012

संस्कृति का फर्क

संस्कृति  का फर्क 

नवरात्रि के पर्व पर दौ संस्कृतियाँ एक साथ देखने को मिल रही है।एक और भारतीय
संस्कृति का गौरव है तो दूसरी और पाश्चात्य संस्कृति का पतन।
   
मैं शाम के समय मंदिर में गया था।   वहां पर एक अपूर्व  सुन्दरी   चितचोर  के साथ
खड़ी है।उस अपूर्व सुन्दरी  के  अंग-अंग  से सौन्दर्य  टपक रहा है मगर फिर भी लोग
शांत हैं। मुग्धता  के साथ   अपूर्व सुन्दरी को निहार रहे हैं।किसी की नजरो में अश्रद्धा
नहीं है।  अहोभाग्य हैं  उस युग  के लोग  जिन्होंने  साक्षात  राजदुलारी  सीताजी  को
निहारा होगा और राजाराम की निकटता पायी होगी।इनकी पत्थर की प्रतिमा में आज 
भी अद्भुत ताकत है कि जनकदुलारी जो युवा हैं ,उनको सभी बच्चे बूढ़े नौजवान आदर
से प्रणाम कर रहे हैं श्री राम के श्री विग्रह के समक्ष शीश झुका रहे हैं।

 जब में यहाँ से बाहर निकलता हूँ और थोड़ी ही दुरी पर चल रहे गरबा नृत्य के पंडाल
की ओर चला जाता हूँ। यहाँ भी  पाश्चात्य  परिधान  में कसी  हुयी  युवा नारियां जीती
जागती खड़ी है ,यहाँ भी सैंकड़ो लोग खड़े हो कर नृत्य देख भी रहे हैं मगर देखने वालो
की नजरो में श्रद्धा का भाव नहीं है ,सब और विकार भरा है,कामुकता का साम्राज्य है।

   मेरे मन में एक प्रश्न कौंधा - क्या कारण है कि  जिस  भारतीय  नारी  की पत्थर की
प्रतिमा को  देख  कर  मन  में नारी  के समक्ष सर झुक जाता है, जिस भारतीय नारी के
प्रतीक  चित्र को  सामने  देख  हम  शक्ति  स्वरूप से हाथ जोड़ते हैं , जिस भारतीय युवा
नारी के  विग्रह  को देख  कर ही  मन  के पाप  धुल जाया  करते  हैं  मगर जो नारियां
पाश्चात्य  परिधान  में ,बदन  से कसे  हुए कपड़ो में ज़िंदा खड़ी है,नृत्य कर रही हैं उनको
लोग विकार से देखते हैं ,कामुकता से देखते हैं ,उन को ललचाई नजरो से देखते हैं?

    लोग , जो मंदिर में थे और नारी के स्वरूप को हाथ जोड़े श्रद्धा से खड़े थे वे मन्दिर
से बाहर आकर श्रद्धा क्यों भूल गए ? क्यों आया  यह प्राचीन और अर्वाचीन भारतीय
नारी के रूप में फरक ?क्या पुरुष समाज आडम्बर कर रहा है या भारतीय नारी
पश्चिमी संस्कृति अपनाने के चक्कर में अपना गौरव खोती  जा रही है ?       

मंगलवार, 16 अक्तूबर 2012

जादूगर

जादूगर 

जादूगर अपना तामझाम समेट रहा था।
मेने  पूछा- कहाँ चल दिये सम्राट ?
वो बोले -आज से ये धंधा बंद!
मेने पूछा-   क्या हुआ ?
जादूगर बोला - जब से इस देश में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं तब से लोगो को
मेरी हाथ की सफाई में मजा भी नहीं आता।सब बोलते हैं असली में गायब
करने वाले तुर्मखां बैठे हैं तो नकली को क्यों देखे।

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जादूगर अपने बरसों पुराने जादू दिखा रहा था तभी दर्शक में से आवाज
आयी ....कुछ नया दिखाओ।
जादूगर बोला - सरकार,मैं सरदार नहीं हूँ,मामूली आदमी हूँ।नया देखना
है तो अखबार में  पढो, समाचार में सुनो। मैं तो पुराना ही दिखाऊंगा।   


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मेने जादूगर से पूछा - आपकी कला में और भ्रष्ट नेता की कला में अंतर
क्या है ?
जादूगर बोला -मेरी कला में जो नही दीखता उसका भी अस्तित्व बना
रहता है और भ्रष्ट नेता की कला में जो बचा है वह भी गायब हो जाता है।

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रविवार, 14 अक्तूबर 2012

चोर बाजार

चोर बाजार 

शहर की गलियों में चोर बाजार का नजारा साप्ताहिक देखा जा सकता है।चोर बाजार में
चोरों की काफी जातियां देखने को मिल जाती है।कुछ कच्चे चोर,कुछ पक्के चोर,कुछ
लुख्खे चोर,कुछ अनुभवी चोर ,कुछ उठाईगीरे तो कुछ सफेद कॉलर .....!!

   चोर बाजार की खासियत यह होती है कि वहाँ जो माल होता है वह आम जनता का होता
है, चोरों को उस सामान की कीमत नहीं देनी पडती है! माल जनता का बिना कीमत के
हासिल करते हैं और उसी जनता को कीमत लेकर बेच देते हैं!!

  कच्चे चोरों की ढेरियों में पुराना माल होता है मगर सफेदपोश की ढेरियों में यकीनन
बढिया माल होता है।

मेने एक सफेदपोश चोर से पूछा -चोर जी, (आजकल चोरों को भी अदब से बोलना पड़ता है
वरना अपने लम्बे हाथों से मुसीबत खड़ी कर देते हैं) आप बढिया माल सस्ते में क्यों बेच
देते हैं ?

  सफेदपोश चोर बोला- हमारा मकसद चोरी करके पूरा का पूरा ह्ड्फ करना नहीं रहता है
हम चोरी करते हैं वो भी आँखों में धुल झोन्क  कर ..हमे लोग चोर मानने भी संदेह करते हैं
लोग हमारी इज्जत करते हैं .जब हम उन्हें उनका माल सस्ते में लुटाते हैं तो वो हमारा
आभार मानते हैं।समाज में मान सम्मान भी मिलता है तथा लोग और-और की रट  लगाये
हमारे इर्दगीर्द घूमते रहते हैं।

हमने पूछा- चोर जी , आप इन कच्चे चोरों के बारे में  भी कुछ सोचते होंगे?

वो बोले - ये कच्चे चोर ही हमारी बदनामी का कारण बनते हैं।पूरी योजना से काम नहीं करते
और उजुल -फिजूल चोरियां करते रहते हैं। कच्चे चोरों की वजह से आम जनता हमे भी शक
से देखने लग जाती है।हम चाहते हैं कि ये कच्चे चोर शातिर चोरों से शिक्षण ले ताकि इज्जत
पर आँच ना आये।

हमने पूछा- क्या आपको भी इज्जत की परवाह  होती है ?

वो बोले- हम क्या झुग्गी बस्तियों वाले नजर आते हैं,अरे!हम भी अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग
हैं ,बड़े घरों से ताल्लुक रखते हैं .....ये तो धंधा ही ऐसा है ,इस वास्ते करते हैं।

हमने पूछा- आदरणीय (आधुनिक समय में सम्मान देने का चलन है), पक्के चोर भी कभी
पकड़े जाते हैं  ?

    वो बोले - वैसे तो शातिर चोर घाघ होते हैं,आगे-पीछे की सोच कर काम करते हैं।ये तो
अहंकारवश या फिर स्टिंग ओपरेशन से फँस जाते हैं मगर चलते पुर्जे होने के कारण कभी
इन पर अपराध साबित नहीं होता है।ये हमारे प्रियपात्र होते हैं।

हमने पूछा- आप श्री श्रीमंत , पक्के और अनुभवी चोर में कोई बुनियादी फर्क बतायेंगे ?

वो बोले- क्यों नहीं, अनुभवी चोर खुद अपने हाथों से चोरी नहीं करता है सिर्फ चोरी की योजना
समझाता है और हिस्सा बटोर लेता  है।पक्का चोर उस योजना पर सतर्कता से काम करता है।

 हमने पूछा - श्रीमान (ये अपने को आदर्श घरानों के बताते हैं इसलिए ये इसके हकदार माने
जाते हैं), उठाईगीरे की आपकी नजर में क्या परिभाषा है?

  वो बोले- ये हमारी बिरादरी के नहीं हैं , ये तो वे लोग हैं जो बिना काम के हैं,ना तो इनके घर में
कुछ माल मिलता है ना ही ये हमारी सहायता करते हैं।ये लोग तो पाँच -दस की चोरी करते भी
नहीं हिचकाते।हम जल्दी ही इनको जनता के हाथों पिटवायेंगे।

हमने पूछा- आप अपने धंधे के भविष्य को कैसा देखते हैं ?

वो बोले-  इस देश में यह धंधा कभी फेल नहीं होगा क्योंकि यहाँ की जनता लापरवाह,भोली,
भुल्लकड़ है।यहाँ के लोग सज्जन हैं ,डरपोक हैं ,असंगठित हैं।इन्हें अपने झगड़ो से भी कभी
फुरसत नहीं मिलती है क्योंकि ये अलग-अलग  जातियों में बँटे हैं।ये लोग जब पड़ोसी के घर
चोरी होती है तो खुश हो जाते हैं .......... हा हा हा !!

चोर महाशय को हँसता देख हम अपनी कमजोरी को भांप कर वहां से खिसक लेते हैं .........।                 

शनिवार, 13 अक्तूबर 2012

लूट सके तो लूट .......

लूट सके तो लूट .......

ये तुलसी के राम नाम की लूट तो नही है मगर इसके काफी करीब जरुर है।राम के नाम
की लूट में इस लूट में कुछ फर्क है,राम नाम की लूट पर सबका समान अधिकार है और
इस लूट में जिसके हाथ में लाठी है उसके हाथ ही भेंस है।तुलसी के राम नाम को नही लूटने
पर पछताना पड़ता है और इस लूट में भी पछताना पड़ता है सिर्फ समय का फेर है तुलसी
अन्तकाल में पछताने की बात करते हैं तो इसमें पाँच साल की ही मर्यादा है उसके बाद
जनता चाहे तो एक्सपायरी डेट डाल सकती है।

      लूट डाकू भी करते थे सा'ब, मगर अक्ल से नही करते थे सिर्फ दुसाहस के बल पर करते
थे  मगर यह लूट दुसाहस के बल पर नही अधिकार पा कर और पाने के पश्चात दुरूपयोग
करके की जाती है। डाकूजी की लूट में बेचारे को काफी तकलीफ थी क्योंकि सिस्टम का
सहयोग नही था  मगर इसमें वो तकलीफ नही है सिस्टम के टूटे भागे अस्थि पंजर पूरा
सहयोग करते हैं। डाकू को लूट के पश्चात बीहड़ों का रुख करना पड़ता था मगर इसमें यह
परेशानी नहीं है,लूट के पश्चात आराम से कुर्सी पर चिपक सकते हैं।लूट के पैसे को भी डाकू
देश की गुफाओं और  घने बीहड़ों  में छिपाते  थे  मगर इस लूट में  बेखटके लूट का पैसा
सात समुंदर पार भेज सकते हैं।

   तुलसी की लूट में समय की मर्यादा बीच में जाती है क्योंकि रात-दिन तो लूट नहीं सकते
राम का नाम,आवश्यक काम में तुलसी की लूट में व्यवधान आ जाता है  मगर इस लूट में
व्यवधान नहीं है जब आपका जी जाता ,लूट मचा लो,इस लूट को अंजाम देने के लिए पहले
दिमाग की जरूरत भी नहीं थी  मगर कुछ समय से विद्रोही चिंचडे इस कदर चिपकने लग
गये हैं कि सावधानी आवश्यक है।

     तुलसी के राम नाम की लूट में और इस लूट में एक बुनियादी फर्क भी है।राम नाम की
लूट जो लुटेरा बनता है उसके खाते में ही जमा होती है ,लूट के धन का हस्तांतरण नहीं है,
मगर इस लूट में हस्तांतरण आराम से किये जा सकता है।इस लूट को  बेटे,दामाद किसी
के नाम पर भी हस्तांतरण कर सकते हैं या किसी के नाम पर भी ऋण दिखा कर भी जमा
कर सकते हैं।

    तुलसी के राम नाम की लूट में परलोक सुधरता है ,वर्तमान लोक में सुधार हर किसी की
नजर नहीं आता क्योंकि तुलसी की लूट में दिखावा नहीं होता ,जगत पर कम और आत्मा
को लाभ ज्यादा होता है मगर इस लूट में लोक सुधरता है और परलोक होता भी है इस पर
सोचने की जरूरत नहीं है।यह लूट जगत को दिखाई देती है और उड़ते पंखिड़े चाटुकारिता के
गीत भी गाते हैं।

  तुलसी के राम के नाम को लुटने के लिए ध्यान ,सुचिता,शुद्धता और एकाग्रता की जरूरत
पडती है मगर  इस  लूट  में  इसमें में से एक भी गुण की जरूरत नहीं पडती है। इस लूट में
ईमानदारी का नकाब पहन कर भी लाभ पाया और दिलाया जा सकता है।इसमें समान विचार
वाले लुटेरे जनता की सेवा,पूजा,अर्चना के नाम पर मिलझुल कर लूट सकते हैं।

   तुलसी के राम नाम की लूट में पापी और परोपकारी का भेद नहीं है जैसे ही राम नाम का
रंग लगता है पाप भी तिरोहित होने लग जाता है मगर अफसोस ...इस लूट में यह सुविधा
नहीं है। इस लूट में आम जनता को अलग रखा जाता है क्योंकि वही तो बकरा है ......!!         

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

सीख

सीख 

1.गली की सडक पर एक व्यक्ति ने रात की बासी रोटियाँ फ़ेंक दी। गली के कुत्ते जो आराम से
पास-पास पड़े उंग रहे थे वे रोटियाँ देख कर उनकी ओर लपक पड़े।रोटियाँ काफी थी मगर
कुत्ते आपस में झगड़ पड़े।कोई भी कुत्ता रोटी नहीं खा रहा था ,एक दुसरे पर गुर्रा रहे थे और
काट रहे थे तभी दूसरी गली का एक कुत्ता वहां आ गया।सभी कुत्ते चोकन्ने हो गए और सब
मिलकर बाहर के कुत्ते पर पिल्ल पड़े।बाहर का कुत्ता बड़ी मुश्किल से खुद को बचाता हुआ
गली से निकल पाया।

2.गली की सडक पर एक व्यक्ति ने रात की बासी रोटियाँ फ़ेंक दी। गली के कुत्ते जो आराम से
पास-पास पड़े उंग रहे थे वे रोटियाँ देख कर उनकी ओर लपक पड़े।रोटियाँ काफी थी मगर
कुत्ते आपस में झगड़ पड़े।कोई भी कुत्ता रोटी नहीं खा रहा था ,एक दुसरे पर गुर्रा रहे थे और
काट रहे थे तभी दूसरी गली का एक कुत्ता वहां आ गया।उसने देखा रोटियाँ भी खूब पड़ी है
और ये एक ही गली के कुत्ते लड़ रहे हैं क्यों नहीं इनकी लड़ाई को और बढ़ा दिया जाए ताकि
रोटियों से पेट भर सके। उस कुत्ते ने आपस में लड़ रहे कुत्तों के कान के पास जाकर कुछ
कहा उसके बाद तो गली के कुत्ते और ज्यादा भोंक- भोंक कर लड़ने लगे और बाहर वाला कुत्ता
आराम से पेट भर कर चलता बना।

3. गली की सडक पर एक व्यक्ति ने रात की बासी रोटियाँ फ़ेंक दी। गली के कुत्ते जो आराम से
पास-पास पड़े उंग रहे थे वे रोटियाँ देख कर उनकी ओर लपक पड़े।रोटियाँ काफी थी मगर
कुत्ते आपस में झगड़ पड़े।कोई भी कुत्ता रोटी नहीं खा रहा था ,एक दुसरे पर गुर्रा रहे थे और
काट रहे थे तभी दूसरी गली का एक कुत्ता वहां आ गया।उसने देखा रोटियाँ भी खूब पड़ी है
और ये एक ही गली के कुत्ते लड़ रहे हैं,ना तो ये रोटियाँ खुद खा रहे हैं और हो सकता है उसे भी
ना खाने दे।कुत्ते ने एक उपाय सोचा और गली के कुत्तों के कान के पास जाकर कुछ कहा।सभी
कुत्ते गुर्राना बंद कर रोटियों के ढेर की ओर गये और बाहर वाले कुत्ते के साथ मिलकर प्रेम से
पेट भरने लगे।

परिस्थिति नंबर एक यह सिखाती है कि घर के भीतर भले ही आपस में मतभेद हो मगर बाहर
के लोग उन मतभेदों पर टाँग अडाने लगे तो सब मिलकर उसका प्रतिकार करे ताकि परिवार की
अखंडता पर खतरा ना आ पाए।

परिस्थिति नंबर दौ यह सिखाती है कि आपस की कलह के कारण हाथ में आया अवसर भी
चला जाता है और उसका फायदा गैर लोग उठा ले जाते हैं।

परिस्थिति नंबर तीन यह सिखाती है आपस का मतभेद यदि मिलकर नहीं सुलझाया जा सके
तो बाहर के किसी योग्य,निष्पक्ष व्यक्ति द्वारा शांति पूर्ण हल निकला लिया जाए ताकि सब
प्रेम से जी सके।

         

बुधवार, 10 अक्तूबर 2012

जीने की कला

जीने की कला 

एक व्यक्ति बार-बार जीवन में आ रही विषम परिस्थितियों से तंग आकर निराश हो गया।
प्रतिकुल स्थितियों के कारण एक रात घर छोड़ कर जंगल की और चल दिया।जंगल में
एक संत का आश्रम था। उस व्यक्ति ने सोचा- जंगल में मारा-मारा फिरने की बजाय क्यों
नही संत का चेला बनकर वीतरागी बन शेष जीवन व्यतीत कर लिया जाये? ऐसा विचार
कर वह संत के आश्रम की ओर चल पड़ा।

          उस व्यक्ति ने संत को नमन किया और संत के समक्ष शेष जीवन वीतरागी बन कर
जीने की अपनी चाहना को भी रख दिया।

     संत ने पूछा- तुम वैराग्य क्यों धारण करना चाहते हो?

वह व्यक्ति बोला - इस संसार में कोई सार नजर नहीं आता,हर कोई दु:खी है,हर समय कोई
ना कोई संघर्ष और विषम परिस्थिति आती रहती है। मेरे जीवन में भी काफी मुश्किले आती
रही,मैं लड़ते-लड़ते तंग आ गया इस कारण संसार से मौह भी खत्म हो गया , अब शेष जीवन
प्रभु के नाम में व्यतीत करना चाहता हूँ।

  संत ने कहा - तुम आज की रात यहाँ आराम करो,कल मेरे साथ जल्दी उठ के जंगल में
चलना।

    दुसरे दिन भोर के समय वह व्यक्ति साधू के संग जंगल की ओर चल पड़ा। संत उसे
दलदल से भरे सरोवर के किनारे ले गया और बोला -इस सरोवर में उतर कर कुछ कमल के
फूल तोड़ लाओ ?

  वह व्यक्ति सरोवर की और कुछ कदम बढ़ा,उसके पैर कीचड़ में धँसने लगे।कदम दर कदम
वह गहरा धँसता जा रहा था कहीं और ज्यादा ना धंस जाए यह सोच कर वह रुक गया और
बाहर की और लौट आया।

संत ने पूछा- तुम वापिस क्यों लौट आये ?

उस व्यक्ति ने कहा - दलदल से डरकर।

 उसका उत्तर सुनकर संत बोले -तुम यहीं रुको मैं कमल पुष्प लेकर आता हूँ।

 संत ने उस सरोवर का निरिक्षण किया और एक लम्बा रास्ता तय कर कमल पुष्प ले आये
और उस व्यक्ति से कहा -तुम पुष्प लाने में असमर्थ क्यों रहे ?

उस व्यक्ति ने कहा -खुद को कदम दर कदम दलदल में फँसते देख कर।

तुम दलदल में क्यों फँसे ? संत ने पुन: प्रश्न किया।

वह व्यक्ति बोला - इसका कारण मैं नही जानता .........

संत ने कहा -तुमने सरोवर का पूरी तरह से निरिक्षण नहीं किया और नजदीक के रास्ते से
तुरंत पुष्प ले आने के चक्कर में दलदल में धँस गये।अब तुम वापिस अपने घर लौट जाओ
और आगे से जो भी काम करो उसके पहले पूरी तरह हर आने वाली परिस्थिति का अवलोकन
करो,रास्ता चाहे लम्बा हो उसे चुन लो मगर जल्दबाजी में दलदल से भरे छोटे रास्ते को मत
चुनो तब तुम्हें यह संसार सुन्दर लगेगा ।

सार- सफलता का कोई शोर्ट -कट नहीं होता है।हर कदम धीरे उठाओ मगर ऐसा एक भी
कदम मत उठाओ की चार कदम पीछे होना पड़े।
      
               

मंगलवार, 9 अक्तूबर 2012

तीन लाइन


तीन लाइन 

एक प्रखर संत रामचरित का गान करने के लिए शहर में पधारे हुये थे।आयोजक मण्डल की
व्यवस्था के अनुसार हर दिन पाठ के आरम्भ होने से पहले व्यासपीठ पर विराजमान संत
का स्वागत करना होता था।एक दिन के लिए मेरा भी नाम स्वागतकर्ता में लिखा था।

       मैं उहापोह की स्थिति में था।मेरे मन में बार-बार एक सवाल कौंधता था कि श्री संत
के स्वागत करने के योग्य मैं  हूँ? मैं आत्मचिंतन करता रहा।

        नियत दिन मेरा नाम भी स्वागतकर्ता के रूप में मंच से पुकारा गया। मैं मंच पर नहीं
पहुँचा क्योंकि मेरी आत्मा मुझे मना कर रही थी।

       कथा के विराम के बाद आयोजक मंडल के सदस्य ने मुझसे पुछा -"आप संत श्री का
स्वागत करने मंच पर नहीं पहुंचे ,क्या आप नियत समय पर नहीं आये थे?

  मेने कहा -"ऐसी बात नही थी,मैं कथा श्रवण के लिए सही समय पर पहुँच गया था लेकिन
मैं उनके स्वागत करने के योग्य खुद को नहीं पा सका।

   आयोजक मंडल के सदस्य ने पूछा - आपने खुद को छोटा क्यों समझा ?

 मेने कहा -उसके कुछ कारण थे।जब आध्यात्मिक संत के स्वागत करने की बात आई तो
मैं पुराने ख्यालो में खो गया था। जब मैं कक्षा दौ का विद्यार्थी था,हमारे शिक्षक श्रुतिलेख के
समय एक वाक्य लिख देते थे और हमें उस लाइन को बार-बार लिखना होता था। हमारे
शिक्षक लिखाते थे -
                          1.सदा सत्य बोलो।

                          2.बड़ों का आदर करो।

                          3.दीन- दुखियों की सेवा करो।

मैं अभी तक इतने सालों के बाद भी पूर्ण रूप से ये तीन बातें भी अमल नहीं कर पाया हूँ
इसलिए मेरा साहस नहीं हो पाया कि मैं संत के स्वागत कर्ता के रूप में मंच पर हाजिर
हो पाऊं।            

शनिवार, 6 अक्तूबर 2012

गुण-अवगुण


गुण-अवगुण 

एक हलवाई चीनी के बताशे बना रहा था।चीनी के गोल में एक कंकड़ गिर गया और कड़ाई
में तल कर बताशे से चिपक गया। उस कंकड़ ने बताशे से कहा - तेरे साथ तला जाने के
कारण अब मैं भी बताशा बन गया हूँ।

बताशे ने कहा - मेरे आवरण में छिप जाने से तेरे अन्दर छिपी कठोरता कम नही हो जाने
वाली है।तुम मेरे सम्पर्क में जरुर आ गये मगर तुम्हारी कठोरता और अहं कम नहीं हुआ
है।तेरा यह झूठा दिखावा भविष्य में सामने आने ही वाला है।

  अगले दिन उस हलवाई की दूकान से एक ग्राहक ने बताशे खरीद लिये।वह कंकड़ भी
बताशे के मोल बिक गया।उस कंकड़ ने बताशे से कहा -तुम तो कह रहे थे कि मेरी कठोरता
सामने आ जायेगी मगर देख,आज मैं तेरे मूल्य के बराबर हो गया हूँ।

बताशे ने कहा -गुण और अवगुण कभी छिपते नहीं हैं,समय आने पर प्रगट हो जाने वाले हैं।

          उस ग्राहक ने बताशे घर लाकर दूध में डाल दिये।दूध के सम्पर्क में आते ही बताशे ने
 कंकड़ से कहा -अपने-अपने गुण-अवगुण की परीक्षा का समय आ गया है ,मैं तो अपने मूल
स्वरूप रस में परिवर्तित हो जाऊँगा और तुम कंकड़ ही रह जाओगे ?

  कंकड़ ने कहा - तुम स्वरूप बदल सकते हो तो मैं भी रूप बदल कर महीन रेत में बदल
जाऊँगा।

 उबलते हुए दूध में बताशे और कंकड़ ने रूप बदल लिया।कंकड़ बारीक रेत  बन गया  और
बताशा रस बन गया । उस ग्राहक ने उस दूध को पी लिया और कंकड़ तथा बताशा उसके
शरीर में पहुंच गये।शरीर में पहुंचने के उपरान्त महीन मिट्टी बने कंकड़ ने बताशे के
रस से कहा -मैं भी तुम्हारे साथ दूध में घुल कर यहाँ आ गया हूँ ,अब बोलो गुण और अवगुण
में क्या फर्क रहा।

           बताशे ने कहा- गुण और अवगुण में काफी फर्क होता है।समय आने पर मालुम पड़
 जाएगा।

 शरीर की ग्रन्थियों ने बताशे के रस को अलग किया और उसे  मनुष्य के खून में पहुंचा दिया
और महीन रेत  बने कंकड़ को अलग किया और अवशिष्ट मार्ग से बाहर निकाल दिया।

सार- छली लोग साधुता का संग करे या वेश बदल ले मगर उनके अवगुण देर-सवेर प्रगट
हो ही जाते हैं।